इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

बुधवार, 31 मार्च 2010

भाड में जाए ब्लोग्गिंग मैं छोड रहा हूं इसे ........अजय कुमार झा ....



भाड में जाए ब्लोग्गिंग मैं छोड रहा हूं ........कारण स्पष्ट है बिल्कुल ......





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क्या हुआ जी .............???????????

आज के दिन कुछ छोडने के लिए इससे अच्छा और क्या हो सकता था ...आखिर मूर्ख दिवस यानि अप्रैल फ़ूल डे है भाई ..........और हां कसम है उसे जो आये और बिना टीपे जाए ...। चाहे गुस्सा ही सही ..............अप्रैल  फ़ूल .........मुबारक हो ।

ये निर्मल हास्य है .........इसे अन्यथा न लें .....यार जब मैंने नहीं लिया तो आप क्यों लें ....मुझे पता है बहुत मार पडने वाली है मगर क्या करूं .....आखिर अप्रैल फ़ूल भी तो मनाना है न ..........

सोमवार, 29 मार्च 2010

हिंदी ब्लोग्गिंग भी करवट बदल रही है , कुछ पोस्ट झलकियां …….

 

अब कोई कह के दिखाए कि हिंदी ब्लोग्गिंग में गंभीरता नहीं दिखती । पिछले कुछ दिनों में आई पोस्टों और उनपर हुई बहस ने बता और जता दिया है कि आने वाले समय में हिंदी ब्लोग्गिंग पर हो रही हलचल, विमर्श , बहस और उसका निष्कर्ष के बहुत बडे मायने होंगे । और इतना ही नहीं सबसे खुशी की बात तो ये है कि हिंदी ब्लोग्गिंग को विस्तार देने के लिए ..एक साथ ही बहुत सारे प्रयास शुरू किए जा रहे हैं । अभी ज्यादा कहना थोडी जल्दबाजी होगी मगर हमने विचार किया है कि भविष्य में एक ब्लोग्गर कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा , जो बहुत सी तकनीकी बातों को साझा करने के लिए जाना जाएगा । खैर, अब आज की कुछ पोस्टों की झलकियां देखिए ….

 

Sunday, 28 March 2010

We all shit, we all pee but never talk about it - 2

बंबई में फिल्‍म रिपोर्टिंग करते हुए जब तक मैं खुद इस दिक्‍कत से नहीं गुजरी थी, मेरे जेहन में ये सवाल तक नहीं आया था। पब्लिक टॉयलेट यूज करने की कभी नौबत नहीं आई, इसलिए उस बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन अब अपनी दोस्‍त लेडी डॉक्‍टर्स से लेकर अनजान लेडी डॉक्‍टर्स तक से मैं ये सवाल जरूर पूछती हूं कि औरतों के बाथरूम रोकने, दबाने या बाथरूम जाने की फजीहत से बचने के लिए पानी न पीने के क्‍या-क्‍या नतीजे हो सकते हैं? कौन-कौन सी बीमारियां उनके शरीर में अपना घर बनाती हैं और आपके पास ऐसे कितने केसेज आते हैं। मेरे पास कोई ठीक-ठीक आंकड़ा नहीं है कि लेकिन सभी लेडी डॉक्‍टर्स ने यह स्‍वीकारा किया कि औरतों में बहुत सी बीमारियों की वजह यही होती है। उन्‍हें कई इंफेक्‍शन हो जाते हैं और काफी हेल्‍थ संबंधी कॉम्‍प्‍लीकेशंस। कई औरतें प्रेग्‍नेंसी के समय भी अपनी शर्म और पब्लिक टॉयलेट्स की अनुपलब्‍धता की सीमाओं से नहीं निकल पातीं और अपने साथ-साथ बच्‍चे का भी नुकसान करती हैं। यूं नहीं कि ये रेअरली होता है। बहुत ज्‍यादा और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। खासकर जब से औरतें घरों से बाहर निकलने लगी हैं, नौ‍करियां करने लगी हैं और खास तौर से ऐसे काम, जिसमें एक एयरकंडीशंड दफ्तर की कुर्सी नहीं है बैठने के लिए। जिसमें दिन भर इधर-उधर भटकते फिरना है।

 

Sunday, 28 March 2010

We all shit, we all pee but never talk about it - 2

बंबई में फिल्‍म रिपोर्टिंग करते हुए जब तक मैं खुद इस दिक्‍कत से नहीं गुजरी थी, मेरे जेहन में ये सवाल तक नहीं आया था। पब्लिक टॉयलेट यूज करने की कभी नौबत नहीं आई, इसलिए उस बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन अब अपनी दोस्‍त लेडी डॉक्‍टर्स से लेकर अनजान लेडी डॉक्‍टर्स तक से मैं ये सवाल जरूर पूछती हूं कि औरतों के बाथरूम रोकने, दबाने या बाथरूम जाने की फजीहत से बचने के लिए पानी न पीने के क्‍या-क्‍या नतीजे हो सकते हैं? कौन-कौन सी बीमारियां उनके शरीर में अपना घर बनाती हैं और आपके पास ऐसे कितने केसेज आते हैं। मेरे पास कोई ठीक-ठीक आंकड़ा नहीं है कि लेकिन सभी लेडी डॉक्‍टर्स ने यह स्‍वीकारा किया कि औरतों में बहुत सी बीमारियों की वजह यही होती है। उन्‍हें कई इंफेक्‍शन हो जाते हैं और काफी हेल्‍थ संबंधी कॉम्‍प्‍लीकेशंस। कई औरतें प्रेग्‍नेंसी के समय भी अपनी शर्म और पब्लिक टॉयलेट्स की अनुपलब्‍धता की सीमाओं से नहीं निकल पातीं और अपने साथ-साथ बच्‍चे का भी नुकसान करती हैं। यूं नहीं कि ये रेअरली होता है। बहुत ज्‍यादा और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। खासकर जब से औरतें घरों से बाहर निकलने लगी हैं, नौ‍करियां करने लगी हैं और खास तौर से ऐसे काम, जिसमें एक एयरकंडीशंड दफ्तर की कुर्सी नहीं है बैठने के लिए। जिसमें दिन भर इधर-उधर भटकते फिरना है।

पेपरवेट

क्रिकेट तमाशा बनकर रह गया है

प्रसून जोशी Monday March 29, 2010

पिछले दिनों मैंने आईपीएल के कुछ मैच देखे। क्रिकेट के इस नए फॉर्मैट में पिछले साल की तुलना में और अधिक ग्लैमर जुड़ा हुआ देखकर मैं हैरान था। सोचता हूं कि हम किसी भी चीज का कितना बाजारीकरण कर सकते हैं? गौर किया जाए तो इस खेल का अपना एक चरित्र है। जिस तरह हर इंसान का डीएनए उसके मूल स्वरूप की पहचान होता है, उसी तरह हर खेल का भी एक डीएनए होता है।
मेरी नजर में क्रिकेट इंसान के चरित्र को निर्मित करता है। व्यक्ति में धैर्य, रणनीति, एकाग्रता, सूझबूझ पैदा करता है और उसकी मानसिक सोच को प्रभावित करता है। मगर जिस तेजी से इस खेल में बदलाव हो रहा है, ऐसे में क्या इसका मूल स्वरूप बचा रह पाएगा? यह सवाल उठाना स्वाभाविक भी है और जरूरी भी।

गलत हाथों में फंसकर बर्बाद हुई जिंदगीimage

किरन बेदी Monday March 29, 2010

वह लड़की कोलकाता से दिल्ली आई तो थी पैसा कमाने, पर वक्त ने कुछ ऐसी करवट बदली कि वह गलत हाथों में फंसकर रह गई। पूर्व महिला आईपीएस अधिकारी किरन बेदी बता रही हैं उसकी की कहानी, उसी की जुबानी...

