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रविवार, 23 फ़रवरी 2014

आज चर्चियाया जाए (चिट्ठाचर्चा)




मुझे लगता है कि अब पाठकों के पास ब्लॉग पोस्टों को पढने , साझा करने और उन्हें सहेज़ने के लिए एग्रीगेटर्स की निर्भरता बहुत हद तक कम हो गई है या कि अब शायद उतनी कमी महसूस नहीं की जा  रही है , सबने अपने अपने ठिकाने और रास्ते गढ और तलाश लिए हैं , मेरे लिए तो गूगल प्लस , ब्लॉगर डैशबोर्ड के अलावा बहुत से एग्रीगेटरनुमा ब्लॉगों और नि:संदेह हमारीवाणी भी बहुत बडा स्रोत रहा है ,जहां से मैं ब्लॉगों तक पहुंचता हूं वैसे जब अपने स्टैट पर नज़र डालता हूं तो देखता हूं कि पाठकों का एक बहुत बडा वर्ग गूगल सर्च इंज़न से चला आ रहा है । ब्लॉग पोस्टों की लिंक को एक पन्ने पर सहेज़ कर पढने के लिए उपलब्ध कराने वाले सारे प्रयास भी नि:संदेह बहुत ही प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं , ऐसे में अनायास ही पुराने दिन याद हो आए ।

यहीं इस ब्लॉग पर अर्से तक हमने भी पोस्ट लिंक्स के साथ तुकबंदी करके एक पंक्ति जोड कर खूब रेल दौडाई थी जिसे पाठक मित्रों ने सराहा और स्नेह दिया था । सोचा आज अर्से के बाद आपको फ़िर से कुछ पोस्टों से मिलवाया जाए । गूगल प्लस पर पाठकों की टिप्पणी के साथ साझा होती पोस्टों पर नज़र स्वत: ही चली जाती हैं , ऐसे ही पहली पोस्ट जो मिली वो थी ,बेहद खूबसूरत कलेवर वाला ब्लॉग राजे , शीर्षक अजब सी कैद है , पढके हमें तो यही लगा कि हो न हो ये जरूर संजू बाबा के भौजी स्वास्थ्य समस्या के कारण लगाता पेरोल मिलते जाने वाली ही कैद होगी , ससुरी अजब गजब कैद तो आजकल यही चल रही है , मगर रचना बहुत संज़ीदा और गहरी निकली ,

अज़ब सी कैद है..


अज़ब सी कैद है..
अंदर हूं तो भी डर लगता है
और बाहर जाने के ख्याल से भी
कि भला होता नहीं
और सकुचा हूं
किसी बुरे के मलाल से भी

अज़ब सी कैद है..
चुकानी हैं अभी
पालने—झूलने--
कच्ची उम्र की यादों की
किश्तें
कि.. और संजो लिये
नर्म रूई.. फाहे से रिश्ते
बुलाए हैं निर्दोष फरिश्ते

अज़ब सी कैद है..
एक—एक सलाख
बड़े जतन से बनाई है
लोहे,सोने—चांदी की जंजीरे सजाई हैं

आज की तारीख में पोस्टों और टिप्पणियों में निरंतरता बनाए रखने में सफ़ल ब्लॉगर मित्रों में श्री प्रवीण पांडेय जी का नाम उल्लेखनीय है । उनकी पोस्टों में शामिल विषयों का इंद्रधनुषी फ़लक और उनकी कमाल की शैली , बहुत सारे क्लिष्ट विषयों को भी एकदम सरल बना देती है । आज कल टरेन बाबू आर्युवेद पढाने समझाने में लगे हैं , आज अपनी पोस्ट में कफ़ वात और पित्त पर घनघोर क्लास ले डाली है उन्होंने हमारे जैसे भुसकोल ब्लॉगरों की ,

"कफ, वात और पित्त, ये तीन तत्व हैं जो शरीर में होते है और कार्यरत रहते हैं। कहने को तो इनको और भी विभाजित किया जा सकता था, पर ये तत्व भौतिक दृष्टि से दिखते भी हैं और गुण की दृष्टि से परिभाषित भी किये जा सकते हैं। शरीर की क्रियाशीलता में हम इनका अनुभव कर सकते हैं। कफ का अनुभव हमें अधिक ठंड में होता है। पित्त नित ही हमारे पाचन में सहयोग करता है। वात हमारे वेगों और तन्त्रिका संकेतों को संचालित करता है। यही कारण रहा होगा कि शरीर को विश्लेषित करने के लिये इनको आयुर्वेद में आधार माना गया है।"

