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मंगलवार, 28 जून 2011

एक बौराया , भन्नाया आम आदमी - झा जी कहिन





नेट पर टहलते हुए एक आम आदमी
कुछ तथ्य मिले पिछले दिनों , सोचा आपके साथ बांटता चलूं । इन्हें पढते हुए आपको ठीक ठीक अंदाज़ा हो जाएगा कि फ़िलहाल देश , दुनिया और समाज की स्थिति कैसी चल रही है ।देश में पिछले दस वर्षों में शराब की खपत में छ: गुनी वृद्धि हुई है । बताइए ये उस देश का हाल है जहां पर सुना है कि देश के सभी राजनीतिक दल और उसके नेता जी गांधी बाबा के दर्शन को मानते हैं । वे बेचारे क्या क्या सोच कर गए थे और अब सरकार जाने क्या क्या सोच रही है । यदि यही हाल रहा तो पूरी उम्मीद है कि सरकार जल्दी ही किसी नई योजना के तहत , पाईप लाईन द्वारा सीधे घरों में मदिरा सेवन की सुविधा दे सकेगी । आखिर अब देश विश्व का सबसे बडा बाज़ार बनने जा रहा है तो इतनी सुविधाओं का हक तो बनता ही है ।



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देश में आज स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्था सुना है कि , "हॉस्पीटल टूरिज़्म "तक के स्तर पर आ पहुंचा है , कमाल की सफ़लता है ये तो , अमरीका तक के बीमार चले आ रहे हैं और ओबामा जी को रोकने के लिए बैरिकेड लगाने पड रहे हैं । लेकिन इसके बावजूद एक आम आदमी जब ईलाज़ के किसी भी अस्पताल जाता है तो उसे जो भी दवाई की पर्ची मिलती है , उसमें से आधी दवा , अस्पताल के ठीक सामने खुली दवाई की दुकान से लाने के लिए कह दिया जाता है । अब इन दोनों के बीच का अर्थशास्त्रीय रिश्ता एक आम आदमी के पल्ले तो नहीं पडता , बेशक प्रधानमंत्री उच्च कोटि के अर्थशास्री हैं उनके पड जाता हो ।



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लो जी एक और सुना जाए प्रभु । एक अनुमान के अनुसार इस देश में धर्मस्थलों की संख्या , स्कूलों की कुल संख्या की साढे चार गुनी अधिक है । वाह वाह , वाह वाह , ये होता है , सभ्य , सुंसकृत , सदाचारी , धार्मिक , सुशील , सज्जन , मगर निरक्षर देश । वैसे एक अन्य हिसाब से भी प्रति धर्मस्थल के बेनिफ़िशयरी के हिसाब से प्रति स्कूल के कर्मचारी , रोजगार की संभावना भी कुछ कम नहीं है । देख नहीं रहे हैं , एक ट्रस्ट , पूरे भ्रष्ट को अकेला टक्कर दे रहा है । सवाल सबसे बडा ये है कि जब हमने पाप करने की रफ़्तार के बराबर ही धर्मस्थल बना लिए हैं तो फ़िर ,इसे कलियुग तो न ही माना जाए न ।


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सवाल नारी के अधिकारों का उठाइए तो जरा , अरे नहीं नहीं रिजर्वेशन को मारिए गोली । संसद में रिजर्वेशन लाने से कौन सा बडा तीर चलेगा ये किसी से छुपा नहीं है ,असली मुद्दा ये है कि आखिर ये समझा ही क्यों  जाए कि नारी को अधिकारों के लिए कुछ हासिल करना है । कुछ यूं महसूस कराइए न उन्हें या वे खुद ही महसूस कर लें कि बस जो सब हैं वो हम हैं , हाड मांस निर्मित मानुस जात । लेकिन आम आदमी ठिठक तब जाता है जब सुनता है कि अबला की रक्षा हेतु तैनात होने वाली सबलाएं और सशस्त्र सबलाएं भी किसी की हैवानियत का शिकार बन गईं , मतलब , अरे , ये क्या बात हुई भला । आखिर किस कारण ने उसे अपने पिस्तौल की छ: गोलियां उस हैवान के सीने में उतारने से रोका था , तो आरक्षण से कौन सी हिम्मत पैदा करोगे