मेरा नाम मीरा है। मेरी उम्र 26 साल है और मैं प्राइमरी पास हूं। मैं कोलकाता की रहने वाली हूं। मेरी मां सरकारी नौकरी करती है। मेरा एक छोटा भाई और एक बड़ी बहन है। वह दिल्ली में रहती है और घरों में काम करने के लिए लड़कियां उपलब्ध कराने वाला छोटा सा प्लेसमेंट ऑफिस चलाती है।

 

रविवार, २८ मार्च २०१०

परिकल्पना ब्लॉग उत्सव को प्रायोजक मिला

कहा जाता है कि यदि चाहत सबल हो तो लक्ष्य मुश्किल नहीं होता । जब मैंने परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की उद्घोषणा की थी तब शायद मुझे भी यकीन नहीं था कि यह आयोजन अपने मुकाम को प्राप्त करेगा , क्योंकि यह धुंध में उगे लक्ष्य रुपी पेंड की मानिंद अस्पष्ट दिखाई दे रहा था । उस पेंड पर बैठी चिड़िया की आंख देखना तो दूर वह चिड़िया भी मुझे दिखाई नहीं दे रही थी । खैर मेल के माध्यम से प्राप्त आपके बहुमूल्य सुझाव और काफी संख्या में विभिन्न विषयों पर प्राप्त रचनाओं से मेरा मनोबल बढ़ा ....सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि इस उत्सव के परिप्रेक्ष्य में कई वरिष्ठ सृजनकर्मियों की शुभकामनाएं भी प्राप्त हुई है ।

Sunday, 28 March 2010

..और इस बार फ्लाईट छूटी..(केरल यात्रा : संस्मरण -१)

लीजिये ,एक अल्पान्तराल के बाद फिर हाजिर हूँ .इस बीच विभागीय कार्य  से केरल यात्रा कर आया .सोचा था कि इस बार यात्रा की अपनी परेशानियों जिनसे अपुन का  चोली दामन का साथ है से ब्लागर मित्रों को बिलकुल भी क्लांत नही करूंगा .घर में तो "जहाँ जाईं गग्घोरानी तहां  पड़े  पत्थर पानी ' के कहावत को चरितार्थ करने वाला तनखैया घोषित हो ही चुका हूँ अब ब्लागजगत में भी अपनी यह लंठ इमेज रूढ़ करना खुद के फेवर में नही - किसी के साथ यात्रा आमंत्रण का  स्कोप भी खत्म !-कौन चलेगा हमारे साथ, जहाँ पग पग प्रयाग की कौन  कहें पग पग परेशानियां मानो स्वागताचार के लिए खडी हों .मगर मैं इसे दूसरे नजरिये से भी देखता हूँ -अपनी परेशानियों से अगले को कुछ सीख मिल जाए तो चलो परेशानियाँ भी सार्थक हो जाएँ .हाँ अगर अगला पहले से ही होशियार हो और मेरी तरह ही गोबर गणेश न हो तो बात दीगर है -मगर वो कहते हैं न कि दूसरो के अनुभव से बुद्धिमान   सीखते हैं और अपनों से मूर्खजन!

 

Monday, March 29, 2010

मन की तरंग

आज से कुछ दिनों तक अपनी पुरानी डायरी से चुनी रचनाएँ ब्लॉग पर रख रहा हूँ .
देखिये भाती हैं या नही

अंतर्ज्ञान
ज्ञान से दृष्टिकोण बदलतें हैं
अंतर्ज्ञान से दृष्टि ही बदलती है
......................
जागना
जागना हो तो जगत की हर चीज पर जागो
सोना है तो विचारों से भी सो जाओ

 

तेरे अहसास से        image

 

Posted on March 29, 2010 by वीर

 

जकड़ता है दर्द अंदर मुझे,
पिघलता हूँ तेरे अहसास से…

बरसों से जमी है नमी आँखों में,
सिमटता हूँ तेरे अहसास से…

थी ख़ामोशी की आदत बरसों से मुझे,
थोडा डरता हूँ तेरी आवाज़ से…

कहीं बेखुदी मेरी ना पी जाये तुझे,
मैं बिखर ना जाऊं तेरे अहसास से..

 

मेजर जोगेन्दर की शहादत पर...

Monday 29 March 2010

सुना था कि सुबह सूर्य की प्रथम किरण निकलने से ठीक पहले की बेला सबसे शुभ बेला होती है पूरे दिन की। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं और शास्त्रों में भी लिखा है, तो शायद सही ही बात होगी। किंतु उस दिन...इस मनहूस बीस मार्च की सुबह की ये कथित शुभ-बेला उतनी शुभ नहीं थी और अब तो शायद ता-उम्र शुभ नहीं रही मेरे लिये। गहरी-से-गहरी नींद में डूबा हुआ मानव-शरीर हल्के शोर-शराबे या धमाके से जाग जाता है एकदम ही। किंतु बीस मार्च की सुबह की उस शुभ-बेला में हुआ एक धमाका सोये हुये जोगी को जगाने की बजाय एक चीर-निद्रा में सुला गया, कभी नहीं जगने के लिये। जोगी...जोगेन्द्र शेखावत...मेजर जोगेन्द्र शेखावत
अभी ही तो आया था वो इस सुलगती घाटी में पोस्टिंग पे। बस दो ही महीने तो हुये थे। ऊपर ऊँचे पहाड़ों पे जमी बर्फ की सफेद चादरों पर कुछ संदेहास्पद पद-चिह्न दिखे थे हैलीकाप्टर से। उन्हीं पद-चिह्नों की तहकीकात करने जोगी को भेजा गया था। सात घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद सुबह तीन बजे सुस्ताने और चंद देर की झपकी मारने हेतु लिया गया विश्राम, जोगी को हमेशा के लिये छीन ले गया हमसब से। हमारे प्रशिक्षण के दौरान ही हमें अपने हथियारों-आयुधों को अपने शरीर का ही एक अंग- एक महत्वपूर्ण अंग मान कर चलने की सिखलाई दी जाती है। राइफल तो अक्सर ही अर्धांगिनी की उपाधि पाती है। शरीर के अंग बने उन्हीं चंद आयुधों में से एक ग्रेनेड का फट जाना जोगी के लिये प्राण-घातक साबित हुआ।

 