अगर नेट पर और फ़िर ब्लॉग्स पर आप मय श्रीमती जी के डटे हों तो फ़िर तो क्या टैंशन है जी ,कम से कम ज्यादा पोस्टें लिखने , टिप्पणियां लिखने या नेट पर ज्यादा समय देने वाले सारे इल्ज़ाम आधे आधे बांटे जा सकते हैं फ़िर जब बात मित्र अमित श्रीवास्तव और उनकी श्रीमती निवेदिता श्रीवास्तव जी की हो तो कहना ही क्या , दोनों जन ने क्या खूब जम के एक दुसरका को समर्पित पोस्ट लगाई है , अमित भाई जहां फ़ोन में कबूतर उडाते पाए गए , तो वहीं निवेदिता भाभी ने भी फ़िर अपने झरोखे में बैरी नेटवा के बहाने बैरी पिया को ही घेर लिया देखिए ,


    ( अमित जी अपने बक्से ,बोले तो डेस्कटॉप के साथ )
इधर जैसे जैसे मौसम चुनावी होता जा रहा है वैसे वैसे ही सियासी उठापटक भी तेज़ हो गई है । ऐसे में दिल्ली की प्रयोगवादी सियासत और उस पर कोई पोस्ट/प्रतिक्रिया न देखने पढने को मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता । हमारी ब्लॉग मास्टरनी शेफ़ाली पांडे जी जब अपनी लेखनी के तीखे बाण वो भी व्यंग्य के बारूद से लैस करके चलाती हैं तो वो बिल्कुल कईयों के कलेजे भेद कर आरपार उतर लेते हैं , अपनी ताज़ा पोस्ट में बखिया उधेडते हुए वे कहती हैं

"आपकी पार्टी की नीतियां स्पष्ट नहीं है । विदेश नीति, अंतर्राष्ट्रीय नीति, कश्मीर समस्या, पकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी के साथ सम्बन्ध, आर्थिक नीतियां, आतंकवाद, अमेरिका, विकास दर, नक्सल समस्या, माओवाद, जैसे अनेकानेक मुद्दे थे, जिन पर आप जनता को सालों तक उलझा सकते थे । आप आम आदमी की समस्याएं लेकर बैठ गए । जबकि आम आदमी ने अपनी समस्याओं को समस्या मानना ही छोड़ दिया था । ये आपकी ही गलती थी कि आपने उसे याद दिलाया कि जिन्हें वह महबूब के प्रेमपत्रों की तरह सीने से लगाए हुए है उसे समस्या कहते हैं ।"

चलिए समस्याओं से तो निपटते ही रहेंगे ,फ़िलहाल विवेक रस्तोगी जी घर से आटे सब्जी लेने के लिए निकले हुए हैं मगर बीच में ही रुककर वे प्रेमी युगल को निहारने लगे , जिन्हें निहार रहे थे उन्हें कैसा फ़ील हुआ देखिए  ,

"हम अपनी बिल्डिंग की पार्किंग में खड़े होकर सभ्यता से यह सब देख रहे थे, पर उन लड़कों को यह अच्छा नहीं लग रहा था, खैर जब हम गाड़ी से चाट वाले के सामने से निकले तो भी वे सब हमें घूर ही रहे थे, यह सब वैसे हमें पहले से ही पसंद नहीं है, जब हम उज्जैन में थे तब हमारी कालोनी में भी यही राग रट्टा चलता था, फ़िर हमने अपना प्रशासन का डंडा दिखाया तो बस इन लोगों के लिये कर्फ़्यू ही लग गया था।"
पत्रकार ब्लॉगर रविश कुमार इन दिनों छुट्टी पर थे , लौटे तो स्वाभाविक रूप से इस बीच उनकी तरफ़ उछाले गए प्रश्नों का जवाब लेकर ,अपनी इस पोस्ट में वे कहते हैं

"
छुट्टी पर होने के कारण इस्तीफ़े से जुड़ी ख़बरों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन आप को लेकर लोगों की इस तरह की प्रतिक्रिया बढ़ती जा रही है । आप में से कई कह रहे थे कि मेरा नज़रिया क्या है। इसीलिए नहीं लिखा क्योंकि टीवी देखा न पेपर पढ़ा । जिस दिन अरविंद इस्तीफ़ा दे रहे थे उसी वक्त मुंबई से दिल्ली उतरा था । हवाई अड्डे पर लगे टीवी सेट पर सुरक्षाकर्मी और एयरपोर्ट स्टाफ़ और कर्मचारी जुटे हुए थे । इस तबके में अरविंद की गहरी पैठ हैं । ज़्यादातर ने कहा कि सही किया है । एक सिपाही ने कहा कि इनको ज़रा बाँदा ले आइये । वहाँ भी ज़रूरत है । अगले दिन ब्रेड लेने निकला तो दुकान पर सब पेपर पढ़ रहे थे । इस तबके की यही राय थी कि कांग्रेस बीजेपी की मिल़ीभगत से बंदा लड़ रहा है । रिलायंस की राजनीतिक छवि के कारण अंबानी पर हमला करने से इस तबके में पार्टी की छवि मज़बूत हुई है लेकिन मध्यमवर्गीय तबके के एक हिस्से को यही अच्छा नहीं लगा । अगर नीचला तबक़ा अरविंद के साथ खड़ा रह गया तभी वे अपने आधार का बचाव या विस्तार कर पायेंगे लेकिन अरविंद उस तबके के प्रति उदासीन नहीं हो सकते जिसका उन पर से विश्वास हिला है ।"

