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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

आकाश वाटिका ; आप भी बनाइये न



कौन सोच सकता था कि किसी छत को यूँ भी सँवारा जा सकता है 

पिताजी मूलतः एक कृषक परिवार से थे इसलिए अपनी फ़ौजी नौकरी के दौरान भी आवंटित फ़ौजी क्वार्टर के अहाते में हमेशा कुछ कुछ उगाते लगाते मैंने उन्हें बचपन में ही देखा था।  ग्रीष्म ऋतु के अवकाशों में गाँव जाकर आम लीची केले के लदे हुए बागान ,तालाब ,नदियाँ ,खेतों ने हमेशा एक सम्मोहन सा जगाए रखा हमारे भीतर।  कालचक्र ने तरुणाई और कॉलेज का सारा समय ग्राम्य जीवन में बिताने का अवसर दिया और मैंने मिट्टी ,पानी ,पेड़ ,पौधों आदि के साथ सहजीवन का अमृत पाठ वहीं बहुत करीब से देखा समझा। 

अध्यन के पश्चात सरकारी सेवा में आने के बाद जो सबसे पहले साथी बने वो थे पौधे और किताबें। स्वअर्जन ने आर्थिक संबलता दे दी थी किन्तु दिल्ली जैसे ईंट पत्थर से बुरी तरह त्रस्त महानगर में स्थान की सीमितिता और किरायेदार के रूप में रहने की विवशता ने बहुत समय तक इन पौधों फूलों से मेरी दोस्ती गमलों तक सीमति रखी।  लगभग पॉंच वर्ष पूर्व जब मैंने दिल्ली में छोटा सा सिर्फ 80 गज़ के क्षेत्रफल का फ़्लैट लिया तो मुझे अपने घर की खुशी उस समय दोगुनी लगी जब छत के सर्वाधिकार के साथ मुझे वो मकान मिला और यहीं से शुरू हुई ये ख्वाबों सरीखी बागवानी करने की कल्पना को साकार करने की प्रक्रिया। 

छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का नैसर्गिक आनंद होता है 

शुरुआत में मिटटी , छत ,मौसम , वानरों के उत्पात आदि ने बहुत बार व्यवधान उत्पन्न किये ,मगर सब धीरे धीरे अपने आप हल होते गए और सिर्फ दस बारह गमलों से शुरू हुई ये बागवानी आज हज़ार से ऊपर पौधों , पच्चीस तरह के फल उतने ही प्रकार की सब्जियों ,सैकड़ों मौसमी व स्थाई फूलों के अनमोल उपहार के रूप में आज मेरे घर के शीर्ष पर विराजमान हैं। घर में बेकार पड़ी चीज़ों ,प्लास्टिक बोतलों , कूलर बेस ,मिक्सी ज़ार , मग सब कुछ धीरे धीरे गमलों का आकार लेने लगे और मैं छोटी से छोटी जगह पर बागवानी कैसे किसकी कब की जा सकती है इन सबमें सिद्ध हस्त होता चला गया।

छत पर बनी मेरी बैठक वाली टेबल 

 कितने ही तरह के पक्षी , छोटे बड़े जीव ,तितलियाँ ,भौरें आदि अपने कलरव से इन्हे और जीवंत किये रहते हैं।  आसपास के पड़ोसी ,मित्र ,सहकर्मी ,बंधु बांधव आदि इससे प्रेरित होकर अपने आसपास को और अपनी आत्मा को हरित करके तृप्त कर रहे हैं तो मेरा सुख द्विगुणित हो जाता है।  पृथ्वी और प्रकृति के बीच जो सेतु है वो इंसान को बना रहना चाहिए।  यही सच है आखिरी सत्य।  बागवानी के विषय में सिर्फ इतना कहूँगा कि किसी भी इंसान को समझने से कहीं आसान होता है पौधों फूलों पत्तियों को समझना।  आप इनसे प्यार करेंगे तो बदले में अपना सर्वाव लुटा देते हैं आप पर।  देर किस बात की है कर डालिये सब कुछ हरा अपनी खिड़की ,बालकनी ,छत ,,मुंडेर सब कुछ हरा करने पर आपकी आत्मा भी हरी भरी होकर तृप्त हो जाएगी। 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

