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सोमवार, 26 सितंबर 2016

निर्भया से करुणा ......



अगर गौर से सोचें तो पाएंगे कि करुणा  की हत्या तो असल में उसी दिन हो गई  थी , जिस दिन , उस व्यक्ति ने ,  बल्कि यह कहना चाहिए कि मनुष्य के रूप में हैवान के मस्तिष्क वाले ने , किसी भी समय ,किसी भी दिन और किसी भी क्षण ,जब सोचा था या फिर वह बड़ी आसानी से ये फैसला ले पाया था कि वह यूं सरेआम दिनदहाड़े करुणा को चाकुओं से गोदा लेगा |

और तब भी क्यों बल्कि उससे भी बहुत पहले ,तब जब ,आज से ठीक कुछ वर्षों पहले ,देश के सबसे वीभत्स अपराध ने पूरे देश के जनमानस को खौला कर सड़कों पर ला दिया था और लगने लगा था कि सरकार ,प्रशासन, न्यायविद ,पुलिस सभी मिलकर अब इस बात के लिए कटिबद्ध हो गए हैं कि भविष्य में इस तरह की कोई घटना दोहराई नहीं जाएगी |लेकिन ऐसा हुआ क्या ????नहीं इसके ठीक विपरीत कानूनी व्यवस्थाओं की कमियों का फ़ायदा उठाते हुए उस नृशंस अपराध का एक दोषी आज सरकार व सरकार की नीतियों से लाभान्वित होकर आराम से कहीं जीवन बसर कर रहा होगा , यकीन करिए ऐसा ही हो रहा होगा  ,व्यवस्थाएं पीड़ितों से अधिक आरोपियों  के हक़ में संवेदनशील दिखाई देती हैं  |

 सरकार मशीनरी ,प्रशासन सबके  अपने अपने स्तर पर ठोस कदम उठाए जाने के दावों के बावजूद स्थिति में कहीं कोई परिवर्तन देखने सुनने को नहीं मिल रहा है | बल्कि ऐसा लगता है मानो यह प्रवृत्ति बहुत तेजी से एक नासूर का रूप लेती जा रही है | सरकारी क्या कर रही है या पुलिस  क्या कर रही है ??? यह प्रश्न अलग है  | इससे अलग एक प्रश्न यह उठता है , कि प्रियदर्शिनी, निर्भया ,करुणा ,कौन जाने कौन कौन और कौन जाने कौन हीं , कहाँ नहीं ,घर, दफ्तर सड़क , सिनेमा , कब और कब नहीं ,कुल मिलाकर देखा जाए तो परिदृश्य ये निकलकर सामने आता है कि आज स्थिति बेहद हृदय विदारक चिंता जनक है

 एक हिंदी पत्रिका के लिए एक साप्ताहिक आलेख लिखने के दौरान अध्ययन करते समय मैंने पाया और देखकर दुखद आश्चर्य हुआ की विश्व के सबसे शक्तिशाली देश की सेना की महिला कमांडो दस्ते की लगभग 24% महिला कमांडो ने एक सर्वेक्षण के दौरान कबूला कि उन्हें उन के साथी सैनिकों ने एक बहादुर सिपाही के अलावा और भी अलग नजर से देखा || यह मेरे लिए बहुत ही दुखद आश्चर्य  देने वाला था क्योंकि अगर विश्व के सबसे शक्तिशाली सेना की महिला कमांडो भी कहीं ना कहीं उन्हीं सब परिस्थितियों और उन्हें छेड़छाड़ का शिकार हुई थी तो फिर हमें यह समझ लेना चाहिए कि कमोबेश यह स्थिति आज हर स्थान पर है ||

इस हालिया घटना और इससे पहले कि इसी तरह की घटी सारी घटनाओं में जो एक बात मुझे सबसे ज्यादा अखरती है वह कि आखिर यह लड़कियां अपने आप को इतनी आसानी से बिना प्रतिरोध बिना प्रतिवाद बिना प्रतिकार किए इतनी आराम से अपनी जान क्यों गवा देते हैं  और कई बार तो बिना शिकायत किए हुए ही ||पुरुषों  और महिलाओं के बीच बढ़ रही यह खाई इस कदर सामाजिक असंतुलन को जन्म दे रही है कि उसने अपने अंदर न्याय कानून सरकार प्रशासन सब को लपेटे में ले लिया है और उसका परिणय यह हुआ है कि कहीं भी किसी के लिए कोई भी खड़ा नहीं   होता है ||