हो सकता है कि अरविंद ने अपनी बात लोगों तक न पहुँचाई हो कि क्यों इस्तीफ़ा दिया । लेकिन इन लोगों की दिलचस्पी कारण में ही नहीं है। दूसरा इनमें से कई मोदी समर्थक भी हैं । जिन्हें अरविंद को एक बार के लिए मौक़ा देना था । लोकसभा में वे मोदी को देंगे । साफ़ साफ़ नहीं कहते मगर यह ज़रूर गिनाते हैं कि आप से क्यों निराशा हुई । इसलिए दूसरा चांस नहीं देंगे । "



चलिए अब कुछ वन लाइनर लिंक्स भी देखना/बांचना चाहें तो

क्या अरविंद केजरीवाल राजनीतिक हो चले हैं  :  रैली तो कर ही रहे हैं 

मंत्रीजी के नाम खत : वाया पब्लिक एंड ब्लॉग

सूरज और मैं :  अक्सर ये बातें करते हैं

हंसे जा रहा है , हंसे जा रहा है : लिखे जा रहा है , लिखे जा रहा है

जीवन संगीत : निरंतर बहता रहे

मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद :   नई हुंकार के साथ

एक चीज़ मिलेगी वंडरफ़ुल :और अगर दो चाहिए हों तो

गांव:   शहर से बहुत दूर हैं जी अब भी

अगर वह बच्चा होता : तो इस तरह ब्लॉग लिख पाता क्या

क्या कर सकता हूं :पोस्ट तो लिख ही डाली है

संविधान की प्रस्तावना : और हमारे राजनीतिज्ञों की भावना (अनुलोम विलोम)

और अब चलते चलते काजल भाई का कार्टून



रविवार, 16 फ़रवरी 2014

ये दिल्ली के लौंडे ....कुछ फ़ुटकर नोट्स



http://www.aamaadmiparty.org/sites/default/files/styles/670_x_270/public/jhadu%20chalao.jpg


आज साठ सालों के बावजूद भी अब तक क्यों नहीं ऐसा कोई कानून पहले के राजनैतिक दलो और उनके अगुआओं ने लाने का प्रयास , संजीदा प्रयास किया ..सारी जिम्मेदारी आम आदमी के कंधों पर ही । चुनाव लडने की चुनौती फ़िर जीतने के बाद सबके डर कर पीछे भागने और पहले आप पहले आप वाला नया फ़ार्मूला लगा कर पुन: आम आदमी के कंधे पर ही बोझ लादा गया कि , पुलिस , प्रशासन , कानून , व्यवस्था राजनीति और खुद आम लोगों के विरोध और असहयोग के बावजूद भी सिर्फ़ पचास दिनों में पांच सौ रिपोर्ट कार्ड भी तैयार कर दिए ...अजी छोडिए , लात मारिए इस सरकार को , हम भी यही कह रहे हैं ...लेकिन सिर्फ़ , इतना और भी बताते जाइए कि आखिर बाकी बची हुई पार्टियों को क्यों नहीं ये जिम्मेदारी दी जा रही है कि वे आएं और लाएं न वैसा मजबूत कानून , जो आपके अनुसार ही संवैधानिक और शायद कारगर भी होगा ...बात को घुमा फ़िरा कर कहना मुझे भी नहीं आता इसलिए सीधा और सपाट कहता हूं ....हां भाषाई मर्यादा का ख्याल जरूर रखने का प्रयास करता हूं । शेष सबके अपने अपने मत और अपनी अपनी विचारधारा है जिसका सदैव स्वागत किया जाना चाहिए , आप जिसे भगोडा कह रहे हैं उसे हमने मलाईदार नौकरियों के बाद मलाईदार कुर्सी को भी ठेंगा दिखाते हुए देख लिया है ....अभी तो अपनी बस थोडी सी ...इत्ती सी समझ पे यकीन रखने का मन है वही कर रहे हैं ..
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दिल्ली की नए नए लौंडों द्वारा बनाई गई अराजक सरकार औंधें मुंह गिर गई , चलो अच्छा हुआ ।ये सत्ताइस बावले अब जो मर्ज़ी करते रहें , बांकी के मिल कर देश के विकास और समस्याओं के लिए यकीनन ही कुछ बेहतर और बडा करके दिखाएंगे , हमें भी पूरा विश्वास है ...और ये बिल था क्या जी ???? फ़ालतू के क्लॉज़ ....पकडे जाने पर सारा माल जब्त ..नौकर चाकर रिश्तेदारों तक की जांच कराने का प्रावधान , कहां अभी साल छ: महीने की सज़ा , जमानत और कहां उम्र कैद ..अबे ऐसा होता है क्या ..दिस इज़ डेमोक्रेटिक कंटरी मैन