आइये टमाटर उगाते हैं










 आज बात करते हैं टमाटरों की।  आप सबने पिछले कई दिनों में जिज्ञासा ज़ाहिर की है कि टमाटरों के लिए क्या कैसे करना चाहिए तो मैं जो करता हूँ वो आप के साथ साझा करता हूँ। 




टमाटर के लिए आवश्यक 

गमला ; छोटा न हो , माध्यम आकार का हो तो उत्तम और बड़ा हो तो सर्वोत्तम
मिट्टी ; अच्छी हो तो उत्तम और बढ़िया नमी रखने वाली काली मिट्टी हो तो सर्वोत्तम
बीज ; दो तरह के मिलते हैं बाज़ार में ,देसी और हाइब्रिड ,दोनों ही अच्छा काम करती हैं
मौसम ; बहुत अधिक गर्मी और बहुत अधिक सर्दी के मौसम को छोड़कर साल भर


टमाटर के बीजों को छिड़क कर [यदि आपके पास बीजों के  लिए अलग से सीड्स बेड बने हुए हैं तो ] ऊपर से मिटटी की हलकी परत से ढक कर पानी के हलके छींटें मार दें।  यदि सीधा गमलों में ही उगाना चाह रहे हैं तो एक गमले में सिर्फ एक बीज डालें।  ध्यान रहे कि पानी बहुत ज्यादा नहीं डालना है उतना ही कि मिट्टी सूखी भी न रहे और बहुत गीली तो कतई न रहे।  


पौधों के निकलने पर उन्हें सीड्स बेड से सावधानी से बिना जड़ हिलाए गमलों में स्थानांन्तरित कर लें। गमलों में ही हैं पहले से तो फिर जरूरत नहीं है कुछ भी करने की।

पानी देते समय ध्यान ये रखने  की योग्य बात है कि छोटे पौधे बहुत ही नाजुक होते हैं इनके ,तो न तो ये झुकने पाएं न ही इनका शीर्ष मुड़ने पाए। सहारे के लिए छोटी से बेंत ,सींक आदि का इस्तेमाल करने से बेहतर रहता है और पौधे भी सुरक्षित रहते हैं।

40-50 दिनों के अंदर इनकी फुनगी पर पीले फूल चमकने लगेंगे और उसके 7 दिनों के अंदर ही नन्हें टमाटर दिखने लगेंगे।

अब सबसे जरूरी काम ये करना होगा कि इनके शीर्ष को ,और उनको विशेषकर जिन पर टमाटर दिखने लगे हैं उन्हें सावधानी से पतले धागे डोरी आदि से सहारे के लिए लगाई हुई सींक\बेंत आदि से इस तरह से स्ट्रिंग कर दें यानि बाँध दें ताकि टमाटर का भार पड़ने पर भी वो शीर्ष झुक कर टमाटर के विकास को रोक न दे।  




पत्तों के पीले पड़ने के साथ ही हरे टमाटर अपने आप सुर्ख लाल और खाने लायक हो जाएंगे।  टमाटरों को बड़ा ,रसीला रखने के लिए उनकी जड़ों में हमेशा नमी बने रहना जरूरी है किन्तु ये भी सावधानी रखनी जरुरी है कि पानी इतना अधिक न हो कि जड़ ही गलने लगे। 