इन परिस्थितियों में क्यों नहीं यह जरूरी हो जाता कि प्रत्येक देशवासी को अनिवार्य सैनिक शिक्षा देकर उन्हें कम से कम आत्मरक्षा आत्मविश्वास अनुशासन आपसी सहायता ,सहभागिता दृढ़ता आदि का प्रशिक्षण दिया जाए ||इसके लिए विशेष रूप से गठित एनसीसी , स्काउट गाइड व् एनएसएस  जैसी संस्थाओं को तुरंत इस बात के लिए आग्रह किया जाना चाहिए कि वह देश भर के स्कूल कॉलेजों में अपने को पुनर्स्थापित  करें | हालांकि मैं निजी रूप से इस विषय  पर एक पत्र पहले ही प्रधानमंत्री कार्यालय को लिख चुका हूं  |

अंत में उन लाखों निर्भया ,करुणाओं  और अन्य सभी लड़कियों से सिर्फ एक प्रश्न पूछना चाहता हूं कि आखिर वह अपनी लड़ाई अधूरी छोड़कर क्यों बीच में ही चली जाती है बिना उनको सजा दिए ,बिना उन उनके अपराध के लिए उनको अंजाम तक उन्हें पहुंचाए बिना और कई बार तो ये लड़कियां यूं बिना कुछ किए बिना कुछ बोले ...........आखिर क्यों इस दुनिया को छोड़ कर ...........अपने घर परिवार को छोड़कर चली जा रही हैं और बस चली जा रही हैं ,

प्रश्न विचारणीय है हमें आपको सोचना है आज और अभी सोचना है........... 

शनिवार, 24 सितंबर 2016

The unreal but Royal Dinner Conference

I was completely not aware of the indispire , the selection of  idea for the coming edition or say posts is also decided purely by the co-members read by all and appreciated or criticised also by all fellow bloggers . This is my first indispire post and purely imaginative ,Hence , please bear me as a new comer in the class of Scholars ......

Shali Jay
On my


Dining Table if I have the "chance of Age" to dine with 5 Eminent personalities or motivators of life


The Very First Guest Sh. Narendra Nath Dutt later known as Swami Vivekanand  will be sharing dinner on my table .  Vivekanand was self made or say self explored human being who experimented his short life of only 38 Years knowingly that He knows well for the purpose he was sent to this place . I get put a question , since more than Hundred Years have passed despite that Swami jee and his philosophy are being read and followed but How long is will take and why not making any difference to the nation ??

Seond Guest : Dr. A. P. J. Abdul Kalam , The Missile Man , The Former President of India , completely a self made simple man who started his life as a paper vendor and ended it (although these personalities alway lives with us through there thoughts and words)
as the very First person of the State . His life , work , dedication and simplicity are so much enriched in him that for a while dining with sir will automatically reflect the positive vibes and blessings what else can a host get in appreciation or tips :)


Third Guest Lord Buddha : -

"महात्मा बुद्ध ने प्रमाणित कर दिया है कि इन्सान पांच हज़ारों वर्ष से भी अधिक जिंदा रहता है सिर्फ अपने विचारों व् सदव्यवहार के कारण " 

Yes , how true lines said about the words and philosophy of Mahatma Buddh ..who shows the path of mankind , heartness by giving his Aashtaangik maarg theory . A prince by birth , and a saint by life to death . I will certainly want to enquire and try to understand that how he see today the equation or relation between religion civilization .



fourth Guest : Subhash Chandra Bose 
Yes , Netaji Subhash Chandra Bose , a true indian leader in all means . The man of whose words and leadership quality was so dedicated that all chiefs of countries around the world . What and How he can or will change the present eradication in Politics and System . He Once predicted that after independence if people were not crafted (either by civil or military rule) , they will definitely ruin the sate  ..and see......How correct he was .

Fifth Guest : Dashrath Manjhi (The Mountain Man) 


Since a film on Dashrath Manjhi ,role played by Navazuddin , was recently released to know the nation about the will power of this poor farmer who lost his wife could not be , hospitalised  in the absence of road , hurdled by two huge mountain . Is is always said "अकेला चना भाड नहीं फोड़ सकता " but Dashrath manjhi proved wrong this and changed " अकेला आदमी भी पहाड़ तोड़ के सड़क निकाल सकता है " | Today when the world is trending ane even costing lifes for selfie ,this done that done . This man have no body sorrounded and infact is co villagers saw him as mentally imbalance . But he proved himself . and that,s why I will ask him as when no body notice you doing great things and the conditions are bad and beyond your limits then ..then how one can or one concentrate on his goal .