...हां संसद ने इससे पहले एक बिल पास किया तो आस्तीन चढा के छोकरे ने कैमरे के सामने ही नानसेंस कहके फ़ाड के फ़ेंक दिया ...सुना एक अलग वाले को लेकर तो चक्कूबाज़ी और मरचाई बम तक चला पाल्लामेंट में ............अरे ऊ ई नहीं किया , ऊ नहीं किया , भगोडा निकला , बेकार था , वोट बेकार गया ...........अब हो गया न ई तो ...चलिए अब आप काम पर लगिए न ...पास करिए लोकपाल विधेयक , महिला आरक्षण विधेयक , न्यायिक सुधार अधिनियम , जित्ते भी हैं फ़ाईल में ..और हां पकड पकड के ठूंसिए जेल में साले चोरों को ,घपले घोटालेबाजों को , हाकिमों और दारोगाओं को ............और नहीं करने का माद्दा है तो ..........तो फ़िर आप गरियाते रहिए ...हर नई सोच , हर नए विकल्प और हर नए प्रयास को
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आगामी लोकसभा चुनावों में यदि फ़िर से कोई राहु केतु धूमकेतु तीसरा चौथा पांचवा मोर्चा टाईप , भाजपा की कुंडली में आकर नहीं बैठ गई तो यकीनन अगली केंद्र सरकार चलाने की बागडोर भाजपा के जिम्मे ही आएगी , ये दिख और महसूस भी हो रहा है किंतु आजकल जिस तरह से देख रहा हूं ,कि भाजपा के प्रबल समर्थक अपने मिशन 2014 के लिए सकारात्मक और उर्ज़ावान माहौल बनाने की बजाय , जिस तरह से अपनी पूरी ताकत , अपनी पूरी सोच , अपनी पूरा ध्यान सिर्फ़ आलोचना में , वो भी अपने चिर प्रतिद्वंदी कांग्रेस की नहीं बल्कि देश में सिर्फ़ सत्ताइस ..सिर्फ़ सत्ताइस विधायकों वाली पार्टी पर निशाना लगा रहा है उससे तो लगने लगा है मानो भारत चीन पाकिस्तान से मुकाबले की बात छोड कर श्रीलंका भूटान को अखाडे में चुनौती देने की कवायद कर रहा हो .........
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एक दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली की नई राजनैतिक सोच और विकल्प बनकर उभरने को लेकर अन्य राज्यों के मित्र इतने व्यग्र हैं कि मानो अपने राज्यों में हो रहे नकारात्मक सकारात्मक को छोड कर सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़िरती हुई झाडू पर नज़र गडाए बैठे हैं , इत्तेफ़ाकन कि हम जैसे दिल्ली में बैठे , हम जैसे दोस्त फ़र्क को महसूसते हुए इस परिवर्तन के प्रयास को निरंतर बल दे रहे हैं वहीं अन्य प्रांतों के मित्र भी लगातार ही दिल्ली राजनीति के इस नए प्रयोग को पूरी तरह फ़ेल करार देने के लिए उद्धत हैं , अच्छा है , अगर ये प्रयास पूरी तरह से दम भी तोड देता है तो भी ये कम से कम इतना तो स्पष्ट कर ही देगा कि अब इस देश में सियासत की सूरत बदलने की सोच रखना बेमानी साबित होगा , वे कुछ भी नहीं हारेंगे , उन्होंने जीता ही क्या अब तक ..............
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मैं हमेशा इस बात में यकीन रखता हूं कि यदि हमें किसी बात ,व्यक्ति , व्यवस्था , आदि का विरोध करना है तो बेशक करना ही चाहिए , लेकिन क्या ये जरूरी है कि हम उसमें लेखकीय भाषा की थोडी सी भी गरिमा तो बनाए रखें , आखिर हम यहां उस अंतर्जाल पर लिख पढ रहे हैं जहां हिंदी में जो थोडा बहुत लिखा जो लिखा जा रहा है हम भी उसका एक हिस्सा हैं , गरियाने का मतलब ये थोडी है कि आप गली मोहल्ले को यहीं खडा कर लें ।