Saturday, March 27, 2010   

विवाह संस्था को अवैध घोषित किया जाय या कम से कम इसे मान्यता तो न दी जाय

विवाह संस्था नारी शोषण का मूल है। अब स्थापित पुरुष प्रधान समाज ने यह एक ऐसा हथियार हजारो साल पहले ढूढ़ा जिसने मातृसत्तात्मक समाज को पितृसत्तात्मक बना दिया । बहुकाजी स्त्री को बर्बर शारीरिक बल के अधीन कर दिया गया और यौन शुचिता की बेड़ियों में उसके अस्तित्त्व को इस तरह कस दिया गया कि उसे निहायत प्राकृतिक विधानों पर भी आत्मघृणा होने लगी - मासिकधर्म । पुरुष स्वप्नदोष या वीर्यपात पर कभी लज्जित नहीं रहा या हुआ लेकिन नारी का रजोस्राव काल उसे अपवित्र और जाने क्या क्या बना गया। सबके मूल में कारण एक है - विवाह संस्था द्वारा नारी स्वतंत्रता का तिरोहण। यह पुरुष का 'मास्टर स्ट्रोक' था।  

 

Sunday, March 28, 2010

माता पिता का सम्मान करें

कभी कभी हम आक्रोश में आकर अपने माता या पिता को इस कदर बुरा भला कर देते हैं की उनके ह्रदय को बहुत आघात होता है | पर उस समय हम ये क्यूँ भूल जाते हैंकि ये वही माता पिता हैं जिन्होंने हमे इस काबिल बनाया की हम इस समाज में सर उठाकर चल सकें | हम ये क्यूँ भूल जाते हैं की ये वही माता पिता हैं जिन्होंने अपनी खुशियों का गला घोंट कर हमारी खुशियों को पूरा किया | एक मात या पिता अपने औलाद स ये उम्मीद कभी नहीं करते हैं की ये बड़ा होकर हमारी झोली भर देगा वो सिर्फ यही सोचते हैं की जिस औलाद का हमने बचपन में हाँथ पकड़कर चलना सिखाया है वो बुढ़ापे में हमारा हाँथ थमेगा | अतः आप सभी स यही अनुरोध है की गुस्से में आकर कभी भी अपने माता पिता को बुरा भला न कहे |

 

देश में एक पाठक्रम लागू करने के अभियान को जोर का झटका

29.3.10

देश में एक पाठक्रम लागू करने के मानव संसाधन विकास मंत्रालय व नेशनल करीकुलम फ्रेमवर्क (NCF-2005) के अभियान को जोर का झटका लगा है। राष्ट्रीय पाठक्रम के तहत पहले चरण में एनसीईआरटी ने विज्ञान, गणित और हिंदी की किताबें तैयार कीं लेकिन उसकी विषयवस्तु और भाषा को लेकर विवाद खड़ हो गया है। सरकार के सभी बदलाव पहले सीबीएसई स्कूलों में लागू होते हैं लेकिन इस बार मामला उलटा नजर आ रहा है। सीबीएसई स्कूलों ने एनसीईआरटी की नई किताबें पढ़ने से मना कर दिया है।

 

Monday, March 29, 2010

सवेरा ...

दूर क्षितिज में सूरज डूबा
साँझ की लाली बिखर गयी
रात ने आँचल मुख पर डाला
चाँद की टिकुली निखर गयी
ओस की बूँदें बनी हीरक-कणी
जब चन्द्र-किरण भी पसर गयी
तारे टीम-टीम मुस्काते नभ पर
जुगनू पूछे जुगनी किधर गयी ?

 

March 2010

आपके १८ वर्षीय बच्चे का आत्म विश्वास - सतीश सक्सेना

 

१८ वर्ष होने के अपने मायने हैं , वयस्क होते ही कानून से कुछ अधिकार अपने आप मिल जाते हैं ! इस उम्र तक आते आते बच्चों की अपेक्षाएं भी बढ़ी होती हैं  ! माँ बाप के उचित सहयोग से बच्चों में आत्मविश्वास और अपने बड़ों के प्रति आदर भावना विकसित होनी स्वाभाविक होती है !

 

रविवार, २८ मार्च २०१०

अल्पना के ग्रीटिंग्स की एक प्रदर्शनी-आर्ट गैलरी रायपुर मे-27मार्च से 31 मार्च तक

 

ललित शर्मा द्वारा निर्मित

सृजनशील हाथ सृजन कार्य मे निरंतर लगे रहते हैं, यह एक साधना है, इस साधना से नई कृतियों का जन्म होता है, जिसमें सृजनकर्ता की वर्षों की मेहनत लगी रहती है। जब उचित समय आता है तभी वह संसार के सामने आती हैं। आज एक ऐसी जुनुनी महिला सृजनकर्ता श्रीमति अल्पना देशपांडे जी से आपका परिचय कराते हैं, अल्पना जी जो हैंडमेड (हस्त निर्मि्त) ग्रीटिंग कार्ड के संग्रहण एवं निर्माण का दीवानगी की हद तक शौक है।

इनके संग्रह में अभी तक 12,345 के लगभग हस्त निर्मित ग्रीटिंग कार्ड हैं, जिसमें कुछ हजार इनके द्वारा निर्मित हैं, बाकी मित्रों द्वारा निर्मित हैं। अल्पना जी के ग्रीटिंग कार्डस में इतनी विभिन्नताएं हैं कि अगर हम उन्हे निर्माण सामग्री एवं उनकी विशेषताओं के आधार पर विभाजित करें तो कई हजार विभाग बन जाते हैं।

 

Sunday 28 March 2010

दुष्यंत और शंकुन्तला के बीच कौन सा संबंध था?

शकुन्तला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, “शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देख कर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।” शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया। कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुन्तला से बोले, “प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउँगा।” इतना कहकर महाराज ने शकुन्तला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये।

 

सोमवार, २९ मार्च २०१०

पत्र पत्रिकाओं के लिए ,ब्लोग पोस्टों पर आधारित मेरा साप्ताहिक स्तंभ "ब्लोग बातें" शुरू


पिछले काफ़ी समय से विचार करते करते आखिरकार आज जाकर हिंदी ब्लोग की पोस्टों पर आधारित और विभिन्न समाचार पत्रों के लिए मेरा नया कालम " ब्लोग बातें " शुरू हो ही गया । ये विचार तो काफ़ी पहले से मन में आ रहा था मगर हर बार कुछ अलग अलग कारणों से और कुछ अपने आलस्य के कारण योजना टलती जा रही थी । मगर अब जाकर ये सुनिश्चित हो ही गया है कि सोमवार के सोमवार मेरे द्वारा एक स्तंभ जो कि सप्ताह भर में किसी एक विषय या किसी एक खास मुद्दे के इर्दगिर्द लिखी गई पोस्टों का संकलन और विश्च्लेषण करता हुआ होगा । और बहुत जल्दी ही आपको उसकी छपी हुई प्रति ब्लोग औन प्रिंट पर देखने को मिलेगी । मेरा प्रयास ये होगा कि उन सभी ब्लोग्स को इसकी सूचना भी प्रेषित करूं ।

 

दैनिक जागरण में 'दुधवा लाईव'

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सोमवार, २९ मार्च २०१०

बुढ़ापा     image

-- मनोज कुमार

देवी मां के दर्शन के लिए पहाड़ की ऊँची चढ़ाई चढ़ कर जाना होता था। सत्तर पार कर चुकी उस वृद्धा के मन में अपनी संतान की सफलता एवं जीवन की कुछेक अभिलाषा पूर्ण होने के कारण मां के दरबार में शीष झुकाने की इच्‍छा बलवती हुई और इस दुर्गम यात्रा पर जाने की उसने ठान ली। चिलचिलाती धूप और पहाड़ की चढ़ाई से क्षण भर को उसका संतुलन बिगड़ा और लाठी फिसल गई।

 

लधुकथा - नकली मुठभेड़          image

डी.आई.जी. सुधांशु अपने कक्ष में आज अकेले बैठे हैं। तभी डी.वाय.एस.पी. शर्मा ने उनके कमरे में प्रवेश किया। शर्माजी आज बहुत खुश थे। उनकी प्रसन्नता छिपाए नहीं छिप रही थी। वे उत्साह में भरकर डी.आई.जी को बता रहे थे कि सर! आज हमें बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। हमारी टीम ने दो आतंककारियों को पकड़ने में सफलता हासिल की है। इतना ही नहीं हमने उन्हें सारे सबूतों के साथ पकड़ा है।

 

बस जी आज के लिए इतना ही ………..उम्मीद है कि आपको ये पोस्टें पसंद आएंगी और मेरा प्रयास सफ़ल होगा …….