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लगभग एक साथ , एक ही पन्ने पर , प्रांत लिख कर नीचे खबर छपी होती हैं , और अक्सर छपी होती हैं । दाएं कॉलम में , जालंधर के सरकारी गोदामों में लाखों क्विटंल गेहूं बरसात के पानी में सड रहा है । बाएं कॉलम में , उडीसा के किसी जिले में दो परिवारों के भूख से मर जाने की खबर छपी होती है । आम आदमी फ़िर परेशान हो जाता है वो यही सोचता है कि जब एक जिले का रिपोर्टर अनाज की सडती बोरियों तक और दूसरा भूख से जाती जानों तक पहुंच ही जाता है तो फ़िर आखिर अन्न का दाना भूखे पेट तक क्यों नहीं पहुंचाया जा सका । अगर हो सकता तो खबर भी क्या कमाल हुआ करती , है कि नहीं ।

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आम आदमी साला चकरघिन्नी बनके घूम ही रहा होता है कि पता चलता है कि सरकार हर रोज़ अपनी नेकनीयती , अपनी ईमानदारी का सबूत खुद प्रधानमंत्री जी की ईमानदारी को कैश करवा के देने की कोशिश करती है , लेकिन शाम तक कोई न कोई मंत्री अपने कुकर्मों का कच्चा चिट्ठा खुलवा के बैठ जाता है । और करो भारत निर्माण । आम जनता जुटी तो नाम दे दिया सिविल सोसायटी , अबे ये अगर सिविल है तो तुम कौन मिलटरी सोसायटी हो , तुम भी इसी में से एक हो , और आज आगे इसलिए खडे हो क्योंकि आम जनता ने तुम्हें आगे जाने की जगह दे दी है । अगर आम लोगों का माथा फ़िर गया न तो कुचल के पीछे करेगी कुचल के ।
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फ़िलहाल आम आदमी सोच रहा है , सोचता ही जा रहा है

शनिवार, 18 जून 2011

"जनलोकपाल" नहीं "धनलोकपाल" बिल लाएगी सरकार ..झा जी कहिन



तस्वीर , गूगल से साभार 





सरकार ने आम जनता को भरपूर आश्वासन देते हुए आश्वस्त किया है कि वो सिर्फ़ लट्ठ नहीं चला रही है और काबिल मंत्री (सरकार के काबिल मंत्री वो हैं जो खूब बोलते हैं , उनका म्यूट बटन का सॉफ़्टवेयर फ़ुंक गया है ., और ज्यादा काबिल वो हैं , जो तब भी नहीं बोलते जब उन्हें बोलना होता है ) सिर्फ़ बोल बक ही नहीं रहे बल्कि ड्राफ़्ट तैयार कर रहे हैं । ओफ़्फ़ो चेक ड्राफ़्ट वाला ड्राफ़्ट नहीं जी , अब बेचारी सरकार के पास पैसे ही नहीं बचे । अब तो मजबूर होकर सरकार को अपने खाए -पीए -अघाए और अब जेल में सुस्ताए अपने सूरमाओं की जनौती संपत्ति ( जैसे बाप की बपौती होती है , जनता के जनौती होती है ) को कुर्क ज़ब्त करके अपने खर्चे के लिए सफ़ेद धन का जुगाड कर रही है , बांकी जो सारा धन था वो तो काला हो गया । अब तो वैज्ञानिक भी मन रहे हैं कि हो न हो हाल ही में जो चांद को छिपा कर रात काली हो गई थी वो भी इसके कारण ही हुई थी । तो सरकार ये कह रही है कि अब जब जनता इत्ती लाठियां खाने के बाद भी चाहती है कि सरकार कुछ और भी पेश करे तो सरकार भी अब ड्राफ़्ट तैयार करके कुछ न कुछ तो लेकर आएगी ही ।


