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शनिवार, 11 जुलाई 2020

बागवानी के लिए उपयुक्त समय




जो भी बागवानी शुरू करना चाह रहे हैं , यही सबसे उपयुक्त समय है | शुरू हो जाइये और जो भी उगना लगाना चाह रहे हैं फ़टाफ़ट लगा दें | मानसून की बारिश इन पौधों के लिए वही काम करती है जो बच्चों के लिए बोर्नवीटा या हॉर्लिक्स करते हैं |

पौधों को खाद पानी देने का भी यही उचित समय है , अभी बारिश की बूंदों के बीच वे जड़ों और मिटटी में खूब रच बस जाएंगे और और जैसे जैसे धूप नरम पड़ती जाएगी सब कुछ गुलज़ार हो उठेगा |

जिन पुराने पौधों में कलियाँ और नए पत्ते आते नहीं दिख रहे हैं उनकी प्रूनिंग के साथ साथ निराई गुड़ाई भी समय है | मानसून में तो धरती का सीना चीर कर हरा करिश्मा बाहर निकल जाता है तो जैसे ही आप उनकी कटिंग करके छोड़ देंगे अगले महीनों में वे कमाल का रंग रूप निखार लेंगे | जिन्हें गुलाब ,आम ,नीम्बू आदि की कलम लगानी आती है उनके लिए भी यही सबसे उपयुक्त समय है |


धनिया , साग , मेथी आदि को लगाने उगाने से फिलहाल परहेज़ ही करें अन्यथा अचानक कभी भी आने वाले तेज़ बारिश आपकी मेहनत पर पानी फेर देंगे |

शुरुआत में यदि बीज से खुद पौधे उगाने में असहज महसूस कर रहे हैं तो आसपास नर्सरी से लेकर आ जाएं | इस मौसम में बेतहाशा पौधों के अपने आप उग जाने के कारण अपेक्षाकृत वे आपको सस्ते और सुन्दर पौधे भी मिल जाएंगे |

बस....तो और क्या , हो जाइये शुरू अपने आस पास खुश्बू और रंग का इंद्रधुनष उगाने के लिए | कोई जिज्ञासा हो तो बेहिचक कहिये , अपने अनुभव के आधार पर जितना जो बता सकूंगा उसके लिए प्रस्तुत हूँ |

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

नज़रिया देखने का





किसी भी बात ,घटना ,तथ्य के हमेशा ही दो पहलू होते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह आधा भरा/आधा खाली ग्लास देखने वाले के नज़रिये पर निर्भर करता है | वास्तव में भी यही होता है , नकारात्मक नज़रिये वाला व्यक्ति किसी भी बात में ,आलोचना निंदा आरोप का अवसर तलाश ही लेता और सकारात्मक नज़रिये वाला इंसान विपरीत और प्रतिकूल परिस्थतियों में भी उसके अच्छे पहलू को ढूंढ ही लेता है |

आज अवसाद और निराशा की जैसी परिस्थितियाँ बनी हुई हैं उसने पहले ही बहुत अधिक तनावपूर्ण बना रखा है | संवेदनशील इंसानों के लिए ये समय और भी अधिक नाज़ुक हो गया है | गाँव से अत्यधिक प्रेम होने के कारण , और इन दिनों की जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी में मिले अवकाश के कारण भी ,गाँव में बने महादेव के मंदिर के पुनर्निमाण के काम को करवाने की योजना बन गई |

आखिरकार ,शिव मंदिर का सारा काम पूरा हुआ और मन को तसल्ली हुई  कि कम से कम मां बाबूजी की आत्मा आज संतुष्ट हुई होगी और मुझे आत्मिक शान्ति मिली की अब अगले कई दशकों तक वो मंदिर सुरक्षित और संरक्षित रहेगा | किन्तु अचानक ही सब कुछ बदल गया |

गाँव के ही कुछ बच्चों ने आनन् फानन में , मंदिर पर (अष्टजाम ) कीर्तन जो 24 घंटे तक निर्बाध चलता है , के आयोजन का कार्यक्रम बनाया और टेंट बाजे साउंड सिस्टम के साथ तैयारी कर दी | दिल्ली से लेकर गाँव और हर जगह के हालात को देखते हुए , मुझे इस बात की बेहद चिंता हुई कि इस कीर्तन भजन के दौरान कोई गलती से भी या भूलवश भी इस बीमारी में चपेट में आ गया तो सब कुछ बेहद गलत दिशा में चला जाएगा | यही सोच कर मैंने सबको, हालातों को देखते हुए और प्रशासनिक निर्देशों के मद्देनज़र भी. थोड़ी दिन  रुक कर इसका आयोजन करने को कह दिया |

और यही सबसे बड़ा गुनाह साबित हुआ | अष्टजाम कीर्तन भजन का कार्यक्रम तो टाल दिया गया ,मगर इसे दूसरा रुप देकर | ये कह कर कि चूँकि मंदिर का निर्माण बाबूजी द्वारा करवाया गया था या कि उसकी साज़ सज़्ज़ा का काम मेरे द्वारा करवाया गया इसलिए ही मैंने ये कीर्तन रुकवा दिया | और उस समय से लेकर अब तक ये हुआ है , सबने अपने अपने स्तर से बुरा भला कह कर , मुझे कोस कर , मुझे कृतज्ञ किया | मंदिर में लगे ताला चाभी को हटा दिया गया , और वहाँ लोगों ने इसके विरोध में पूजा करना भी छोड़ दिया |