And Yes the Pleasure is mine always to be a host and bill payer of these humanly god peoples who taught the coming generation that do not lose your faith in yourself , get inspired by others and then inspire others to do so . Good Night

शनिवार, 17 सितंबर 2016

जीवन को नहीं जीवन संस्कृति को समझें





आप कभी छत पर सोए हैं ???

रात में जब आप छत पर आकाश की ओर मुंह करके ऊपर अनंत की ओर देखने की कोशिश करें तो एक अद्भुत संसार ,सोचता हूँ उसे संसार भी कहना ठीक होगा क्या ,मगर ये जो आदि से लेकर अनंत तक दिखाई देता है वो सिर्फ एक अनुभूति है । अक्सर ये कहते हुए सुना है कि मरने के बाद सब तारा बन जाते हैं |विज्ञान कहता है नहीं बकवास है ये ,गैस के गोले हैं सब बस ..मगर फिर विज्ञान ये भी नहीं बताता कि अगर अभी के बाद तारा नहीं बनता तो फिर क्या बनता है कुछ  बनता भी है या नहीं पता नहीं है | खैर ,हम इस मौत की बातें क्यों करें हम तो जीवन और जीवन संस्कृति की बातें करने चले थे तो उसी की बातें करते हैं ।।


 संस्कृति यानि संस्कारों से युक्त दिनचर्या ऐसी आदर्श स्थिति जिसका निर्वाह करते हुए मनुष्य पूरे जीवन चक्र को बिता कर सिर्फ इसलिए भी उस जीवन चक्र से बाहर निकलने का हकदार हो जाता है | क्योंकि उसका जन्म संस्कारों को ग्रहण कर जीवन को संस्कृति में बदलने के लिए ही हुआ है ||संस्कृति मिलती है या कहे पनपती है संस्कारों से संस्कार आते हैं शिक्षा से शिक्षा वह हमें तब मिलती है जब हमारे अंदर ज्ञान की अनुभूति हो और ज्ञान की अनुभूति करने वाला और कोई नहीं वह गुरु होता है गुरु ऐसा होना चाहिए जो इंसान से भी ज्यादा अच्छा इंसान हो |कहने का तात्पर्य यह है हमारे जैसा आप के जैसा उनके  आदर्शों में ,व्यवहार में ,चरित्र में ,वाणी में ,जीवन शैली में ,हर दृष्टिकोण में मानवता को  स्थापित करने वाला वह गुरु कहलाने का हकदार है फिर चाहे वह ईश्वर हो या मानव के रुप में जन्म देने वाली कोई  आत्मा ||

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अपने भीतर समेट कर रखने यवाले ईश्वर को ना पहचानने वाला इंसान ही सबसे ज्यादा उसकी तलाश में यहां वहां मारा मारा फिरता है | विज्ञान की खोजें  की जा रही  हैं ,योग मनोयोग शारीरिक मानसिक सामाजिक जाने कैसे-कैसे प्रयोजनों से इन सब को साधने की कवायद की जा रही है जबकि जीवन संस्कृति को समझने का सबसे सरल उपाय है कि आप मनुष्य जीवन को समझ और जब गुरु को तलाशते हैं तो फिर तो प्रकृति में आपके आसपास मौजूद हरण आपसे ज्यादा श्रेष्ठ और आपसे ज्यादा आदरणीय माना जाना चाहिए ।।


ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह खुद बखुद समय में इतिहास में प्रमाणित किया हुआ है और जिन की बात कर रहा हूं उन्होंने खुद भी साबित  किया हुआ है| आप अपने आसपास देखिए क्या दिखाई देता है |आकाश धरती मिट्टी पानी इनमें से कौन सी ऐसी चीज है जिसे आप अपना गुरु नहीं मान सकते हैं | जिसे इष्ट नहीं  समझ सकते जिसमें ईश्वर का निवास नहीं मान सकते तो फिर इन सब को अपना दोस्त , मित्र , सखा , परिवार , और ईष्ट मानकर उनकी यथावत सेवा करने की बजाए हम उनमें यथेष्ट प्रकार से विषाक्त पदार्थों को सिर्फ इसलिए घोल रहे हैं कि हम मानव विकास और विज्ञान के नाम पर साधक से उपभोगी  बन कर रह जाएं और सच में देखा जाए तो यही है भी..........शेष चर्चा ............