बस फिर क्या शुरू हो जाइये ,उगाइये अपने हरे और लाल टमाटर। 


रविवार, 19 अप्रैल 2020

ज़िदंगी का फ्लैश बैक देखने को ;चाहिए एक रिवाइंड बटन









कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी ऐसा भी दिन आएगा जब अचानक से कुदरत कहेगी , स्टैच्यू और हम सब ठिठक कर एक जगह रुक जाएंगे जो जहां है वहीं जड़ होकर रह जाएगा।  मैं और मेरी या मेरे से ज्यादा उम्र के सबके पास अपनी बीती हुई ज़िंदगी के एल्बम में से कितनी ही यादें ,कितनी ही बातें सबने अपने ज़ेहन में बसा कर छुपा कर रखी होंगी।  और इससे बेहतर और क्या वक्त हो सकता है उन पन्नों को पलटने का।  देख रहा हूँ मित्र अपनी बरसों पुरानी तस्वीरें ,अपनों के साथ की फोटो यहां अंतरजाल पर साझा कर के सहेज रहे हैं।  अच्छा ही है कल को जब हम न होंगे तो हमारी आने वाली नस्लें ,और उनके बाद वाले भी ये सब यदि बचा खुचा रह गया तो देख पढ़ पाएंगे और कम से कम समझ सकेंगे कि हमने अपनी ज़िंदगी में कौन कौन से रंग देखे थे।

हम बहुत ही खुशकिस्मत रहे हैं ,हम कंचे पतंगों लट्टू , से भी पहले सायकल के पुराने टायर और माचिस की डिब्बी के कवर से ढेरम ढेर खेलने वाली दुनिया से शुरू होकर आज एंग्री बर्ड्स और पब जी तक का सफर तय कर चुकने वालों में से रहे हैं। ये हम ही हैं जिसने दुनिया में रेडियो ,टीवी ,फ्रिज ,कुकर ,स्कूटर ,कंप्यूटर ,मोबाईल को अवतरित होते देखा है और जाने अभी और क्या क्या देखेंगे।  तो हम तो बहुत सारे मायनों में एकमात्र ऐसी नस्ल रहे और रहेंगे जिन्होंने दुनिया में वो देखा और देख चुके जो कल के इतिहास में किसी अजूबे से कम नहीं होगा।

मुझे याद है बाबूजी के साथ गर्मियों की छुट्टियों का वो कोयले के इंजन वाली रेल में किया हुआ साधारण डब्बों का यादगार सफर जब रास्ते में माँ के हाथ के बने भरवां करेले और पराठे के साथ सुराही का मीठा पानी कई दिनों के लम्बे रेल के सफर को भी ज़िंदगी के कुछ अनमोल दिनों में बदल देता था। मुझे याद है गाँव का वो कच्चा घर जहां दादी हमारे पहुँचते ही जाने क्या क्या मीठा खाने को और शरबत लेकर दालान पर ही अपना स्नेह लुटाने चली आती थी और मिनटों में ही पूरा टोला हमें देखने खैरियत पूछने चला आता था।


मुझे याद है सरस्वती पूजा , दुर्गा पूजा ,इंद्र पूजा ,जन्माष्टमी में लगने वाले वो छोटे छोटे मेले और उनमें गोले में पार्ले जी के बिस्किट को फंसाना ,गेंद मार कर स्टील के भारी ग्लास गिरा कर तालियाँ बटोरना ,मुझे याद है गाँव की काली पूजा में खेले गए नाटक में अभिनय करने वाले हम कुल 16 युवकों में अपने द्वारा निभाया गया  युवती का एक अकेला किरदार।  मुझे याद है गाँव की वो सत्यनारायण भगवान की पूजा में चावल और केले का मिलने वाला चौरठ प्रसाद भी और गाँव में केले के पत्तों पर खाए गए भोज भात का स्वाद भी।

मुझे याद है तीसरी कक्षा के दोस्त संजय सुथार के लखनऊ के तोपखाना बाज़ार में स्थित स्टूडियो के सामने की वो किताबों की दूकान जिसमें ऊपर रखी हुई ज्योमेट्री बॉक्स को स्कूल से आते जाते निहारना। मुझे याद है मेरे स्कूल में आने वाले जादू दिखाने वाले और स्कूल के रास्ते में कभी भालू कभी बन्दर और कभी सपेरे के इर्द गिर्द गोल खडी भीड़ में खुद को खड़ा देखना।  मुझे सर्कस याद है ,पटना जंक्शन से स्टीमर पकड़ कर गंगा पार करना भी याद है। मधुबनी रेलवे जंक्शन से गाँव तक ले जाने वाला ताँगा भी और दादी गाँव से मौसी के गाँव तक जाने वाली बैलगाड़ी भी। 