इस पूरे प्रकरण ने मन को बुरी तरह आहत किया और मुझे निराश होकर विवश होकर अब ये सोचना पड़ रहा है कि आखिर गलती कहाँ हुई | मंदिर के काम को हाथ में लेकर उसे पुनर्निर्मित करवाना मेरी गलती थी या गाँव में रह रहे काका काकी ,बूढ़े बुजुर्ग ,बच्चों को इस बीमारी की चपेट में आने से बचाने के लिए कीर्तन के कार्यक्रम आगे टालने के लिए कहना | आत्मा तक बुरी तरह से आहत हुई है , और भविष्य के प्रति अब कुछ भी सोचने के लिए बहुत आशंकित भी |

जो अब तक छूटा हुआ था ,अब वो सब कुछ टूटा हुआ है | सच कहते हैं कि सबसे जीत कर भी इंसान , आखिर अपने और अपनों से ही हार जाता है | हम खानाबदोश हो चुके लोगों को अब अपनी मिट्टी से मोह का भ्रम अपने मन मस्तिष्क से निकला देना चाहिए | साझा इसलिए किया क्यूंकि बिना लिखे रहता तो दो दिनों में फिर से तेज़ी से बढ़ा रक्तचाप अपने भीतर जमा हुए इस दर्द के कारण अपने चरम पर पहुँच जाता |कृपया किसी भी टिप्पणी में किसी को भी दोषी न ठहराएं आप भी | कहा जाता है की इंसान नहीं खराब होता , ये वक्त होता है जो खराब होता है और वो तो खैर खराब है ही | 

शनिवार, 4 जुलाई 2020

मैं किसी को नहीं बख्शता







दिन एक जुलाई समय साढ़े नौ बजे सुबह

दफ्तर के लिए निकलते हुए : " अरे हेलमेट क्यों नहीं लिया आपने ?

नहीं मास्क के साथ उसे लगाने से ये घुटन और बढ़ जाएगी | आज ऐसे ही चलते हैं |

लेकिन मास्क तो जरुरी है और हेलमेट भी , फिर अब तो आदत डालनी ही पड़ेगी | मुझे पड़ गई है न |

नहीं फिर मैं मास्क हटा कर हेलमेट पहन लेती हूँ |

मैं थोड़ा सा ठिठक जाता हूँ | दफ्तर के लिए निकलने का समय हो रहा है |

ठीक है , मास्क पहने रहो आप , हेलमेट नहीं पहनना है तो रहने दो |

दो सवारियां स्कूटी पर बैठ कर दफ्तर के निकल पड़ती हैं |

अरे ये आज इधर किधर से मोड़ लिया ?

उधर सड़क तोड़ रखी है , काम चल रहा है न इसलिए इधर से लिया है |

थोड़ी देर आगे जाते ही सामने ट्रैफिक पुलिस की पूरी टीम हाथ देती है | मैं स्कूटी आहिस्ता कर देता हूँ |

श्रीमती जी ,थोड़ा सा सकपका जाती हैं |

कांस्टेबल नजदीक आते हुए गले में लटका पहचान पत्र और नाम पट्टिका देख कर थोड़ा झिझकते हुए

अरे सर , मैडम को बिना हेलमेट क्यों लिए जा रहे हो आप ?

मैं कुछ कहूं इससे पहले ही श्रीमती जी , :
सर मास्क की वजह से और मुझे थोड़ी घुटन ज्यादा होती है |
जल्दी में निकलना था इसलिए रह गया | आगे से ध्यान रखेंगे पक्का |

पुलिस वाला थोड़ा आश्वस्त सा होता लगता है

मैं : लेकिन अब तो कैमरे में आ ही चुकी है गाड़ी सवारी और अब तो चालान करना ही पडेगा , क्यों हैं न सर ??

जी मैडम जी सर ठीक ही कह रहे हैं ,चालान मैसेज आ जाएगा अपने आप आपके फोन में |

श्रीमती जी भुनभुनाते हुए ट्रैफिक वाले को मन ही मन कोसती हैं | दफ्तर पहुँचते ही " अब बिना हेलमेट नहीं निकलेंगे कभी , बेकार में चालान हो गया |

काम ख़त्म | 24 घंटे में चालान का सन्देश आ जाता है ,1000 रूपए का जुर्माना भरना है |

न तो वो सड़क टूटी हुई थी और न ही रास्ता खराब था , उस नए रास्ते पर ट्रैफिक वाले रहते ही हैं ये सिर्फ मुझे पता था |

कहा न , मैं किसी को नहीं बख्शता , खुद को भी नहीं |

शशशशशश। .......किसी से कहियेगा मत ये बात , मुझे पता है आप नहीं बताएँगे | है न 

रविवार, 24 मई 2020

छत को कैसे बनाएं एक सुन्दर बगीचा


छत पर बनी मेरी वाटिका 


#बागवानीमंत्र

आज बागवानी से सम्बंधित कुछ बेहद साधारण मगर महत्पूर्ण बातें करेंगे |

पहली बात यदि आप बागवानी शुरू करने की शुरुआत करने की सोच रहे हैं या मन बना रहे हैं तो अभी जून तक का समय बिलकुल प्रतिकूल होने के कारण अवश्य ही रुक जाएं | बेशक इस साल बार बार बदलता मौसम और बारिश के कारण कभी कभी थोड़ी बहुत नमी बन जाती है किन्तु अगले दिन निकलने वाली तेज़ धूप आपके नन्हें पौधों के लिए घातक बन जाएगी |

बागवानी शुरू करने से पहले अपने आप से ये जरुर पूछें कि आप बागवानी करना क्यूँ चाहते हैं , शौक के लिए , आपको फूल पसंद हैं , किसी को देख कर ,प्रेरित होकर आपको लगता है की आपको भी बागवानी करनी चाहिए | ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ की यदि इन सारे प्रश्नों में से किसी का भी जवाब आपका दिल ये कह कर देता है की आपको सच में ही फूलों पौधों पत्तियों से स्नेह मुहब्बत है तो ही आप बागवानी शुरू करिए |