बुधवार, 24 मार्च 2010

आज चर्चा सांझ सकारे : लिंक्स हैं प्यारे प्यारे

 

 

हमें क्या पता था कि आपको हमरी कट पेस्ट भी गुड बेटर बेस्ट लगने लगेगी । आप सब न एक दम झूठे हैं जो कुछ भी धर दें आप कह देते हैं बढिया है । अब हमको तो लगेगा ही कि बढिया है …लिया जाए आज की चर्चा भी झेलिए …

 

 

फलों से डर लगता है!

image प्रभु की दया से हम सब लगभग सामान्य लोग हैं। किसी तरह की विकलांगता का अनुभव नहीं करते है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि समाज का एक बहुत बडा तबका जो पूर्ण रूप से सामान्य नहीं है उनकी बडी उपेक्षा होती है। मैं ने इस बात को पिछले तीन महीनों में अच्छी तरह महसूस किया है।

तीन महीने पहले डाक्टर बेटे ने पहचान लिया कि मुझ में डायबटीज के लक्षण दिखने लगे हैं। बस आननफानन में जांच करवाई और और तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिये। फिलहाल मैं ने सीमा को हल्के से पार किया है लेकिन उसका कहना है कि अब यहीं बने रहने के लिये फलमिठाई, मीठी चाय, ठंडे पेय आदि को एकदम तिलांजली देना जरूरी है। मैं एक अनुशासित व्यक्ति हूं अत: सब कुछ मान लिया। लेकिन अब परेशानी यह है कि किसी के घर जाओ तो न तो चाय पी सकते हैं न मिठाई खा सकते है। सेवचिवडा खाकर कब तक आदमी जी सकता है।

 

गदहा जी कहिन (व्यंग)

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हाय रे ये बैरी मन ना जाने क्या क्या विचार देते रहता है , अब देखिये ना कल मेरे मन में एक विचार आया की क्यूँ ना किसी का साक्षात्कार लिया जाये …. एक सुबह जो घर से निकला तो शाम होने को आई, लेकिन कोई ऐसा नहीं मिला जो मुझे साक्षात्कार देने को तैयार हो | अचानक मेरा ध्यान सड़क की दूसरी तरफ आराम फरमा रहे गदहा जी पर गया | मेरे अन्दर से आवाज़ आई की क्यूँ ना आज गदहा जी का ही साक्षात्कार लिया जाये? आखिर एक गदहा का साक्षात्कार एक गदहा ही ले सकता है , इस विचार से ओत-प्रोत मन ही मन अपनी ही प्रशंसा करता हुआ गदगद हो गदहा जी के पास पहुंचा |

धुल धूसरित गदहा जी आराम फरमाने के मूड में थे ,अत: उन्होंने मेरी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया | लेकिन मैं भी ठहरा एक पत्रकार, गदहा जी को साष्टांग प्रणाम किया (आगे से ही , क्यूंकि पीछे से साष्टांग करना…. कहा जाता है की इनकी दुलत्ती मे इन्द्र के वज्र का सा प्रहार देखा जा सकता है..अब ..आप समझ ही सकते है.) और अपने आने का प्रयोजन बताया | गदहा जी बहुत खुश हुए .. अपने चार बड़े बड़े दांत दिखा कर उन्होंने मेरा स्वागत किया और मेरे प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हो गये | आईये.. गदहा जी से मेरे लिए गये साक्षात्कार से आप भी रु -ब- रु होकर मुझे अनुगृहित करे | हाँ एक बात और…. इस साक्षात्कार के दौरान गदहा जी कई बार अत्यधिक उत्साह में ढेचु ढेचु भी करने लगते थे, अत: उनकी इन बातों को मैंने साक्षात्कार में शामिल नहीं किया है |

 

 

ऐसा क्यों कि हमारे डॉक्टर देश छोड़ विदेश की ओर मूंह मोड़ रहे हैं---image

भारत में करीब ३०० ऍम सी आई द्वारा स्वीकृति प्राप्त मेडिकल कॉलिज हैं , जिनमे से करीब ३५००० छात्र प्रति वर्ष मेडिकल डिग्री प्राप्त कर डॉक्टर बनते हैं। हालाँकि डॉक्टरों की संख्या वांछित डॉक्टर पोपुलेशन रेशो के हिसाब से काफी कम है। फिर भी प्रति वर्ष पास होने वाले डॉक्टरों में से लगभग २०-२५ % अंततय: देश छोड़कर विकसित देशों की ओर कूच कर जाते हैं, एक सुनहरे भविष्य की कामना में ।

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Wednesday 24 March 2010

500 वाँ आलेख, 50000 चटके और बेटी का जन्मदिनimage

28 अक्टूबर 2007 को जब तीसरा खंबा का पहला आलेख लिखा गया था तब सोचा भी न था कि ये तकरीबन ढाई वर्ष का समय यूँ ही निकल जाएगा। बस एक लक्ष्य था सामने कि मुझे देश को न्याय व्यवस्था की जरूरत और न्याय प्रणाली की जरूरतों के बारे में लिखना है। लोगों को बताना है कि  हम जिस न्याय प्रणाली पर गर्व करते हैं। उस की शासन को कोई परवाह नहीं है। वास्तव में वह इसे मजबूरी समझता है। इस बिंदु से आरंभ करने के उपरांत तीसरा खंबा बहुत सोपानों से गुजरा।

 

Wednesday, March 24, 2010image

कुछ बुलबुले....

कुछ बुलबुले

कुछ बुलबुले देख कर

ख़ुश हो जाती हैं
ज़िन्दगानियाँ

भूल जाते हैं कि
जब ये फूटेंगे तो
क्या होगा !

हाथ रिक्त

आसमाँ रिक्त 

रिक्त सा जहाँ होगा

 

 

Wednesday, March 24, 2010image

कामयाब होना है, घर की चीज़ों की बात सुनिए...खुशदीप 

हर घर कुछ न कुछ कहता है...नेरोलक पेंटस का ये एड आपने कभी न कभी ज़रूर देखा होगा...मैं कहता हूं घर क्या, घर का हर कमरा, कमरे की हर चीज़ भी आप से कुछ न कुछ कहती है...यहां तक कि सफलता का मंत्र भी बताती हैं...यकीन नहीं हो रहा न...तो लीजिए, खुद ही पढ़िए कमरे की हर चीज़ आपसे कैसे मुखातिब है....