मुझे याद है मौसियों के साथ उनकी उंगलियां थामे पूरे ननिहाल के एक एक घर आँगन का चक्कर भी जिसमें जाने कितने प्यार करने वाले हाथ आशीर्वाद देने वाले हाथ एक साथ उठ जाते थे और बस माँ का नाम लेकर कहते ये निर्जला के बेटे हैं न। 

क्या क्या याद करूँ , आँखों के आँसू इस यादों के एलबम को बार बार धुँधला कर दे रहे हैं।  लेकिन मैं फिर लौटूंगा बार बार लौटूंगा इस एल्बम को लेकर इसके रंगों को लेकर ताकि मेरे जीवन का ये इंद्रधनुष उगता रहे हर दिन उगता रहे।




बुधवार, 15 अप्रैल 2020

चीन को दण्डित किये जाने की तैयारी




इस बीच खबर ये आ रही है कि , नराधम ,कृतघ्न ,लालची और महास्वार्थी धूर्त देश चीन के विरुद्ध विश्व भर के देश लामबंद हो रहे हैं . अंतर्राष्ट्रीय अदालत में अब तक अलग अलग कुल सात देशों ने वाद संस्थापित कर दिए हैं और अमेरिका ब्रिटेन जापान दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने चीन को स्पष्ट सन्देश देने शुरू कर दिए हैं |

उधर चीन भी अपनी आदतों के अनुरूप इस बीमारी के उद्भव ,प्रसार और उसमें उसकी अपनी कारगुजारियों को छिपाने की भरसक कोशिश कर रहा है | इससे जुडी तमाम जानकारियाँ ,चिकत्सकों की रिपोर्ट ,वैज्ञानिकों के शोधपात्र पर यथासंभव पाबंदी लगा कर अपने चिर परिचित चरित्र को उजागर कर रहा है |

यह सही मौक़ा है ,इस #चायनीज़वायरस से उबरने के बाद समूचे विश्व को इस धूर्त बदमाश अपराधी देश को सामाजिक आर्थिक रूप से बिलकुल अलग थलग कर देना चाहिए | ऐसे में स्वाभाविक रूप से बड़े बाज़ार और बड़े कामगार क्षेत्र के लिए पूरे विश्व के पास सबसे बेहतर और सबसे पहला विकल्प भारत होगा |

आज जिस तरह से इस महामारी की दवाई को पूरे विश्व को उपलब्ध करवाने में भारत पूरी दुनिया के बड़े से बड़े ताकतवर विकसित देश से लेकर छोटे देश तक का तारणहार बना हुआ है उससे भी एक बार फिर भारत की छवि तारणहार की और विश्व के अगुआ की बन गई है | ऐसे में पूरे विश्व का विश्वास पूरे विश्व का यकीन अपने आप ही भारत पर बन गया है |

इस महामारी से निपटने के बाद भारत को अपने आर्थिक संकट से निकलने के लिए भी निश्चित रूप से इन स्थितियों का लाभ मिलेगा बशर्ते कि शुरू से ही गणित में कमज़ोर (यूँ भी कमज़ोर गणित वाले दिल से काम लेने वाले होते हैं और लाभ हानि से ऊपर सिर्फ दिल से ही सोचते करते हैं ) , इस सरकार के पास तब तक कोई बेहतरीन और सटीक विकल्प मिल जाए |

जो भी हो चीन को मानवता के विरुद्ध किये जा रहे इस अपराध के लिए पूरे विश्व द्वारा जलालत के साथ साथ दण्डित किये जाने की भी जरूरत है | इसके अतिरिक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे तमाम वैश्विक संगठनों को भी उनके गैर ज़िम्मेदार रवैये के लिए भरपूर लानत मलामत की जानी चाहिए |


शनिवार, 11 अप्रैल 2020

आउटडेटेड हो गई क्या ब्लॉगिंग ??