और हां किसी भी बहस से परे और बहुत सारी बहस के बावजूद मैं आपसे यही कहूंगा कि यदि व्यवस्था में रहकर , व्यवस्था से लडने वाले इन जैसे कुछ पागलों , बावलों पर आप यकीन नहीं करेंगे , और कोई जबरन नहीं कहेगा यकीन करने को ये तय है , तो फ़िर निश्चित रूप से आपको ये अधिकारपूर्वक कहना ही होगा कि व्यवस्था दूषित और भ्रष्ट नहीं है , बल्कि हम सब ही धूर्त , झूठे और भ्रष्ट होने को तत्पर हैं ।
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कुछ अराजकतावादियों द्वारा पेश किया गया अंसवैधानिक बिल के पेश ही न हो पाने से ये हुआ है कि अब दिल्ली वालों बिजली पानी के सारे अंबानी मार्का संवैधानिक बिल मिल सकेंगे , जल्दी ही प्रदेश पूरी तरह से संवैधानिक व्यवस्था से चुस्त दुरूस्त दिखाई देगा , कोई छापेमारी , कोई स्टिंग फ़िटिंग का चक्कर नहीं , दरोगा जी भी खुश और हाकिम भी ,,,..बकिया बचा आम आदमी ..........ऊ झाडू लगाएगा , लगाते रहो

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जरा उन लोगों को भी याद दिलाता चलूं कि इन सबके बीच उस गृहिणी की भी सोचिए कि जिसके पति पर बडका बंगला मांगने के बाद छोटका में रहने के लिए अभी जुम्मे जुम्मे आठ दिन भी तो नहीं हुए और वही क्यों पूरी बटालियन ही तो अभी शिफ़्ट हुई , अभी तो सामान जमाया भी नहीं होगा ठीक से , फ़िर वापस ....ई नाजुक जिगरे वाले के बस का नय है जी ..ई बौरहवा सब इकट्ठा हो रहा है ....भारी .............बहुत भारी पडने वाला है
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चलिए तो फ़िर आज ये भी खुल्लम खुल्ला तय करते है सचमुच ही सियासत चाहती है कि अब सडक पे रहने मरने वाला हर आम आदमी खुद उससे पंजा लडाए तो यही सही, दिल्ली को गरियाने वाले तमाम दोस्तों को पुन: आमंत्रण कि देखिए ,अगले फ़िर मैदान में आ गए हैं .....जम के गरियाइए
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देखिए जी अगर समाज से गंदगी को काटकर फ़ेंकना चाहते हैं तो फ़िर तेवर तेज़ाब सा रखना ही होगा , तेल लेने जाए कुर्सी और पोस्ट , सरकारी नौकर को खूब पता होता है छोटी बडी नौकरी का फ़र्क , ये नौकर हैं , मालिक नहीं हैं , इसलिए निश्चित रूप से यदि व्यवस्था ओह , मेरा मतलब संवैधिनिक व्यवस्था को ऐसा लग रहा था कि सिर्फ़ जांच की बात कह जाना और जांच की आंच को धधकाए रखना सरासर अराजक है तो फ़िर ऐसे नौकरों को यकीनन ही अब पद को ना कह देना ही श्रेयस्कर है .....आम आदमी को अब ये भी दिखा देना चाहिए कि हमारे ठैंगे से ..लो रखो अपनी कुर्सी और खेलो सरकार सरकार
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चलिए जी तो अब ये लगभग तय हो गया है और जैसा कि मैं अपने स्टेटस में इस सरकार के बनने के पहले दिन से कहता आ रहा हूं कि इस सरकार द्वारा धडाधड दर्ज़ कराई जा रही वैधानिक और सही शिकायतें, जिनके बारे में निश्चित रूप से हर भारतीय थोडा बहुत जानता है या अंदाज़ा लगा लेता है , जितनी पैनी होती जाएगी इस सरकार की मैय्यत का दिन उतना करीब होता जाएगा , तो अब ये तय हो गया कि आज और अभी के बाद से दिल्ली में कुछ भी अराजक नहीं हो पाएगा , सब कुछ 42 घनघोर संवैधानिक लोगों के हाथ में बागडोर आ गई है , हद है साला अईसा भी कोई करता है क्या कि सोटा ऐसा तैयार किया जाए कि जिसे शक्लों और रुतबों की पहचान ही न हो और हो तो उलटा बिफ़र के दुगने वेग से पीठ पर पडे ..........कल से सब कुछ संवैधानिक होगा लेकिन ई भांड मीडिया को देखिए , अजबे बाजीगरी है , साला आज टोटल बहस चरस में बह गया जईसे , सब झाडू खाने वहीं पहुंचा हुआ है , अबे साले इत्ते बेसरम हो कईसे बे , एक्के घंटा पहिले गरियाते हो अगले में सीधा दंडवत दिखते हो
...माने सब कुछ मार्केटवे तय कर रहा है क्या बे
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हम आज साला उस जगह को पक्का खोज के ही दम लेंगे जहां से ई रोजिन्ना का "डे" सब डिकलियर किया जाता है , अरे हद है जी , हम लोग को अपना डे मनाने का साला चांसे नय दे रहा है ...नाखून डे से लेकर दातुन डे तक धडाधड मन रहा रोज़ के रोज़ लोगबाग इत्ते बिज़ी हो चले हैं ..हमसे तो रोज़ छूट जा रहा है ..नौकरी डे आ घर का ड्यूटी डे गजब बजाते हैं रोज़ ...हर डे डिफ़रैंट होता है ..हर डे एकदम खास होता है , जैसा पहले कभी नहीं होता न बाद में होता है ...............
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ऑन ए सीरीयस नोट मुझे ऐसे वक्त पे एक खास बात जो ध्यान आती है वो ये कि आखिर आज़ादी के साठ बरस बाद भी हमें सर्वोच्च न्याय पाने के लिए बहुत ही कम फ़ैसलेकार अब तक मिल रहे हैं और ठीक ऐसा ही कुछ जनप्रतिनिधियों के मैथ का भी है ..अबे इतने बडे पेट वाले देश के पास सोचने करने के लिए क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ साढे पांच सौ लोग ही होने चाहिए , क्यों नहीं पांच हज़ार या शायद उससे भी ज्यादा...........कम लोगों पर कुछ ज्यादा दबाव डाल कर हम उनपर कुछ ज्यादा ही डिपेंडेंट नहीं हो गए हैं ......साला नौकरी सरकारी है , वो भी सिर्फ़ पांच साल की ..और कमाल देखिए कि ..भाई लोगों ने पुश्तैनी बना डाला है ...........मिर्ची और चाकू ..धंधे में ही चलाए जाते हैं ...नौकरियों में चाकूबाजी नहीं हुआ करती ..............और हां एक आखिरी बात ..अराजकता इसे कहते हैं .......माने कि ओसहिं बताए हैं