सरकार ने थोडी तब्दीली की मंशा ज़ाहिर की है । सरकार बोले तो कुल एक जमा एक = दो मंत्री जी ने यार दी है कि चूंकि जनता ने अपने ढंग से सोचा विचारा है और इसलिए इसका नाम "जनलोकपाल " बिल रख कर सोच रही है लेकिन सरकार का सारा ध्यान इन दिनों धन पर लगा हुआ है इसलिए सरकार जल्दी ही एक "धनलोकपाल " बिल लेकर आएगी । इस बिल से सरकार धन के लिए एक ऐसा "धनलोकपाल" नियुक्त करेगी जो धन के साथ साध धनियों को एक तरह तिहाड जाने से बचने के उपाय बताए और दूसरी तरफ़ बाबा, अन्ना जैसी तेज़ नज़रों से भी उन्हें बचाने के लिए बीस सूत्री योजना बनाए । सरकार की नज़र में तो एक "धनलोकपालिका " का नाम है भी । "धनलोकपालिका जी " ठीक "नगरपालिका" की तरह ही काम करेंगीं । न "नगरपालिका" का काम दिखाई देता है और न" धनलोकपालिका" का खाता दिखाई देगा ।


धनलोकपालिका का चयन उसी योग्यता के आधार पर किया गया है जिस आधार पर बचपन में क्रिकेट टीम के कप्तान का चयन होता था , यानि जिसका बल्ला वही कप्तान और उसी हिसाब से जिसके पास सबसे ज्यादा धन वही धनलोकपाल नियुक्त हो सकेगा ..तो आइए स्वागत करिए ..देश के नए धनपालकों का  .


मंगलवार, 7 जून 2011

सवाल सिर्फ़ उन मुद्दों का है .....झा जी कहिन




आखिरकार न्यायपालिका ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार से पूछ ही लिया कि आखिर संविधान के किस कानून के तहत रात के एक बजे इतनी भारी पुलिस बल की सहायता से वहां चुपचाप सो रहे लोगों को मार पीट कर खदेडने की कार्यवाही की गई । ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय भी इन दिनों उसी काले धन के मुद्दे पर बार बार सरकार को लताड लगाने में लगा हुआ है जिसकी पेशी में सरकार हर बार बेशर्मी से साष्टांग करके कह आती है कि , खाता धारकों ने नाम पता तो हैं लेकिन बता नहीं सकते अदालत को ।सरकार को इसका जवाब देते समय ये भी बताना होगा कि जो सरकार गुर्जरों द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर पूरी उत्तर भारतीय रेल व्यवस्था तक को ठप्प किए जाने के बावजूद उन्हें टस से मस नहीं करवा पाई , एडी चोटी का जोर लगवाने के बावजूद भी पायलटों की हडताल नहीं खत्म करवा सकी उसे आखिरकार किन कारणों से ऐसा करने के लिए मजबूर होना पडा । इससे अलग जनलोकपाल बिल के लिए लड रही अन्ना टीम ने भी सरकार की इस हरकत को देखते हुए एक दिन के अनशन का ऐलान कर दिया है । अब बात रही जनता की , तो हालिया जूता प्रकरण से ये अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है कि बंद कमरों में खास इसी मकसद से पहुंचने वाले लोगों पर राजनेता अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं तो फ़िर क्या अब सार्वजनिक तौर पर उनमें आम जनता का सामना करने की हिम्मत बची है । क्या दिग्विजय सिंह और कपिल सिब्बल जैसे नेता इतनी ही बहादुरी जनता के बीच पहुंच कर भी दिखा सकते हैं । 


पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को गौर से देखने पर कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं । रामदेव बाबा ने महीनों पहले से प्रचारित कर रखा था कि रामलीला मैदान में वे और उनके साथ खडे बैठे लोग किस उद्देश्य से इकट्ठा होने जा रहे हैं । आज बेशक सरकार ये दलील दे कि उनसे अनुमति तो योग शिविर के लिए ली गई थी आमरण अनशन के लिए नहीं लेकिन क्या सरकार ये बता सकती है कि " भ्रष्टाचार मिटाओ " के पोस्टर से अटे पडे देश पर सरकार की नज़र क्यों और कैसे नहीं पडी , क्या रामदेव ने अनुलोम विलोम या कपाल भारती करने के लिए पोस्टर लगाए थे । यानि कि सरकार को बखूबी पता था कि क्या होने वाला है । सरकार की मंशा इतनी ही साफ़ थी , जैसा कि वो दिखाने जताने की कोशिश की जा रही है तो फ़िर रामदेव को होटल के बंद कमरे में बुलाकर क्यों और कैसी वार्ता की गई । सरकार ने क्यों नहीं कहा कि विदेशों में काले धन के मुद्दे से निपटने के लिए सरकार कडा कानून लाने जा रही है फ़िर चाहे उस कानून के दायरे में फ़ंस कर कोई नेता जेल जाए या या मंत्री या बाबा । कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे बडबोले नेताओं को जानबूझ कर सरकार की तरफ़ से हर बार क्यों इस तरह के मसलों से निपटने के लिए भेजा जाता है  , इसका बेहतर कारण तो वही बता सकती है । बंद कमरे में एक चिट्ठी लिखवाई जाती है , इसके पीछे क्या मंशा रही हो ये तो वे ही जानें , लेकिन फ़िर उस चिट्ठी को सार्वजनिक करना वो भी ये कहते हुए कि सरकार ने तो अपना कर्तव्य निभा दिया और  अब बाबा रामदेव को निभाना है । क्या उस चिट्ठी को लिखवाना जरूरी थी , और उसे सार्वजनिक करना भी जरूरी था । इसके बाद जो हुआ वो अपेक्षित ही था , और घटनाक्रम को तेज़ी से बदलने के लिए सरकार ने सोती हुई महिलाओं बच्चों तक पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोडने जैसा नृशंस कदम भी उठा लिया । और अब जूता प्रकरण पर मची हुई हाय तौबा । 


यानि कुलमिलाकर ये कि सरकार को अब किसी को कोई लिखित आश्वासन दिए जाने की जरूरत नहीं है कि वो स्विस जैसे काले धन को वापस लाए जाने के लिए क्या , कब और कैसे कोई कानून बनाने जा रही है । और वो मुद्दा पीछे चला गया , कम से कम फ़िलहाल तो जरूर ही सरकार ने लोगों का ध्यान उससे हटाकर अन्य बातों की तरफ़ मोड दिया है । अब इससे पीछे चलें तो जनलोकपाल बिल के लिए जब अन्ना हज़ारे ने जनांदोलन शुरू किया था तो सरकार ने अपने सारे दांव चलने के बाद एक आश्वासन देकर जान तो छुडा ली , किंतु अगले ही दिन से सीडी प्रकरण , अन्ना हज़ारे के ट्रस्ट पर उठने वाले सवाल जैसे कदम उठाने लगी । उद्देश्य स्पष्ट था कि किसी भी तरह से सरकार लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दे से भटका कर कहीं और ले जाया जाए । अब जबकि अन्ना टीम ने बैठक का बहिष्कार का निर्णय ले लिया है तो फ़िरसे सरकार मन ही मन जरूर राहत महसूस कर रही होगी कि उसे वो कानून बनाने से फ़िलहाल तो मुक्ति मिल ही गई है जिसे आधार बना कर न सिर्फ़ सरकार को बल्कि पूरी भारतीय राजनीति और राजनेताओं को जनसेवा का असली मकसद जनता समझा सकती थी । सरकार सूचना का अधिकार कानून पास करके खुद को फ़ंस जाने देने की एक गलती पहले ही कर चुकी है इसलिए अब वो जल्दी उसे दोहराने से बचना चाहेगी । 


सरकार इन सारे घटनाक्रमों में जो एक बात नहीं समझ रही है कि , अन्ना हज़ारे या बाबा रामदेव से लोगों के जुडने का कारण सिर्फ़ उनकी अंधभक्ति या उनपर अटूट विश्वास जैसा कारण ही नहीं है बल्कि जनता अब चाहती है कि उन मुद्दों को आगे लाया जाए , उनपर बहस हो , उन पर कानून बने और ये स्थिति बदले । कल एक आम आदमी के आक्रोश का शिकार होते होते बचे राजनेता को देख कर सरकार को अब ये एहसास होना चाहिए कि जनता के दिमाग में क्या चल रहा है । पूरा देश अलग अलग तरह से अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है लेकिन उद्देश्य एक ही है कि सरकार की नीयत और आचरण में बहुत खोट है । तमाम तर्कों , बहसों और आंदोलनों पर एक मिनट में ब्रेक लग जाएगा , आम लोग भी चुप्पी साध लेंगे अगर सरकार फ़ौरन ही विशेष सत्र बुलाकर इन तमाम कानूनों को बनाए क्योंकि असली मुद्दा यही है , लेकिन क्या सरकार ऐसा कर पाएगी ? बस इसी लेकिन ने आज अन्ना हज़ारे , बाबा रामदेव और जाने कितने आक्रोशित मन को हवा दे दी है ।  