अभी 1 मार्च को विख्यात ब्लॉगर दीदी रेखा  श्रीवास्तव जी द्वारा ब्लॉगरों के अधूरे सपनों को शब्दों के ताने बाने में बुनकर पुस्तक के रूप में संकलित कर प्रकाशन किये जाने और उसे पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने का अनौपचारिक कार्यक्रम जब भाई राजीव तनेजा (यहाँ बिना संजू भाभी संजू तनेजा जी ,के ज़िक्र के ये बात कभी मुकम्मल नहीं हो सकती ) द्वारा शब्दों की दुनिया के दोस्तों के लिए उपलब्ध कराए गए एक प्लेटफॉर्म पर बना तो बहुत बार मेरे ऐसे किसी कार्यक्रम में शिरकत किये जाने का टाल मटोल भी ख़त्म सा हुआ और ऐसा संयोग बना की मैं देर से ही सही उस कार्यक्रम में अपनी उपस्थति दर्ज़ करवा पाया।  

मेरे पहुँचने तक क्या कैसे हो चूका था ये तो मैं नहीं जान पाया हाँ गंतव्य स्थल तक पहुँचने के लिए भाई राजीव तनेजा  जी से फोन द्वारा दिशा निर्देश लेते रहने के कारण वे तो अगुवाई करते पहले ही मिल गए। आदतन मैं आजम से सबसे पीछे बैठ कर सारा ज़ायज़ा लेने लगा। दीदी रेखा श्रीवास्तव आज के कार्यक्रम की शो स्टॉपर थीं सो एक एक आने जाने वाले पर उनकी नज़र थी।  



पोडियम पर रंजना जी , जिनसे मेरी पहली मुलाक़ात थी ,अपने रेडियो प्रस्तोता होने के कारण बहुत अधिक दक्षता से कार्यक्रम का कुशल संचालन करती दिखीं और वहीँ  हमारे सुपर स्टार ब्लॉगर ,डॉ टी एस दराल सर , भाई खुशदीप सहगल जी ,शाहनवाज़ जी ,दिगंबर नासवा जी आदि विराजे हुए थे। नज़रें घूमी तो भाभी संजू तनेजा ,दोस्त ब्लॉगर वंदना गुप्ता ,नीलीमा शर्मा ,मुकेश सिन्हा जैसे सितारे भी अपना नूर बिखेरे हुए थे। दीदी रेखा श्रीवास्तव जी के परिवार व समस्त बन्धुगण भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हुए सबको तसल्ल्ली बक्श सुन रहे थे। 

रंजना जी सबको एक एक करके आमंत्रित कर रही थीं और साथी ब्लॉगर अपने ब्लॉगिंग के अनुभवों को साझा करते चलते जा रहे थे। मुझे सालों पहले होने वाली ब्लॉग बैठकों की याद आने लगी थी। भाई खुशदीप सहगल जी ने शुरआती दिनों की ब्लॉगिंग के दिलचस्प किस्सों को साझा करते हुए बहुत से रोचक किस्से सुनाए ,चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी जैसे संकलकों की चर्चा ,उन पर चली खींचतान आदि की बाबत बातें हुईं। 



भाई शाहनवाज़ हुसैन जो अभी हमारीवाणी संकलक के संचालन का कार्य देख रहे हैं उन्होंने भी तकनीकी बातों के साथ ब्लॉगजगत के अनुभव साझा किये। दराल से ने अपने हर दिल अज़ीज़ अंदाज़ से सबको गुदगुदा दिया तो वहीँ नासवा जी ने बताया की कैसे उन्होंने कभी भी अपने ब्लॉग पोस्ट की रफ़्तार को थमने नहीं दिया। 