सोमवार, 11 अप्रैल 2016

भारत माता की जय ....कुछ समझे लल्लू






असल में "भारत माता की जय " जिसे यकीनन ही इस देश की धरती से जुड़े हर व्यक्ति ने , अपनी उम्र में , खेल के मैदान में , सरहद की सीमाओं पर , इसरो की प्रयोगशालाओं में, खो खो और कबड्डी के मैदान में , किसी अभिनन्दन और किसी बलिदान पर ...कभी न कभी हर किसी ने "भारत माता की जय" की ही है ..गौर करिएगा मैंने कहा है "भारत माता की जय "की" है , कही न कही ये जुदा बात है और असल में फालतू बात है |

चलिए शुरू से शुरू करते हैं , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वर्तमान प्रमुख स्वयंसेवक श्री मोहन राव भागवत ने अपने एक बौद्धिक में कहा कि , इस देश में सबको भारत माता की जय करना सिखाना होगा ...इसके ठीक पांच दिन बाद भारत में इस्लामिक कट्टरवाद के झंडाबरदार ओवैसी एकदम सिनेमाई अंदाज़ में टीवी कैमरे के सामने आर्तनाद करते हैं कि कोई मेरी गर्दन पर भी तलवार रख देगा तो मैं भारत माता की जय नहीं बोलूँगा , इसके बाद महाराष्ट विधानसभा के दोनों सदस्यों का निलंबन ..फिर अगडम बगडम ..जो कि अब चलता ही जा रहा है ..और अब तो बाकायादा जंग लड़ी जा रही है गोया "भारत माता की जय" न होने के लिए जिहाद छेड़ दिया गया है |
आइये अब मामले को जरा इस दृष्टिकोण से देखते हैं | आज देश में लोगों को यातायात नियमों का पालन करने को सीखने के लिए कहा जा रहा है , ये सिखाया समझाया जा रहा है कि भईया बस करो थोड़े साफ़ सुथरे रहो , स्वच्छ रहो , सेहत स्वास्थ्य का ध्यान रखो , बीमार पड़ने से खुद को बचाओ , और भाई मेरे धरती के जिस टुकड़े पर खड़े होकर इतना सब कुछ सीख रहे हो न , उस धरती से , उस देश से , उस मातृभूमि से थोडा सा प्यार भी कर लो , और थोड़ी सी "जय" तो उसकी भी हो थोड़ी सी इज्ज़त पाने का हक़ तो उसको भी है ही तो यही तो है भारत माता की जय ...या फिर कि बात कुछ ऐसी तो नहीं ..

एक वे जो "भारत" की जय नहीं कर सकते . भारत , हिन्दुस्तान के नाम से ही एलर्जी सी हो उठती है
अगले वे जिन्हें "माता " से घनघोर आपत्ति है , यार अम्मी , आई , मैय्या , दीदी ,भैय्या मान लो , पर अपना समझो यार अपना
और आखिर वाले सबसे अधिक खतरनाक जिन्हें "जय" करने से काफी तकलीफ है , ये भारत माता की ऐसी तैसी भारत माँ की बर्बादी की नारे सीना तान के लगा सकते हैं मगर ये भूल जा रहे हैं कि आज यूं इसी देश की छाती पर बैठ कर निडर ,निर्भीक होकर यदि वे ये धृष्टता कर पा रहे हैं क्योंकि आज देश में विचारों की अभिव्यक्ति की इतनी आज़ादी , जो अब अक्सर उदंडता को लांघ जाती है , माहौल ही अपने आप में "भारत माता की जय" है |