माली की सहायता लीजीए , शुरू में आप लगे लगाए पौधे भी ले सकते हैं , बीच बीच में खाद पानी निराई गुडाई के टिप्स भी बेशक और बेझिझक ले सकते हैं मगर भूल कर भी सिर्फ और सिर्फ मालियों के भरोसे ही बागवानी करने कराने की गलती न करें | नहीं इससे आपको बागवानी तो भरपूर होगी आपके आसपास फूल पौधे भी रहेंगे मगर वो फिर आपका एक बेहद महँगा और खर्चीला शौक भर बन कर रह जाएगा |

बागवानी शुरू करने से पहले सोचिए कि आपके पास जो भी जितनी भी जगह उपलब्ध है उसमें आप कैसी बागवानी कर सकते हैं आउटडोर इनडोर , फूलों की ,फलों की ,सब्जियों की आदि आदि | ये सब तय करने के बाद आप एकाग्र होकर उसी की बागवानी करें जो आपके मन स्थान के अनुकूल हो |

सब पौधों को बीजों से उगाने लगाने का हुनर ,  नीम्बू , आम ,संतरे ,अनार ,चीकू  आदि जैसे पौधों और कलम से ही लगाने वाले पौधों को लगाने की कला में पारंगत न होने के कारण ये पौधे मालियों से ही खरीद लें और फिर उन्हें ही देख रेख करके बड़ा करें |

मालियों से पौधे लेते समय ध्यान रहे की आपको कच्चे पौधे लेने हैं और उन पौधों को लेते और लगाते हुए उनकी जड़ें बिलकुल न हिल पायें अन्यथा पौधे कुछ ही दिनों में दम तोड़ देंगे |

पौधों को लगाने के लिए सबसे उपयुक्त समय जुलाई अगस्त का होता है बारिश के इन महीनों में लगाए पौधे बड़ी ही सुलभता से लग और बच जाते हैं |

एक आखरी बात मैं अपने यू ट्यूब चैनल पर "बागवानी करें शहरी किसान के साथ " नाम की एक श्रंखला शुरू करने जा रहा हूँ जो आपकी वीडीयो  के माध्यम से  बताएगी की आपको बिना ज़मीन के बागवानी कैसी करनी है ,कैसे कर सकते हैं और किस किस चीज़ की बागवानी कर सकते हैं |



आइये एक दूसरे के अनुभव से एक दूसरे से सीखें और सिखाएं , आइये प्रकृति को अपनाएं | 

गुरुवार, 21 मई 2020

कोरोना से लड़ें आत्मनिर्भर होकर



पिछले दिनों जब प्रधानम्नत्री महोदय ने ये कहा कि कोरोना के सन्दर्भ में दो बातें जाननी बहुत जरूरी हैं। 

पहली ये कि निकट भविष्य में हम इससे निजात पाने वाले नहीं हैं खासकर जब तक हमारे चिकित्सा अनुसन्धान में लगे वैज्ञानिक चिकित्सक इसके लिए को कारगर टीका दवाई इत्यादि नहीं तलाश लेते। 

दूसरी ये और बहुत जरूरी बात यह कि इस महामारी ने भारत सहित पूरे विश्व को ये सन्देश दिया है कि अब समय आ गया है की व्यक्ति से लेकर समाज और देश तक को अपने कार्य अपने व्यवहार और अपनी जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर होने की और बढ़ना चाहिए।  

इस बीमारी से बचने और बचे रहने के लिए जो सबसे कारगर उपाय है वो है इसकी चपेट में आने से बचने के लिए अपनाई गयी आदतें और सावधानियां और दूसरी है शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को विकसित करना।   

इसी सन्दर्भ में मेरा ये वीडियो आपको बताएगा की कैसे अपने घरों के पौधों के छिपे रामबाण उपाय हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में हमारी सहायता कर सकते हैं।  आप यू ट्यूब पर इस वीडियो को देख कर समझ सकते हैं कि मैं बिना घर से निकले ही कैसे , नीम ग्लोय तुलसी नीम्बू और अदरक आदि के इस्तेमाल से प्रतिरोधी क्षमता की वृद्धि में  कैसे अमृत समान काम करती है ये विधि।  आप भी देख कर मुझे बताएं की आपको कैसी लगी ये आत्मनिर्भर होकर बनाई गयी औषधि 





सोमवार, 18 मई 2020

कोरोना ने दिया नया मकसद





गाँव की एक खुबसूरत भोर 

मैंने अपने जीवन में बहुत पहले ही ये अनुभव कर लिया था कि अपना समाज अक्सर भीड़ बन कर पीछे चलने में ही खुद को सहज महसूस करता है | वक्त ,हालात और परिस्थतियों ने जाने कब मुझे ये विश्वास और ताकत दे दी कि लिखने बोलने कहने और करने में भी मैं पूरी निडरता और से अपना निर्णय लेता गया और अक्सर आगे की पंक्ति या कहूँ की अगुआ बनता गया |


बचपन में ही पड़ी ये आदत बाद में संस्कार में शामिल हो गई | माँ सरस्वती , लक्ष्मी और सबसे अधिक माँ संतोषी की असीम कृपा की त्रिवेणी ने कालान्तर में इसे और भी पुख्ता किया | आज भी कार्यालय तक में अपने सबसे शीर्ष अधिकारियों से मैं पूरी निडरता से वो सब कह जाता हूँ वो कर जाता हूँ जिसकी बाबत बहुत से सहकर्मी सोचने से भी डरते हैं |

