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सोमवार, 11 अप्रैल 2016

भारत माता की जय ....कुछ समझे लल्लू






असल में "भारत माता की जय " जिसे यकीनन ही इस देश की धरती से जुड़े हर व्यक्ति ने , अपनी उम्र में , खेल के मैदान में , सरहद की सीमाओं पर , इसरो की प्रयोगशालाओं में, खो खो और कबड्डी के मैदान में , किसी अभिनन्दन और किसी बलिदान पर ...कभी न कभी हर किसी ने "भारत माता की जय" की ही है ..गौर करिएगा मैंने कहा है "भारत माता की जय "की" है , कही न कही ये जुदा बात है और असल में फालतू बात है |

चलिए शुरू से शुरू करते हैं , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वर्तमान प्रमुख स्वयंसेवक श्री मोहन राव भागवत ने अपने एक बौद्धिक में कहा कि , इस देश में सबको भारत माता की जय करना सिखाना होगा ...इसके ठीक पांच दिन बाद भारत में इस्लामिक कट्टरवाद के झंडाबरदार ओवैसी एकदम सिनेमाई अंदाज़ में टीवी कैमरे के सामने आर्तनाद करते हैं कि कोई मेरी गर्दन पर भी तलवार रख देगा तो मैं भारत माता की जय नहीं बोलूँगा , इसके बाद महाराष्ट विधानसभा के दोनों सदस्यों का निलंबन ..फिर अगडम बगडम ..जो कि अब चलता ही जा रहा है ..और अब तो बाकायादा जंग लड़ी जा रही है गोया "भारत माता की जय" न होने के लिए जिहाद छेड़ दिया गया है |
आइये अब मामले को जरा इस दृष्टिकोण से देखते हैं | आज देश में लोगों को यातायात नियमों का पालन करने को सीखने के लिए कहा जा रहा है , ये सिखाया समझाया जा रहा है कि भईया बस करो थोड़े साफ़ सुथरे रहो , स्वच्छ रहो , सेहत स्वास्थ्य का ध्यान रखो , बीमार पड़ने से खुद को बचाओ , और भाई मेरे धरती के जिस टुकड़े पर खड़े होकर इतना सब कुछ सीख रहे हो न , उस धरती से , उस देश से , उस मातृभूमि से थोडा सा प्यार भी कर लो , और थोड़ी सी "जय" तो उसकी भी हो थोड़ी सी इज्ज़त पाने का हक़ तो उसको भी है ही तो यही तो है भारत माता की जय ...या फिर कि बात कुछ ऐसी तो नहीं ..

एक वे जो "भारत" की जय नहीं कर सकते . भारत , हिन्दुस्तान के नाम से ही एलर्जी सी हो उठती है
अगले वे जिन्हें "माता " से घनघोर आपत्ति है , यार अम्मी , आई , मैय्या , दीदी ,भैय्या मान लो , पर अपना समझो यार अपना
और आखिर वाले सबसे अधिक खतरनाक जिन्हें "जय" करने से काफी तकलीफ है , ये भारत माता की ऐसी तैसी भारत माँ की बर्बादी की नारे सीना तान के लगा सकते हैं मगर ये भूल जा रहे हैं कि आज यूं इसी देश की छाती पर बैठ कर निडर ,निर्भीक होकर यदि वे ये धृष्टता कर पा रहे हैं क्योंकि आज देश में विचारों की अभिव्यक्ति की इतनी आज़ादी , जो अब अक्सर उदंडता को लांघ जाती है , माहौल ही अपने आप में "भारत माता की जय" है |

और एक सबसे दिलचस्प तथ्य | फिलहाल दो तरह के कथ्य सामने आ रहे हैं | पहला ये कि जो .........................."भारत माता की जय" ..नहीं करता /नहीं करेगा .....आदि आदि दूसरा वही हाहाकारी वाला , तोप तलवार रख दो , खंजर रख दो ........... "भारत माता की जय " .........................नहीं बोलूँगा .... और दोनों ही सन्दर्भों में क्या दोनों ही कह बोल बहसिया रहे हैं "भारत माता की जय " ..... सबसे जरूरी बात , इस नाम तो तो तितमहा तांडव व्याप्त किया जा रहा है देश में उससे नफरत ,द्वेष, फैलाने को आतुर लोगों को बैठे बिठाए काफी कुछ मिल रहा है | ध्यान रहे ये गजब की क्रांतियों का दौर है , ईमानदारी की क्रान्ति , धरनों प्रदर्शनों की क्रान्ति , असहिष्णुता की क्रान्ति , पुरस्कारों के तिरस्कारों की क्रान्ति , जूतों को फेंकने की क्रान्ति ......तो ...कहिये न कहिये ...मगर करिए जरूर और हाँ आप अपनी भी जय करेंगे न तो यकीन मानिए वो भारत माता की जय ही है ......क्या है ,,,,,,,,,,,,,,,,,?????????

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

सुनो भई ...लौटते हुए लोगों ..