और एक सबसे दिलचस्प तथ्य | फिलहाल दो तरह के कथ्य सामने आ रहे हैं | पहला ये कि जो .........................."भारत माता की जय" ..नहीं करता /नहीं करेगा .....आदि आदि दूसरा वही हाहाकारी वाला , तोप तलवार रख दो , खंजर रख दो ........... "भारत माता की जय " .........................नहीं बोलूँगा .... और दोनों ही सन्दर्भों में क्या दोनों ही कह बोल बहसिया रहे हैं "भारत माता की जय " ..... सबसे जरूरी बात , इस नाम तो तो तितमहा तांडव व्याप्त किया जा रहा है देश में उससे नफरत ,द्वेष, फैलाने को आतुर लोगों को बैठे बिठाए काफी कुछ मिल रहा है | ध्यान रहे ये गजब की क्रांतियों का दौर है , ईमानदारी की क्रान्ति , धरनों प्रदर्शनों की क्रान्ति , असहिष्णुता की क्रान्ति , पुरस्कारों के तिरस्कारों की क्रान्ति , जूतों को फेंकने की क्रान्ति ......तो ...कहिये न कहिये ...मगर करिए जरूर और हाँ आप अपनी भी जय करेंगे न तो यकीन मानिए वो भारत माता की जय ही है ......क्या है ,,,,,,,,,,,,,,,,,?????????

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

सुनो भई ...लौटते हुए लोगों ..





वाह भई क्या समां बंधा है ...और ये देखिए कि ..क्रिकेट के मैच में हार के बाद उपजी झल्लाहट अक्सर फैशन के रूप में संन्यास लेने की नई प्रथा भी चारों खाने चित्त ....धड़ाधड़ ..बल्कि उससे भी तेज़ कहिये कि ...दुरंतो की रफ़्तार से पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं ..यकायक उठे इसे साहित्यिक सुनामी का जोड़ गणित समझने लायक हम जैसे निहायत ही बिना किसी ब्रैंड और ब्रिगेड के पाठकों के बूते की बात नहीं , वो हमारा आउट आफ सिलेबस प्रश्न है ...लेकिन फिर भी अब जो आप जैसों को पढ़ पढ़ के बोलने समझने जानने लायक बना हो तो फिर ये भी स्वाभाविक ही है कि अपनी जिज्ञासा भी आप विद्व जनों के सम्मुख ही रखे ....

जब आप सबकी लेखनी , क्षेत्र , भाषा , तेवर सब कुछ कहीं न कहीं से कभी कभी थोडा तो भिन्न रहा ही होगा तो फिर ये सामूहिक भाव ..दमन , अभिव्यक्ति की आज़ादी , अतिवादी सोच वाली सरकार आदि के तमाम आप सब विद्व जनों के मन में ...एक ही कारण ....इतना सामूहिकवाद ...इतनी एकता ...| चलिए मन लिया कि

कुछ तो वजह होगी ऐसी जो वे मिल कर साथ बैठ गए ,
रंगे सपनों की चाह सोए रहे जिनके साथ ,जगे तो ऐंठ गए

खैर साहेब ये आपकी मर्जी ....मुझे ये बात भी समझ नहीं आ रही कि , जब आपको यही लगता है कि मौजूदा सरकार आपकी सोच के बिलकुल मनमाफिक न  होकर , हर बात पर तर्क और सवाल करने वालों की जमात सरीखी होती जा रही है ,और ये भी यकीन है पुख्ता कि देर सवेर झुका ही लेंगे , तो उस पर सिर्फ एक साल में पिछले साठ सालों से ढोए जा कन्धों पर बढ़ा देंगे , माफ़ करिएगा मगर अब लोग .....लोग से मेरा मतलब आजकल व्हाट्सअप पर दुनिया गोल गोल घूम रही है ...गांधी बाबा से लेकर सुभाष दादा तक का सच लोग जानने और समझने को आतुर हैं ...तो थोड़े दिन और सब्र करिए ..कम से कम इतना तो जरूर कि जिन सरकारों ने सम्मान और पुरस्कारों का भी गान्धीकरण नेहरूकरण कर दिया था उनके आने तक उनकी संपत्ति संभाल के रखते , अब इस वक्त वापस किया जब ..हकीकत की बात जानें तो अभी कुछ दिनों पहले इस गूगल को किसी ने खरीद कर मारा था ...लोग दर्ज़न का भाव तो ज्यादा कम लगाते हैं ऊपर से इस ओएलेक्स ने तो लोगों की आदतें बिगाड़ दी हैं |