 

Wednesday, 24 March 2010

लघुकथा------------------------>>>दीपक 'मशाल' 

पूजा के लिए सुबह मुँहअँधेरे उठ गया था वो, धरती पर पाँव रखने से पहले दोनों हाथों की हथेलियों के दर्शन कर प्रातःस्मरण मंत्र गाया 'कराग्रे बसते लक्ष्मी.. कर मध्ये सरस्वती, कर मूले तु.....'. पिछली रात देर से काम से घर लौटे पड़ोसी को बेवजह जगा दिया अनजाने में.
जनेऊ को कान में अटका सपरा-खोरा(नहाया-धोया), बाग़ से कुछ फूल, कुछ कलियाँ तोड़ लाया, अटारी पर से बच्चों से छुपा के रखे पेड़े निकाले और धूप, चन्दन, अगरबत्ती, अक्षत और जल के लोटे से सजी थाली ले मंदिर निकल गया. रस्ते में एक हड्डियों के ढाँचे जैसे खजैले कुत्ते को हाथ में लिए डंडे से मार के भगा दिया.
ख़ुशी-ख़ुशी मंदिर पहुँच विधिवत पूजा अर्चना की और लौटते समय एक भिखारी के बढ़े हाथ को अनदेखा कर प्रसाद बचा कर घर ले आया. मन फिर भी शांत ना था...
शाम को एक ज्योतिषी जी के पास जाकर दुविधा बताई और हाथ की हथेली उसके सामने बिछा दी. ज्योतिषी का कहना था- ''आजकल तुम पर शनि की छाया है इसलिए की गई कोई पूजा नहीं लग रही.. मन अशांत होने का यही कारण है. अगले शनिवार को घर पर एक छोटा सा यज्ञ रख लो मैं पूरा करा दूंगा.''
'अशांत मन' की शांति के लिए उसने चुपचाप सहमती में सर हिला दिया.
दीपक 'मशाल'

 

“उत्तराखण्ड का प्रवेश-द्वार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

Wednesday, 24 March 2010

बरेली से पिथौरागढ़ राष्ट्रीय-राजमार्ग पर

विगत दो वर्षों से मुँह चिढ़ाता

उत्तराखण्ड का प्रवेश-द्वार

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बरेली के रास्ते कभी आप उत्तराखण्ड पधारें तो-

उत्तर-प्रदेश के मझोला कस्बे से थोड़ा सा आगे निकलने पर उत्तराखण्ड की सीमा में प्रवेश करते ही यह खण्ड-खण्ड प्रवेश द्वार आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा!

ऐसा नही है कि मण्डी समिति के के पास इस बोर्ड को ठीक कराने के लिये धन नही है!

किन्तु मुख्य बात तो यह है कि भिखारियों के घर यदि बाहर से सुन्दर होंगे तो उन्हें भिक्षा कौन देगा?

 

बनारस की सुबह

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 23 मार्च 2010, 14:43 IST

सुबहे बनारस यानी बनारस की सुबह.

सुबह पाँच बजे बनारस की सड़कों पर लगता है कि सारे रास्ते सिर्फ़ घाट की ओर जाते हैं, चाहे वह दशाश्वमेध घाट हो या फिर अस्सी घाट.

देश-दुनिया से आए लोगों के झुंड घाटों की ओर जाते दिख जाते हैं. रिक्शे पर, ऑटो रिक्शा पर और ज़्यादातर पैदल.

दुकानें सुबह होने से पहले ही सज जाती हैं. फूल की, नारियल-प्रसाद की और चाय की.

भीख माँगने वाले भी घाट की सीढ़ियों पर जम जाते हैं

 

मंगलवार, २३ मार्च २०१०

कानून से इतर.......
प्रस्तुतकर्ता प्रज्ञा पर १०:२७ AM

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवाहपूर्व सेक्स या लिव इन रिलेशनशिप अपराध नहीं और दो वयस्कों के बीच संबंध को रोकने के लिए किसी कानून की व्यवस्था नहीं... मैं भी ये मानती हूं कि सेक्सुअल रिलेशन कंपलीटली किसी का निजी मामला होता है.. लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष से मैं सहमत नहीं हूं... और आगाह करना चाहूंगी ऐसे जोड़ों को जो विवाह पूर्व ऐसे संबंधों में हैं या संबंधों में जाना चाहते हैं...
इसकी कई वजहें हैं... अगर दोनों लोग प्रैक्टिकल हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर साथ रहने के दौरान कोई भी एक पार्टनर संबंधों को लेकर सीरियस हो गया और किन्हीं वजहों से ये संबंध टूट गया तो जो व्यक्ति सीरियस है उसकी ज़िंदगी तो बर्बाद हुई समझो...

 

घर को जाता हूँ

Posted on March 24, 2010 by वीर image

घर को जाता हूँ…

बहुत कुछ बिखरा है वहाँ,
टुकड़े हैं मेरे कुछ फर्श पर|

दीवारों पर धबे हैं मेरे झूट के|
फीका पड़ गया हैं इनका रंग… इन्हें धोना है |
घर को जाता हूँ…

 

Wednesday, March 24, 2010image

haiku-rang

हूक हिय की

बरबस छलकी

भीगी दुनिया

 

नक्सलवादी आंदोलन के संस्थापक कानू सान्याल नही रहे image

प्रस्तुतकर्ता HARI SHARMA on Tuesday, March 23, 2010

आज के समाचर पत्रो की छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण  खबर है कि नक्सल आन्दोलन के जनक और सच कहे तो स्वतन्त्र भारत के सबसे सन्घर्षशील व्यक्तित्व कानू सान्याल नही रहे.उनका शव हाथीघीसा स्थित उनके घर में रस्सी से लटका हुआ पाया गया. पुलिस मान कर चल रही है कि पिछले कुछ समय से विभिन्न बीमारियों से परेशान कानू सान्याल ने आत्महत्या की है  यह सोचकर तो दिमाग का दिवाला निकल गया कि इस महा नायक ने आत्म हत्या की. मुझे यकीन नही होता

 

Wednesday 24 March 2010

चहबच्ची......इसराफील........और मैं ..............सतीश पंचम

चहबच्ची
वो चहबच्ची अब कहां से खोद लाउं
छिपाये जिसमें थे दिन अमनों- सूकून के
अब तो वह जमीन भी बंट चुकी है
नपी है चहबच्ची भी जमकर जरीब से

 

धुलियाये लैंडस्‍केप में..

2 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये

जाने कैसी आवारा गोधुलि बेला है, खुले उजाड़ मैदान के एक छोर टहलते हुए लगता है मानो ग़लत पते पर आ गए हों. जैसे मैदानी नाटकीय फैलाव के किसी कोने रेज़्ड प्‍लेटफ़ॉर्म पर कोई तेलुगू बाई का राजस्‍थानी नाच हो सकता था, या प्रतापगढ़ की किसी बिसराई नौटंकी का रिपीट शो, मगर सन्‍नाटों की अधबनी कविता पसरी हुई है, इमैजिन्‍ड अतीत का मेला उखड़कर मानो हार्डकोर फ्यूचर के एक रंगहीन कैनवास में डिसॉल्‍व हो गया है. इट कुड हैव बीन द लास्‍ट पिक्‍चर शो इन द वाइल्‍डरनेस, बट इट इज़ नॉट..