वाह भई क्या समां बंधा है ...और ये देखिए कि ..क्रिकेट के मैच में हार के बाद उपजी झल्लाहट अक्सर फैशन के रूप में संन्यास लेने की नई प्रथा भी चारों खाने चित्त ....धड़ाधड़ ..बल्कि उससे भी तेज़ कहिये कि ...दुरंतो की रफ़्तार से पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं ..यकायक उठे इसे साहित्यिक सुनामी का जोड़ गणित समझने लायक हम जैसे निहायत ही बिना किसी ब्रैंड और ब्रिगेड के पाठकों के बूते की बात नहीं , वो हमारा आउट आफ सिलेबस प्रश्न है ...लेकिन फिर भी अब जो आप जैसों को पढ़ पढ़ के बोलने समझने जानने लायक बना हो तो फिर ये भी स्वाभाविक ही है कि अपनी जिज्ञासा भी आप विद्व जनों के सम्मुख ही रखे ....

जब आप सबकी लेखनी , क्षेत्र , भाषा , तेवर सब कुछ कहीं न कहीं से कभी कभी थोडा तो भिन्न रहा ही होगा तो फिर ये सामूहिक भाव ..दमन , अभिव्यक्ति की आज़ादी , अतिवादी सोच वाली सरकार आदि के तमाम आप सब विद्व जनों के मन में ...एक ही कारण ....इतना सामूहिकवाद ...इतनी एकता ...| चलिए मन लिया कि

कुछ तो वजह होगी ऐसी जो वे मिल कर साथ बैठ गए ,
रंगे सपनों की चाह सोए रहे जिनके साथ ,जगे तो ऐंठ गए

खैर साहेब ये आपकी मर्जी ....मुझे ये बात भी समझ नहीं आ रही कि , जब आपको यही लगता है कि मौजूदा सरकार आपकी सोच के बिलकुल मनमाफिक न  होकर , हर बात पर तर्क और सवाल करने वालों की जमात सरीखी होती जा रही है ,और ये भी यकीन है पुख्ता कि देर सवेर झुका ही लेंगे , तो उस पर सिर्फ एक साल में पिछले साठ सालों से ढोए जा कन्धों पर बढ़ा देंगे , माफ़ करिएगा मगर अब लोग .....लोग से मेरा मतलब आजकल व्हाट्सअप पर दुनिया गोल गोल घूम रही है ...गांधी बाबा से लेकर सुभाष दादा तक का सच लोग जानने और समझने को आतुर हैं ...तो थोड़े दिन और सब्र करिए ..कम से कम इतना तो जरूर कि जिन सरकारों ने सम्मान और पुरस्कारों का भी गान्धीकरण नेहरूकरण कर दिया था उनके आने तक उनकी संपत्ति संभाल के रखते , अब इस वक्त वापस किया जब ..हकीकत की बात जानें तो अभी कुछ दिनों पहले इस गूगल को किसी ने खरीद कर मारा था ...लोग दर्ज़न का भाव तो ज्यादा कम लगाते हैं ऊपर से इस ओएलेक्स ने तो लोगों की आदतें बिगाड़ दी हैं |

देखिये दो बातें हैं , पहली , ये कि आपने अपनी प्रतिक्रया ज़ाहिर करते हुए देश और सरकार की तरफ से मिले सम्मान पत्र , समारिका आदि वापस करने का निर्णय किया कारण यदि सबका एक ही माना जाए जो, कि ताज्जुब है और शुक्र भी एका का हुनर याद है सबको , तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला जैसा कोइ घनघोर विस्फोटक कारण आप लोग बता रहे हैं माफ़ करिएगा वैसा अब नहीं है | आप कहते हैं देश युवा है और यदि देश युवा है तो वो युवा वर्ग ही है जो आज खुद को पूरी दुनिया से जोड़े हुए सोशल नेटवर्किंग के सहारे वो वो सब अन्जाम दे पा रहा है जो आपने शायद कल्पना भी न की हो | एक समय देश में सिर्फ खिचडी सरकारों के बनते रहने की अमिट भविष्यवाणी तक को नकार कर रख दिया | फिर भी यदि ऐसा भी है तो किसने कहा और किसने रोका है आपको , लिखिए हाँ जब भी अभिव्यक्ति पर बहुत दबाव सा महसूस हो तब उस मासूम से कार्टून पर जारी हुए फतवों और उन फतवों के मसीहाओं द्वारा क़त्ल कर दिए उन जाबाजों के किस्से पढियेगा आपको अपने से ज्यादा वजनदार दिखाई देंगे |