पिछले कुछ दिनों में अचानक से शहरों ने मजदूरों के पलायन ने मेरी छठी चेतना को जाग्रत किया और मैंने तुरत फुरत में ग्राम समाज के लिए यहाँ से जो भी जैसे भी संभव था काम करना शुरू कर दिया | सोशल नेट्वर्किंग के जमाने में गाँव में रह रहे बच्चों और युवाओं की मदद और स्नेह से ये बहुत ज्यादा कठिन नहीं था |

गाँव का वो आँगन 
इसका परिणाम ये हुआ है कि पिछले तीन चार दिनों गाँव के विभिन्न क्रियाकलापों से जुड़े समूहों से जुड़ कर बहुत सी जानकारी बातें साझा की बल्कि अपने टोल (गाँव का मुहल्ला ) के लिए खुद ही एक समूह बना कर काम शुरू कर दिया | इस समूह में गाँव के सभी मेरे जैसे प्रवासी बंधु बांधवों को आनन फानन में जोड़ कर हमने एक सूत्र में सबको पिरो दिया।दिल्ली ,कोलकाता ,मुम्बई ,सूरत ,अहमदाबाद आदि तमाम शहरों में रह रहे हम सब एक साथ एक ही समूह में आ गए |


गाँव का तालाब 

गाँव की पुरानी यादों बातों सुख दुःख को साझा करने के अतिरिक्त , तुरंत किये जाने वाले कई महत्वपूर्ण काम और भविष्य में किये जाने वाले कामों की रूप रेखा बनाई जाने लगी | हमारे जनप्रतिनिधियों का भी स्नेह हमसे जुड़ जाने से ये और अधिक सार्थक और उपयोगी साबित हुआ है |

महादेव स्थान 

अब विभिन्न फेसबुक पेज और व्हाट्सएप समूह के माध्यम से न सिर्फ हम पूरी तरह ग्राम समाज के सुख दुख के साझीदार हैं बल्कि कदम दर कदम साथ चल रहे हैं । अगले कुछ वर्षों में गाँव मे बहुत सारे बड़े परिवर्तन के लिए कमर कस कर और प्रति वर्ष एक बड़ी राशि के सहयोग से उसे अमली जामा पहनाने का संकल्प , ने मुझे अब एक नया ही मकसद दे दिया है ज़िन्दगी का ।

महादेव मंदिर में चलता कीर्तन 
                                                                              

मेरे श्रम , अर्थ और समय का बहुत बड़ा हिस्सा अब गाँव को समर्पित होगा । ईश्वर मुझे शक्ति दें ।

मंगलवार, 5 मई 2020

बागवानी के लिए जरूरी है मिटटी की पहचान





#बागवानीमंत्र

पिछली पोस्ट में जब मैंने गमलों के बारे में बताया था तो आप सबने जिज्ञासा की थी कि ,बागवानी के लिए मिट्टी ,कैसी हो ,उसे तैयार कैसे किया जाए आदि के बारे में भी कुछ बताऊँ | कुछ भी साझा करने से पहले दो बातें स्पष्ट कर दूँ , मैं कहीं से भी कैसे भी बागवानी का विशेषज्ञ नहीं हूँ , माली भी नहीं हूँ बिलकुल आपके जैसा ही एक नौकरीपेशा व्यक्ति हूँ दूसरी बात ये कि इसलिए ही मैं आपको अपने अनुभव के आधार पर ही जो समझ पाया सीख पाया हूँ वो बताता और साझा करता हूँ |

तो आज बात करते हैं मिट्टी की | मिट्टी के बारे में जानना यूँ तो आज उनके लिए भी जरूरी है जिन्हें बागवानी में की रूचि नहीं क्यूंकि खुद प्रकृति ने बता दिया है कि हे इंसान तू युगों युगों से सिर्फ और सिर्फ मिटटी का बना हुआ था और मिट्टी का ही बना रहेगा | खैर , तो मिट्टी बागवानी का सबसे जरुरी तत्व है | विशेषकर जब आप शहरी क्षेत्रों में और वो भी गमलों में बागवानी करने जा रहे हैं तो |

बागवानी के लिए सर्वथा उपयुक्त मैदानी यानि साधारण काली मिट्टी होती है | साधारण से मेरा आशय है , जो मिटटी,  बलुई या रेतीली  , कीच , ऊसर , शुष्क , पथरीली ,पीली  आदि नहीं है और जिसमें नमी बनाए रखने के लिए कोई अतिरिक्त श्रम न करना पड़े वो ही साधारण मैदानी मिट्टी है जो कि साधारणतया आपने अपने आस पास के पार्क मैदान और खेतों में देखी होगी | इस मिट्टी में पानी न तो बहुत ज्यादा ठहर कर रुक कर कीचड का रूप लेता है न ही तुरंत हवा बन कर हवा हो जाता है और न ही पानी सूखते ही मिट्टी बहुत कड़ी होकर पत्थर जैसी हो जाती है जिससे की जड़ों में श्वास लेने हेतु पर्याप्त गुंजाईश बनी रहती है |

इससे ठीक उलट कीच वाली में , रेतीली मिट्टी में और शुष्क पीली मिटटी में कुछ विशेष पौधों को छोड कर आपको अन्य कोई भी पौधा लगाने उगाने में बहुत अधिक कठिनाई होगी | बागवानी के प्रारम्भिक दिनों में मुझे खुद इस परेशानी का सामना करना पडा था और मेरे बहुत से पौधे उसी पीली मिट्टी में थोड़े थोड़े दिनों बाद अपना दम तोड़ गए | इसके बाद मुझे यमुना के पुश्ते से वो काली उपजाऊ मिट्टी मंगवानी पड़ी | 