देखिये दो बातें हैं , पहली , ये कि आपने अपनी प्रतिक्रया ज़ाहिर करते हुए देश और सरकार की तरफ से मिले सम्मान पत्र , समारिका आदि वापस करने का निर्णय किया कारण यदि सबका एक ही माना जाए जो, कि ताज्जुब है और शुक्र भी एका का हुनर याद है सबको , तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला जैसा कोइ घनघोर विस्फोटक कारण आप लोग बता रहे हैं माफ़ करिएगा वैसा अब नहीं है | आप कहते हैं देश युवा है और यदि देश युवा है तो वो युवा वर्ग ही है जो आज खुद को पूरी दुनिया से जोड़े हुए सोशल नेटवर्किंग के सहारे वो वो सब अन्जाम दे पा रहा है जो आपने शायद कल्पना भी न की हो | एक समय देश में सिर्फ खिचडी सरकारों के बनते रहने की अमिट भविष्यवाणी तक को नकार कर रख दिया | फिर भी यदि ऐसा भी है तो किसने कहा और किसने रोका है आपको , लिखिए हाँ जब भी अभिव्यक्ति पर बहुत दबाव सा महसूस हो तब उस मासूम से कार्टून पर जारी हुए फतवों और उन फतवों के मसीहाओं द्वारा क़त्ल कर दिए उन जाबाजों के किस्से पढियेगा आपको अपने से ज्यादा वजनदार दिखाई देंगे |

देखिये हम पाठक हैं , आपके लिखे से आपकी किताबों से प्रभावित होकर उस विचार से , उस शैली , उन किस्सों से , लेखकों के मुरीद बन जाते हैं और माफ़ करिए मुझे इस बात से कोइ फर्क नहीं पड़ता कि गुनाहों का देवता के लिए धर्मवीर भारती को कौन कौन से पुरस्कार मिले या नहीं मिले | मुझे पढ़ के सुकून मिला लेखन कार्य सिद्ध हुआ | मुझे लगता है ये बात भी कह ही दूं कि यदि इस पुरस्कार वापसी समारोह के परिप्रेक्ष्य में आप मुझसे कुछ कहने को कहें तो मैं कहूंगा कि आप अकेले नहीं है वापसी करने वाले , कई लोग राजनीति से अपने गृहस्थाश्रम में वापसी कर चुके हैं , कई जगह पार्टी फंड की वापसी हो रही है , युवराज का जाना और उनकी वापसी हो रही है , जनता को ही ले लीजीये लोकतंत्र की बहुमत्त्व शक्ति की वापसी हुई .सीमापर सुना है अब एकदम बराबर वापसी हो रही है गोलियों की ........तिलमिलाहट कलम से कागजों तक उतरे तो आनंद आए ..ज़रा तर्क होने दीजीये और मुँह मत फुलाइये ......आखिर किसी का लिखा पढके तो बहके होंगे लड़के


........................

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

भूत का कुनबा




पुराने समय की बात है , एक गाँव में अकाल पड गया | सुखी समपन्न और भरे पूरे लोगों को छोड़ कर अन्य सबको खाने के लाले पड़ गए | संपन्न सेठ साहूकार और उनके परिवार तो मज़े में ज़िंदगी काट रहे थे , किंतु गरीब किसानों का  जीना दूभर हो गया था | बांकेदास का परिवार भी इस गरीबी की चपेट में आ गया था | बांकेदास ने जब देखा कि यहां तो अब भूख से सबकी मृत्यु ही हो जानी है तो उसने निश्च्य किया कि वह स्वयं परिवार के सभी पुरुषों  के साथ पास के गावों कस्बों में जाकर कोइ काम मजदूरी ढूंढ कर अपने परिवार के लिए कुछ खाने पीने का इंतज़ाम करेगा | कुनबे के सभी पुरुष सदस्यों को कल प्रातः निकलने को तैयार रहने के लिए कह दिया गया | 


अगली सुबह बांकेदास अपने भाईयों भतीजों व् कुनबे के अन्य पुरूष सदस्यों  के साथ घर से निकल पड़े | चलते चलते सुबह से शाम हो गयी किन्तु उन्हें अब तक कोई ऐसा ठिकाना या काम नहीं मिला जिससे उनका मकसद पूरा हो पाता | साँझ होने को आ रही थी और सभी थक कर चूर हो गए थे | गाँव कस्बों से काफी दूर आगे आने के बाद एक पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे पूरे कुनबे ने रात बिताने की सोची | शुक्ल पक्ष अपने चरम पर था और पूर्णिमा से पहले की चांदनी में चाँद की चमकीली रोशनी से सारा वातावरण शीतलमय हो रहा था | 