देखिये हम पाठक हैं , आपके लिखे से आपकी किताबों से प्रभावित होकर उस विचार से , उस शैली , उन किस्सों से , लेखकों के मुरीद बन जाते हैं और माफ़ करिए मुझे इस बात से कोइ फर्क नहीं पड़ता कि गुनाहों का देवता के लिए धर्मवीर भारती को कौन कौन से पुरस्कार मिले या नहीं मिले | मुझे पढ़ के सुकून मिला लेखन कार्य सिद्ध हुआ | मुझे लगता है ये बात भी कह ही दूं कि यदि इस पुरस्कार वापसी समारोह के परिप्रेक्ष्य में आप मुझसे कुछ कहने को कहें तो मैं कहूंगा कि आप अकेले नहीं है वापसी करने वाले , कई लोग राजनीति से अपने गृहस्थाश्रम में वापसी कर चुके हैं , कई जगह पार्टी फंड की वापसी हो रही है , युवराज का जाना और उनकी वापसी हो रही है , जनता को ही ले लीजीये लोकतंत्र की बहुमत्त्व शक्ति की वापसी हुई .सीमापर सुना है अब एकदम बराबर वापसी हो रही है गोलियों की ........तिलमिलाहट कलम से कागजों तक उतरे तो आनंद आए ..ज़रा तर्क होने दीजीये और मुँह मत फुलाइये ......आखिर किसी का लिखा पढके तो बहके होंगे लड़के


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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

भूत का कुनबा




पुराने समय की बात है , एक गाँव में अकाल पड गया | सुखी समपन्न और भरे पूरे लोगों को छोड़ कर अन्य सबको खाने के लाले पड़ गए | संपन्न सेठ साहूकार और उनके परिवार तो मज़े में ज़िंदगी काट रहे थे , किंतु गरीब किसानों का  जीना दूभर हो गया था | बांकेदास का परिवार भी इस गरीबी की चपेट में आ गया था | बांकेदास ने जब देखा कि यहां तो अब भूख से सबकी मृत्यु ही हो जानी है तो उसने निश्च्य किया कि वह स्वयं परिवार के सभी पुरुषों  के साथ पास के गावों कस्बों में जाकर कोइ काम मजदूरी ढूंढ कर अपने परिवार के लिए कुछ खाने पीने का इंतज़ाम करेगा | कुनबे के सभी पुरुष सदस्यों को कल प्रातः निकलने को तैयार रहने के लिए कह दिया गया | 


अगली सुबह बांकेदास अपने भाईयों भतीजों व् कुनबे के अन्य पुरूष सदस्यों  के साथ घर से निकल पड़े | चलते चलते सुबह से शाम हो गयी किन्तु उन्हें अब तक कोई ऐसा ठिकाना या काम नहीं मिला जिससे उनका मकसद पूरा हो पाता | साँझ होने को आ रही थी और सभी थक कर चूर हो गए थे | गाँव कस्बों से काफी दूर आगे आने के बाद एक पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे पूरे कुनबे ने रात बिताने की सोची | शुक्ल पक्ष अपने चरम पर था और पूर्णिमा से पहले की चांदनी में चाँद की चमकीली रोशनी से सारा वातावरण शीतलमय हो रहा था | 


ऐसे में बांकेदास ने देखा की पास में ही मूँज के बड़े बड़े झाड़ लगे हुए हैं मानो मूँज का जंगल उगा हुआ हो | उसके दिमाग में एक तरकीब आई | उसने अपने कुनबे के सदस्यों को पास बुलाकर कहा की क्यों न रात में इस मूँज को काट कर उसकी बंटाई करके डोरियाँ रस्सियाँ बना ली जाएँ और सुबह होने पर उन्हें बाज़ार में बेच कर थोड़े पैसे कमाए जाएं | बात सबको भा गयी | फिर क्या था सबने आनन् फानन में मूँज के बड़े बड़े गट्ठर काट कर इकट्ठा कर लिए और आमने सामने मिल कर बैठ उनकी गुंथाई बंटाई करने लगे | साथ ही साथ पूरा कुनबा मिल कर जोर जोर से गाता जा रहा था ..आज तो मिल के बांधेंगे , आज तो मिल के बांधेंगे | 



उस पीपल के वृक्ष के ऊपर रहने वाले एक प्रेत , जो कि यह माज़रा बहुत देर से देख रहा था अचानक ही यह सुन कर डर गया | उसने मन ही मन सोचा हो न हो ये कोइ विशेष दल आज मुझे बांध कर ले जाने आया है | जैसे जैसे आवाज़ बढ़ती जाती प्रेत का दिल डर से बैठा जा रहा था | उससे अब नहीं रहा जा रहा था उसने नीचे उतर कर सीधा बांकेदास के सामने पहुँच कर उससे कहा ," हे वीर पुरुषों आप सब मुँझे न बांधें मैं यहाँ कई युगों से ऐसे ही उन्मुक्त और भयरहित हो कर रहा हूँ | आप चाहें तो इसके बदले में मुझसे अनन , धन ,वेभव् जो चाहे ले लें `|

बांकेदास को सारी बात समझते देर नहीं लगी , उसने बड़ी चतुराई से प्रेत से अपने पूरे कुनबे के लिए एक वर्ष का भोजन गुजारे की अन्य सामग्री मांग ली | सारा अनाज , कपड़े व् अन्य सामग्री लेकर बांकेदास अपने गाँव वापस आ गया | गाँव के सेठ साहूकारों को जब यह बात पता चली तो वे सब बांके दास से इस बाबत पूछने लगे | बांकेदास सीधा सरल किसान था उसने सारी राम कहानी उस सेठ को सूना दी | 