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

वीसीडी और तीन पिक्चरों वाली रात ................




अब यदि आज के बच्चों से आप ये कहिएगा कि एक ज़माने में हम मुहल्ले के उस इकलौते घर , जिसमें ब्लैक एंड व्हाइट टीवी होता था , उस घर में रविवार को नहा धो कर टीवी के आगे बिछाई गई दरी चादर , न भी हो तो क्या गम था , पर जम जाने की कशिश बयां करने से परे का आनंद था , टीवी की स्क्रीन दिखाई देनी चाहिए थी और आवाज़ बराबर सुनाई देनी चाहिए थी बस  । और अगर खुशकिस्मती से मुहल्ले का वो इकलौता घर आपके किसी जिगरी दोस्त का निकल जाए तो फ़िर तो आपकी बल्ले बल्ले , समझिए कि दोस्त के साथ कुर्सी सोफ़े या उसकी चौकी पर उसके साथ बैठ कर आपको छब्बीस जनवरी की परेड को वी आई पी पंडाल में बैठ के देखने टाईप की फ़ीलींग आ सकती थी । और हमारे उन दिनों के दोस्त खूब गुजरे होंगे कि उन दिनों जिसके पास क्रिकेट का बैट होता था उसके कैप्टन बनने के चांस ज्यादा होते थे , और उसी तरह जिसके घर पे संडे को टीवी देखना तय था खेल में उसका एक आध बार ज्यादा आउट होना कोई बुरी बात नहीं थी । और हिम्मत की दाद तो ये सुनकर दी जा सकती है कि , बीच कार्यक्रम में "रुकावट के लिए खेद है " को हम आधा आधा घंटा यूं अपलक निहारते थे कि मानो एक सीन भी निकलना नहीं चाहिए । 
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ब्लैक एंड व्हाइट टीवी को धक्का मारा हमारे अप्पू जी की पूंछ और सूंड ने । जी हां भारत में रंगीन टेलीविज़न का चलन 1982 में भारत में आयोजित पहले एशियाड खेलों के आयोजन के साथ ही हुआ था । रामायण और महाभारत सरीखे धारावाहिक यकायक ही ज्यादा चमकदार दिखने लगे थे । मगर टीवी के साथ जुडी यादों का जब जब ज़िक्र आएगा तब तक उसके साथ थोडे दिनों के बाद आया वो एक रात के लिए किराए पे  वीसीडी और तीन वीडियो कैसेट लाकर पूरी रात जागकर उसे देखने का दौर । वाह क्या दौर था वो भी , एक रात में तीन तीन फ़िल्में वो भी लगातार , बिना किसी ब्रेक श्रेक के । 
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अक्सर शनिवार की रात को चुना था ऐसी घनघोर फ़िल्मी रात के लिए , वैसे बाद में किसी खास अवसर , मौके पर भी एक तय कार्यक्रमों और सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले आयोजनों में से एक यही होता था वीसीडी किराए पे लाओ , और उसके साथ अपने पसंद की तीन वीडियो कैसेट खरीद के लाओ , पूरी रात दीदे फ़ाड के उन तीनों पिक्चरों को एक सांस में देख जाओ , हालांकि जो चतुर होते थे वे चार ले आते थे क्योंकि किराए पे जा जाकर घिसी हुई वीडियो सीडी कई बार ऐन मौके पर धोका दे जाती थी और कई बात तो ससुरा वीसीडी प्लेयर ही अड कर टैं बोल जाता था , दिल खोल के गालियां पडती थी वीडियो कैसेट लाइब्रेरी चलाने वाले को । 
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लेकिन सिर्फ़ ऐसा नहीं था कि ये इत्ता आसान सा आयोजन होता था जी , पहले तो घर में इसी बात पर महाभारत छिड जाती थी कि वो तीन पिक्चरें कौन सी होंगी , एक दिन पहले से ही घनघोर माथापच्ची के बाद एक लिस्ट फ़ाइनल की जाती थी कम से कम पांच सात पिक्चरों वाली , उन्हें वरीयता के क्रम से टिकाया जाता था , मसलन अमिताभ बच्चन या धरमिंदर  पाजी की नई वाली फ़िल्म अगर उपलब्ध नहीं है तो मिठुन दा वाली ली जा सकती है । मम्मी , चाची , मासी के सामाजिक फ़िल्मों की लिस्ट में से एक का सलेक्शन नहीं किए जाने पर वीटो किया जा सकता था ,मगर उसका तोड बच्चे यूं निकालते थे कि वीडियो लाइब्रेरी से वापस आने पर कह देते थे कि आपकी वाली फ़िल्म तो मिली ही नहीं , बदले में अपनी वाली पसंद की ही दोनों उठा लाए । 