ऐसे में बांकेदास ने देखा की पास में ही मूँज के बड़े बड़े झाड़ लगे हुए हैं मानो मूँज का जंगल उगा हुआ हो | उसके दिमाग में एक तरकीब आई | उसने अपने कुनबे के सदस्यों को पास बुलाकर कहा की क्यों न रात में इस मूँज को काट कर उसकी बंटाई करके डोरियाँ रस्सियाँ बना ली जाएँ और सुबह होने पर उन्हें बाज़ार में बेच कर थोड़े पैसे कमाए जाएं | बात सबको भा गयी | फिर क्या था सबने आनन् फानन में मूँज के बड़े बड़े गट्ठर काट कर इकट्ठा कर लिए और आमने सामने मिल कर बैठ उनकी गुंथाई बंटाई करने लगे | साथ ही साथ पूरा कुनबा मिल कर जोर जोर से गाता जा रहा था ..आज तो मिल के बांधेंगे , आज तो मिल के बांधेंगे | 



उस पीपल के वृक्ष के ऊपर रहने वाले एक प्रेत , जो कि यह माज़रा बहुत देर से देख रहा था अचानक ही यह सुन कर डर गया | उसने मन ही मन सोचा हो न हो ये कोइ विशेष दल आज मुझे बांध कर ले जाने आया है | जैसे जैसे आवाज़ बढ़ती जाती प्रेत का दिल डर से बैठा जा रहा था | उससे अब नहीं रहा जा रहा था उसने नीचे उतर कर सीधा बांकेदास के सामने पहुँच कर उससे कहा ," हे वीर पुरुषों आप सब मुँझे न बांधें मैं यहाँ कई युगों से ऐसे ही उन्मुक्त और भयरहित हो कर रहा हूँ | आप चाहें तो इसके बदले में मुझसे अनन , धन ,वेभव् जो चाहे ले लें `|

बांकेदास को सारी बात समझते देर नहीं लगी , उसने बड़ी चतुराई से प्रेत से अपने पूरे कुनबे के लिए एक वर्ष का भोजन गुजारे की अन्य सामग्री मांग ली | सारा अनाज , कपड़े व् अन्य सामग्री लेकर बांकेदास अपने गाँव वापस आ गया | गाँव के सेठ साहूकारों को जब यह बात पता चली तो वे सब बांके दास से इस बाबत पूछने लगे | बांकेदास सीधा सरल किसान था उसने सारी राम कहानी उस सेठ को सूना दी | 


सेठ के मन में यह सुन कर लालच आ गया उसने सोचा कि यदि इस तरकीब से मैं मेरा कुनबा भी  अन्न धन ले आएं तो हम और भी अमीर हो जाएंगे | अगली सुबह उसने जैसे तैसे अपने कुनबे के पुरुष सदस्यों को तैयार किया की बाहर जाकर परिश्रम करके अधिक धन कमा कर लाना है | सारे पुरुष सदस्य इस बात का विरोध करने लगे ,क्योंकि वे साधन संपन्न होने के कारण बहुत ही सुस्त व् आलसी हो गए थे | जैसे तैसे  वे उस पीपल के वृक्ष तक पहुँच गए किन्तु मूँज काट कर लाने की बात पर वे आपस में एक दूसरे से नोक झोंक करने लगे |खैर थोड़ी बहुत मूँज काट कर लाने के बात उसको गूंथ कर डोरी बनाने की बारी आई तो वे आपस में लड़ाई कुटाई तक करने लगे | ऊपर से बैठे प्रेत ने यह सब देखा तो नीचे उतर आया | सेठ जो पहले से इओस क्षण की प्रतीक्षा में व्यग्र बैठा था , लपक कर प्रेत के सामने पहुंचा और कहा हमें ढेर सारा अन्न धन दो नहीं तो हम सब तुम्हें बाँध कर ले जाएंगे | 


प्रेत ने पास ही पड़ा अपना मोटा लट्ठ उठाया और सेठ को पीटने लगा , प्रेत ज़ोर ज़ोर से कहता जा रहा था , तुझसे अपना कुनबा तो बांधा जोड़ा नहीं जा सका अब तक तू मुझे बाँधने का बात करता है " | सेठ और उसका कुनबा अपनी जान बचा कर भाग खड़े हुए |
सीख : आपस में बंधा हुआ जुड़ा हुआ कुनबा ही शक्तिशाली होता है |        

