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सोमवार, 10 नवंबर 2014

प्रेरित करती सबको, ये तो सबके "मन की बात"






इस बीच सोशल नेटवर्किंग साइट्स से लेकर ,समाचार माध्यमों की अति सक्रियता , या कहा जाए कि तत्परता के दोहरा प्रभाव पडता दिख रहा है । एक तरफ़ तो,टीवी, मोबाइल , इंटरनेट, व अन्य समाचार माध्यमों की सर्वसुलभता और खबरों की सतत उपलब्धता ने लोगों को इन सबका आदी बना दिया है , यानि अब लोग किसी भी छोटी बडी घटना/दुर्घटना/योजना/कानून/खबर/सुर्खी.........को जानने को उत्कट रहते हैं । दूसरी ये कि चाहे अनचाहे सरकार ,समाज, और लोगों की क्रिया/प्रतिक्रिया/आचरण/शब्द/व्यवहार/कर्म लगभग सब कुछ कहीं अधिक पारदर्शी हो गया है ।
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नई सोच और नई दृष्टि से लबरेज़ , नवगठित सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ऐसे में , जब देश की बागडोर संभालते हैं तो देश से लेकर अमेरिका तक में सार्वजनिक रूप से ये कहते हैं कि हां अब समय आ गया है जब हमें देश में फ़ैली और फ़ैलाई जा रही गंदगी/कूडा/कचरा से निज़ात पानी ही होगी । स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत इसी उद्देश्य से की गई है कि लोगों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे स्वच्छता के प्रति जागरूक हों । ऐसा नहीं है कि इस तरह की पहल और प्रयास पहले कभी नहीं किए गए हैं , यकीनन किए गए हैं किंतु औपचारिकता की भेंट चढी वो सारी योजनाएं और कोशिशें समय के गर्त में खुद दरकिनार हो गईं ।
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छोटी सी शुरूआत भी भविष्य में बेहद प्रभावकारी साबित हो सकती है यदि उद्देश्य और नीयत दोनों ही अच्छे और स्पष्ट हों , खैर इसका आकलन तो थोडे समय के बाद ही होगा किंतु इतना तो सबको महसूस हो ही रहा है कि ,कहीं तो कुछ धीरे धीरे बदलने लगा है , कुछ तो ऐसा है जो पहले नहीं हुआ ।
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ऐसी ही एक शुरूआत हम दोनों पिता पुत्र ने घर के साथ सटे पार्क से की , प्रात: कालीन शाखा (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा ) में नियमित रूप से जाने के कारण , शाखा लगने से पहले हम दोनों मिलकर पूरे पार्क का (waste scan) वेस्ट स्कैन कर डालते हैं , हर छोटे बडी , पॉलिथीन, रैपर, प्लास्टिक की बोतलें, ढक्कन , चाय के कप आदि तमाम कचरे को साथ लेकर जाने वाले एक छोटी बोरी में भरकर इकट्ठा कर लेते हैं , जिसे बाद में पार्क के रख रखाव में लगे कर्मचारी नियत स्थान तक पहुंचा देते हैं । इतना ही नहीं हमने शाम को पार्क में बैठे लोगों से आग्रह करना शुरू किया , जिसका लब्बो लुआब ये रहता है कि ,


स्वच्छ रहने, रखने के सिर्फ़ दो रास्ते हैं .........गंदगी मत फ़ैलाइए , सफ़ाई नहीं करनी पडेगी,
दूसरा रास्ता ,रोज़ गंदगी फ़ैलाना नहीं छोड सकते , तो रोज़ सफ़ाई करने की आदत डालिए ॥

रोकिए .............खुद को , गंदगी फ़ैलाने से ,
टोकिए.............दूसरों को , गंदगी फ़ैलाने से

स्वच्छ भारत , निर्मल भारत ॥ स्वस्थ भारत , सबल भारत ॥

 देखिए , शायद कुछ कुछ प्रभाव इसका दिखने लगा है और अब तो सुबह की सैर/टहल के लिए आए हुए स्थानीय लोग भी हमारे साथ जुटने लगे हैं , झाडू थामे/बुहारते/कचरा उठाते हुए फ़ोटो लगाने की जरूरत नहीं समझी , स्वच्छ पार्क की फ़ोटो ज्यादा सुंदर लगेगी , यही ठीक लगा ॥


पार्क का वो हिस्सा जहां बच्चे खेलते कूदते हैं


पार्क के दूसरे हिस्से में फ़ैली हरियाली

 इसी तरह एक नई पहल करते हुए प्रधानमंत्री ने आम जनों से संवाद के लिए रेडियो को अपने माध्यम के रूप में चुना । इसके पीछे भी जरूर कोई न कोई बहुत ही सुलझी हुई सोच और दूरदृष्टियुक्त विचार ही होगा अन्यथा आज के समय में जब लोग आगे ही आगे की तरफ़ भागे जा रहे हैं और रेडियो/चिट्ठी जैसे संचार/संवाद माध्यमों को बिल्कुल आउटडेटेड मान समझ लिया गया है , किंतु सच तो ये है आज भी ग्रामीण भारत का एक बहुत बडा हिस्सा और जनमानस कंपूटर और इंटरनेट तक नहीं पहुंच पाया है , ऐसे में रेडियो को संवाद सूत्र के रूप में चुनना नि:संदेह प्रशंसनीय कदम है ।

मोदी बहुत ही संतुलित भाषा में ,अपनी बात को पूरी दृढता से रखते हैं , इतना ही नहीं उसे तार्किक तरीके से विश्लेषित भी कर देते हैं , वो लोगों को प्रेरित कर रहे हैं , वे रेडियो पर नाम लेकर कहते हैं कि देश के एक नागरिक ने पत्र लिखकर मुझे ये बात बताई है । इस बार स्वच्छता को सीधे देश में आज़ादी के बाद से अब तक रोग से नासूर बन चुक जाने वाली गरीबी से जोड दिया । बात सौ फ़ीसदी सच है , गरीब गंदगी की वजह से बीमार पडता है और बीमार पडने की वजह से गरीब रह जाता है , इसलिए यदि देश से गरीबी मिटानी है तो पहले गंदगी हटानी होगी , कितनी सरल और गहरी बात है । शैली, तेवर और स्वर हूबहू वैसे जैसे कि आम भारतीय को खुद का लगता है ।

मन की बात से प्रेरित होकर चिट्ठियों का दौर यदि दोबारा से शुरू हो जाए तो ये धीरे धीरे मैसेज व्हाट्स अप में सिमट कर रह जाने वाली सिमटती जा रही पीढी को ,खत/चिट्ठी के शिल्प से रूबरू होने और उस परंपरा को बढाने का मौका मिलेगा , ये अच्छी पहल होगी , आम जनमानस का सीधे सीधे प्रधानमंत्री को संबोधित करके अपने मन की बात लिखने का , मेरे जैसे पत्र प्रेमी के लिए तो ये सोई उर्ज़ा को जगाने जैसा है , मेरी पत्र पेटिका तैयार हो गई है , मन की बात कहने और करने के लिए ।



शनिवार, 13 सितंबर 2014

प्रकृति के खिलाफ़ नहीं प्रकृति के साथ चलना होगा





पिछले वर्ष जून में जब अचानक ही केदारनाथ की आपदा सब पर कयामत बनकर टूटी तो उस त्रासदी के प्रभाव से देश भर के लोगों ने झेला । कुदरत के इस कहर से जाने कितने ही परिवार हमेशा के लिए गुम हो गए , कितने बिखर कर आधे अधूरे बच गए , जाने कितने ही परिवार में बचे खुचे लोग मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर रुग्ण होकर रह गए । केदारनाथ त्रासदी के बाद इस दुर्घटना के कारणों पर किए गए शोध , विश्लेषण आदि से ये तथ्य निकल कर सामने आया था और यदि न भी निकलता तो भी ये तो अब खुद भी इंसान बहुत अच्छी तरह से समझ और जान रहा है कि प्रकृति द्वारा कुछ भी अनियमित करने होने घटने के पीछे सबसे बढा घटन वो मानवीय क्रियाकलाप ही होते हैं जो प्रकृति के प्रतिकूल हैं ॥
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अभी पिछला घाव ठीक से भरा भी नहीं था किस इस वर्ष फ़िर से धरती का स्वर्ग कहलाने वाला जम्मू कशमीर पिछले कई दशकों में पहली बार आई जल प्रलय के विप्लव से बुरी तरह त्रस्त हुआ है । पिछले दस दिनों से लगातार , सरकार , प्रशासन , आपदा नियंत्रक , भारतीय सेना और आर एस एस जैसे स्वयं सेवी संगठन वहां पीडित क्षेत्र में फ़ंसी हुई जिंदगियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोगों को काल के गाल में समा जाने से बचाया जा सके । स्थिति इतनी भयावह और विकट है कि इसे राष्ट्रीय आपदा मानते हुए पूरा देश सहायता के लिए आगे आया है ॥ एक बार पुन: वही विमर्श , वही आंकडे , आकलन ..........॥
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आखिर कब ..कब हम इस बात को अच्छी तरह समझेंगे कि हम इस प्रकृति जो कि जल , थल , वायु, अगिन , मिट्टी ,पर्वत , नदी , पेड आदि तत्वों के समन्वय से सिंचित होती रही है और लाख उन्नति और आधुनिकता के बावजूद भी , जी हां अब भी मानव/इंसान प्रकृति के उपस्थिति तत्वों में से बहुत ही सूक्ष्म और कोमल है शायद यही वजह है कि प्रकृति के हल्के से हल्के दबाव के आगे वो तिनके की तरह बिखर जाता है । 

विश्व में बढती प्राकृतिक आपदाओंने इंसानों को बहुत कुछ सिखाया जिसमें से सबसे अधिक ये कि बदलती हुई पारिस्थितिकी के अनुसार मानव जीवन ने अपने आपको बदला और ढाला , और ये प्रक्रिया युगों युगों से सतत चलती चली आ रही है । अब तो भू विज्ञानियों , प्राणी विज्ञानियों और बहुत से संबंधित विज्ञानों ने निरंतर खोज़ कर ऐसे साक्ष्य जुटा लिए हैं जो स्पष्टत: ये प्रमाणित करता है कि इंसानी सभ्यता बहुत ही प्राचीन समय से प्रकृति के साथ संघर्षरत होते हुए भी उसके साथ बराबर तालमेल बिठाती आई है । और इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि जब जब इंसान ने अपनी जिद , अपने अन्वेषण , अपनी आवश्यकता के कारण , प्रकृति की नैसर्गिक  व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश की है , प्रकृति खुद उसे संतुलित कर लेती है ॥
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प्रकृतिशास्त्री पिछले दो दशकों से ,या शायद तभी जब से इंसान ने अपनी सुविधा के लिए प्रकृति के मिज़ाज़ के खिलाफ़ जाकर छेडछाड शुरू की तभी से बार बार इस  बात पर चिंता जताते हुए नसीहत स्वरूप ये कहते रहे हैं कि जीवन जीने के रास्ते  प्रकृति के खिलाफ़ नहीं प्रकृति के साथ तलाशे जाने चाहिए । इतने बरसों बाद भी जहां एक तरफ़ हम इंसान , न तो प्रकृति के तत्वों का सम्मान करते हैं और न ही  उन्हें सहेजने और संरक्षित करने के लिए रत्ती भर  भी गंभीर है । विशेषकर पश्चिमी देशों की तुलना में अभी देश में कुछ भी नहीं सोचा किया गया है अब ये तो खुद सरकार , समाज , और आपको हमें तय करना है कि हमें भविष्य में ऐसी त्रासदियों के लिए तैयार रहना चाहिए या हमें अभी से चेत कर प्रकृति के साथ सहजीवन पद्धति का विकास करना चाहिए ....प्रकृति सोच चुकी है , अब सोचना आपको और हमें है ............