सेठ के मन में यह सुन कर लालच आ गया उसने सोचा कि यदि इस तरकीब से मैं मेरा कुनबा भी  अन्न धन ले आएं तो हम और भी अमीर हो जाएंगे | अगली सुबह उसने जैसे तैसे अपने कुनबे के पुरुष सदस्यों को तैयार किया की बाहर जाकर परिश्रम करके अधिक धन कमा कर लाना है | सारे पुरुष सदस्य इस बात का विरोध करने लगे ,क्योंकि वे साधन संपन्न होने के कारण बहुत ही सुस्त व् आलसी हो गए थे | जैसे तैसे  वे उस पीपल के वृक्ष तक पहुँच गए किन्तु मूँज काट कर लाने की बात पर वे आपस में एक दूसरे से नोक झोंक करने लगे |खैर थोड़ी बहुत मूँज काट कर लाने के बात उसको गूंथ कर डोरी बनाने की बारी आई तो वे आपस में लड़ाई कुटाई तक करने लगे | ऊपर से बैठे प्रेत ने यह सब देखा तो नीचे उतर आया | सेठ जो पहले से इओस क्षण की प्रतीक्षा में व्यग्र बैठा था , लपक कर प्रेत के सामने पहुंचा और कहा हमें ढेर सारा अन्न धन दो नहीं तो हम सब तुम्हें बाँध कर ले जाएंगे | 


प्रेत ने पास ही पड़ा अपना मोटा लट्ठ उठाया और सेठ को पीटने लगा , प्रेत ज़ोर ज़ोर से कहता जा रहा था , तुझसे अपना कुनबा तो बांधा जोड़ा नहीं जा सका अब तक तू मुझे बाँधने का बात करता है " | सेठ और उसका कुनबा अपनी जान बचा कर भाग खड़े हुए |
सीख : आपस में बंधा हुआ जुड़ा हुआ कुनबा ही शक्तिशाली होता है |        

सोमवार, 28 सितंबर 2015

सुई में निकला हाथी


 चित्र अंतरजाल खोज से साभार


बोध कथाओं का हमारे जीवन पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है | अक्सर देखा और सुना जाता है कि छोटी छोटी बोध कथाएँ हमारे जीवन पर क्या प्रभाव डालते हैँ जो बड़े बड़े किताब मेँ यह बड़ी बड़ी सीख भी नहीँ डाल पाती ।  आज ऐसी ही एक बोध कथा

देवों में सबसे श्रेष्ठ देवऋषि  नारद जी  का स्थान माना जाता रहा है कहा जाता है कि जब प्रभु श्री हरि विष्णु ने अपनी मनपसंद वीणा देव ऋषि को दी थी तो साथ ही यह शर्त भी रख दी थी कि वे  उससे  सिर्फ नारायण नारायण का ही जाप करेंगे | उसका प्रभाव यह  पडा कि  देवर्षि नारद के  मन में कहीं न कहीं दंभ  का भाव उत्पन्न हो गया | उनका अहम्  स्वाभाविक भी था जिसे स्वयं  नारायण ने  यह आदेश दिया कि वह हमेशा अपने मुख से  श्री नारायण को  ही याद करते रहेंगे | लेकिन यह भाव इस कारण से उत्पन्न हुआ था क्योंकि नारद स्वयं  को विश्व  प्रभु कसा सबसे बड़ा भक्त समझने लगे थे | ईश्वर को नारद मुनि का यह भाव ज्ञात होते ज्यादा देर  नहीं लगी |

किंतु ईश्वर जो भी करते हैँ उसके पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य होता है |   नारद पूरी सृष्टि का भ्रमण करके आते और विष्णु के समक्ष खड़े होते तो उन्हें इस बात की उम्मीद रहती कि प्रभु जब भी अपने भक्तों में से सर्वश्रेष्ठ  भक्त  का  उल्लेख  करेंगे  नि;संदेह  वह नाम  नारद  मुनि का ही होगा | किन्तु उन्हें बहुत निराशा हाथ लगती जब वे पाते कि प्रभु देवर्षि नारद का नाम न लेकर अपने भक्त संत रविदास का नाम लेकर उन्हें अपना सबसे बड़ा भक्त बताते थे | एक दिन नारद मुनि ने निश्चय किया कि वे संत रविदास की परिक्षा लेकर देखेंगे |

देवर्षि नारद मुनि देवलोक से सीधे संत  रविदास की कुटिया में पहुंचे | संत रविदास एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर जूते सिलने के अपने कर्म में मशगूल थे | जैसे ही देवर्षि ने "नारायण नारायण " का जाप किया रविदास ने सर उठाकर ऊपर देखा |

"ओह देवर्षि नारद | भक्त का प्रणाम स्वीकार करें | मेरे प्रभु श्री हरी कैसे हैं ?"