 

बुधवार, २४ मार्च २०१०

राम के अनुरागी.. (रामनवमी)

राम के अनुरागी.. (रामनवमी)

राम मेरे मन में बसनेवाले है..
मेरे हर रोम में राम समाये है..
मेरे जीवन सहारे राम है..
मेरे दर्पण और अर्चन राम है..
मेरी जिह्वा भी 'राम' नाम ही रटती है..
अनुलोम-विलोम होनेवाली साँसें भी राम है..
मेरे शक्ति और स्मरण राम है..
मेरी भक्ति और भरोसा राम है...
मेरा हर कर्म राममय है..
दीवाने है राम नाम के..
सुख-दुःख नहीं रहा अब तो..
हरख-शोक भी नहीं है..
राममय हो गया है सबकुछ..
उपवन बन गए है राम के..
नहीं रहा अब क्रोध किंचित मात्र..
हर लिया है सबकुछ राम नाम ने..
राम ने मुक्त कर दिया संसार से..
सार्थक हो गया जनम..
निर्मल हो गए निर्गुण को पाकर..
कैसे कहे महिमा राम नाम की..
अनंत है परमानन्द की गुणगाथा..
कैसे कहे अनुभव राम नाम का..
एक बार राम नाम प्रयोग कर देखें,
खुद-ब-खुद परिचित हो जायेंगे...
राम नाम है अति मंगलकारी..
'जय श्री राम'
*

प्रस्तुतकर्ता **ANANYA**

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अदालती फ़ैसलों के निहितार्थ : लिव इन रिलेशनशिप , बलात्कार आदि के परिप्रेक्ष्य में


मैंने बहुत बार अनुभव किया है कि जब समाचार पत्रों में किसी अदालती फ़ैसले का समाचार छपता है तो आम जन में उसको लेकर बहुत तरह के विमर्श , तर्क वितर्क और बहस होती हैं जो कि स्वस्थ समाज के लिए अनिवार्य भी है और अपेक्षित भी । मगर इन सबके बीच एक बात जो बार बार कौंधती है वो ये कि अक्सर इन अदालती फ़ैसलों के जो निहातार्थ निकाले जाते हैं , जो कि जाहिर है समाचार के ऊपर ही आधारित होते हैं क्या सचमुच ही वो ऐसे होते हैं जैसे कि अदालत का मतंव्य होता है । शायद बहुत बार ऐसा नहीं होता है ।

 

आज डॉ अनुराग का जनमदिन है

>> बुधवार, २४ मार्च २०१०


आज, 24 मार्च को दिल की बात वाले डॉ अनुराग का जनमदिन है। इनका ईमेल पता anuragarya@yahoo.com है।

 

मंगलवार, २३ मार्च २०१० image

कबीर, जिन्हें एक साथ ही अग्नि और धरती में लीन होना पडा. .

कबीर के समय में काशी विद्या और धर्म साधना का सबसे बड़ा केन्द्र तो था ही, वस्त्र व्यवसायियों, वस्त्र कर्मियों, जुलाहों का भी सबसे बड़ा कर्म क्षेत्र था। देश के चारों ओर से लोग वहां आते रहते थे और उनके अनुरोध पर कबीर को भी दूर-दूर तक जाना पड़ता था।

 

23.3.10

एक ब्लागर की वसीयत ब्लागरो के नाम ....image

सुना है की अपने वकील बिहारी बाबू कहिन अजय झा जी ब्लागरों की वसीयत बनाने में जुटे हैं तो मैंने भी सोचा की जीते जी वकील बाबू जी से क्यों न अपनी वसीयत तैयार करवा ली जाए ताकि मरने के बाद मन में कोई ख़ुलूस न जाए की जीते जी अपनी ब्लागरी की वसीयत तैयार नहीं करवा सका . वसीयत बनने के बाद कम से कम आत्मशांति तो रहेगी . फिर दिमाग ने जोर मारा की बिहारी बाबू क्यों अपनी मर्जी से वसीयत तैयार करेंगे जब हम उन्हें लिखवायेंगे तबई न वसीयत लिखी जावेगी . मरने के पहले मै वकील बाबू से जो अपनी वसीयत लिखवाना चाहता हूँ उसका प्रारूप निम्नानुसार यह है -

 

ई महेन्द्र भाई सब ठो पोल खोल के रख दिए ..उनका वसीयत तो आप उनके ब्लोग पर पढिए ..मुदा बकिया सबका वसीयत …सीजनल वसीयत …जल्दी ही पढवाएंगे  आपको ………राम राम 

सोमवार, 22 मार्च 2010

सिर्फ़ कट पेस्ट चर्चा : कुछ ब्लोग्स लिंक्स

 

आज खाली कट पिटिया चर्चा …अरे खाली कट पेस्ट यार …..का लुत्फ़ उठाईये ….बस उठाते गए ..चेपते गए …आप भी झेलते जाईये …….

यहां घोषणा हुई कि महफ़ूज़ मियां खो गए ……

कहां महफूज़ है एक स्टार ब्लॉगर...खुशदीप

कल मैनपुरी से ब्लॉगर भाई शिवम मिश्रा का फोन आया...उन्होंने बड़ी फ़िक्र जताई कि न तो ये स्टार ब्लॉगर महोदय फोन उठा रहे हैं, न ही इनका कोई अता-पता चल रहा है...मैंने भी कहा, भैया मुझसे आखिरी बार पांच छह दिन पहले जनाब ने बात की थी...आखिरी बार ये मिस्टर हैंडसम जबलपुर के ब्लॉगरों के बीच हीरो बने हुए मीडिया से मुखातिब होते हुए देखे गए...जबलपुर में ही इनकी ननिहाल है...मुझे तो पूरा शक है कि लखनऊ के इस नवाब के हाथ-पैर नीले (पीले लड़कियों के होते हैं) करने की तैयारी चल रही है...तभी ये शख्स कहीं अंडरग्राउंड हो गए हैं....

मगर शुक्र है कि जल्द ही दूसरी घोषणा भी हो गई

सुनो सुनो सुनो.....महफूज़ मियाँ मिल गए हैं...

सुनो सुनो सुनो.....

ब्लागवुड  के सभी ख़ास-ओ-आम को इतल्ला दी जाती है....गर्ल फ्रेंड नंबर ३०१ मिल गई है....

महफूज़ मियाँ को उनके साथ देखा गया है....

हमारे खोजी कैमरे ने वो चेहरा भी कैद कर लिया है.....

देख लीजिये आप भी.....

.