रविवार, 7 सितंबर 2014

करवट बदलता एक देश ..........सामयिक टिप्पणी






वर्ष २०१४ केआम चुनावों से पहले ही संभावित जीत के प्रति आश्वस्त से लगते प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लिए अगले साठ महीनों की प्रशासनिक सेवा देने का अवसर जिस आत्मविश्वास से मांगा था उसी समय कयास लगाए जाने लगे थे कि आगामी सरकार बहुत सारे नए विकल्पों , विचारों , कार्यप्रणाली , प्रतिबद्धता व परिवर्तन लेकर आएगी ॥
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नई केंद्र सरकार को सत्ता संभाले अभी इतना समय नहीं हुआ है कि उनके कार्यों ,निर्णयों व पहल का विश्लेषण किया जाए किंतु न सिर्फ़ भारतीय राज़नीति , प्रशासन , विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका , वैश्विक अर्थ जगत सहित अंतर्राष्ट्रय कूटनीइक जगत में भी आज नई केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति व जनकल्याण की चर्चा हो रही है । नई सरकार के अगुआ के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के रूप में आज देश के पास एक अनुशासित , अनुभवी , कर्मशील व करिश्माई व्यक्ति का नाम सामने आ चुका है ॥
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पिछले एक दशक में विकास होते रहने के बावजूद भी सियासत व आम लोगों के बीच सामंजस्य की भावना निरंतर क्षीण होती गई । नई सरकार ने इस नकारात्मक माहौल को पूरी तरह बदलते हुए न सिर्फ़ अपनी बल्कि देश की छवि को नए दृष्टिकोण से सामने रखा ॥
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नई सरकार ने तीव्र गति से कार्य करते हुए एक साथ बहुत मोर्चों पर अपनी कवायद तेज़ की । मंत्रालय के शीर्ष मंत्रियों , अधिकारियों, कर्मचारियों को अधिक श्रमशील होकर कार्य करने के निर्देश, सूचना संचार , व समाचार माध्यमों की ताकत को पहचाने हुए उनका भलीभांति उपयोग की शुरूआत , अर्थनीति , विदेशनीति, रक्षा , पर्यावरण , शिक्षा आदि सभी विषयों पर मंथन , विमर्श तथा योजनाओं की रूपरेखा की तैयारी , वर्षों से मृतप्राय या औचित्यहीन हो चुकी संस्थाएं व कानूनों की समीक्षा आदि मुद्दों पर सरकार न सिर्फ़ तेज़ी से फ़ैसले ले रही है बल्कि उन्हें अमली जामा भी पहनाया जा रहा है ॥ ..


सरकार के अस्तित्व में आने के ठीक अगले ही पल से जो कार्य होने लगा वह था सभी मित्र देशों के साथ सामंजस्य व साझेदारी के नए रिश्तों के युग का आरंभ । वैश्विक राज़नीति पर अपनी नज़र बनाए रखने वाले विश्लेषकों ने भारत की तरफ़ से सभी मित्र देशों को मित्रता का आग्रह संप्रेषण पूर्व के ऐसे सभी प्रयासों से कहीं अधिक गरिमापूर्ण व ओज़ भरा महसूस किया । इसका सकारात्मक परिणाम व प्रभाव यह रहा कि पिछले तीन महीने की अवधि में ही भारत अब तक अपने मित्र देशों से सौ से अधिक करार कर चुका है ॥
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चिर प्रतिद्वंदी पडोसी के साथ भी ऐसी ही एक नई पहल का प्रयास किया गया किंतु पिछले कुछ घटनाक्रमों के बाद फ़ौरन ही कठोर संदेश देते हुए वार्ता निलंबित भी कर दी गई । वैश्विक परिदृश्य बेहद तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है । संसाधनों पर आधिपत्य के वर्चस्व का संघर्ष अब उग्र होता जा रहा है । अस्थिर व निरंकुश शासन व्यवस्थाओं की निकटता किसी भी राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और अंतत: मनुष्य सभ्यता के अस्तित्व के लिए सदैव खतरा उत्पन्न करते है । इन बदली हुई परिस्थितियों में अमन चैन विकास और सृजन के पक्षधर वैश्विक देशों को भी संगठित होना होगा । नई सरकार के सारे वरिष्ठ सेवक अपने-अपने क्षेत्रों के लिए मित्रों का चयन व गठन कर रहे हैं ॥
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पिछले दो दशकों में देश के राजनीतिक चरित्र व कार्यपालिका की अकर्मठता के अपने चरम पर पहुंच जाने का एक बडा दुष्परिणाम ये निकल कर सामने आया कि न्यायपालिका को अति सक्रियता व अतिक्रमण के इतने सारे अवसर उपलब्ध करा दिए कि समाज में व्याप्त दुर्गुणों व दुर्बलताओं से ग्रस्त होकर खुद न्यायपालिका रुग्ण सी हो गई । भ्रष्टाचार से लेकर यौन उत्पीडन और पक्षपात से लेकर पदलोलुपता तक के आरोप सहित वरिष्ठतम न्यायविदों द्वारा दर्ज़ की जा रही टिप्पणियों आदि ने नई सरकार , जो कि प्रचंड बहुमत से सरकार में है को प्रोत्साहित किया कि वे बेझिझक न्यायिक सुधारों को लागू करे सरकार दो बडे निर्णय, कोलेजियम व्यवस्था में परिवर्तन एक वैकल्पिक व्यवस्था का प्रारंभ तथा उच्च न्यायालयों में पच्चीस फ़ीसदी नई अदालतों/ पदों का सृजन । न्यायिक सुधारों के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होने की बात कही जा रही है ।
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आम लोगों से सीधे संवाद स्थापित करती यह सरकार "जनधन योजना" "डिजिटल इंडिया" जैसी छोटी छोटी किंतु बेहद प्रभावकारी योजनाओं के साथ , गंगा नदी को पुनर्जीवन देने के लिए विशेष प्रयास , कागज़ातों को सत्यापित कराये जाने की अनिवार्यता की समाप्ति जैसी प्रक्रियात्मक राहत आदि कुल मिला कर ऐसा महसूस किया जा रहा है जैसे देश एक अलग दिशा में जा रहा है । शायद अच्छे दिन आने वाले हैं ॥

गुरुवार, 29 मई 2014

पढे लिखे अशिक्षित (संदर्भ स्मृति ईरानी विवाद) -200 वीं पोस्ट






नई सरकार के कामकाज से पहले ही जिस एक तथ्य को मुद्दा बना कर उस पर बहस की और कराई जा रही है ,वो है नवनियुक्त सरकार के प्रधानमंत्री द्वारा केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के रूप में टीवी की मशहूर अभिनेत्री सुश्री स्मृति जुबिन ईरानी की शैक्षणिक योग्यता जो , अंतर स्नातक बताई जा रही है , की नियुक्ति । ज्ञात हो कि चूंकि मानव संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत ही शिक्षा मंत्रालय का काम भी आता है ,इसलिए इस बहस को और हवा दी जा रही है कि इसके लिए किसी ज्यादा शिक्षित और योग्य सांसद को ये जिम्मेदारी दी जानी चाहिए थी ।
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ऐसा शायद पहली बार ही हो रहा है कि ,किसी सांसद को सौंपे गए दायित्व को उसके हाथ में लेने से पहले ही उसकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर उसकी काबलियत पर न सिर्फ़ शक जताया जा रहा है बल्कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा स्तरहीन छींटाकशी तक की जा रही है । इतना ही नहीं सुश्री स्मृति ईरानी द्वारा पूर्व में किए गए कार्य चाहे वो मैकडोनाल्ड में वेट्रेस की नौकरी हो या बतौर टीवी अभिनेत्री ,उनको आधारित करके उनपर निजि हमले भी किए जा रहे हैं । और दिलचस्प बात ये है कि जो पार्टी इस पूरे मुद्दे को व्यत्र में तूल दे कर एक अलग दिशा दे रही है ,खुद उसी पार्टी के दो शीर्ष राजनेता जो पूर्व प्रधानमंत्री तक का पद संभाल चुके हैं , स्वर्गीय इंदिरा गांधी और स्वर्गीय राजीव गांधी की शैक्षणिक योग्यता भी अंतरस्नातक ही थी । इत्तेफ़ाकन ये तथ्य भी उल्लेखनीय लगता है कि बिहार में एक समय ऐसा भी आया था जब मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने अपनी गृहिणी पत्नी जो पूरी तरह निरक्षर थीं उन्हें सीधे मुख्यमंत्री की गद्दी न सिर्फ़ सौंप दी बल्कि उनकी पत्नी राबडी देवी ने राजकाज भी देखा भी
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जहां तक संवैधानिक स्थिति की बात है तो संविधान निर्माताओं ने कुछ सोच कर ही जनसेवा के लिए किसी की शैक्षणिक योग्यता न आडे आए ,इसलिए ही राजनीति से लेकर संवैधानिक पद के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं रखी ।और इतिहास इस बात का गवाह है कि बहुत बार ही कम शिक्षा प्राप्त जनसेवकों ने सिर्फ़ अपनी स्पष्ट नीयत और दृढ आत्मविश्वास से ऐसे कार्य कर दिखाए हैं जो मील का पत्थर साबित हुए हैं । हां वर्तमान परिदृश्य में इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता या आम जनमानस की ,राज़नीति व राज़नेताओं से ये अपेक्षा उचित ही लगती है कि उनके प्रतिनिधि उच्च शिक्षा प्राप्त काबिल लोग हों ,किंतु मात्र शैक्षणिक डिग्री को ही योग्यता का पैमाना माना जाए ये कहीं से भी उचित नहीं लगता ।
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यहां मुझे ब्लॉगर मित्र सुरेश चिपलूणकर जी द्वारा उपलब्ध कराया गया ये तथ्य यहां रखना समीचीन लग रहा है जिसे देखने के बाद आसानी से ये समझा जा सकता है कि एक जनप्रतिनिधि सांसद के रूप में उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन कितनी निष्ठा और शिद्धत से किया है , और स्मृति ईरानी के व्यक्तिव का आकलन करने वालों को खुदबखुद इसकी तुलना करके सारी स्थिति समझनी चाहिए ।

"18 अगस्त 2011 को राज्यसभा सांसद बनने के बाद से स्मृति ईरानी ने 51 बहस में भाग लिया, 340 प्रश्न पूछे, और संसद में उनकी उपस्थिति 73% रही...
- (स्रोत राज्यसभा सचिवालय)."