नारद कुटिल मुस्कान से साथ बोले " अच्छे हैं जब मैं देवलोक से चला था तो वे सुई में से हाथी निकाल रहे थे | "

संत रविदास ने कहा , " जय श्री हरि , प्रभु की लीला अपरम्पार " |

यह सुन कर नारद मुनि जोर से ठठा कर हँसे और बोले , " रविदास तुम्हें तो प्रभु अपना सबसे बड़ा भक्त मानते हैं किन्तु तुममें तो ज़रा सी भी तर्क बुद्धि नहीं है , कहीं सुई में से भी हाथी निकल सकता है ?? "

अब मुस्कुराने की बारी संत रविदास की थी | उन्होंने सामने बरगद के वृक्ष से पक कर गिरे एक फल को उठाया और उसे हाथों से मसल दिया , एक कण के बराबर बीज अपनी हथेली पर रख कर पूछा , मुनिवर क्या ये बीज सुई से बड़ा है ?? "

"नहीं ये तो अति सूक्ष्म है , सुई तो इससे कहीं अधिक बड़ी होती है " मुनिवर ने हैरान होकर उत्तर दिया |

रविदास ने कहा , " मुनिवर अब उधर देखिये इस बरगद के वृक्ष के नीचे एक नहीं बीस हाथी विश्राम कर रहे हैं तो यदि प्रभु बरगद के एक सूक्ष्म बीज (जो कि सुई से भी कहीं छोटा है ) को मिट्टी में दबाने के बाद उसे इतना विशाल कर सकते हैं तो प्रभु के लिए क्या असंभव है |

सोमवार, 10 नवंबर 2014

प्रेरित करती सबको, ये तो सबके "मन की बात"






इस बीच सोशल नेटवर्किंग साइट्स से लेकर ,समाचार माध्यमों की अति सक्रियता , या कहा जाए कि तत्परता के दोहरा प्रभाव पडता दिख रहा है । एक तरफ़ तो,टीवी, मोबाइल , इंटरनेट, व अन्य समाचार माध्यमों की सर्वसुलभता और खबरों की सतत उपलब्धता ने लोगों को इन सबका आदी बना दिया है , यानि अब लोग किसी भी छोटी बडी घटना/दुर्घटना/योजना/कानून/खबर/सुर्खी.........को जानने को उत्कट रहते हैं । दूसरी ये कि चाहे अनचाहे सरकार ,समाज, और लोगों की क्रिया/प्रतिक्रिया/आचरण/शब्द/व्यवहार/कर्म लगभग सब कुछ कहीं अधिक पारदर्शी हो गया है ।
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नई सोच और नई दृष्टि से लबरेज़ , नवगठित सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ऐसे में , जब देश की बागडोर संभालते हैं तो देश से लेकर अमेरिका तक में सार्वजनिक रूप से ये कहते हैं कि हां अब समय आ गया है जब हमें देश में फ़ैली और फ़ैलाई जा रही गंदगी/कूडा/कचरा से निज़ात पानी ही होगी । स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत इसी उद्देश्य से की गई है कि लोगों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे स्वच्छता के प्रति जागरूक हों । ऐसा नहीं है कि इस तरह की पहल और प्रयास पहले कभी नहीं किए गए हैं , यकीनन किए गए हैं किंतु औपचारिकता की भेंट चढी वो सारी योजनाएं और कोशिशें समय के गर्त में खुद दरकिनार हो गईं ।
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छोटी सी शुरूआत भी भविष्य में बेहद प्रभावकारी साबित हो सकती है यदि उद्देश्य और नीयत दोनों ही अच्छे और स्पष्ट हों , खैर इसका आकलन तो थोडे समय के बाद ही होगा किंतु इतना तो सबको महसूस हो ही रहा है कि ,कहीं तो कुछ धीरे धीरे बदलने लगा है , कुछ तो ऐसा है जो पहले नहीं हुआ ।
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ऐसी ही एक शुरूआत हम दोनों पिता पुत्र ने घर के साथ सटे पार्क से की , प्रात: कालीन शाखा (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा ) में नियमित रूप से जाने के कारण , शाखा लगने से पहले हम दोनों मिलकर पूरे पार्क का (waste scan) वेस्ट स्कैन कर डालते हैं , हर छोटे बडी , पॉलिथीन, रैपर, प्लास्टिक की बोतलें, ढक्कन , चाय के कप आदि तमाम कचरे को साथ लेकर जाने वाले एक छोटी बोरी में भरकर इकट्ठा कर लेते हैं , जिसे बाद में पार्क के रख रखाव में लगे कर्मचारी नियत स्थान तक पहुंचा देते हैं । इतना ही नहीं हमने शाम को पार्क में बैठे लोगों से आग्रह करना शुरू किया , जिसका लब्बो लुआब ये रहता है कि ,