मुझे मिलने वाली आपकी बहुत सारी जिज्ञासाओं के जवाब में मेरा सबसे पहला जवाब होता है गमले और जड़ की फोटो भेजें तो असल में मैं उनकी मिटटी ही देखना चाहता हूँ | यदि मिटटी में कोई गड़बड़ है तो पहले उसी का निदान किया जाना जरुरी है | 

चलिए अब मिट्टी यदि बहुत अच्छी नहीं है तो फिर उसे कम से कम बागवानी के लायक कैसे बनाएं वो जानते हैं | कम गुणवत्ता वाली मिट्टी में , अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी , खाद , कोकोपीट को मिला कर भी उसकी गुणवत्ता को ठीक कर सकते हैं | बस ध्यान रे रखें कि मिट्टी कम से कम उस लायक जरूर बन जाए कि उसमें कम से कम तीन चार घंटे या उससे अधिक नमी जरुर बनी रहे | 

यहाँ मिट्टी की उपलब्धता के लिए जो परेशान हो रहे हों उनके लिए एक जानकारी ये है कि आज सब कुछ , पानी को छोड़कर , अंतर्जाल पर उपलब्ध है , जी हाँ मिट्टी भी | 


अब एक आखिरी बात , मिट्टी को उपजाऊ बनाने का सबसे सरल उपाय और घरेलू भी | चाय की पत्ती जो आप चाय पीने के बाद छान कर फेंक देते हैं उन्हें रख लें | तेज़ धूप में सुखा लें और फिर उन्हें मिक्सी में बारीक पीस कर मिट्टी में मिला लें | फल सब्जियों के बचे हुए छिलके ,गूदे ,बीज आदि को भी आप सुखा कर और पीस कर उनका उपयोग भी आप मिट्टी को ठीक करने में और खाद की तरह ही इस्तेमाल कर सकते हैं | 

मिट्टी की उर्वरा शक्ति को ठीक रखने के लिए गमलों की निराई गुडाई करते रहना बहुत जरूरी है इससे मिट्टी ऊपर नीचे होने से संतुलित रहेगी और साथ ही पौधों की जड़ो तक हवा पानी भी पहुंचता रहेगा | 


मिट्टी से अगर आप इश्क कर बैठे तो फिर पौधे तो यूं ही महबूब हो जायेंगे आपके | अपनी जिज्ञासा आप यहाँ रख सकते हैं , मैं यथासंभव उनका निवारण करने का प्रयास करूंगा | 

शुक्रवार, 1 मई 2020

बागवानी के लिए जरूरी हैं गमले





आज बात करते हैं गमलों की।
बागवानी विशेषकर शहरों में जहां आपको छत पर ,बालकनी में ,सीढ़ियों में और खिड़की पर जैसी जगह ही बड़ी मुश्किल से मयस्सर होती है वहां गमलों में बागवानी ही एकमात्र विकल्प बचता है इसलिए ऐसी शहरी बागवानी में गमलों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
गमलों का आकार प्रकार सिर्फ सिर्फ उसमें लगाए जाने वाले पौधे पर निर्भर करता है। छोटी जड़ वाले पौधे के लिए छोटे और माध्यम आकार के गमले चल सकते हैं किन्तु जिन पौधों की जड़ों को फैलाव की जरूरत होती है उनके लिए निश्चित रूप से माध्यम आकार के गमले ही चाहिए।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि मैंने बड़े छोटे पौधे नहीं कहा है बल्कि कहा है बड़ी जड़ वाले और छोटी जड़ वाले पौधे। मसलन गुलाब के पौधे बड़े होते हैं मगर जड़ छोटी इसलिए छोटे छोटे गमले में भी उग सकते हैं इसके उलट गेंदे फूल छोटे होते हैं मगर रेशेदार जड़ों को फैलाव अधिक चाहिए इसलिए यदि उन्हें आप छोटे गमले में लगा भी दें तो या तो फूल आएंगे ही नहीं या फिर फूल आकर में छोटे आएँगे।
फूलों के गमलों का आकर तो थोड़ा बहुत छोटा बड़ा फिर भी चल सकता है किन्तु फल सब्जी आदि के लिए मध्यम और बड़े आकर का गमला ही जरूरी है नहीं तो फल का आकार छोटा रह जाएगा हमेशा।
गमले मिट्टी के ,प्लास्टिक के ,लकड़ी के और ग्रो बैग भी हो सकते हैं। गमलों का चयन उन्हें रखने जाने वाले स्थान पर भी निर्भर करता है। बस ध्यान ये रखना होता है कि सभी गमलों में पानी की निकासी के लिए निर्धारित छिद्र बना हुआ हो ताकि उसमें पानी न जमा रहे और पौधों की जड़ें अधिक पानी से सड़ न जाएँ।
साग पात धनिया पुदीना मेथी पालक आदि जैसे सब्जियों के लिए चौड़े और कम गहरे गमले का इस्तेमाल किया जाना चाहिए जबकि मिर्च नीम्बू संतरे चीकू अमरूद केले अनार आदि के लिए बड़े और गहरे गमले का प्रयोग उचित रहता है।
गमलों में मिट्टी कभी भी ऊपर से एक दो इंच या तीन इंच तक भी से नीचे ही रहनी चाहिए ताकि पानी डालने के बाद जड़ों तक पहुँच कर सोखने के लिए पर्याप्त पानी व समय मिल सके।
शुरुआत में बागवानी करने वालों को ,बोतलों ,ज़ार ,मग आदि को गमलों में परिवर्तित करके बागवानी में रोमांच के प्रयोग से बचना चाहिए। जब बागवानी में सिद्ध हस्त हो जाएं तो फिर चाहे वे अपनी हथेली पर भी गुलाब उगा लें।
गमलों को मौसम में गरमी सर्दी के अनुसार उनका स्थान भी बदलना जरूरी होता है। इससे एक तो पौधों को अनुकून वातावरण मिल जाएगा दूसरे अधिक समय तक एक स्थान पर पड़े रहने के कारण छत बालकनी आदि में उनसे पड़ने वाले निशान से भी बचा जा सकता है। गमलों के नीचे प्लेट रखना भी इन निशानों से बचाने का एक विकल्प होता है।
किसी भी गमले की उम्र कम से कम चार वर्ष तो रहती ही है बशर्ते कि आपसे भूलवश वो गिर कर टूट न जाए।
आज के लिए इतना ही , आप चाहें तो अपने प्रश्न यहाँ पूछ सकते हैं