अंत में इस बहस पर एक आम भारतीय की राय के रूप में सिर्फ़ इतना ही कहना है कि मेरी तरह का आम व्यक्ति ये सोच रहा है कि जहां बहस इस बात पर होनी चाहिए थी कि इस लोकसभा में , पिछली लोकसभा से कहीं अधिक सांसद ऐसे पहुंचे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं , चिंता राजनीति के अपराधीकरण पर व्यक्त की जानी चाहिए थी , आलोचना  उनकी होनी चाहिए थी जिनका दामन दागदार है न कि , बहस इस बात पर की जानी चाहिए थी कि , एक बारहवीं पास किस तरह से मानव संसाधन मंत्री के रूप में कार्य कर सकेगी॥ बहरहाल ये भारतीय राजनीति में उतर आए कुछ छिछले लोगों की ओछी सोच का परिचायक बनके आम जन के बीच उजागर हुआ है ॥
अरे हां चलते चलते याद आया कि ये इस ब्लॉग की 200वीं पोस्ट है जी ......

मंगलवार, 27 मई 2014

हां , ये है एक मुकम्मल ब्लॉग एग्रीगेटर -"ब्लॉगसेतु"




              "ब्लॉगसेतु "- नया ब्लॉग संकलक का मुखपृष्ठ




जब भी किसी नए ब्लॉग संकलक के शुरू किए जाने की कोई खबर या सूचना मिलती है तो हम उन हिंदी भाषाई ब्लॉगरों की उत्सुकता स्वाभाविक रूप से बढ ही जाती है, जिन्होंने , नारद , चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी ,जैसे बेहतरीन ब्लॉग संकलकों के साथ ब्लॉगिंग के शुरूआती दिन बिताए थे और इन संकलकों पर प्रदत्त सुविधाओं को लेकर हुई उठापटक के गवाह भी रहे थे । हिंदी ब्लॉगिंग के लिए तब के दो बेहद लोकप्रिय संकलकों का बंद होना नि:संदेह नकारात्मक रहा , और जो रही सही कसर बची थी वो फ़ेसबुक ट्विट्टर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पोस्टों को प्रकाशित करने और उन पर प्रतिक्रिया देने की तीव्र गति के कारण पूरी हो गई ।

हिंदी ब्लॉग पोस्टों को एक साथ सहेज़ कर एक पन्ने पर लाने के प्रयास यूं तो चलते ही रहे हैं और इस बीच आए संकलक जैसे हमारीवाणी ने काफ़ी हद तक पाठकों के लिए ये सुविधा मुहैय्या कराई , मगर फ़िर भी स्वचालित रूप से पोस्टों का प्रकाशन , कितनी बार पढी गईं , कितनी टिप्पणियां आदि जैसे फ़ीचर को ब्लॉगर व ब्लॉग पाठक तलाशते रहे । आखिरकार कुछ समय पहले जब ये ज्ञात हुआ कि ,हिंदी ब्लॉगिंग को अपनी शोध का विषय बनाने वाले युवा ब्लॉगर श्री केवल राम जी ने अपने अथक प्रयासों और काबिल टीम के नए प्रयोगों के साथ एक नए संकलक -ब्लॉगसेतु को पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है तो सबने खुले दिल से इसका स्वागत किया । रोज़ाना नए ब्लॉग्स के जुडने का क्रम जारी है , किंतु इसके बहुत सारे विशेष फ़ीचर मेरे लिए आकर्षण की वजह रहे ......ये सिलसिलेवार संक्षिप्त रूप से कुछ यूं हैं ........

विषयों का वर्गीकरण
अभी इसमें मुख्य रूप से आठ श्रेणियां दिखाई दे रही हैं , जिनमें ब्लॉगर्स अपने ब्लॉग को उसकी सामग्री के अनुरूप इन श्रेणियों में प्रकाशित कर सकते हैं । इसका एक अन्य लाभ ये है कि जब भी किसी श्रेणी या उपश्रेणी को क्लिक करके देखा जाए तो उस श्रेणी की सारी पोस्टों की संख्या और सारी पोस्टें सिलसिलेवार दिखाई देती हैं । ये मुख्य श्रेणियां हैं , साहित्य, समाज ,मीडिया , तकनीक,विज्ञान , मनोरंजन, विविध विषय तथा अन्य

मुख्य श्रेणी के साथ उपश्रेणी की व्यवस्था
इन मुख्य श्रेणी के अंतर्गत भी सामग्रियों व पोस्टों को और फ़िल्टर करने के लिए उपश्रेणियां बनाई गई हैं , जैसे मीडिया के अंतर्गत , प्रिंट मीडिया , इलेक्ट्रॉनिक और वैब मीडिया । इसका लाभ ये है कि पाठकों के सामने विकल्पों की व्यवस्था रहने से वे ठीक उन पोस्टों पर ही पहुंच सकेंगे जहां वे पहुंचना चाह रहे हैं

केवल राम जी की मानें तो अभी ये संकलक प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है और न सिर्फ़ ब्लॉग लेखकों बल्कि ब्लॉग के पाठकों के लिए भी इसमें कई सारे नए फ़ीचर जोडे जाने वाले हैं । उम्मीद की जानी चाहिए कि , ये सबकी अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरेगा ।

स्मरण रहे कि एक ब्लॉगर सिर्फ़ अपने किन्हीं पांच ब्लॉग्स को ही ब्लॉगसेतु पर पंजीकृत करवा सकता है ॥

नवीनतम ब्लॉगों की सूची

चूंकि अभी संकलक अपने निर्माण की अवस्था में है ,इसलिए विशेष रूप से और स्थाई व्यवस्था के अनुसार भी इसकी साइड बार में नवीनतम ब्लॉग्स यानि वे ब्लॉग्स जो हाल ही में पंजीकृत हुए हैं उनकी सूची भी प्रदर्शित हो रही है ।
शीर्ष पचास ब्लॉग्स (प्रकाशित पोस्ट की संख्या अनुसार) की सूची

पोस्टों की संख्या के अनुसार ब्लॉगसेतु पर पंजीकृत ब्लॉग्स में से अधिक पोस्टों के हिसाब से शीर्ष पचास ब्लॉग्स ,उनकी प्रकाशित पोस्टों की संख्या के साथ ही मुखपृष्ठ पर प्रदर्शित किया गया है ।

ब्लॉगर्स की सूची

 ब्लॉग्स की तरह ही नए जुडने वाले ब्लॉगर्स का नाम व उनकी सूची भी मुख्य पन्ने पर ही प्रदर्शित की गई है , जिसका नाम रखा गया है हमारे सम्मानित ब्लॉगर ।

इनके अलावा और भी बहुत कुछ विशेषताएं हैं जिन्होंने ये साबित कर दिया है कि आने वाले समय में अपनी खासियत और उपयोगिता के कारण ब्लॉगसेतु नि:संदेह हिंदी ब्लॉगरों के लिए एक नियमित कोना साबित होने जा रहा है , उनमें से ये कुछ हैं ।

स्वचालित रूप से पोस्टों के प्रकाशन के साथ ही ब्लॉगसेतु मुख्य पृष्ठ पर उस पोस्ट का प्रदर्शन , जहां पोस्ट का शीर्षक , ब्लॉग लेखक की तस्वीर , कुल देखे जाने की संख्या , टिप्पणियों की संख्या आदि प्रदर्शित की जा रही है ।

एक जो और भी बहुत खास बात लगी वो ये कि इसमें पोस्ट पढने के लिए पाठकों को किसी अन्य पेज को क्लिक करने की जरूरत नहीं है , नीचे की तरफ़ स्वचालित स्क्रालिंग से पाठक जितनी चाहें पोस्टें पढ सकते हैं ।
कैलेंडर की तारीख के साथ उस दिन प्रकाशित पोस्टों की संख्या

मुख्य पृष्ठ पर ही दिया गया कैलेंडर , जिसमें हर तारीख के साथ ही उस तारीख को कुल प्रकाशित पोस्टों की संख्या भी दिख रही है जिस पर क्लिक करने से उस दिन प्रकाशित सारी पोस्टें एक साथ देखी जा सकती हैं ।

सांख्कीय आंकडे

केवल राम जी ने बताया कि ब्लॉग्स के सांख्यकीय आंकडों वाला फ़ीचर इसमें विशेष रूप से प्रदर्शित करने के पीछे उद्देश्य है कि ब्लॉग लेखक को उसके ब्लॉग और प्रकाशित पोस्टों से संबंधित सभी आंकडे एक साथ उसके डैशबोर्ड पर प्राप्त हो जाएंगे । ये इतना आकर्षक है कि इसमें अलेक्सा रैंकिंग से लेकर whois तक के आंकडे ,ग्राफ़ आदि दिख रहे हैं ।

ब्लॉगरों का जन्मदिन

ब्लॉगरों के प्रति विशेष स्नेह दर्शाते हुए यह विशेष फ़ीचर भी बहुत ही उम्दा और आकर्षक है । किसी ब्लॉगर के जन्मदिवस पर उसकी फ़ोटो के साथ बधाई संदेश के साथ मुखपृष्ठ पर उसकी मौजूदगी नि:संदेह सभी ब्लॉगर्स के मन को भाने वाली है ।

केवल राम जी निरंतर संवाद से ज्ञात हुआ कि वे अपनी टीम के साथ इसे निरंतर और अधिक उन्नत व उपयोगी बनाने के लिए प्रयासरत हैं । हम तमाम हिंदी ब्लॉगर्स की तरफ़ से उन्हें बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं । आप हिंदी के ब्लॉगर हैं तो ब्लॉगसेतु आपके लिए एक अनिवार्य कोना साबित होने जा रहा है , जो पहले पहुंच चुके हैं उनका आभार और जो बाकी हैं ,उनकी प्रतीक्षा है ..........केवल राम जी को पुन: शुभकामनाएं हिंदी ब्लॉगिंग के प्रसार के इस प्रयास के लिए

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

आज चर्चियाया जाए (चिट्ठाचर्चा)




मुझे लगता है कि अब पाठकों के पास ब्लॉग पोस्टों को पढने , साझा करने और उन्हें सहेज़ने के लिए एग्रीगेटर्स की निर्भरता बहुत हद तक कम हो गई है या कि अब शायद उतनी कमी महसूस नहीं की जा  रही है , सबने अपने अपने ठिकाने और रास्ते गढ और तलाश लिए हैं , मेरे लिए तो गूगल प्लस , ब्लॉगर डैशबोर्ड के अलावा बहुत से एग्रीगेटरनुमा ब्लॉगों और नि:संदेह हमारीवाणी भी बहुत बडा स्रोत रहा है ,जहां से मैं ब्लॉगों तक पहुंचता हूं वैसे जब अपने स्टैट पर नज़र डालता हूं तो देखता हूं कि पाठकों का एक बहुत बडा वर्ग गूगल सर्च इंज़न से चला आ रहा है । ब्लॉग पोस्टों की लिंक को एक पन्ने पर सहेज़ कर पढने के लिए उपलब्ध कराने वाले सारे प्रयास भी नि:संदेह बहुत ही प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं , ऐसे में अनायास ही पुराने दिन याद हो आए ।

यहीं इस ब्लॉग पर अर्से तक हमने भी पोस्ट लिंक्स के साथ तुकबंदी करके एक पंक्ति जोड कर खूब रेल दौडाई थी जिसे पाठक मित्रों ने सराहा और स्नेह दिया था । सोचा आज अर्से के बाद आपको फ़िर से कुछ पोस्टों से मिलवाया जाए । गूगल प्लस पर पाठकों की टिप्पणी के साथ साझा होती पोस्टों पर नज़र स्वत: ही चली जाती हैं , ऐसे ही पहली पोस्ट जो मिली वो थी ,बेहद खूबसूरत कलेवर वाला ब्लॉग राजे , शीर्षक अजब सी कैद है , पढके हमें तो यही लगा कि हो न हो ये जरूर संजू बाबा के भौजी स्वास्थ्य समस्या के कारण लगाता पेरोल मिलते जाने वाली ही कैद होगी , ससुरी अजब गजब कैद तो आजकल यही चल रही है , मगर रचना बहुत संज़ीदा और गहरी निकली ,

अज़ब सी कैद है..


