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शनिवार, 13 सितंबर 2014

प्रकृति के खिलाफ़ नहीं प्रकृति के साथ चलना होगा





पिछले वर्ष जून में जब अचानक ही केदारनाथ की आपदा सब पर कयामत बनकर टूटी तो उस त्रासदी के प्रभाव से देश भर के लोगों ने झेला । कुदरत के इस कहर से जाने कितने ही परिवार हमेशा के लिए गुम हो गए , कितने बिखर कर आधे अधूरे बच गए , जाने कितने ही परिवार में बचे खुचे लोग मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर रुग्ण होकर रह गए । केदारनाथ त्रासदी के बाद इस दुर्घटना के कारणों पर किए गए शोध , विश्लेषण आदि से ये तथ्य निकल कर सामने आया था और यदि न भी निकलता तो भी ये तो अब खुद भी इंसान बहुत अच्छी तरह से समझ और जान रहा है कि प्रकृति द्वारा कुछ भी अनियमित करने होने घटने के पीछे सबसे बढा घटन वो मानवीय क्रियाकलाप ही होते हैं जो प्रकृति के प्रतिकूल हैं ॥
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अभी पिछला घाव ठीक से भरा भी नहीं था किस इस वर्ष फ़िर से धरती का स्वर्ग कहलाने वाला जम्मू कशमीर पिछले कई दशकों में पहली बार आई जल प्रलय के विप्लव से बुरी तरह त्रस्त हुआ है । पिछले दस दिनों से लगातार , सरकार , प्रशासन , आपदा नियंत्रक , भारतीय सेना और आर एस एस जैसे स्वयं सेवी संगठन वहां पीडित क्षेत्र में फ़ंसी हुई जिंदगियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोगों को काल के गाल में समा जाने से बचाया जा सके । स्थिति इतनी भयावह और विकट है कि इसे राष्ट्रीय आपदा मानते हुए पूरा देश सहायता के लिए आगे आया है ॥ एक बार पुन: वही विमर्श , वही आंकडे , आकलन ..........॥
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आखिर कब ..कब हम इस बात को अच्छी तरह समझेंगे कि हम इस प्रकृति जो कि जल , थल , वायु, अगिन , मिट्टी ,पर्वत , नदी , पेड आदि तत्वों के समन्वय से सिंचित होती रही है और लाख उन्नति और आधुनिकता के बावजूद भी , जी हां अब भी मानव/इंसान प्रकृति के उपस्थिति तत्वों में से बहुत ही सूक्ष्म और कोमल है शायद यही वजह है कि प्रकृति के हल्के से हल्के दबाव के आगे वो तिनके की तरह बिखर जाता है । 

विश्व में बढती प्राकृतिक आपदाओंने इंसानों को बहुत कुछ सिखाया जिसमें से सबसे अधिक ये कि बदलती हुई पारिस्थितिकी के अनुसार मानव जीवन ने अपने आपको बदला और ढाला , और ये प्रक्रिया युगों युगों से सतत चलती चली आ रही है । अब तो भू विज्ञानियों , प्राणी विज्ञानियों और बहुत से संबंधित विज्ञानों ने निरंतर खोज़ कर ऐसे साक्ष्य जुटा लिए हैं जो स्पष्टत: ये प्रमाणित करता है कि इंसानी सभ्यता बहुत ही प्राचीन समय से प्रकृति के साथ संघर्षरत होते हुए भी उसके साथ बराबर तालमेल बिठाती आई है । और इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि जब जब इंसान ने अपनी जिद , अपने अन्वेषण , अपनी आवश्यकता के कारण , प्रकृति की नैसर्गिक  व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश की है , प्रकृति खुद उसे संतुलित कर लेती है ॥
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प्रकृतिशास्त्री पिछले दो दशकों से ,या शायद तभी जब से इंसान ने अपनी सुविधा के लिए प्रकृति के मिज़ाज़ के खिलाफ़ जाकर छेडछाड शुरू की तभी से बार बार इस  बात पर चिंता जताते हुए नसीहत स्वरूप ये कहते रहे हैं कि जीवन जीने के रास्ते  प्रकृति के खिलाफ़ नहीं प्रकृति के साथ तलाशे जाने चाहिए । इतने बरसों बाद भी जहां एक तरफ़ हम इंसान , न तो प्रकृति के तत्वों का सम्मान करते हैं और न ही  उन्हें सहेजने और संरक्षित करने के लिए रत्ती भर  भी गंभीर है । विशेषकर पश्चिमी देशों की तुलना में अभी देश में कुछ भी नहीं सोचा किया गया है अब ये तो खुद सरकार , समाज , और आपको हमें तय करना है कि हमें भविष्य में ऐसी त्रासदियों के लिए तैयार रहना चाहिए या हमें अभी से चेत कर प्रकृति के साथ सहजीवन पद्धति का विकास करना चाहिए ....प्रकृति सोच चुकी है , अब सोचना आपको और हमें है ............