 

 

मेरा फोटो

शेफाली पाण्डे  को
पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं……………क्यों खुद पढिए

तीस की उम्र में पचास की लगती हैं  

पहाड़ की औरतें  उदास सी लगती हैं

काली हथेलियाँ, पैर बिवाइयां

पत्थर हाथ, पहाड़ जिम्मेदारियां 

चांदनी में अमावस की रात लगती हैं

कड़ी मेहनत सूखी रोटियाँ

किस माटी की हैं ये बहू, बेटियाँ

नियति का किया मज़ाक लगती हैं

 

समेटना बिखरे भावों का- भाग १image


 

pearls

उस मकां से ग्रामोफोन की आवाज़ आती है
कहते हैं वो लोग कुछ पुराने ख़्यालात के हैं..
रात भर चाँदनी सिसकती रही, छत पर उनकी
वो समझते हैं कि दिन अब भी बरसात के हैं

 

 

बबूल और बांस

Babool मेरा मुंह तिक्त है। अन्दर कुछ बुखार है। बैठे बैठे झपकी भी आ जा रही है। और मुझे कभी कभी नजर आता है बबूल। कोई भौतिक आधार नहीं है बबूल याद आने का। बबूल और नागफनी मैने उदयपुर प्रवास के समय देखे थे। उसके बाद नहीं।

कौटिल्य की सोचूं तो याद आता है बबूल का कांटा – कांटे से कांटे को निकालने की बात से सम्बद्ध। पर अब तो कौटिल्य याद नहीं आ रहे। मन शायद मुंह की तिक्तता को बबूल से जोड़ रहा है। बैठे बैठे पत्रिका में पाता हूं कौशिक बसु का उल्लेख। उनके इस पन्ने पर उनके लेख का लिंक है - "Globalization and Babool Gum: Travels through Rural Gujarat". उसमें है कि बबूल का गोंद इकठ्ठा करने में पूरी आबादी गरीबी की मानसिकता में जीती रहती है।

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जो जलाता है किसी को खुद भी जलता है जरूर ..

ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जो कभी किसी से जला न हो। वह मुझसे आगे बढ़ गया, बस हो गई जलन शुरू। मैं जिस वस्तु की चाह रखता हूँ वह किसी और को प्राप्त हो गई और मेरा उससे जलना शुरू हो गया। कई बार तो लोग दूसरों से सिर्फ इसीलिये जलते हैं वे अधिक सुखी क्यों हैं। पर जो अधिक सुखी हैं वे भी अपने से अधिक सुखी से जलते हैं।
विचित्र भावना है यह जलन अर्थात् ईर्ष्या भी! आमतौर पर जलन की यह भावना असुरक्षा, भय, नकारात्मक विचारों आदि के कारण उत्पन्न होती है। क्रोध और उदासी ईर्ष्या के मित्र हैं और इसके उत्पन्न होते ही इसके साथ आ जुड़ते हैं। ये क्रोध और उदासी फिर आदमी को भड़काने लगते हैं कि तू अकेला क्यों जले? तू जिससे जल रहा है उसे भी जला। और आदमी शुरु कर देता है दूसरों को जलाना। किसी शायर ने ठीक ही कहा हैः

 

Monday, March 22, 2010

ये भी फासिस्ट, वो भी फासिस्ट

a-villani-benito-mussolini फासिज्म चाहे आज सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धांत न हो मगर इसका प्रेत अभी भी विभिन्न अतिवादी, चरमपंथी और उग्र विचारधाराओं में नज़र आता है। राजनीतिक शब्द के रूप में इसे स्थापित करने का श्रेय इटली के तानाशाह बैनिटो मुसोलिनी को जाता है।

फा सिज्म शब्द दुनियाभर की भाषाओं में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली राजनीतिक शब्दावली की चर्चित टर्म है। हिन्दी में इसका रूप फासीवाद है। हालांकि अंग्रेजी, इतालवी में इसका उच्चारण फैशिज़म होता है मगर हिन्दी में फासिज्म उच्चारण प्रचलित है।  फासीवादी विचारधारा को माननेवाला फासिस्ट कहलाता है। राजनीतिक दायरों में फासिस्ट कहलाने से लोग बचते हैं। आज की राजनीति में फासिस्ट या फासिज्म शब्द के साथ मनमाना बर्ताव होता है। अतिवादी विचारधारा से जुड़े लोग एक दूसरे को फासिस्ट कह कर गरियाते हैं। खुद को नायक समझनेवाला कभी नहीं चाहेगा कि उसे खलनायक की तरह देखा जाए।

 

Monday 22 March 2010

आस्था पर प्रश्न क्यों ? सतीश सक्सेनाimage

आज कल कुछ जगह हमारे कुछ शास्त्रार्थ पंडित एक दूसरे की हजारों वर्षों पुरानी आस्थाओं को अपनी  आधुनिक निगाह से देखते हुए,  जम कर प्रहार कर रहे हैं ! चूंकि दोनों पक्ष विद्वान् हैं अतः शालीनता भी भरसक दिखा कर अपने अपने जनमत की वाहवाही  लूट रहें हैं  !


पुराने धार्मिक ग्रंथों में समय समय पर लेखकों अनुवादकों की बुद्धि के हिसाब से कितने बदलाव हुए होंगे फिर भी पूर्वजों और पंडित मौलवियों के द्वारा पारिभाषित ज्ञान को बिना विज्ञान की कसौटी पर कसे, हम इज्ज़त देते हैं और उसमें ही ईश्वर को ढूँढ़ते रहते हैं और निस्संदेह हमें फल भी मिलता है !

Sunday, March 21, 2010

निजी इच्छा राष्ट्रीय इच्छा नहीं बन सकती!image

क्या किसी व्यक्ति विशेष की नितांत निजी आकांक्षा पार्टी की आकांक्षा या राष्ट्र की आकांक्षा बन सकती है? कदापि नहीं। अगर ऐसा होने लगे तब राजदलों और देश में घोर अराजक स्थिति पैदा हो जाएगी। न अनुशासन रहेगा, न राष्ट्र विकास के प्रति कोई गंभीरता। ये समझ से परे है कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए परेशानियां पैदा करने की कोशिश करने वाले, जी हां, कोशिश करने वाले, इस हकीकत को क्यों नहीं समझ पा रहे। शायद वे समझना ही नहीं चाहते। कतिपय किंतु-परंतु के बावजूद भारतीय जनता पार्टी की आज भी एक विशिष्ट पहचान है तो अनुशासन और सिद्धांत के कारण। जिस दिन यह समाप्त हो गया, पार्टी खत्म हो जाएगी। क्योंकि तब लोग-बाग विकल्प की चाहत को भूल जाएंगे। गडकरी ने दो-टूक शब्दों में कह भी दिया है कि सभी को खुश करना संभव नहीं।

 

रविवार, २१ मार्च २०१०

हम कमाते क्यों हैं?image

मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आदमी के नाते ये सवाल अक्सर मेरे ज़हन में आता है कि हम कमाते क्यों हैं? क्या हम इसलिए कमाते हैं कि अच्छा खा-पहन सकें, अच्छी जगह घूम सकें और भविष्य के लिए ढेर सारा पैसा बचा सकें। या हम इसलिए कमाते हैं कि एक तारीख को मकान मालिक को किराया दे सकें। पानी,बिजली, मोबाइल, इंटरनेट सहित आधा दर्जन बिल चुका पाएं। पांच तारीख को गाड़ी की ईएमआई दें और हर तीसरे दिन जेब खाली कर पैट्रोल टैंक फुल करवा सकें।

 