अज़ब सी कैद है..
अंदर हूं तो भी डर लगता है
और बाहर जाने के ख्याल से भी
कि भला होता नहीं
और सकुचा हूं
किसी बुरे के मलाल से भी

अज़ब सी कैद है..
चुकानी हैं अभी
पालने—झूलने--
कच्ची उम्र की यादों की
किश्तें
कि.. और संजो लिये
नर्म रूई.. फाहे से रिश्ते
बुलाए हैं निर्दोष फरिश्ते

अज़ब सी कैद है..
एक—एक सलाख
बड़े जतन से बनाई है
लोहे,सोने—चांदी की जंजीरे सजाई हैं

आज की तारीख में पोस्टों और टिप्पणियों में निरंतरता बनाए रखने में सफ़ल ब्लॉगर मित्रों में श्री प्रवीण पांडेय जी का नाम उल्लेखनीय है । उनकी पोस्टों में शामिल विषयों का इंद्रधनुषी फ़लक और उनकी कमाल की शैली , बहुत सारे क्लिष्ट विषयों को भी एकदम सरल बना देती है । आज कल टरेन बाबू आर्युवेद पढाने समझाने में लगे हैं , आज अपनी पोस्ट में कफ़ वात और पित्त पर घनघोर क्लास ले डाली है उन्होंने हमारे जैसे भुसकोल ब्लॉगरों की ,

"कफ, वात और पित्त, ये तीन तत्व हैं जो शरीर में होते है और कार्यरत रहते हैं। कहने को तो इनको और भी विभाजित किया जा सकता था, पर ये तत्व भौतिक दृष्टि से दिखते भी हैं और गुण की दृष्टि से परिभाषित भी किये जा सकते हैं। शरीर की क्रियाशीलता में हम इनका अनुभव कर सकते हैं। कफ का अनुभव हमें अधिक ठंड में होता है। पित्त नित ही हमारे पाचन में सहयोग करता है। वात हमारे वेगों और तन्त्रिका संकेतों को संचालित करता है। यही कारण रहा होगा कि शरीर को विश्लेषित करने के लिये इनको आयुर्वेद में आधार माना गया है।"

अगर नेट पर और फ़िर ब्लॉग्स पर आप मय श्रीमती जी के डटे हों तो फ़िर तो क्या टैंशन है जी ,कम से कम ज्यादा पोस्टें लिखने , टिप्पणियां लिखने या नेट पर ज्यादा समय देने वाले सारे इल्ज़ाम आधे आधे बांटे जा सकते हैं फ़िर जब बात मित्र अमित श्रीवास्तव और उनकी श्रीमती निवेदिता श्रीवास्तव जी की हो तो कहना ही क्या , दोनों जन ने क्या खूब जम के एक दुसरका को समर्पित पोस्ट लगाई है , अमित भाई जहां फ़ोन में कबूतर उडाते पाए गए , तो वहीं निवेदिता भाभी ने भी फ़िर अपने झरोखे में बैरी नेटवा के बहाने बैरी पिया को ही घेर लिया देखिए ,


    ( अमित जी अपने बक्से ,बोले तो डेस्कटॉप के साथ )
इधर जैसे जैसे मौसम चुनावी होता जा रहा है वैसे वैसे ही सियासी उठापटक भी तेज़ हो गई है । ऐसे में दिल्ली की प्रयोगवादी सियासत और उस पर कोई पोस्ट/प्रतिक्रिया न देखने पढने को मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता । हमारी ब्लॉग मास्टरनी शेफ़ाली पांडे जी जब अपनी लेखनी के तीखे बाण वो भी व्यंग्य के बारूद से लैस करके चलाती हैं तो वो बिल्कुल कईयों के कलेजे भेद कर आरपार उतर लेते हैं , अपनी ताज़ा पोस्ट में बखिया उधेडते हुए वे कहती हैं

"आपकी पार्टी की नीतियां स्पष्ट नहीं है । विदेश नीति, अंतर्राष्ट्रीय नीति, कश्मीर समस्या, पकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी के साथ सम्बन्ध, आर्थिक नीतियां, आतंकवाद, अमेरिका, विकास दर, नक्सल समस्या, माओवाद, जैसे अनेकानेक मुद्दे थे, जिन पर आप जनता को सालों तक उलझा सकते थे । आप आम आदमी की समस्याएं लेकर बैठ गए । जबकि आम आदमी ने अपनी समस्याओं को समस्या मानना ही छोड़ दिया था । ये आपकी ही गलती थी कि आपने उसे याद दिलाया कि जिन्हें वह महबूब के प्रेमपत्रों की तरह सीने से लगाए हुए है उसे समस्या कहते हैं ।"

चलिए समस्याओं से तो निपटते ही रहेंगे ,फ़िलहाल विवेक रस्तोगी जी घर से आटे सब्जी लेने के लिए निकले हुए हैं मगर बीच में ही रुककर वे प्रेमी युगल को निहारने लगे , जिन्हें निहार रहे थे उन्हें कैसा फ़ील हुआ देखिए  ,

"हम अपनी बिल्डिंग की पार्किंग में खड़े होकर सभ्यता से यह सब देख रहे थे, पर उन लड़कों को यह अच्छा नहीं लग रहा था, खैर जब हम गाड़ी से चाट वाले के सामने से निकले तो भी वे सब हमें घूर ही रहे थे, यह सब वैसे हमें पहले से ही पसंद नहीं है, जब हम उज्जैन में थे तब हमारी कालोनी में भी यही राग रट्टा चलता था, फ़िर हमने अपना प्रशासन का डंडा दिखाया तो बस इन लोगों के लिये कर्फ़्यू ही लग गया था।"
पत्रकार ब्लॉगर रविश कुमार इन दिनों छुट्टी पर थे , लौटे तो स्वाभाविक रूप से इस बीच उनकी तरफ़ उछाले गए प्रश्नों का जवाब लेकर ,अपनी इस पोस्ट में वे कहते हैं

"
छुट्टी पर होने के कारण इस्तीफ़े से जुड़ी ख़बरों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन आप को लेकर लोगों की इस तरह की प्रतिक्रिया बढ़ती जा रही है । आप में से कई कह रहे थे कि मेरा नज़रिया क्या है। इसीलिए नहीं लिखा क्योंकि टीवी देखा न पेपर पढ़ा । जिस दिन अरविंद इस्तीफ़ा दे रहे थे उसी वक्त मुंबई से दिल्ली उतरा था । हवाई अड्डे पर लगे टीवी सेट पर सुरक्षाकर्मी और एयरपोर्ट स्टाफ़ और कर्मचारी जुटे हुए थे । इस तबके में अरविंद की गहरी पैठ हैं । ज़्यादातर ने कहा कि सही किया है । एक सिपाही ने कहा कि इनको ज़रा बाँदा ले आइये । वहाँ भी ज़रूरत है । अगले दिन ब्रेड लेने निकला तो दुकान पर सब पेपर पढ़ रहे थे । इस तबके की यही राय थी कि कांग्रेस बीजेपी की मिल़ीभगत से बंदा लड़ रहा है । रिलायंस की राजनीतिक छवि के कारण अंबानी पर हमला करने से इस तबके में पार्टी की छवि मज़बूत हुई है लेकिन मध्यमवर्गीय तबके के एक हिस्से को यही अच्छा नहीं लगा । अगर नीचला तबक़ा अरविंद के साथ खड़ा रह गया तभी वे अपने आधार का बचाव या विस्तार कर पायेंगे लेकिन अरविंद उस तबके के प्रति उदासीन नहीं हो सकते जिसका उन पर से विश्वास हिला है ।"

हो सकता है कि अरविंद ने अपनी बात लोगों तक न पहुँचाई हो कि क्यों इस्तीफ़ा दिया । लेकिन इन लोगों की दिलचस्पी कारण में ही नहीं है। दूसरा इनमें से कई मोदी समर्थक भी हैं । जिन्हें अरविंद को एक बार के लिए मौक़ा देना था । लोकसभा में वे मोदी को देंगे । साफ़ साफ़ नहीं कहते मगर यह ज़रूर गिनाते हैं कि आप से क्यों निराशा हुई । इसलिए दूसरा चांस नहीं देंगे । "



चलिए अब कुछ वन लाइनर लिंक्स भी देखना/बांचना चाहें तो

क्या अरविंद केजरीवाल राजनीतिक हो चले हैं  :  रैली तो कर ही रहे हैं 

मंत्रीजी के नाम खत : वाया पब्लिक एंड ब्लॉग

सूरज और मैं :  अक्सर ये बातें करते हैं

हंसे जा रहा है , हंसे जा रहा है : लिखे जा रहा है , लिखे जा रहा है

जीवन संगीत : निरंतर बहता रहे

मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद :   नई हुंकार के साथ

एक चीज़ मिलेगी वंडरफ़ुल :और अगर दो चाहिए हों तो

गांव:   शहर से बहुत दूर हैं जी अब भी

अगर वह बच्चा होता : तो इस तरह ब्लॉग लिख पाता क्या

क्या कर सकता हूं :पोस्ट तो लिख ही डाली है

संविधान की प्रस्तावना : और हमारे राजनीतिज्ञों की भावना (अनुलोम विलोम)

और अब चलते चलते काजल भाई का कार्टून



रविवार, 16 फ़रवरी 2014

ये दिल्ली के लौंडे ....कुछ फ़ुटकर नोट्स



http://www.aamaadmiparty.org/sites/default/files/styles/670_x_270/public/jhadu%20chalao.jpg