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

आकाश वाटिका ; आप भी बनाइये न



कौन सोच सकता था कि किसी छत को यूँ भी सँवारा जा सकता है 

पिताजी मूलतः एक कृषक परिवार से थे इसलिए अपनी फ़ौजी नौकरी के दौरान भी आवंटित फ़ौजी क्वार्टर के अहाते में हमेशा कुछ कुछ उगाते लगाते मैंने उन्हें बचपन में ही देखा था।  ग्रीष्म ऋतु के अवकाशों में गाँव जाकर आम लीची केले के लदे हुए बागान ,तालाब ,नदियाँ ,खेतों ने हमेशा एक सम्मोहन सा जगाए रखा हमारे भीतर।  कालचक्र ने तरुणाई और कॉलेज का सारा समय ग्राम्य जीवन में बिताने का अवसर दिया और मैंने मिट्टी ,पानी ,पेड़ ,पौधों आदि के साथ सहजीवन का अमृत पाठ वहीं बहुत करीब से देखा समझा। 

अध्यन के पश्चात सरकारी सेवा में आने के बाद जो सबसे पहले साथी बने वो थे पौधे और किताबें। स्वअर्जन ने आर्थिक संबलता दे दी थी किन्तु दिल्ली जैसे ईंट पत्थर से बुरी तरह त्रस्त महानगर में स्थान की सीमितिता और किरायेदार के रूप में रहने की विवशता ने बहुत समय तक इन पौधों फूलों से मेरी दोस्ती गमलों तक सीमति रखी।  लगभग पॉंच वर्ष पूर्व जब मैंने दिल्ली में छोटा सा सिर्फ 80 गज़ के क्षेत्रफल का फ़्लैट लिया तो मुझे अपने घर की खुशी उस समय दोगुनी लगी जब छत के सर्वाधिकार के साथ मुझे वो मकान मिला और यहीं से शुरू हुई ये ख्वाबों सरीखी बागवानी करने की कल्पना को साकार करने की प्रक्रिया। 

छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का नैसर्गिक आनंद होता है 

शुरुआत में मिटटी , छत ,मौसम , वानरों के उत्पात आदि ने बहुत बार व्यवधान उत्पन्न किये ,मगर सब धीरे धीरे अपने आप हल होते गए और सिर्फ दस बारह गमलों से शुरू हुई ये बागवानी आज हज़ार से ऊपर पौधों , पच्चीस तरह के फल उतने ही प्रकार की सब्जियों ,सैकड़ों मौसमी व स्थाई फूलों के अनमोल उपहार के रूप में आज मेरे घर के शीर्ष पर विराजमान हैं। घर में बेकार पड़ी चीज़ों ,प्लास्टिक बोतलों , कूलर बेस ,मिक्सी ज़ार , मग सब कुछ धीरे धीरे गमलों का आकार लेने लगे और मैं छोटी से छोटी जगह पर बागवानी कैसे किसकी कब की जा सकती है इन सबमें सिद्ध हस्त होता चला गया।

छत पर बनी मेरी बैठक वाली टेबल 

 कितने ही तरह के पक्षी , छोटे बड़े जीव ,तितलियाँ ,भौरें आदि अपने कलरव से इन्हे और जीवंत किये रहते हैं।  आसपास के पड़ोसी ,मित्र ,सहकर्मी ,बंधु बांधव आदि इससे प्रेरित होकर अपने आसपास को और अपनी आत्मा को हरित करके तृप्त कर रहे हैं तो मेरा सुख द्विगुणित हो जाता है।  पृथ्वी और प्रकृति के बीच जो सेतु है वो इंसान को बना रहना चाहिए।  यही सच है आखिरी सत्य।  बागवानी के विषय में सिर्फ इतना कहूँगा कि किसी भी इंसान को समझने से कहीं आसान होता है पौधों फूलों पत्तियों को समझना।  आप इनसे प्यार करेंगे तो बदले में अपना सर्वाव लुटा देते हैं आप पर।  देर किस बात की है कर डालिये सब कुछ हरा अपनी खिड़की ,बालकनी ,छत ,,मुंडेर सब कुछ हरा करने पर आपकी आत्मा भी हरी भरी होकर तृप्त हो जाएगी। 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

आइये टमाटर उगाते हैं










 आज बात करते हैं टमाटरों की।  आप सबने पिछले कई दिनों में जिज्ञासा ज़ाहिर की है कि टमाटरों के लिए क्या कैसे करना चाहिए तो मैं जो करता हूँ वो आप के साथ साझा करता हूँ। 




टमाटर के लिए आवश्यक 

गमला ; छोटा न हो , माध्यम आकार का हो तो उत्तम और बड़ा हो तो सर्वोत्तम
मिट्टी ; अच्छी हो तो उत्तम और बढ़िया नमी रखने वाली काली मिट्टी हो तो सर्वोत्तम
बीज ; दो तरह के मिलते हैं बाज़ार में ,देसी और हाइब्रिड ,दोनों ही अच्छा काम करती हैं
मौसम ; बहुत अधिक गर्मी और बहुत अधिक सर्दी के मौसम को छोड़कर साल भर