मुकेश सिन्हा जी ने अपने ब्लॉग्गिंग के सफर की दास्ताँ सुनाते हुए ,भाई संजय भास्कर जी का उनकी रोचक व नियमति टिप्पणियों का उल्लेख किया तो राजीव तनेजा जी ने बताया की कैसे ब्लॉगिंग ने उनकी साहित्यिक और व्यंग्य लेखन के प्रति उनकी रूचि को अंजाम तक पहुंचाने में मदद की। 

हमारी महिला ब्लॉगर में दोस्त वंदना गुप्ता जो अब एक ब्लॉगर से कहीं आगे जाकर विख्यात लेखिका बन चुकी हैं उनहोंने न सिर्फ अपने ब्लॉग लेखन के अनुभव साझा किए बल्कि ब्लॉगिंग में एक सशक्त और नियमित संकलक की जरूरत और उसके लिए कुछ किए जाने की जरूरत की ओर सबका ध्यान दिलाया। उनका साथ सिया नीलीमा शर्मा जी ने और उन्होंने भी अपने ही अंदाज़ में सबके साथ अपने अनुभव साझा किये। विख्यात ब्लॉगर कवियत्री साहित्यकार मित्र सुनीता शानू जी ने भी अपने मुस्कराहट के साथ ब्लॉगिंग के अनुभव को साझा करते हुए पुराने दिनों को याद किया साथ ही ये भी कि बेशक इसकी गति नए प्लेटफॉर्म्स के आने से थोड़ी सी कम हो गई है किन्तु उन्हें विशवास है कि सब कुछ पहले की तरह ही रफ्तार में आ जाएगा।  

दीदी रेखा श्रीवास्तव जी ने बताया की कैसे उन्हें ये ब्लॉग जगत एक परिवार की तरह अपने मोह में बांधे रखा कर ये भी कि बहुत से अन्य ब्लॉगर के सपनों को शब्द देकर अधूरे सपनों की कसक का दूसरा भाग भी वे लेकर आएंगी।  

मैंने ब्लॉगिंग के शुरआती दिनों , ब्लॉग जगत की बढ़ती हलचल ,ख्याति से न्यू मीडिया का दखल और प्रभाव उसे बाँधने की कोशिशें ,समयांतराल पर उसमें आई मंथरता , एक बेहतरीन संकलक की जरूरत आदि पर अपने विचार रखे।  बीच में ताऊ ,उनकी पहलेयाँ ,चिट्ठा चर्चा , बेनामी ,ब्लॉग वकील आदि के रोचक किस्से भी सामने आए 

रंजना  जी के कुशल मंच संचालन के कायल मुझ सहित वहाँ उपस्थित सभी साथी हुए। 

इसके उपरान्त पुस्तक के लोकार्पण ,उसकी चर्चा और गरमा गर्म भोजन के साथ भी आगे का कार्यक्रम बदस्तूर चलता रहा।  निःसंदेह ऐसे कार्यक्रम ,ऐसे बहाने ,नई ऊर्जा का संचार कर न सिर्फ ब्लॉगिंग बल्कि हम ब्लोगर्स में भी नई स्फूर्ति का संचार करते हैं।  



मुझे उम्मीद थी की पहले की तरह इस ब्लॉग बैठकी की भी रिपोर्ट लिखने के बहाने कुछ नई पोस्टें और बातें हमें और तमाम साथियों को भी मिल जाएंगी ,मगर ऐसा हुआ नहीं , और ये प्रश्न पुनः सर उठाए इधर उधर घूमता फिर रहा है कि -आउटडेटेड हो गई क्या ब्लॉगिंग  ?? इसका उत्तर हमें और आपको तलाशना है और करना भी कुछ नहीं है सिर्फ इसके सिवा कि नियमित अनियमति होकर भी ब्लॉग पोस्ट लिखते रहना है और ब्लॉग पोस्ट पढ़ते रहना है। 

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