आज साठ सालों के बावजूद भी अब तक क्यों नहीं ऐसा कोई कानून पहले के राजनैतिक दलो और उनके अगुआओं ने लाने का प्रयास , संजीदा प्रयास किया ..सारी जिम्मेदारी आम आदमी के कंधों पर ही । चुनाव लडने की चुनौती फ़िर जीतने के बाद सबके डर कर पीछे भागने और पहले आप पहले आप वाला नया फ़ार्मूला लगा कर पुन: आम आदमी के कंधे पर ही बोझ लादा गया कि , पुलिस , प्रशासन , कानून , व्यवस्था राजनीति और खुद आम लोगों के विरोध और असहयोग के बावजूद भी सिर्फ़ पचास दिनों में पांच सौ रिपोर्ट कार्ड भी तैयार कर दिए ...अजी छोडिए , लात मारिए इस सरकार को , हम भी यही कह रहे हैं ...लेकिन सिर्फ़ , इतना और भी बताते जाइए कि आखिर बाकी बची हुई पार्टियों को क्यों नहीं ये जिम्मेदारी दी जा रही है कि वे आएं और लाएं न वैसा मजबूत कानून , जो आपके अनुसार ही संवैधानिक और शायद कारगर भी होगा ...बात को घुमा फ़िरा कर कहना मुझे भी नहीं आता इसलिए सीधा और सपाट कहता हूं ....हां भाषाई मर्यादा का ख्याल जरूर रखने का प्रयास करता हूं । शेष सबके अपने अपने मत और अपनी अपनी विचारधारा है जिसका सदैव स्वागत किया जाना चाहिए , आप जिसे भगोडा कह रहे हैं उसे हमने मलाईदार नौकरियों के बाद मलाईदार कुर्सी को भी ठेंगा दिखाते हुए देख लिया है ....अभी तो अपनी बस थोडी सी ...इत्ती सी समझ पे यकीन रखने का मन है वही कर रहे हैं ..
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दिल्ली की नए नए लौंडों द्वारा बनाई गई अराजक सरकार औंधें मुंह गिर गई , चलो अच्छा हुआ ।ये सत्ताइस बावले अब जो मर्ज़ी करते रहें , बांकी के मिल कर देश के विकास और समस्याओं के लिए यकीनन ही कुछ बेहतर और बडा करके दिखाएंगे , हमें भी पूरा विश्वास है ...और ये बिल था क्या जी ???? फ़ालतू के क्लॉज़ ....पकडे जाने पर सारा माल जब्त ..नौकर चाकर रिश्तेदारों तक की जांच कराने का प्रावधान , कहां अभी साल छ: महीने की सज़ा , जमानत और कहां उम्र कैद ..अबे ऐसा होता है क्या ..दिस इज़ डेमोक्रेटिक कंटरी मैन

...हां संसद ने इससे पहले एक बिल पास किया तो आस्तीन चढा के छोकरे ने कैमरे के सामने ही नानसेंस कहके फ़ाड के फ़ेंक दिया ...सुना एक अलग वाले को लेकर तो चक्कूबाज़ी और मरचाई बम तक चला पाल्लामेंट में ............अरे ऊ ई नहीं किया , ऊ नहीं किया , भगोडा निकला , बेकार था , वोट बेकार गया ...........अब हो गया न ई तो ...चलिए अब आप काम पर लगिए न ...पास करिए लोकपाल विधेयक , महिला आरक्षण विधेयक , न्यायिक सुधार अधिनियम , जित्ते भी हैं फ़ाईल में ..और हां पकड पकड के ठूंसिए जेल में साले चोरों को ,घपले घोटालेबाजों को , हाकिमों और दारोगाओं को ............और नहीं करने का माद्दा है तो ..........तो फ़िर आप गरियाते रहिए ...हर नई सोच , हर नए विकल्प और हर नए प्रयास को
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आगामी लोकसभा चुनावों में यदि फ़िर से कोई राहु केतु धूमकेतु तीसरा चौथा पांचवा मोर्चा टाईप , भाजपा की कुंडली में आकर नहीं बैठ गई तो यकीनन अगली केंद्र सरकार चलाने की बागडोर भाजपा के जिम्मे ही आएगी , ये दिख और महसूस भी हो रहा है किंतु आजकल जिस तरह से देख रहा हूं ,कि भाजपा के प्रबल समर्थक अपने मिशन 2014 के लिए सकारात्मक और उर्ज़ावान माहौल बनाने की बजाय , जिस तरह से अपनी पूरी ताकत , अपनी पूरी सोच , अपनी पूरा ध्यान सिर्फ़ आलोचना में , वो भी अपने चिर प्रतिद्वंदी कांग्रेस की नहीं बल्कि देश में सिर्फ़ सत्ताइस ..सिर्फ़ सत्ताइस विधायकों वाली पार्टी पर निशाना लगा रहा है उससे तो लगने लगा है मानो भारत चीन पाकिस्तान से मुकाबले की बात छोड कर श्रीलंका भूटान को अखाडे में चुनौती देने की कवायद कर रहा हो .........
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एक दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली की नई राजनैतिक सोच और विकल्प बनकर उभरने को लेकर अन्य राज्यों के मित्र इतने व्यग्र हैं कि मानो अपने राज्यों में हो रहे नकारात्मक सकारात्मक को छोड कर सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़िरती हुई झाडू पर नज़र गडाए बैठे हैं , इत्तेफ़ाकन कि हम जैसे दिल्ली में बैठे , हम जैसे दोस्त फ़र्क को महसूसते हुए इस परिवर्तन के प्रयास को निरंतर बल दे रहे हैं वहीं अन्य प्रांतों के मित्र भी लगातार ही दिल्ली राजनीति के इस नए प्रयोग को पूरी तरह फ़ेल करार देने के लिए उद्धत हैं , अच्छा है , अगर ये प्रयास पूरी तरह से दम भी तोड देता है तो भी ये कम से कम इतना तो स्पष्ट कर ही देगा कि अब इस देश में सियासत की सूरत बदलने की सोच रखना बेमानी साबित होगा , वे कुछ भी नहीं हारेंगे , उन्होंने जीता ही क्या अब तक ..............
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मैं हमेशा इस बात में यकीन रखता हूं कि यदि हमें किसी बात ,व्यक्ति , व्यवस्था , आदि का विरोध करना है तो बेशक करना ही चाहिए , लेकिन क्या ये जरूरी है कि हम उसमें लेखकीय भाषा की थोडी सी भी गरिमा तो बनाए रखें , आखिर हम यहां उस अंतर्जाल पर लिख पढ रहे हैं जहां हिंदी में जो थोडा बहुत लिखा जो लिखा जा रहा है हम भी उसका एक हिस्सा हैं , गरियाने का मतलब ये थोडी है कि आप गली मोहल्ले को यहीं खडा कर लें ।

और हां किसी भी बहस से परे और बहुत सारी बहस के बावजूद मैं आपसे यही कहूंगा कि यदि व्यवस्था में रहकर , व्यवस्था से लडने वाले इन जैसे कुछ पागलों , बावलों पर आप यकीन नहीं करेंगे , और कोई जबरन नहीं कहेगा यकीन करने को ये तय है , तो फ़िर निश्चित रूप से आपको ये अधिकारपूर्वक कहना ही होगा कि व्यवस्था दूषित और भ्रष्ट नहीं है , बल्कि हम सब ही धूर्त , झूठे और भ्रष्ट होने को तत्पर हैं ।
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कुछ अराजकतावादियों द्वारा पेश किया गया अंसवैधानिक बिल के पेश ही न हो पाने से ये हुआ है कि अब दिल्ली वालों बिजली पानी के सारे अंबानी मार्का संवैधानिक बिल मिल सकेंगे , जल्दी ही प्रदेश पूरी तरह से संवैधानिक व्यवस्था से चुस्त दुरूस्त दिखाई देगा , कोई छापेमारी , कोई स्टिंग फ़िटिंग का चक्कर नहीं , दरोगा जी भी खुश और हाकिम भी ,,,..बकिया बचा आम आदमी ..........ऊ झाडू लगाएगा , लगाते रहो

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जरा उन लोगों को भी याद दिलाता चलूं कि इन सबके बीच उस गृहिणी की भी सोचिए कि जिसके पति पर बडका बंगला मांगने के बाद छोटका में रहने के लिए अभी जुम्मे जुम्मे आठ दिन भी तो नहीं हुए और वही क्यों पूरी बटालियन ही तो अभी शिफ़्ट हुई , अभी तो सामान जमाया भी नहीं होगा ठीक से , फ़िर वापस ....ई नाजुक जिगरे वाले के बस का नय है जी ..ई बौरहवा सब इकट्ठा हो रहा है ....भारी .............बहुत भारी पडने वाला है
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चलिए तो फ़िर आज ये भी खुल्लम खुल्ला तय करते है सचमुच ही सियासत चाहती है कि अब सडक पे रहने मरने वाला हर आम आदमी खुद उससे पंजा लडाए तो यही सही, दिल्ली को गरियाने वाले तमाम दोस्तों को पुन: आमंत्रण कि देखिए ,अगले फ़िर मैदान में आ गए हैं .....जम के गरियाइए
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देखिए जी अगर समाज से गंदगी को काटकर फ़ेंकना चाहते हैं तो फ़िर तेवर तेज़ाब सा रखना ही होगा , तेल लेने जाए कुर्सी और पोस्ट , सरकारी नौकर को खूब पता होता है छोटी बडी नौकरी का फ़र्क , ये नौकर हैं , मालिक नहीं हैं , इसलिए निश्चित रूप से यदि व्यवस्था ओह , मेरा मतलब संवैधिनिक व्यवस्था को ऐसा लग रहा था कि सिर्फ़ जांच की बात कह जाना और जांच की आंच को धधकाए रखना सरासर अराजक है तो फ़िर ऐसे नौकरों को यकीनन ही अब पद को ना कह देना ही श्रेयस्कर है .....आम आदमी को अब ये भी दिखा देना चाहिए कि हमारे ठैंगे से ..लो रखो अपनी कुर्सी और खेलो सरकार सरकार
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चलिए जी तो अब ये लगभग तय हो गया है और जैसा कि मैं अपने स्टेटस में इस सरकार के बनने के पहले दिन से कहता आ रहा हूं कि इस सरकार द्वारा धडाधड दर्ज़ कराई जा रही वैधानिक और सही शिकायतें, जिनके बारे में निश्चित रूप से हर भारतीय थोडा बहुत जानता है या अंदाज़ा लगा लेता है , जितनी पैनी होती जाएगी इस सरकार की मैय्यत का दिन उतना करीब होता जाएगा , तो अब ये तय हो गया कि आज और अभी के बाद से दिल्ली में कुछ भी अराजक नहीं हो पाएगा , सब कुछ 42 घनघोर संवैधानिक लोगों के हाथ में बागडोर आ गई है , हद है साला अईसा भी कोई करता है क्या कि सोटा ऐसा तैयार किया जाए कि जिसे शक्लों और रुतबों की पहचान ही न हो और हो तो उलटा बिफ़र के दुगने वेग से पीठ पर पडे ..........कल से सब कुछ संवैधानिक होगा लेकिन ई भांड मीडिया को देखिए , अजबे बाजीगरी है , साला आज टोटल बहस चरस में बह गया जईसे , सब झाडू खाने वहीं पहुंचा हुआ है , अबे साले इत्ते बेसरम हो कईसे बे , एक्के घंटा पहिले गरियाते हो अगले में सीधा दंडवत दिखते हो
...माने सब कुछ मार्केटवे तय कर रहा है क्या बे
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हम आज साला उस जगह को पक्का खोज के ही दम लेंगे जहां से ई रोजिन्ना का "डे" सब डिकलियर किया जाता है , अरे हद है जी , हम लोग को अपना डे मनाने का साला चांसे नय दे रहा है ...नाखून डे से लेकर दातुन डे तक धडाधड मन रहा रोज़ के रोज़ लोगबाग इत्ते बिज़ी हो चले हैं ..हमसे तो रोज़ छूट जा रहा है ..नौकरी डे आ घर का ड्यूटी डे गजब बजाते हैं रोज़ ...हर डे डिफ़रैंट होता है ..हर डे एकदम खास होता है , जैसा पहले कभी नहीं होता न बाद में होता है ...............
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ऑन ए सीरीयस नोट मुझे ऐसे वक्त पे एक खास बात जो ध्यान आती है वो ये कि आखिर आज़ादी के साठ बरस बाद भी हमें सर्वोच्च न्याय पाने के लिए बहुत ही कम फ़ैसलेकार अब तक मिल रहे हैं और ठीक ऐसा ही कुछ जनप्रतिनिधियों के मैथ का भी है ..अबे इतने बडे पेट वाले देश के पास सोचने करने के लिए क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ साढे पांच सौ लोग ही होने चाहिए , क्यों नहीं पांच हज़ार या शायद उससे भी ज्यादा...........कम लोगों पर कुछ ज्यादा दबाव डाल कर हम उनपर कुछ ज्यादा ही डिपेंडेंट नहीं हो गए हैं ......साला नौकरी सरकारी है , वो भी सिर्फ़ पांच साल की ..और कमाल देखिए कि ..भाई लोगों ने पुश्तैनी बना डाला है ...........मिर्ची और चाकू ..धंधे में ही चलाए जाते हैं ...नौकरियों में चाकूबाजी नहीं हुआ करती ..............और हां एक आखिरी बात ..अराजकता इसे कहते हैं .......माने कि ओसहिं बताए हैं