टमाटर के बीजों को छिड़क कर [यदि आपके पास बीजों के  लिए अलग से सीड्स बेड बने हुए हैं तो ] ऊपर से मिटटी की हलकी परत से ढक कर पानी के हलके छींटें मार दें।  यदि सीधा गमलों में ही उगाना चाह रहे हैं तो एक गमले में सिर्फ एक बीज डालें।  ध्यान रहे कि पानी बहुत ज्यादा नहीं डालना है उतना ही कि मिट्टी सूखी भी न रहे और बहुत गीली तो कतई न रहे।  


पौधों के निकलने पर उन्हें सीड्स बेड से सावधानी से बिना जड़ हिलाए गमलों में स्थानांन्तरित कर लें। गमलों में ही हैं पहले से तो फिर जरूरत नहीं है कुछ भी करने की।

पानी देते समय ध्यान ये रखने  की योग्य बात है कि छोटे पौधे बहुत ही नाजुक होते हैं इनके ,तो न तो ये झुकने पाएं न ही इनका शीर्ष मुड़ने पाए। सहारे के लिए छोटी से बेंत ,सींक आदि का इस्तेमाल करने से बेहतर रहता है और पौधे भी सुरक्षित रहते हैं।

40-50 दिनों के अंदर इनकी फुनगी पर पीले फूल चमकने लगेंगे और उसके 7 दिनों के अंदर ही नन्हें टमाटर दिखने लगेंगे।

अब सबसे जरूरी काम ये करना होगा कि इनके शीर्ष को ,और उनको विशेषकर जिन पर टमाटर दिखने लगे हैं उन्हें सावधानी से पतले धागे डोरी आदि से सहारे के लिए लगाई हुई सींक\बेंत आदि से इस तरह से स्ट्रिंग कर दें यानि बाँध दें ताकि टमाटर का भार पड़ने पर भी वो शीर्ष झुक कर टमाटर के विकास को रोक न दे।  




पत्तों के पीले पड़ने के साथ ही हरे टमाटर अपने आप सुर्ख लाल और खाने लायक हो जाएंगे।  टमाटरों को बड़ा ,रसीला रखने के लिए उनकी जड़ों में हमेशा नमी बने रहना जरूरी है किन्तु ये भी सावधानी रखनी जरुरी है कि पानी इतना अधिक न हो कि जड़ ही गलने लगे। 

बस फिर क्या शुरू हो जाइये ,उगाइये अपने हरे और लाल टमाटर। 


रविवार, 19 अप्रैल 2020

ज़िदंगी का फ्लैश बैक देखने को ;चाहिए एक रिवाइंड बटन









कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी ऐसा भी दिन आएगा जब अचानक से कुदरत कहेगी , स्टैच्यू और हम सब ठिठक कर एक जगह रुक जाएंगे जो जहां है वहीं जड़ होकर रह जाएगा।  मैं और मेरी या मेरे से ज्यादा उम्र के सबके पास अपनी बीती हुई ज़िंदगी के एल्बम में से कितनी ही यादें ,कितनी ही बातें सबने अपने ज़ेहन में बसा कर छुपा कर रखी होंगी।  और इससे बेहतर और क्या वक्त हो सकता है उन पन्नों को पलटने का।  देख रहा हूँ मित्र अपनी बरसों पुरानी तस्वीरें ,अपनों के साथ की फोटो यहां अंतरजाल पर साझा कर के सहेज रहे हैं।  अच्छा ही है कल को जब हम न होंगे तो हमारी आने वाली नस्लें ,और उनके बाद वाले भी ये सब यदि बचा खुचा रह गया तो देख पढ़ पाएंगे और कम से कम समझ सकेंगे कि हमने अपनी ज़िंदगी में कौन कौन से रंग देखे थे।

हम बहुत ही खुशकिस्मत रहे हैं ,हम कंचे पतंगों लट्टू , से भी पहले सायकल के पुराने टायर और माचिस की डिब्बी के कवर से ढेरम ढेर खेलने वाली दुनिया से शुरू होकर आज एंग्री बर्ड्स और पब जी तक का सफर तय कर चुकने वालों में से रहे हैं। ये हम ही हैं जिसने दुनिया में रेडियो ,टीवी ,फ्रिज ,कुकर ,स्कूटर ,कंप्यूटर ,मोबाईल को अवतरित होते देखा है और जाने अभी और क्या क्या देखेंगे।  तो हम तो बहुत सारे मायनों में एकमात्र ऐसी नस्ल रहे और रहेंगे जिन्होंने दुनिया में वो देखा और देख चुके जो कल के इतिहास में किसी अजूबे से कम नहीं होगा।

मुझे याद है बाबूजी के साथ गर्मियों की छुट्टियों का वो कोयले के इंजन वाली रेल में किया हुआ साधारण डब्बों का यादगार सफर जब रास्ते में माँ के हाथ के बने भरवां करेले और पराठे के साथ सुराही का मीठा पानी कई दिनों के लम्बे रेल के सफर को भी ज़िंदगी के कुछ अनमोल दिनों में बदल देता था। मुझे याद है गाँव का वो कच्चा घर जहां दादी हमारे पहुँचते ही जाने क्या क्या मीठा खाने को और शरबत लेकर दालान पर ही अपना स्नेह लुटाने चली आती थी और मिनटों में ही पूरा टोला हमें देखने खैरियत पूछने चला आता था।