स्वच्छ रहने, रखने के सिर्फ़ दो रास्ते हैं .........गंदगी मत फ़ैलाइए , सफ़ाई नहीं करनी पडेगी,
दूसरा रास्ता ,रोज़ गंदगी फ़ैलाना नहीं छोड सकते , तो रोज़ सफ़ाई करने की आदत डालिए ॥

रोकिए .............खुद को , गंदगी फ़ैलाने से ,
टोकिए.............दूसरों को , गंदगी फ़ैलाने से

स्वच्छ भारत , निर्मल भारत ॥ स्वस्थ भारत , सबल भारत ॥

 देखिए , शायद कुछ कुछ प्रभाव इसका दिखने लगा है और अब तो सुबह की सैर/टहल के लिए आए हुए स्थानीय लोग भी हमारे साथ जुटने लगे हैं , झाडू थामे/बुहारते/कचरा उठाते हुए फ़ोटो लगाने की जरूरत नहीं समझी , स्वच्छ पार्क की फ़ोटो ज्यादा सुंदर लगेगी , यही ठीक लगा ॥


पार्क का वो हिस्सा जहां बच्चे खेलते कूदते हैं


पार्क के दूसरे हिस्से में फ़ैली हरियाली

 इसी तरह एक नई पहल करते हुए प्रधानमंत्री ने आम जनों से संवाद के लिए रेडियो को अपने माध्यम के रूप में चुना । इसके पीछे भी जरूर कोई न कोई बहुत ही सुलझी हुई सोच और दूरदृष्टियुक्त विचार ही होगा अन्यथा आज के समय में जब लोग आगे ही आगे की तरफ़ भागे जा रहे हैं और रेडियो/चिट्ठी जैसे संचार/संवाद माध्यमों को बिल्कुल आउटडेटेड मान समझ लिया गया है , किंतु सच तो ये है आज भी ग्रामीण भारत का एक बहुत बडा हिस्सा और जनमानस कंपूटर और इंटरनेट तक नहीं पहुंच पाया है , ऐसे में रेडियो को संवाद सूत्र के रूप में चुनना नि:संदेह प्रशंसनीय कदम है ।

मोदी बहुत ही संतुलित भाषा में ,अपनी बात को पूरी दृढता से रखते हैं , इतना ही नहीं उसे तार्किक तरीके से विश्लेषित भी कर देते हैं , वो लोगों को प्रेरित कर रहे हैं , वे रेडियो पर नाम लेकर कहते हैं कि देश के एक नागरिक ने पत्र लिखकर मुझे ये बात बताई है । इस बार स्वच्छता को सीधे देश में आज़ादी के बाद से अब तक रोग से नासूर बन चुक जाने वाली गरीबी से जोड दिया । बात सौ फ़ीसदी सच है , गरीब गंदगी की वजह से बीमार पडता है और बीमार पडने की वजह से गरीब रह जाता है , इसलिए यदि देश से गरीबी मिटानी है तो पहले गंदगी हटानी होगी , कितनी सरल और गहरी बात है । शैली, तेवर और स्वर हूबहू वैसे जैसे कि आम भारतीय को खुद का लगता है ।

मन की बात से प्रेरित होकर चिट्ठियों का दौर यदि दोबारा से शुरू हो जाए तो ये धीरे धीरे मैसेज व्हाट्स अप में सिमट कर रह जाने वाली सिमटती जा रही पीढी को ,खत/चिट्ठी के शिल्प से रूबरू होने और उस परंपरा को बढाने का मौका मिलेगा , ये अच्छी पहल होगी , आम जनमानस का सीधे सीधे प्रधानमंत्री को संबोधित करके अपने मन की बात लिखने का , मेरे जैसे पत्र प्रेमी के लिए तो ये सोई उर्ज़ा को जगाने जैसा है , मेरी पत्र पेटिका तैयार हो गई है , मन की बात कहने और करने के लिए ।