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

वीसीडी और तीन पिक्चरों वाली रात ................




अब यदि आज के बच्चों से आप ये कहिएगा कि एक ज़माने में हम मुहल्ले के उस इकलौते घर , जिसमें ब्लैक एंड व्हाइट टीवी होता था , उस घर में रविवार को नहा धो कर टीवी के आगे बिछाई गई दरी चादर , न भी हो तो क्या गम था , पर जम जाने की कशिश बयां करने से परे का आनंद था , टीवी की स्क्रीन दिखाई देनी चाहिए थी और आवाज़ बराबर सुनाई देनी चाहिए थी बस  । और अगर खुशकिस्मती से मुहल्ले का वो इकलौता घर आपके किसी जिगरी दोस्त का निकल जाए तो फ़िर तो आपकी बल्ले बल्ले , समझिए कि दोस्त के साथ कुर्सी सोफ़े या उसकी चौकी पर उसके साथ बैठ कर आपको छब्बीस जनवरी की परेड को वी आई पी पंडाल में बैठ के देखने टाईप की फ़ीलींग आ सकती थी । और हमारे उन दिनों के दोस्त खूब गुजरे होंगे कि उन दिनों जिसके पास क्रिकेट का बैट होता था उसके कैप्टन बनने के चांस ज्यादा होते थे , और उसी तरह जिसके घर पे संडे को टीवी देखना तय था खेल में उसका एक आध बार ज्यादा आउट होना कोई बुरी बात नहीं थी । और हिम्मत की दाद तो ये सुनकर दी जा सकती है कि , बीच कार्यक्रम में "रुकावट के लिए खेद है " को हम आधा आधा घंटा यूं अपलक निहारते थे कि मानो एक सीन भी निकलना नहीं चाहिए । 
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ब्लैक एंड व्हाइट टीवी को धक्का मारा हमारे अप्पू जी की पूंछ और सूंड ने । जी हां भारत में रंगीन टेलीविज़न का चलन 1982 में भारत में आयोजित पहले एशियाड खेलों के आयोजन के साथ ही हुआ था । रामायण और महाभारत सरीखे धारावाहिक यकायक ही ज्यादा चमकदार दिखने लगे थे । मगर टीवी के साथ जुडी यादों का जब जब ज़िक्र आएगा तब तक उसके साथ थोडे दिनों के बाद आया वो एक रात के लिए किराए पे  वीसीडी और तीन वीडियो कैसेट लाकर पूरी रात जागकर उसे देखने का दौर । वाह क्या दौर था वो भी , एक रात में तीन तीन फ़िल्में वो भी लगातार , बिना किसी ब्रेक श्रेक के । 
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अक्सर शनिवार की रात को चुना था ऐसी घनघोर फ़िल्मी रात के लिए , वैसे बाद में किसी खास अवसर , मौके पर भी एक तय कार्यक्रमों और सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले आयोजनों में से एक यही होता था वीसीडी किराए पे लाओ , और उसके साथ अपने पसंद की तीन वीडियो कैसेट खरीद के लाओ , पूरी रात दीदे फ़ाड के उन तीनों पिक्चरों को एक सांस में देख जाओ , हालांकि जो चतुर होते थे वे चार ले आते थे क्योंकि किराए पे जा जाकर घिसी हुई वीडियो सीडी कई बार ऐन मौके पर धोका दे जाती थी और कई बात तो ससुरा वीसीडी प्लेयर ही अड कर टैं बोल जाता था , दिल खोल के गालियां पडती थी वीडियो कैसेट लाइब्रेरी चलाने वाले को । 
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लेकिन सिर्फ़ ऐसा नहीं था कि ये इत्ता आसान सा आयोजन होता था जी , पहले तो घर में इसी बात पर महाभारत छिड जाती थी कि वो तीन पिक्चरें कौन सी होंगी , एक दिन पहले से ही घनघोर माथापच्ची के बाद एक लिस्ट फ़ाइनल की जाती थी कम से कम पांच सात पिक्चरों वाली , उन्हें वरीयता के क्रम से टिकाया जाता था , मसलन अमिताभ बच्चन या धरमिंदर  पाजी की नई वाली फ़िल्म अगर उपलब्ध नहीं है तो मिठुन दा वाली ली जा सकती है । मम्मी , चाची , मासी के सामाजिक फ़िल्मों की लिस्ट में से एक का सलेक्शन नहीं किए जाने पर वीटो किया जा सकता था ,मगर उसका तोड बच्चे यूं निकालते थे कि वीडियो लाइब्रेरी से वापस आने पर कह देते थे कि आपकी वाली फ़िल्म तो मिली ही नहीं , बदले में अपनी वाली पसंद की ही दोनों उठा लाए । 
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सबको पता होता था कि कौन कौन सी संभावित पिक्चरें लाई और लगाई जाने की संभावना है इसलिए शाम से ही कमर कस के तैयार हो लेते थे । उस शाम को खाना जल्दी खा लिया जाता था अमूमन दिनों से काफ़ी पहले ताकि जल्दी से निबट कर पहली वाली फ़िल्म को जल्दी शुरू किया जा सके । और खूब हो हल्ले के बाद सबसे ज्यादा हल्ले से  ही ये निर्णय होता था कि बच्चों को पसंद आने वाली पहले चलाई जाएगी । इसके बाद अगली फ़िल्म वही सामाजिक पारिवारिक घरेलू , राज किरन , फ़ारुक शेख और अमोल पालेकर जी वाली चलाई जाती थी ,सबसे अंत में जो बचती थी वो । अगर कभी खुशकिस्मती और बदकिस्मती से एक ही अभिनेता की दो या कभी कभी तीनों ही फ़िल्में हुईं तो मजाल है कि सुबह तक ये याद हो कि अमिताभ बच्चन ने कादर खान का मुंह किसमें तोडा था और अमरीश पुरी के दांत किसमें । 
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इससे जुडा एक दिलचस्प किस्सा मुझे ये भी याद आ रहा है कि उन दिनों एक बार मांसी के गांव में मौसेरे भईया लोगों ने एक छोटा साला हॉलनुमा कमरा किराए पे लेकर , लगातार दस दिनों तक वीडियो सीडी प्लेयर किराए पे लेकर , टिकट लगा कर बहुत सारी फ़िल्में दिखाईं थीं । इस वीडियो फ़िल्मोत्सव के बीच में पहुंचे मुझे एक दिन ये जिम्मेदारी दी गई कि मैं रिक्शे पे बैठ कर शाम को दिखाई जाने वाली पिक्चर "सन्यासी" का प्रचार कर आउं । मैंने बिना जाने समझे आव देखा न ताव और खूब ढिंढोरा पीट आया , मासियों , नानियों और मामियों को भी बडा घनघोर वर्णन कर आया कि , कित्ती धार्मिक फ़ीलिंग वाली पिक्चर है , बाद में वीसीडी कवर पर उसका पोस्टर देख कर मैं समझ गया था कि शाम को पिक्चर देखने के वाद वे सब मुझे ही ढूंढने वाली थीं ....





सोचता हूं कि कहां वो आनंद वो रोमांच अब मिलता है चकाचौंध भरे महंगे मल्टीप्लैक्स में फ़िल्म देखने में भी 

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बिहरिया पोलटिस स्टोरी -(ग्राम यात्रा -IV )





बिहार के लोगबाग राजनीतिक रूप से इतने अधिक जागरूक और सचेत होते हैं कि चाहे आज अपने अलग अलग किए प्रयोगों के कारण बिहार की ये स्थिति हो गई है कि आज प्रांत का मुखिया देश की सरकार के सामने बहुत सारा पैसा मांग रहा है ताकि सूबे को पटरी पे लाया जा सके । बडी सरकार छोटे सूबेदार के बदलते पलटते तेवर और अपने खजाने को देखते हुए उनकी इस मांग को कितना मांगेगी ये तो भविष्य की बात है मगर मेरे कहने का मतलब ये था कि , कोई भी चौक चौराहा , बाज़ार , हाट , दालान , और खेत तक राजनीति की बातों से पटे और भरे हुए होते हैं । और कमाल की बात ये है कि ग्राम स्तर की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों , परिवर्तनों पर अपनी टिप्पणियां जरूर करते हैं , बहस करते हैं , और एक दूसरे को बाकायदा अपने तर्क से खुद को पराजित करने की चुनौती देते हैं ।


दिल्ली से मधुबनी के रेल सफ़र में , मुझे एक मंडल जी (उन्होंने पूरी यात्रा में बार बार यही कहा कि किसी से भी मेरे बारे में पूछिएगा कि मंडल जी के यहां जाना है वो बता देगा ) ने पूरी यात्रा में न सिर्फ़ राजनीति ,समाज , अपने परिवार और बाल बच्चों की बात में बहुत सी बातें साझा कीं । जैसे कि उन्होंने बताया कि रेल सफ़र के दौरान आप आसानी से उत्तर प्रदेश से बिहार की सीमा में प्रवेश करने का फ़र्क महसूस सकते हैं , मुझे जानकर विस्मय और हर्ष हुआ जब उन्होंने बताया कि जहां से आपको कृषि भूमि कम और वनस्पति ज्यादा सघन दिखाई देने लगे समझ जाइए कि आप बिहार की सीमा में प्रवेश करने जा रहे हैं ।