रविवार, 7 सितंबर 2014

करवट बदलता एक देश ..........सामयिक टिप्पणी






वर्ष २०१४ केआम चुनावों से पहले ही संभावित जीत के प्रति आश्वस्त से लगते प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लिए अगले साठ महीनों की प्रशासनिक सेवा देने का अवसर जिस आत्मविश्वास से मांगा था उसी समय कयास लगाए जाने लगे थे कि आगामी सरकार बहुत सारे नए विकल्पों , विचारों , कार्यप्रणाली , प्रतिबद्धता व परिवर्तन लेकर आएगी ॥
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नई केंद्र सरकार को सत्ता संभाले अभी इतना समय नहीं हुआ है कि उनके कार्यों ,निर्णयों व पहल का विश्लेषण किया जाए किंतु न सिर्फ़ भारतीय राज़नीति , प्रशासन , विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका , वैश्विक अर्थ जगत सहित अंतर्राष्ट्रय कूटनीइक जगत में भी आज नई केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति व जनकल्याण की चर्चा हो रही है । नई सरकार के अगुआ के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के रूप में आज देश के पास एक अनुशासित , अनुभवी , कर्मशील व करिश्माई व्यक्ति का नाम सामने आ चुका है ॥
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पिछले एक दशक में विकास होते रहने के बावजूद भी सियासत व आम लोगों के बीच सामंजस्य की भावना निरंतर क्षीण होती गई । नई सरकार ने इस नकारात्मक माहौल को पूरी तरह बदलते हुए न सिर्फ़ अपनी बल्कि देश की छवि को नए दृष्टिकोण से सामने रखा ॥
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नई सरकार ने तीव्र गति से कार्य करते हुए एक साथ बहुत मोर्चों पर अपनी कवायद तेज़ की । मंत्रालय के शीर्ष मंत्रियों , अधिकारियों, कर्मचारियों को अधिक श्रमशील होकर कार्य करने के निर्देश, सूचना संचार , व समाचार माध्यमों की ताकत को पहचाने हुए उनका भलीभांति उपयोग की शुरूआत , अर्थनीति , विदेशनीति, रक्षा , पर्यावरण , शिक्षा आदि सभी विषयों पर मंथन , विमर्श तथा योजनाओं की रूपरेखा की तैयारी , वर्षों से मृतप्राय या औचित्यहीन हो चुकी संस्थाएं व कानूनों की समीक्षा आदि मुद्दों पर सरकार न सिर्फ़ तेज़ी से फ़ैसले ले रही है बल्कि उन्हें अमली जामा भी पहनाया जा रहा है ॥ ..


सरकार के अस्तित्व में आने के ठीक अगले ही पल से जो कार्य होने लगा वह था सभी मित्र देशों के साथ सामंजस्य व साझेदारी के नए रिश्तों के युग का आरंभ । वैश्विक राज़नीति पर अपनी नज़र बनाए रखने वाले विश्लेषकों ने भारत की तरफ़ से सभी मित्र देशों को मित्रता का आग्रह संप्रेषण पूर्व के ऐसे सभी प्रयासों से कहीं अधिक गरिमापूर्ण व ओज़ भरा महसूस किया । इसका सकारात्मक परिणाम व प्रभाव यह रहा कि पिछले तीन महीने की अवधि में ही भारत अब तक अपने मित्र देशों से सौ से अधिक करार कर चुका है ॥
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चिर प्रतिद्वंदी पडोसी के साथ भी ऐसी ही एक नई पहल का प्रयास किया गया किंतु पिछले कुछ घटनाक्रमों के बाद फ़ौरन ही कठोर संदेश देते हुए वार्ता निलंबित भी कर दी गई । वैश्विक परिदृश्य बेहद तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है । संसाधनों पर आधिपत्य के वर्चस्व का संघर्ष अब उग्र होता जा रहा है । अस्थिर व निरंकुश शासन व्यवस्थाओं की निकटता किसी भी राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और अंतत: मनुष्य सभ्यता के अस्तित्व के लिए सदैव खतरा उत्पन्न करते है । इन बदली हुई परिस्थितियों में अमन चैन विकास और सृजन के पक्षधर वैश्विक देशों को भी संगठित होना होगा । नई सरकार के सारे वरिष्ठ सेवक अपने-अपने क्षेत्रों के लिए मित्रों का चयन व गठन कर रहे हैं ॥
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पिछले दो दशकों में देश के राजनीतिक चरित्र व कार्यपालिका की अकर्मठता के अपने चरम पर पहुंच जाने का एक बडा दुष्परिणाम ये निकल कर सामने आया कि न्यायपालिका को अति सक्रियता व अतिक्रमण के इतने सारे अवसर उपलब्ध करा दिए कि समाज में व्याप्त दुर्गुणों व दुर्बलताओं से ग्रस्त होकर खुद न्यायपालिका रुग्ण सी हो गई । भ्रष्टाचार से लेकर यौन उत्पीडन और पक्षपात से लेकर पदलोलुपता तक के आरोप सहित वरिष्ठतम न्यायविदों द्वारा दर्ज़ की जा रही टिप्पणियों आदि ने नई सरकार , जो कि प्रचंड बहुमत से सरकार में है को प्रोत्साहित किया कि वे बेझिझक न्यायिक सुधारों को लागू करे सरकार दो बडे निर्णय, कोलेजियम व्यवस्था में परिवर्तन एक वैकल्पिक व्यवस्था का प्रारंभ तथा उच्च न्यायालयों में पच्चीस फ़ीसदी नई अदालतों/ पदों का सृजन । न्यायिक सुधारों के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होने की बात कही जा रही है ।
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आम लोगों से सीधे संवाद स्थापित करती यह सरकार "जनधन योजना" "डिजिटल इंडिया" जैसी छोटी छोटी किंतु बेहद प्रभावकारी योजनाओं के साथ , गंगा नदी को पुनर्जीवन देने के लिए विशेष प्रयास , कागज़ातों को सत्यापित कराये जाने की अनिवार्यता की समाप्ति जैसी प्रक्रियात्मक राहत आदि कुल मिला कर ऐसा महसूस किया जा रहा है जैसे देश एक अलग दिशा में जा रहा है । शायद अच्छे दिन आने वाले हैं ॥

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