शनिवार, 13 सितंबर 2014

प्रकृति के खिलाफ़ नहीं प्रकृति के साथ चलना होगा





पिछले वर्ष जून में जब अचानक ही केदारनाथ की आपदा सब पर कयामत बनकर टूटी तो उस त्रासदी के प्रभाव से देश भर के लोगों ने झेला । कुदरत के इस कहर से जाने कितने ही परिवार हमेशा के लिए गुम हो गए , कितने बिखर कर आधे अधूरे बच गए , जाने कितने ही परिवार में बचे खुचे लोग मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर रुग्ण होकर रह गए । केदारनाथ त्रासदी के बाद इस दुर्घटना के कारणों पर किए गए शोध , विश्लेषण आदि से ये तथ्य निकल कर सामने आया था और यदि न भी निकलता तो भी ये तो अब खुद भी इंसान बहुत अच्छी तरह से समझ और जान रहा है कि प्रकृति द्वारा कुछ भी अनियमित करने होने घटने के पीछे सबसे बढा घटन वो मानवीय क्रियाकलाप ही होते हैं जो प्रकृति के प्रतिकूल हैं ॥
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अभी पिछला घाव ठीक से भरा भी नहीं था किस इस वर्ष फ़िर से धरती का स्वर्ग कहलाने वाला जम्मू कशमीर पिछले कई दशकों में पहली बार आई जल प्रलय के विप्लव से बुरी तरह त्रस्त हुआ है । पिछले दस दिनों से लगातार , सरकार , प्रशासन , आपदा नियंत्रक , भारतीय सेना और आर एस एस जैसे स्वयं सेवी संगठन वहां पीडित क्षेत्र में फ़ंसी हुई जिंदगियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोगों को काल के गाल में समा जाने से बचाया जा सके । स्थिति इतनी भयावह और विकट है कि इसे राष्ट्रीय आपदा मानते हुए पूरा देश सहायता के लिए आगे आया है ॥ एक बार पुन: वही विमर्श , वही आंकडे , आकलन ..........॥
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आखिर कब ..कब हम इस बात को अच्छी तरह समझेंगे कि हम इस प्रकृति जो कि जल , थल , वायु, अगिन , मिट्टी ,पर्वत , नदी , पेड आदि तत्वों के समन्वय से सिंचित होती रही है और लाख उन्नति और आधुनिकता के बावजूद भी , जी हां अब भी मानव/इंसान प्रकृति के उपस्थिति तत्वों में से बहुत ही सूक्ष्म और कोमल है शायद यही वजह है कि प्रकृति के हल्के से हल्के दबाव के आगे वो तिनके की तरह बिखर जाता है । 

विश्व में बढती प्राकृतिक आपदाओंने इंसानों को बहुत कुछ सिखाया जिसमें से सबसे अधिक ये कि बदलती हुई पारिस्थितिकी के अनुसार मानव जीवन ने अपने आपको बदला और ढाला , और ये प्रक्रिया युगों युगों से सतत चलती चली आ रही है । अब तो भू विज्ञानियों , प्राणी विज्ञानियों और बहुत से संबंधित विज्ञानों ने निरंतर खोज़ कर ऐसे साक्ष्य जुटा लिए हैं जो स्पष्टत: ये प्रमाणित करता है कि इंसानी सभ्यता बहुत ही प्राचीन समय से प्रकृति के साथ संघर्षरत होते हुए भी उसके साथ बराबर तालमेल बिठाती आई है । और इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि जब जब इंसान ने अपनी जिद , अपने अन्वेषण , अपनी आवश्यकता के कारण , प्रकृति की नैसर्गिक  व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश की है , प्रकृति खुद उसे संतुलित कर लेती है ॥
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प्रकृतिशास्त्री पिछले दो दशकों से ,या शायद तभी जब से इंसान ने अपनी सुविधा के लिए प्रकृति के मिज़ाज़ के खिलाफ़ जाकर छेडछाड शुरू की तभी से बार बार इस  बात पर चिंता जताते हुए नसीहत स्वरूप ये कहते रहे हैं कि जीवन जीने के रास्ते  प्रकृति के खिलाफ़ नहीं प्रकृति के साथ तलाशे जाने चाहिए । इतने बरसों बाद भी जहां एक तरफ़ हम इंसान , न तो प्रकृति के तत्वों का सम्मान करते हैं और न ही  उन्हें सहेजने और संरक्षित करने के लिए रत्ती भर  भी गंभीर है । विशेषकर पश्चिमी देशों की तुलना में अभी देश में कुछ भी नहीं सोचा किया गया है अब ये तो खुद सरकार , समाज , और आपको हमें तय करना है कि हमें भविष्य में ऐसी त्रासदियों के लिए तैयार रहना चाहिए या हमें अभी से चेत कर प्रकृति के साथ सहजीवन पद्धति का विकास करना चाहिए ....प्रकृति सोच चुकी है , अब सोचना आपको और हमें है ............