रविवार, 5 जून 2011

हां अब शुरू हुई लीला ..फ़ंस गया जनांदोलन ...





इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सिर्फ़ मौजमस्ती के अपडेट नहीं लिखे जा रहे हैं , बाकायदा मुहिम चल रही है , बहस और विमर्श किए जा रहे हैं । लोग न सिर्फ़ अपनी साहित्यिक काबलियत का परिचय करवा रहे हैं बल्कि अपनी  बौद्धिक सोच , और वैचारिक क्रांति को भी जम के धारदार बना रही है । अन्ना हज़ारे द्वारा किए जा रहे जनांदोलन में फ़ेसबुक पर चली और चलाई गई एक मुहिम इंडिया अगेंस्ट करपशन ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इस जनांदोलन से जुडाव ने ही शायद बाबा रामदेव द्वारा स्थापित स्वाभिमान ट्रस्ट के मित्रों का रूख मेरी तरफ़ मोडा , और मित्रों ने ताबडतोड मुझसे सवाल किए कि , क्या मेरा समर्थन बाबा के प्रस्तावित आंदोलन को उसी रूप में है जिस रूप में मैंने अन्ना के जनादोंलन में रुचि दिखाई थी । मैं बह्त जल्दी किसी भी बात , और व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता और यूं भी  आधुनिक भारत में बाबाओं के इतिहास ने मुझे कभी भी किसी भी बाबा का अंधभक्त बनने नहीं देता है । इसलिए पुरज़ोर तरीके से न सही किंतु मैंने अपने विचार से उन्हें अवगत करा ही दिया था कि , ये सब मुझे संतुष्टिजनक नहीं दिख लग रहा है । 



अब जबकि मामला त्रिशंकु की तरह लटक गया है तो लगा कि अब समय आ गया है कि इस नाज़ुक समय पर हर आम आदमी की तरह विचार और सोच को सामने रखना ही चाहिए । प्रबुद्ध समाज का ये दायित्व हो जाता है कि वे ऐसे समय पर जबकि पूरा देश एक परिवर्तन की लडाई लड रहा है तो उससे सहमति या असहमति, विमर्श और विचारों के सहारे समाज के सामने जरूर रखे । इतिहास गवाह रहा है कि एक व्यक्ति द्वारा संचालित कोई भी पंथ , समुदाय , आंदोलन , संस्था अक्सर बहुत सी विषम परिस्थितियों में फ़ंस जाती है और अगर किसी कारणवश उस अकेले व्यक्ति से अलग हो कुछ भी तो सब कुछ बिखर सा जाता है । बाबा रामदेव के विषय में तबसे चर्चा ज्यादा तेज़ हुई थी जबसे उन्होंने योग के अपने चमत्कारिक साधन से इतर जाकर समाज की राजनीति से होने वाली लडाई के एक सूत्रधार के रूप में ये बयान दिया कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक देश व्यापी जनांदोलन की शुरूआत करने जा रहे हैं । खासकर विदेशों में फ़ंसी हुआ भारत का काला धन लाने की उनकी मुहिम ने उन्हें देश से लेकर विदेश तक की चर्चा में ला दिया । इस समय तक बाबा अपने योग गुरूत्व के बल पर एक बहुत बडी जमात अपने अनुयायिओं और उन पर विश्वास करने वालों की खडी कर चुके थे । बाबा को पूरा यकीन था कि वे जब किसी भी जनांदोलन को प्रारंभ करेंगे तो उसमें उनका साथ देने आने वाला ये जनसमूह सरकार के लिए बडी सिरदर्दी साबित होगा । 