बात राजनीति की चल निकली , मंडल जी पुराने कांग्रेसी थे उनके पास एक बडी ही मजेदार दलील थी जिसे उन्होंने पूरे सफ़र के दौरान बहुत बार दोहराया कि जो भी कहिए सरकार तो कांग्रेस को ही चलानी आती है ...............आखिरी बार मुझसे नहीं रहा गया और मुझे उनकी बात काटते हुए कहना ही पडा कि " हां सरकार तो कांग्रेस चला ही लेती है , मगर देश उससे नहीं चलाया जाता "।बात दिल्ली की नए नवेले राजनीतिक  प्रयोग से शुरू होकर आगामी  लोकसभा चुनावों पर जाकर अटक गई । रेल से शुरू हुई ये बहस , आगे गांव के चौराहे और दालानों तक भी खूब चली ।

बडे बूढे बुजुर्ग तक की पूरी राजनीतिक चर्चा का सार यही था इस बार मोदी ही राष्ट्रीय राजनीति के एकमात्र अगुआ साबित होंगे , और वे मुझसे इस तरह से पूछ रहे थे मानो सिर्फ़ आश्वस्त होना चाह रहे हों , बाकी उन्हें पता तो है कि होगा यही । जहां तक बिहार की वर्तमान प्रादेशिक सरकार और उसके राजनीतिक दृष्टिकोण पर मेरा मानना ये था कि नीतिश कुमार की टाइमिंग बहुत ही गलत रही , समर्थन वापस भी लिया तो उस पार्टी से जिसका भविष्य आगामी राष्ट्रीय राजनीति में सबसे प्रबल है , समर्थन वापस भी लिया तो किस मुद्दे पर , नरेंद्र मोदी को आगामी प्रधानमंत्री के रूप में नामित करने के कारण , दूसरी तरफ़ जिस केंद्रीय सरकार की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष छवि के साथ अपनी छवि चमकाने की कोशिश वे कर रहे हैं और जिस बडे खजाने को पाने के लिए कह और कर रहे हैं वो फ़िलहाल उन्हें मिलता नहीं दिख रहा है ।
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यहां बिहार में दिखते विकास और परिवर्तन को महसूसते हुए भी जो दो बातें मुझे अखर रही थीं वो ये थीं अब तक भी राज्य में औद्योगीकरण व व्यापार को वो दिशा दशा नहीं मिल पाई थी जो शायद एक बडा बदलाव ला सके । आज भी प्रांत के लोगों की पूरे देश में जाकर वहां काम करने , पढने , मजदूरी करने के लिए जाने को विवश होना पड रहा है , पलायन तो अब भी बदस्तूर जारी है , क्यों नहीं आज तक प्रांत के मुखियाओं ने पूरे देश से हिम्मत करके कहा कि ये जो हमारे लोग , आपके सबके प्रदेशों में , राजधानियों से लेकर छोटे मोटे शहरों में , बैंक , दफ़्तर , दुकान से लेकर सडकों तक पर अपनी मेहनत और अपने बूते पर अपना सर्वस्व आपको दे रहे हैं तो फ़िर क्यों नहीं उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए बनिस्पत इसके कि उन्हें क्षेत्रीयता और भाषाई निशाने पर रखा  जाए ।


ग्राम यात्रा सीरीज़ की आखिरी पोस्ट भी जल्दी ही पढवाऊंगा आपको .................

सोमवार, 20 जनवरी 2014

विकास और विनाश के बीच (ग्राम यात्रा -III)

 पिछली बार जब गांव गया था तो मधुबनी से गांव के इस सडक जिसके बारे में मुझे बिल्कुल ठीक ठीक और शायद पहली बार ये मालूम चला कि ये बिहार का राजकीय मार्ग संख्या 52 है , माने कि राज्यों के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग सरीखी महत्वपूर्ण , हालांकि मुझे इतना अंदाज़ा तो था कि देश की सीमा की सडकों से जुडी होने के कारण ये बहुत मुख्य महत्व वाली सडक है किंतु अपने गांव में रहने तक और खासकर इस पर पडने वाले कमाल के लकडी सीमेंट और लोहे के पुलों और साल दो साल के अंतराल पर उनका चरमराया हुआ ढांचा देखकर ऐसा कभी भीतर से महसूस नहीं हो पाया कि इतने महत्व का होगा , तो पिछली बार ये देख कर मुझे खुशी हुई थी कि इस बार सडक पर सरकार इस तरह से गंभीर होकर काम करवा रही है कि अब ये कम से कम दस सालों तक के लिए पक्का काम किया जा रहा है । एक मिशन की तरह से शुरू और पूरा किया गया ये काम नि: संदेह राज्य द्वारा करवाए गए कुछ बहुत अहम कामों में से एक अवश्य है । तो इस बार नए कमाल के मजबूत पुलों के साथ नई और एकदम सपाट बेहतरीन सडक हमें इत्ती भाई कि हमने चार दिन के डेर में दो दिन सायकल हांक दिया गांव से मधुबनी की ओर ।


यहां सायकल की कहानी सुनानी तो बनती है फ़िर चाहे पोस्ट लंबी ही  क्यों न हो जाए वैसे भी गांव की बातें जितनी होती रहें उतना अच्छा इससे हमारी गांव जाने की हुमक जोर मारती रहेगी । तो गांव के जीवन में ही हमने सायकल चलाना यानि की सीट तक सायकल चलाना सीखा था वो भी खेत की मेडों पे , अब समझ जाइए कि कित्ते घनघोर सायकलिस्ट रह चुके हैं । लगभग पांच साल तो लगातार गांव से मधुबनी तक और कुल मिलाकर तीस किलोमीटर की सायक्लिंग तो होती ही थी , वो भी कभी पुर्वा तो कभी पछिया पवन के खिलाफ़ और हमें याद है कि एक बार भाजपा की सायकल रैली में अस्सी सत्तर किलोमीटर तक नाप दिया था । और एक कमाल की याद और सुनाएं आपको कि एक बार जिद्दम जिद्द में हमने और हमारे मित्र जयप्रकाश ने मॉर्निंग शो में "लैला मजनू" देखने की ठानी और शायद सत्ताइए अट्ठाइस मिनट में पहुंच मारे थे । आज भी गांव जाने पर सबसे पहला काम यही होता है कि कभी चुपके से तो कभी बताकर मधुबनी का चक्कर मार लेते हैं वो भी सायकिल से । यूं भी सायकल से जाने पर रास्ते रिश्तेदार सरीखे लगने लगते हैं । अब तो इनपर ये दूरी स्थान सूचक शिलाएं भी खूब चमकती हैं ये बताने के लिए कि कितना कट गया कितना बचा , वैसे रोज़ जाने वालों को चप्पे चप्पे की पहचान हो ही जाती है , दूरी की भी ..







खुद ही देखिए , कित्ती लिल्लन टॉप सी लग रही है एकदम मक्खन । और हमारी सायकिल की हुमक तो छोडिए , इतने सारे टैंपो , ट्रेकर , छोटी छोटी सवारी गाडियां और जाने क्या क्या पूरे दिन रात गुडगुडाती रहती हैं । अब वो आधे एक घंटे का इंतज़ार नहीं होता है ,अब तो बस आइए धरिए और फ़ुर्रर्रर्र ....। लेकिन यहां ये बात बताना नहीं भूल सकता कि इन सडकों पर बढती रफ़्तार ने अकाल मौतों की दर में अचानक भारी इज़ाफ़ा किया है और क्यूं न हो , जब सरकार ने खुद अद्धे पव्वे , थैली , बाटली का इंतज़ाम चौक चौराहों पर खूब बढा दिया है , इसकी चर्चा आगे करूंगा विस्तार से ....आप सडक देखिए और हमारी दौडती हुई सायकल ...


 


पिछली बार जब लौटे थे तो मधुबनी और हमारे गांव के लगभग बीच में पडने वाला कस्पा , रामपट्टी का ये स्कूल भवन निर्माणरत था । अबके चकाचक बन कर तैयार मिला ...........


सतियानाश जाए , इसपर इतराते हुए हम चले जा रहे थे कि बीच में ये उधडन सी मिल गई । हमें भारी गुस्सा आया , और अब हम सोचने पर मजबूर हुए कि दो साल की घिसाई में इनका ये हाल हुआ है , दस साल तो कतई नहीं , हमने उमर जादा बढा दी क्या ???? खैर ,


इस और इन जैसी सडकों का पहला प्रभाव तो हमने आपको घुरघुराते टैंपो, मैजिक , के रूप में दिखा ही दिया अब दूसरा जो हमें महसूस हुआ उसके दो पहलू हैं । एक है बिन्नेस वाला और दूसरा एग्रीकल्चर वाला । आजकल गन्नों की पेराई और गुड की सप्लाई का बिन्नेस हमने सबसे ज्यादा पनपते देखा , ईंट के भट्ठों से भी ज्यादा का बिन्नेस । हम ऐसे ही एक पर रुके । यहां मिले युवक संतोष साव ने विस्तार से बताया कि । एक बडे कडाह में जितना गुड उबाला जाता है उसे पहले बडे पर और इसके बाद इससे छोटे पर उबाला जाता है , एक कडाही उबाले गुड से एक गुड का बडा ढेला तैयार किया जाता है । पूरे दिन में ऐसे एक पेराई ठिकाने से दस ढेले तैयार किए जाते हैं रोज़ाना। मैंने संतोष से पूछा कि क्या उन्हें राज्य की तरफ़ से कोई सहायता या प्रोत्साहन , नहीं । यदि मेवे डाल कर सुगंधित गुड बनाने का ऑर्डर मिले तो बना सकते हैं , लेकिन देसी गुड का स्वाद ही अपना होता है , उन्होंने बताया ।
आगे के रास्ते पड कमोबेश दस से भी ज्यादा मिले ऐसे ठिकाने हमें और ट्रक पर गन्ने लादने का स्थान यानि राटन भी देखा हमने । चलो शुक्र है कुछ तो मीठा मीठा चल रहा है प्रदेश में .....



सडक पर खडे ट्रैक्टर में बैठे इन बच्चों की तरफ़ जैसे ही मैंने कैमरा मोडा दोनों अकचका गए मगर मेरे कहने पर खिलखिलाने भी लगे ।

जब रास्ते में गर्रर्रर्रर्र पों होगी तो बिना तेल के राधा कैसे नाचेगी सो राजकीय पथ संख्या 52 पर आपको तेल पेट्रोल भरवाने का पंप भी मिलेगा , और उसमें पेट्रोल डीजल भी ...........

आगे सडक किनारे के मकानों वाली दीवारों पर हमें इस शैक्षणिक  संस्थान के विज्ञापन के अलावा भी बहुत सारे विज्ञापन पढने को मिले , यानि कि कुछ तो बदल रहा है और बढिया बदल रहा है , ...