रविवार, 7 सितंबर 2014

करवट बदलता एक देश ..........सामयिक टिप्पणी






वर्ष २०१४ केआम चुनावों से पहले ही संभावित जीत के प्रति आश्वस्त से लगते प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लिए अगले साठ महीनों की प्रशासनिक सेवा देने का अवसर जिस आत्मविश्वास से मांगा था उसी समय कयास लगाए जाने लगे थे कि आगामी सरकार बहुत सारे नए विकल्पों , विचारों , कार्यप्रणाली , प्रतिबद्धता व परिवर्तन लेकर आएगी ॥
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नई केंद्र सरकार को सत्ता संभाले अभी इतना समय नहीं हुआ है कि उनके कार्यों ,निर्णयों व पहल का विश्लेषण किया जाए किंतु न सिर्फ़ भारतीय राज़नीति , प्रशासन , विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका , वैश्विक अर्थ जगत सहित अंतर्राष्ट्रय कूटनीइक जगत में भी आज नई केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति व जनकल्याण की चर्चा हो रही है । नई सरकार के अगुआ के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के रूप में आज देश के पास एक अनुशासित , अनुभवी , कर्मशील व करिश्माई व्यक्ति का नाम सामने आ चुका है ॥
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पिछले एक दशक में विकास होते रहने के बावजूद भी सियासत व आम लोगों के बीच सामंजस्य की भावना निरंतर क्षीण होती गई । नई सरकार ने इस नकारात्मक माहौल को पूरी तरह बदलते हुए न सिर्फ़ अपनी बल्कि देश की छवि को नए दृष्टिकोण से सामने रखा ॥
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नई सरकार ने तीव्र गति से कार्य करते हुए एक साथ बहुत मोर्चों पर अपनी कवायद तेज़ की । मंत्रालय के शीर्ष मंत्रियों , अधिकारियों, कर्मचारियों को अधिक श्रमशील होकर कार्य करने के निर्देश, सूचना संचार , व समाचार माध्यमों की ताकत को पहचाने हुए उनका भलीभांति उपयोग की शुरूआत , अर्थनीति , विदेशनीति, रक्षा , पर्यावरण , शिक्षा आदि सभी विषयों पर मंथन , विमर्श तथा योजनाओं की रूपरेखा की तैयारी , वर्षों से मृतप्राय या औचित्यहीन हो चुकी संस्थाएं व कानूनों की समीक्षा आदि मुद्दों पर सरकार न सिर्फ़ तेज़ी से फ़ैसले ले रही है बल्कि उन्हें अमली जामा भी पहनाया जा रहा है ॥ ..


सरकार के अस्तित्व में आने के ठीक अगले ही पल से जो कार्य होने लगा वह था सभी मित्र देशों के साथ सामंजस्य व साझेदारी के नए रिश्तों के युग का आरंभ । वैश्विक राज़नीति पर अपनी नज़र बनाए रखने वाले विश्लेषकों ने भारत की तरफ़ से सभी मित्र देशों को मित्रता का आग्रह संप्रेषण पूर्व के ऐसे सभी प्रयासों से कहीं अधिक गरिमापूर्ण व ओज़ भरा महसूस किया । इसका सकारात्मक परिणाम व प्रभाव यह रहा कि पिछले तीन महीने की अवधि में ही भारत अब तक अपने मित्र देशों से सौ से अधिक करार कर चुका है ॥
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चिर प्रतिद्वंदी पडोसी के साथ भी ऐसी ही एक नई पहल का प्रयास किया गया किंतु पिछले कुछ घटनाक्रमों के बाद फ़ौरन ही कठोर संदेश देते हुए वार्ता निलंबित भी कर दी गई । वैश्विक परिदृश्य बेहद तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है । संसाधनों पर आधिपत्य के वर्चस्व का संघर्ष अब उग्र होता जा रहा है । अस्थिर व निरंकुश शासन व्यवस्थाओं की निकटता किसी भी राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और अंतत: मनुष्य सभ्यता के अस्तित्व के लिए सदैव खतरा उत्पन्न करते है । इन बदली हुई परिस्थितियों में अमन चैन विकास और सृजन के पक्षधर वैश्विक देशों को भी संगठित होना होगा । नई सरकार के सारे वरिष्ठ सेवक अपने-अपने क्षेत्रों के लिए मित्रों का चयन व गठन कर रहे हैं ॥
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पिछले दो दशकों में देश के राजनीतिक चरित्र व कार्यपालिका की अकर्मठता के अपने चरम पर पहुंच जाने का एक बडा दुष्परिणाम ये निकल कर सामने आया कि न्यायपालिका को अति सक्रियता व अतिक्रमण के इतने सारे अवसर उपलब्ध करा दिए कि समाज में व्याप्त दुर्गुणों व दुर्बलताओं से ग्रस्त होकर खुद न्यायपालिका रुग्ण सी हो गई । भ्रष्टाचार से लेकर यौन उत्पीडन और पक्षपात से लेकर पदलोलुपता तक के आरोप सहित वरिष्ठतम न्यायविदों द्वारा दर्ज़ की जा रही टिप्पणियों आदि ने नई सरकार , जो कि प्रचंड बहुमत से सरकार में है को प्रोत्साहित किया कि वे बेझिझक न्यायिक सुधारों को लागू करे सरकार दो बडे निर्णय, कोलेजियम व्यवस्था में परिवर्तन एक वैकल्पिक व्यवस्था का प्रारंभ तथा उच्च न्यायालयों में पच्चीस फ़ीसदी नई अदालतों/ पदों का सृजन । न्यायिक सुधारों के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होने की बात कही जा रही है ।
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आम लोगों से सीधे संवाद स्थापित करती यह सरकार "जनधन योजना" "डिजिटल इंडिया" जैसी छोटी छोटी किंतु बेहद प्रभावकारी योजनाओं के साथ , गंगा नदी को पुनर्जीवन देने के लिए विशेष प्रयास , कागज़ातों को सत्यापित कराये जाने की अनिवार्यता की समाप्ति जैसी प्रक्रियात्मक राहत आदि कुल मिला कर ऐसा महसूस किया जा रहा है जैसे देश एक अलग दिशा में जा रहा है । शायद अच्छे दिन आने वाले हैं ॥

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