लेकिन इसके साथ ही बाबा के इतिहास भूगोल के पडताल की कहानी भी शुरू हो गई । तहलका समेत कई खोजी पत्रकारों ने बाबा के ज़र्रे से आसमान तक के तीव्र सफ़र का सारा राज़ अपने समाचार सूत्रों के माध्यम से कर डाला । बाबा रामदेव और उनसे जुडी हुई संस्थाओं के पास हजार करोड की अकूत संपत्ति का होना , और उनका ये कहना कि वे आगामी चुनावों में सभी सीटों से अपने प्रत्याशी खडे कर सकते हैं ने इस बात का ईशारा कर दिया था कि राजनीतिक महात्वाकांक्षा का एक पुट भी कहीं न कहीं तो पनप ही रहा है । किंतु इसके बावजूद भी जब बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काले धन को वापस लाने के अनशन की घोषणा की तो मन ही मन एक आम आदमी यही सोच रहा था कि , इस सरकार के साथ यही सलूक होना चाहिए । और इसे हर तरफ़ से घेरा जाना चाहिए । बाबा ने अन्ना के जनांदोलन से अलग अपने इस आंदोलन के लिए व्यापक तैयारी करवाई । न सिर्फ़ अनशन स्थल पर करोडों रुपए का खर्च किया गया बल्कि इस मुहिम के प्रचार के लिए भी देश को कटाआऊट और बैनरों से पाटने में भी अच्छा खासा धन लगाया गया । खैर बाबा के पास था तो उन्होंने लगाया , इसमें कोई बडी बात नहीं । 



मामला तब दुविधा में फ़ंसने जैसा हो गया जब समाचार माध्यमों में खबर आई कि अनशन शुरू होने से पहले ही सरकारी मंत्रियों ने सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए बहुत सी मांगों पर सहमति दे दी है । आगे का चिट्ठी प्रकरण , सरकार का आश्वासन , कपिल सिब्बल की राजनीतिक धूर्तता और बाबा का अब इस विकट स्थिति में फ़ंसने की सारी घटनाएं जितनी तेज़ी से घटी हैं पिछले कुछ घंटों में उससे एक अजीब ही हालात बन गए हैं । बाबा खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं । पूरे देश से आई हुई भारी जनता , जाने कहां कहां बैठे सहयोगी और अनशनकर्ता आंदोलन खुद ही दुविधा में फ़ंस गए हैं । उधर सरकार अलग ताल ठोंक रही है कि जब मांगे मान ही लीं तो फ़िर अनशन क्यों ?? मामला अब ज्यादा संगीन हो गया है और स्थिति ज्यादा नाज़ुक । सरकार की बेशर्मी का आलम तो देखिए कि केंद्रीय मंत्री कितनी बेशर्मी से कहते हैं कि बाबा की मांगों को मान लेने का मतलब ये कतई न लगाया जाए कि सरकार कमज़ोर है इसलिए झुक जाती है । वो सरकार जिससे पिछ्ले कई सालों से अफ़ज़ल गुरू और कसाब जैसे आतंकियों को फ़ांसी पर चढाने की भी हिम्मत नहीं है , वो सरकार जो चुप होकर अपने मंत्रियों को पूरा देश लूटते हुए देख रही है वो सरकार भी ऐसे दावे करती है । अब ये जनांदोलन क्या रूप लेगा ये तो भविष्य की बात है किंतु इतना तय है कि सरकार इस बात को अच्छी तरफ़ समझ रही है कि आम अवाम जो आए दिनों भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनसैलाब की तरह उमड जा रही है वो सरकार की सेहत के लिए खतरे की घंटी है । रही बात अन्ना और बाबा के जनांदोलनों और अनशन पर सवाल उठाने वालों की , तो जिस दिन कोई भी राजनेता अपने दम पर इतने सारे आम लोगों को अपने साथ खडा होने के लिए सहमत कर लेगा उस दिन गैर राजनितिक लोगों को ये बागडोर अपने हाथों में उठाने की कोई जरूरत नहीं पडेगी । फ़िलहाले तो जनता यही चाहेगी कि , ये जनांदोलन भी सरकार के ताबूत में एक कील की तरह ठुक जाए । 
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