मेरा नाम केसर है!image


नाम : केसर
गाँव : मोत्वारा
जिला: अमीरपुर , मध्य प्रदेश
यह कहानी किसी छोटे से गाँव में रहने वाली अबला, मासूम याज़ुल्म की पीड़ित औरत की नहीं है बल्कि एक साधारण भेष मेंछुपी असाधारण केसर की है जो आजकल महानगर दिल्ली केकनाट प्लेस में फल बेचती है। दो दिन पहले फोटोग्राफी करतेहुए मेरी मुलाकात हुई केसर से। नौकरी छोड़ने के बाद से मैंअक्सर कनाट प्लेस चला जाया करता हूँ, सेंट्रल पार्क में बैठना और इन्नर सर्कल में घूमना अच्छा लगता है। मैं अभी भी नहींभुला सका केसर के वह प्यार भरे शब्द " बाबूजी आप गर्मीं में इतनी देर से खड़े हो, यह लो संतरा खा लो।" महानगर मेंइतने प्यार भरे लफ्ज सुनने को ज़माना हो जाता है। भागती हुई ज़िन्दगी में किसी के पास अपनों के लिए ही समय नहीं तोहमैं तोह अजनबी था। सुनके में एक पल को मन ही मन मुस्कुरा दिया। कुछ देर उसके पास खड़े रहने के बाद मैं चलने हीवाला था की उसने संतरा काट के मेरे हाथ में थमा दिया। यह देख के मुझसे रुका नहीं गया और मैंने अपना बैग वहीँ रख दिया और बैठ के संतरे का लुफ्त लेना शुरू कर दिया। वाकई संतरा बहुत ही लाजवाब था। और जैसे की मेरी दिलचस्पलोगों के बारे में जानने की आदत है, मैंने बातें शुरू कर दी।

 

रविवार, २१ मार्च २०१०

उथले हैं वे जो कहते हैंimage


किसी भी साहित्यिक रचना या रचना संग्रह को इमानदारी से पढने वाला पाठक अगर मिल जाता है और वो उस रचना पर अपनी राय भी व्यक्त कर देता है तो यह सोने पे सुहागा हो जाता है। उस संग्रह को फिर किसी दूजे पुरस्कार आदि की आवश्यकता ही नहीं होती। मेरे पूज्य पिताजी डॉ. जे पी श्रीवास्तव के काव्य खंड " रागाकाश" के प्रकाशन के लिये जब इस पर मैं वर्क कर रहा था तो कई सारी कठिनाइयां आ रही थीं। पहली तो यही थी कि मैं बगैर पिताजी की आज्ञा के उनकी धरोहर को छापना चाह रहा था। उनकी अपने दौर में लिखी गई कई सारी रचनायें, जिसमें कइयों के कागज़ भी पुराने होकर फटने लगे थे को सहेज कर मुम्बई तो ले आया था अब बस पिताजी की आज्ञा की देर थी।

 

आज मरते मरते बचे!image

 

111300836_687a54b79b मेरे मंझले साढू भाई की बिटिया की शादी तय करने के लिये आज सुबह दो कारों पर हम नौ जने आज सुबह लगभग 150 किलोमीटर की यात्रा पर गये। एलप्पी में नाश्ते के लिये एक जानेमाने हॉटेल में उतरे और आर्डर दिया। हम लोग इंतजार कर रहे थे कि एकदम से खाकी वस्त्रधारी दस बारह लोग खिडकी के बाहर दौडते और फुर्ती से एक दूसरे को इशारा करते नजर आये।

 

Monday, March 22, 2010

देखें कार्टून...

 

Monday, March 22, 2010

बाबा नहीं, समाज पर कलंक है...

मनोज राठौर

ढोंगी, पाखंडी, राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ भीमानंद जी महाराज चित्रकूट वाले बाबा...। जो भी कहा जाए वह कम है। जितना बड़ा नाम है, उसे भी बड़ा कारनामा। दिल्ली समेत देश में वेबसाइड के जरिए गंदगी फैलाने वाला भीमानंद इस समय जनता की आंख की कीचड़ बन गया है। उसके प्रति लोगों का क्या नजरिया है। यह एक अंधा व्यक्ति भी सुनकर बता सकता है। बाबा की महिमा देखने वाली है। उनके गिरोह के लोग ग्राहक को अभिनेत्रियों की सप्लाई करने तक का दावा करता है। सोच पर थू-थू।

 

Monday, March 22, 2010

अदालतें भी तो अपने गिरेबान में झांकें

क्या वह दिन आने वाला है कि जब अदालतों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा और लोग इसके फैसलों को मनाने से इनकार कर देंगे। क्या भारत की अदालतें भी सांप्रदायिक ध्रवीकरण का शिकार हो रही हैं। इस जैसे ही कुछ और सवाल हैं जो आम आदमी के मन में इस समय कौंध रहे हैं। हाल ही में हुई कुछ घटनाओं के बाद इस तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं।

 

सोमवार, २२ मार्च २०१०image

विज्ञान का वास्‍तविक तौर पर प्रचार प्रसार काफी मुश्किल लगता है !!

भारतवर्ष में फैले अंधविश्‍वास को देखते हुए बहुत सारे लोगों , बहुत सारी संस्‍थाओं का व्‍यक्तिगत प्रयास अंधविश्‍वास को दूर करते हुए विज्ञान का प्रचार प्रसार करना हो गया है। मैं उनके इस प्रयास की सराहना करती हूं , पर जन जन तक विज्ञान का प्रचार प्रसार कर पाना इतना आसान नहीं दिखता। पहले हमारे यहां 7वीं कक्षा तक  विज्ञान की पढाई अनिवार्य थी , पर अब सरकार ने 10वीं कक्षा तक विज्ञान की पढाई को अनिवार्य बना दिया है । 10वीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढाने वाले एक शिक्षक का मानना है कि कुछ विद्यार्थी ही गणित और विज्ञान जैसे विषय को अच्‍छी तरह समझने में कामयाब है,  बहुत सारे विद्यार्थी विज्ञान की नैय्या को भी अन्‍य विषयों की तरह रटकर ही पार लगाते हैं । उनका मानना है कि एक शिक्षक को भी बच्‍च्‍े के दिमाग के अनुरूप ही गणित और विज्ञान जैसे विषय को पढाना चाहिए। जो विज्ञान के एक एक तह की जानकारी के लिए उत्‍सुक और उपयुक्‍त हों , उन्‍हें अलग ढंग से पढाया जाना चाहिए, जबकि अन्‍य बच्‍चों को रटे रटाए तरीके से ही परीक्षा में पास करवाने भर की जिम्‍मेदारी लेनी चाहिए।उनका कहना मुझे इसलिए गलत नहीं लगता , क्‍यूंकि एक एक मानव की मस्तिष्‍क की बनावट अलग अलग है।

 

गहराइयाँ लबालब -----image

किसी की निगाहों से उतर गया पानी
किसी की निगाहों में ठहर गया पानी
कतरा-कतरा ओस मोती बन गया था
हवा के एक झोके से बिखर गया पानी

कब तक रहोगे हालात के गिरफ्त में
उठो, देखो तो सर से ऊपर गया पानी

 

दैनिक जागरण में 'अनिल पुसदकर'

 

बस जी ई कटपिटिया चर्चा समाप्त हुई …….ई तो ससुर एकदम ईजी था जी ….हमको जादे मजा नहीं आया …ऊ झाजी वाला टच नहीं न दिए

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