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सबको पता होता था कि कौन कौन सी संभावित पिक्चरें लाई और लगाई जाने की संभावना है इसलिए शाम से ही कमर कस के तैयार हो लेते थे । उस शाम को खाना जल्दी खा लिया जाता था अमूमन दिनों से काफ़ी पहले ताकि जल्दी से निबट कर पहली वाली फ़िल्म को जल्दी शुरू किया जा सके । और खूब हो हल्ले के बाद सबसे ज्यादा हल्ले से  ही ये निर्णय होता था कि बच्चों को पसंद आने वाली पहले चलाई जाएगी । इसके बाद अगली फ़िल्म वही सामाजिक पारिवारिक घरेलू , राज किरन , फ़ारुक शेख और अमोल पालेकर जी वाली चलाई जाती थी ,सबसे अंत में जो बचती थी वो । अगर कभी खुशकिस्मती और बदकिस्मती से एक ही अभिनेता की दो या कभी कभी तीनों ही फ़िल्में हुईं तो मजाल है कि सुबह तक ये याद हो कि अमिताभ बच्चन ने कादर खान का मुंह किसमें तोडा था और अमरीश पुरी के दांत किसमें । 
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इससे जुडा एक दिलचस्प किस्सा मुझे ये भी याद आ रहा है कि उन दिनों एक बार मांसी के गांव में मौसेरे भईया लोगों ने एक छोटा साला हॉलनुमा कमरा किराए पे लेकर , लगातार दस दिनों तक वीडियो सीडी प्लेयर किराए पे लेकर , टिकट लगा कर बहुत सारी फ़िल्में दिखाईं थीं । इस वीडियो फ़िल्मोत्सव के बीच में पहुंचे मुझे एक दिन ये जिम्मेदारी दी गई कि मैं रिक्शे पे बैठ कर शाम को दिखाई जाने वाली पिक्चर "सन्यासी" का प्रचार कर आउं । मैंने बिना जाने समझे आव देखा न ताव और खूब ढिंढोरा पीट आया , मासियों , नानियों और मामियों को भी बडा घनघोर वर्णन कर आया कि , कित्ती धार्मिक फ़ीलिंग वाली पिक्चर है , बाद में वीसीडी कवर पर उसका पोस्टर देख कर मैं समझ गया था कि शाम को पिक्चर देखने के वाद वे सब मुझे ही ढूंढने वाली थीं ....





सोचता हूं कि कहां वो आनंद वो रोमांच अब मिलता है चकाचौंध भरे महंगे मल्टीप्लैक्स में फ़िल्म देखने में भी 

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बिहरिया पोलटिस स्टोरी -(ग्राम यात्रा -IV )





बिहार के लोगबाग राजनीतिक रूप से इतने अधिक जागरूक और सचेत होते हैं कि चाहे आज अपने अलग अलग किए प्रयोगों के कारण बिहार की ये स्थिति हो गई है कि आज प्रांत का मुखिया देश की सरकार के सामने बहुत सारा पैसा मांग रहा है ताकि सूबे को पटरी पे लाया जा सके । बडी सरकार छोटे सूबेदार के बदलते पलटते तेवर और अपने खजाने को देखते हुए उनकी इस मांग को कितना मांगेगी ये तो भविष्य की बात है मगर मेरे कहने का मतलब ये था कि , कोई भी चौक चौराहा , बाज़ार , हाट , दालान , और खेत तक राजनीति की बातों से पटे और भरे हुए होते हैं । और कमाल की बात ये है कि ग्राम स्तर की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों , परिवर्तनों पर अपनी टिप्पणियां जरूर करते हैं , बहस करते हैं , और एक दूसरे को बाकायदा अपने तर्क से खुद को पराजित करने की चुनौती देते हैं ।