मधुबनी बाज़ार में भी खूब रौनक देखने को मिली । और लगभग उतनी ही भीडभाड भी । फ़ोटो मैने बाज़ार की इसलिए नहीं ली कि क्या पता एकाध कोई पत्रकार समझ कौनो स्टिंग फ़्टिंग के चक्कर में कैमरा समेत हमारा शिकार करे ।

हां जैसा कि मैं ऊपर आपको बता रहा था कि इस नई सरकार के बही खाते में एक कमाल का तमगा ये लग रहा है कि इसने सबको नशेडी और शराबी बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोडी है और इसी क्रम में मुझे पता चला कि सरकार ने खुद एक घोषणा भी छोडी है हर बेवडा चौक पे कि नशा मुक्त गांव को भारी ईनाम से नवाज़ा जाएगा , जे बात :) इसे कहते हैं कांटे की कंपटीसन ..............चलिए आगे फ़िर बताएंगे , सुनाएंगे और हां दिखाएंगे भी .............







सोमवार, 13 जनवरी 2014

दिल्ली टू मधुबनी ,वाया सरयू यमुना (ग्राम यात्रा-II)




बेहद दुख और कमाल की बात ये है कि इतने सारे सुधारों के दावों के बाद भी भारतीय रेल और रेल यात्राओं का हाल कमोबेश अब भी यही है । जिन दिनों मैं दिल्ली से मधुबनी के लिए सरयू यमुना एक्सप्रैस के स्लीपर में यात्रा कर रहा था लगभग उन्हीं दिनों खबरों में ये सुन देख रहा था कि रेल के डिब्बे धधक रहे हैं और उनमें सफ़र कर रहे यात्री अपनी आखिरी यात्रा पर निकल गए हैं । जांच कमेटियां , मुआवजा , भविष्य के लिए योजनाएं आदि की नौटंकी तो इसके बाद आती जाती ही रहीं पहले भी आती जाती रही हैं । मगर मैंने और मुझ जैसे बिहार उत्तर प्रदेश जाने वाले हर रेल यात्री ने इन यात्राओं में जिस तरह के अनुभव लिए हैं , वो नि:संदेह साठ सालों के बाद और पिछले सालों में रेल मंत्रालय व प्रशासन द्वारा किए गए वादों के बाद बहुत ही तकलीफ़देह है । हालांकि इसमें भी कोई संदेह नहीं कि रेल सफ़र को कुव्यवस्थित और निहायत ही कठिन बनाने में खुद हम रेल यात्रियों का भी कम योगदान नहीं है ।


जब दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ार्म संख्या 13 से मैं अपनी रेल , सरयू यमुना एक्सप्रेस में बैठने के लिए खडा था तो मुझे यकायक दीवाली से पहले का वो दिन याद आ गया जब इसी तरह गांव जाने के इसी रेल को अपनी भरसक कोशिश के बावजूद सिर्फ़ इस वजह से नहीं पकड पाया था क्योंकि भीडभाड की अधिकता के कारण और सभी दरवाज़ों को पीछे अमृतसर और पंजाब के बाद के स्टेशनों पर चढे और दीवाली और छठ के लिए घर जा रहे मजदूर परिवारों ने खोला ही नहीं । इस बार कमोबेश उतनी खराब नौबत नहीं थी । लेकिन उससे पहले जो एक दुविधा मेरे मन में उठी , जो पहले भी ऐसी रेल यात्राओं के दौरान उठती रही है । प्लेटफ़ार्म पर खडे होने और रेल की प्रतीक्षा करते समय ये पता नहीं होता कि अमुक स्थान पर अमुक डब्बा आकर लगेगा । मेरे ख्याल से रेल के आने के बाद जो  अफ़रा तफ़री मचती है उसका एक बडा अहम कारण यही है ।

 मैं अब तक समझ नहीं पाया हूं कि आखिर क्यों हम अब तक ये निश्चित नहीं कर पाए हैं कि प्लेटफ़ार्म पर एक निश्चित स्थान पर भी कोई निश्चित डब्बा आकर खडा होगा । अब  तो पहले की तरह आरक्षित सीटों के चार्ट के ऊपर भी ये अंकित नहीं होता कि अमुक डब्बे संख्या को अमुक डब्बे के रूप में लगाया गया है । अब ये पता नहीं कि ऐसा सिर्फ़ बिहार और उत्तरप्रदेश जाने वाली रेलों और उनमें चढने वाले यात्रियों को फ़ालतू समझ कर किया जाता है या सभी रेलों का यही हाल है । किंतु मुझे लगता है कि यदि सभी प्लेटफ़ार्मों पर ये निश्चित कर दिया जाए कि एक निश्चित स्थान पर ही आकर एक निश्चित डिब्बा लगे तो स्थिति में बहुत बडा सुधार हो सकता है ।

डब्बे के भीतर का नज़ारा अपेक्षा के अनुरूप ही निकला । आरक्षित यात्रियों का कम से कम दोगुना वे यात्री ठुंसे हुए थे जो वेटिंग टिकट लेकर अपने भारी सामानों , पेटी ,बक्से , गठरी , बोरी , और जाने क्या , बर्थ के नीचे से लेकर ऊपर तक । खैर बिहार और उत्तर प्रदेश के रेल यात्री इस माहौल से खूब परिचित होते हैं । पूछने पर पता चला कि अधिकांश पंजाब से लौट रहे कृषि मजदूर हैं । लगभग अट्ठाईस घंटे के लंबे सफ़र के बावजूद रेल में पैंट्री कार की व्यवस्था का न होना तो नहीं खला , कम से कम मुझे क्योंकि मैं पहले ही देख चुका था और रास्ते के लिए पर्याप्त मात्रा में खाने पीने की वस्तुएं ले चुका था ,मगर डब्बों के शौचालयों में थोडी देर पानी का न होना क्षुब्ध कर गया ।

सफ़र में किताबें और कैमरा दोनों साथ निभाते गए । इस बार सफ़र में काफ़ी कुछ मिला जो मुझे कैमरे में कैद करने लायक लगा , धीरेधीरे आपको दिखाउंगा ......... और मैं तकरीबन रात के ढाई बजे मधुबनी स्टेशन पर उतर चुका था ................

रेल सफ़र में रेल और पटरियों से जुडी कुछ तस्वीरें , आप भी देखिए ........
फ़ैज़ाबाद स्टेशन पर इंतज़ार करती सवारियां

एक ने तो रेल भी पकड ली

ऊपर पूर्वज यात्रा कर रहे हैं और नीचे मानुस

फ़ैज़ाबाद जंक्शन

बलिया छपरा के आसपास खेतों में नीलगाय

नीलगायों का झुंड


क्रमश:

रविवार, 12 जनवरी 2014

यादों का एलबम (ग्राम यात्रा- I)...झा जी कहिन

लहकते खेतों की सुनहरी चमक

लगभग एक साल के बाद मां की पांचवी बरसी के लिए गांव जाने का कार्यक्रम बन गया , वैसे तो मुझ बदनसीब को , बदनसीब इसलिए क्योंकि जितना ज्यादा प्यार और लगाव मुझे ग्राम्य जीवन से था और यही कारण था कि मैं किसी भी बहाने से साल में कम से कम दो बार तो जरूर ही गांव पहुंच जाता था, मगर अब मां बाबूजी के चले जाने के बाद ये तारतम्यता टूट सी गई है , जब भी कोई अवसर मिलता है मेरी भरसक कोशिश होती है कि मैं गांव पहुंच जाऊं मगर ये भी सच है कि अक्सर ऐसा नहीं हो पाता है ।

इस बार की बहुत ही छोटी सी ग्राम यात्रा बहुत सारे मायनों में अलग रही । बहुत कुछ नया , अ्नोखा और रोमांचित करने वाला लगा/मिला । सडकों की दुरूस्त हुई हालत ने न सिर्फ़ सडकों की रफ़्तार बढा दी है , न सिर्फ़ ऑटो टैंपो , रिक्शे , जीप की आवक जावक को बढा कर ट्रेन के आगे के गांव कस्बों तक पहुंच को सुलभ बनाया है बल्कि रातों को हर चौक चौराहे पर जलते बल्ब और सीएफ़एल भी मानो ये बता रहे हैं कि बहुत कुछ बदल रहा है और बहुत तेज़ी से बदल रहा है ।


खेतों में गन्नों , तंबाकू ,और सब्जियों की लहलहाती फ़सल मानो ईशारा कर रही थी कि हम भी अब बदलने को आतुर हैं । जिलों और कस्बों के बाज़ार अब फ़ैलने लगे हैं और उनमें भीड भी अचानक ज्यादा दिखाई देती है । किताबों की दुकानों से लेकर समाचार पत्रों की संख्या में भी बहुत इज़ाफ़ा होता दिखाई दिया है । बीच में अचानक जो शून्यता सी दिखने लगी थी वो अब भरने सी लगी है ।

लेकिन सब अच्छा ही अच्छा हो रहा है ऐसा भी नहीं है , सरकार की अजीबोगरीब नीतियां जिसके कारण आज गांवों के चौक चौराहों पर शराब के अड्डे खुल गए हैं , बडी से छोटी और कच्ची उम्र तक के लोग नशे के आदी बन रहे हैं अब शराब और थैली (कच्ची शराब) ज्यादा आसानी से उपलब्ध कराई जा रही है । तिस पर कमाल ये कि सरकार खुद ऐलान कर रही है कि नशा मुक्त ग्राम को एक लाख रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा । अपराध की बढती घटनाओं ने भी बरबस ध्यान खींचा , सिर्फ़ पांच दिनों के अपने प्रवास में मैंने कम से कम दस बडे अपराधों के बारे में पढा सुना । डकैती , अपहरण और बलात्कार की घटनाओं के अलावा भ्रष्टाचार और उनमें फ़ंसते और धराते अधिकारियों की खबरें भी पढने सुनने देखने को मिलीं । अस्पताल और स्कूल के हालात अब पहले के मुकाबले बहुत बेहतर है । इन सब पहलुओं पर विस्तार से लिखूंगा , और बिंदुवार लिखूंगा ...फ़िलहाल कुछ बेहद खूबसूरत से दृश्य जो मैंने अपने कैमरे में कैद किए , आपके लिए ले आया हूं







खेतों के आसपार विचरते हुए नीलगायों का समूह

नीलगायों ने बेशक कृषकों की मुसीबतें बढाई हैं मगर मेरे लिए तो आकर्षण जैसा था


आंगन में चमकता हुआ सूरज का कतरा बना हुआ गेंदे का फ़ूल
सरस्वती पूजा की तैयारियों में लगा बाज़ार ..खूबसूरत प्रतिमाएं

हरी पीली चादर ओढे हुए धरती


हरी हरी धरती पे पीले पीले फ़ूल

बढती और उगती फ़सल

रेल का लंबा सफ़र

गन्नों की पेराई और बनती गुड की भेलियां

बदलते हुए स्कूल


आगे की पोस्टों में , मैं आपको सिलसिलेवार इस विकास और विस्तार की कहानी सुनाऊंगा ..........
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