सोमवार, 28 सितंबर 2015

सुई में निकला हाथी


 चित्र अंतरजाल खोज से साभार


बोध कथाओं का हमारे जीवन पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है | अक्सर देखा और सुना जाता है कि छोटी छोटी बोध कथाएँ हमारे जीवन पर क्या प्रभाव डालते हैँ जो बड़े बड़े किताब मेँ यह बड़ी बड़ी सीख भी नहीँ डाल पाती ।  आज ऐसी ही एक बोध कथा

देवों में सबसे श्रेष्ठ देवऋषि  नारद जी  का स्थान माना जाता रहा है कहा जाता है कि जब प्रभु श्री हरि विष्णु ने अपनी मनपसंद वीणा देव ऋषि को दी थी तो साथ ही यह शर्त भी रख दी थी कि वे  उससे  सिर्फ नारायण नारायण का ही जाप करेंगे | उसका प्रभाव यह  पडा कि  देवर्षि नारद के  मन में कहीं न कहीं दंभ  का भाव उत्पन्न हो गया | उनका अहम्  स्वाभाविक भी था जिसे स्वयं  नारायण ने  यह आदेश दिया कि वह हमेशा अपने मुख से  श्री नारायण को  ही याद करते रहेंगे | लेकिन यह भाव इस कारण से उत्पन्न हुआ था क्योंकि नारद स्वयं  को विश्व  प्रभु कसा सबसे बड़ा भक्त समझने लगे थे | ईश्वर को नारद मुनि का यह भाव ज्ञात होते ज्यादा देर  नहीं लगी |

किंतु ईश्वर जो भी करते हैँ उसके पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य होता है |   नारद पूरी सृष्टि का भ्रमण करके आते और विष्णु के समक्ष खड़े होते तो उन्हें इस बात की उम्मीद रहती कि प्रभु जब भी अपने भक्तों में से सर्वश्रेष्ठ  भक्त  का  उल्लेख  करेंगे  नि;संदेह  वह नाम  नारद  मुनि का ही होगा | किन्तु उन्हें बहुत निराशा हाथ लगती जब वे पाते कि प्रभु देवर्षि नारद का नाम न लेकर अपने भक्त संत रविदास का नाम लेकर उन्हें अपना सबसे बड़ा भक्त बताते थे | एक दिन नारद मुनि ने निश्चय किया कि वे संत रविदास की परिक्षा लेकर देखेंगे |

देवर्षि नारद मुनि देवलोक से सीधे संत  रविदास की कुटिया में पहुंचे | संत रविदास एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर जूते सिलने के अपने कर्म में मशगूल थे | जैसे ही देवर्षि ने "नारायण नारायण " का जाप किया रविदास ने सर उठाकर ऊपर देखा |

"ओह देवर्षि नारद | भक्त का प्रणाम स्वीकार करें | मेरे प्रभु श्री हरी कैसे हैं ?"

नारद कुटिल मुस्कान से साथ बोले " अच्छे हैं जब मैं देवलोक से चला था तो वे सुई में से हाथी निकाल रहे थे | "

संत रविदास ने कहा , " जय श्री हरि , प्रभु की लीला अपरम्पार " |

यह सुन कर नारद मुनि जोर से ठठा कर हँसे और बोले , " रविदास तुम्हें तो प्रभु अपना सबसे बड़ा भक्त मानते हैं किन्तु तुममें तो ज़रा सी भी तर्क बुद्धि नहीं है , कहीं सुई में से भी हाथी निकल सकता है ?? "

अब मुस्कुराने की बारी संत रविदास की थी | उन्होंने सामने बरगद के वृक्ष से पक कर गिरे एक फल को उठाया और उसे हाथों से मसल दिया , एक कण के बराबर बीज अपनी हथेली पर रख कर पूछा , मुनिवर क्या ये बीज सुई से बड़ा है ?? "

"नहीं ये तो अति सूक्ष्म है , सुई तो इससे कहीं अधिक बड़ी होती है " मुनिवर ने हैरान होकर उत्तर दिया |

रविदास ने कहा , " मुनिवर अब उधर देखिये इस बरगद के वृक्ष के नीचे एक नहीं बीस हाथी विश्राम कर रहे हैं तो यदि प्रभु बरगद के एक सूक्ष्म बीज (जो कि सुई से भी कहीं छोटा है ) को मिट्टी में दबाने के बाद उसे इतना विशाल कर सकते हैं तो प्रभु के लिए क्या असंभव है |
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