दिल्ली से मधुबनी के रेल सफ़र में , मुझे एक मंडल जी (उन्होंने पूरी यात्रा में बार बार यही कहा कि किसी से भी मेरे बारे में पूछिएगा कि मंडल जी के यहां जाना है वो बता देगा ) ने पूरी यात्रा में न सिर्फ़ राजनीति ,समाज , अपने परिवार और बाल बच्चों की बात में बहुत सी बातें साझा कीं । जैसे कि उन्होंने बताया कि रेल सफ़र के दौरान आप आसानी से उत्तर प्रदेश से बिहार की सीमा में प्रवेश करने का फ़र्क महसूस सकते हैं , मुझे जानकर विस्मय और हर्ष हुआ जब उन्होंने बताया कि जहां से आपको कृषि भूमि कम और वनस्पति ज्यादा सघन दिखाई देने लगे समझ जाइए कि आप बिहार की सीमा में प्रवेश करने जा रहे हैं ।

बात राजनीति की चल निकली , मंडल जी पुराने कांग्रेसी थे उनके पास एक बडी ही मजेदार दलील थी जिसे उन्होंने पूरे सफ़र के दौरान बहुत बार दोहराया कि जो भी कहिए सरकार तो कांग्रेस को ही चलानी आती है ...............आखिरी बार मुझसे नहीं रहा गया और मुझे उनकी बात काटते हुए कहना ही पडा कि " हां सरकार तो कांग्रेस चला ही लेती है , मगर देश उससे नहीं चलाया जाता "।बात दिल्ली की नए नवेले राजनीतिक  प्रयोग से शुरू होकर आगामी  लोकसभा चुनावों पर जाकर अटक गई । रेल से शुरू हुई ये बहस , आगे गांव के चौराहे और दालानों तक भी खूब चली ।

बडे बूढे बुजुर्ग तक की पूरी राजनीतिक चर्चा का सार यही था इस बार मोदी ही राष्ट्रीय राजनीति के एकमात्र अगुआ साबित होंगे , और वे मुझसे इस तरह से पूछ रहे थे मानो सिर्फ़ आश्वस्त होना चाह रहे हों , बाकी उन्हें पता तो है कि होगा यही । जहां तक बिहार की वर्तमान प्रादेशिक सरकार और उसके राजनीतिक दृष्टिकोण पर मेरा मानना ये था कि नीतिश कुमार की टाइमिंग बहुत ही गलत रही , समर्थन वापस भी लिया तो उस पार्टी से जिसका भविष्य आगामी राष्ट्रीय राजनीति में सबसे प्रबल है , समर्थन वापस भी लिया तो किस मुद्दे पर , नरेंद्र मोदी को आगामी प्रधानमंत्री के रूप में नामित करने के कारण , दूसरी तरफ़ जिस केंद्रीय सरकार की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष छवि के साथ अपनी छवि चमकाने की कोशिश वे कर रहे हैं और जिस बडे खजाने को पाने के लिए कह और कर रहे हैं वो फ़िलहाल उन्हें मिलता नहीं दिख रहा है ।
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यहां बिहार में दिखते विकास और परिवर्तन को महसूसते हुए भी जो दो बातें मुझे अखर रही थीं वो ये थीं अब तक भी राज्य में औद्योगीकरण व व्यापार को वो दिशा दशा नहीं मिल पाई थी जो शायद एक बडा बदलाव ला सके । आज भी प्रांत के लोगों की पूरे देश में जाकर वहां काम करने , पढने , मजदूरी करने के लिए जाने को विवश होना पड रहा है , पलायन तो अब भी बदस्तूर जारी है , क्यों नहीं आज तक प्रांत के मुखियाओं ने पूरे देश से हिम्मत करके कहा कि ये जो हमारे लोग , आपके सबके प्रदेशों में , राजधानियों से लेकर छोटे मोटे शहरों में , बैंक , दफ़्तर , दुकान से लेकर सडकों तक पर अपनी मेहनत और अपने बूते पर अपना सर्वस्व आपको दे रहे हैं तो फ़िर क्यों नहीं उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए बनिस्पत इसके कि उन्हें क्षेत्रीयता और भाषाई निशाने पर रखा  जाए ।


ग्राम यात्रा सीरीज़ की आखिरी पोस्ट भी जल्दी ही पढवाऊंगा आपको .................
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