मुझे याद है सरस्वती पूजा , दुर्गा पूजा ,इंद्र पूजा ,जन्माष्टमी में लगने वाले वो छोटे छोटे मेले और उनमें गोले में पार्ले जी के बिस्किट को फंसाना ,गेंद मार कर स्टील के भारी ग्लास गिरा कर तालियाँ बटोरना ,मुझे याद है गाँव की काली पूजा में खेले गए नाटक में अभिनय करने वाले हम कुल 16 युवकों में अपने द्वारा निभाया गया  युवती का एक अकेला किरदार।  मुझे याद है गाँव की वो सत्यनारायण भगवान की पूजा में चावल और केले का मिलने वाला चौरठ प्रसाद भी और गाँव में केले के पत्तों पर खाए गए भोज भात का स्वाद भी।

मुझे याद है तीसरी कक्षा के दोस्त संजय सुथार के लखनऊ के तोपखाना बाज़ार में स्थित स्टूडियो के सामने की वो किताबों की दूकान जिसमें ऊपर रखी हुई ज्योमेट्री बॉक्स को स्कूल से आते जाते निहारना। मुझे याद है मेरे स्कूल में आने वाले जादू दिखाने वाले और स्कूल के रास्ते में कभी भालू कभी बन्दर और कभी सपेरे के इर्द गिर्द गोल खडी भीड़ में खुद को खड़ा देखना।  मुझे सर्कस याद है ,पटना जंक्शन से स्टीमर पकड़ कर गंगा पार करना भी याद है। मधुबनी रेलवे जंक्शन से गाँव तक ले जाने वाला ताँगा भी और दादी गाँव से मौसी के गाँव तक जाने वाली बैलगाड़ी भी। 


मुझे याद है मौसियों के साथ उनकी उंगलियां थामे पूरे ननिहाल के एक एक घर आँगन का चक्कर भी जिसमें जाने कितने प्यार करने वाले हाथ आशीर्वाद देने वाले हाथ एक साथ उठ जाते थे और बस माँ का नाम लेकर कहते ये निर्जला के बेटे हैं न। 

क्या क्या याद करूँ , आँखों के आँसू इस यादों के एलबम को बार बार धुँधला कर दे रहे हैं।  लेकिन मैं फिर लौटूंगा बार बार लौटूंगा इस एल्बम को लेकर इसके रंगों को लेकर ताकि मेरे जीवन का ये इंद्रधनुष उगता रहे हर दिन उगता रहे।




बुधवार, 15 अप्रैल 2020

चीन को दण्डित किये जाने की तैयारी




इस बीच खबर ये आ रही है कि , नराधम ,कृतघ्न ,लालची और महास्वार्थी धूर्त देश चीन के विरुद्ध विश्व भर के देश लामबंद हो रहे हैं . अंतर्राष्ट्रीय अदालत में अब तक अलग अलग कुल सात देशों ने वाद संस्थापित कर दिए हैं और अमेरिका ब्रिटेन जापान दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने चीन को स्पष्ट सन्देश देने शुरू कर दिए हैं |

उधर चीन भी अपनी आदतों के अनुरूप इस बीमारी के उद्भव ,प्रसार और उसमें उसकी अपनी कारगुजारियों को छिपाने की भरसक कोशिश कर रहा है | इससे जुडी तमाम जानकारियाँ ,चिकत्सकों की रिपोर्ट ,वैज्ञानिकों के शोधपात्र पर यथासंभव पाबंदी लगा कर अपने चिर परिचित चरित्र को उजागर कर रहा है |

यह सही मौक़ा है ,इस #चायनीज़वायरस से उबरने के बाद समूचे विश्व को इस धूर्त बदमाश अपराधी देश को सामाजिक आर्थिक रूप से बिलकुल अलग थलग कर देना चाहिए | ऐसे में स्वाभाविक रूप से बड़े बाज़ार और बड़े कामगार क्षेत्र के लिए पूरे विश्व के पास सबसे बेहतर और सबसे पहला विकल्प भारत होगा |

आज जिस तरह से इस महामारी की दवाई को पूरे विश्व को उपलब्ध करवाने में भारत पूरी दुनिया के बड़े से बड़े ताकतवर विकसित देश से लेकर छोटे देश तक का तारणहार बना हुआ है उससे भी एक बार फिर भारत की छवि तारणहार की और विश्व के अगुआ की बन गई है | ऐसे में पूरे विश्व का विश्वास पूरे विश्व का यकीन अपने आप ही भारत पर बन गया है |

इस महामारी से निपटने के बाद भारत को अपने आर्थिक संकट से निकलने के लिए भी निश्चित रूप से इन स्थितियों का लाभ मिलेगा बशर्ते कि शुरू से ही गणित में कमज़ोर (यूँ भी कमज़ोर गणित वाले दिल से काम लेने वाले होते हैं और लाभ हानि से ऊपर सिर्फ दिल से ही सोचते करते हैं ) , इस सरकार के पास तब तक कोई बेहतरीन और सटीक विकल्प मिल जाए |

जो भी हो चीन को मानवता के विरुद्ध किये जा रहे इस अपराध के लिए पूरे विश्व द्वारा जलालत के साथ साथ दण्डित किये जाने की भी जरूरत है | इसके अतिरिक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे तमाम वैश्विक संगठनों को भी उनके गैर ज़िम्मेदार रवैये के लिए भरपूर लानत मलामत की जानी चाहिए |


शनिवार, 11 अप्रैल 2020

आउटडेटेड हो गई क्या ब्लॉगिंग ??







अभी 1 मार्च को विख्यात ब्लॉगर दीदी रेखा  श्रीवास्तव जी द्वारा ब्लॉगरों के अधूरे सपनों को शब्दों के ताने बाने में बुनकर पुस्तक के रूप में संकलित कर प्रकाशन किये जाने और उसे पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने का अनौपचारिक कार्यक्रम जब भाई राजीव तनेजा (यहाँ बिना संजू भाभी संजू तनेजा जी ,के ज़िक्र के ये बात कभी मुकम्मल नहीं हो सकती ) द्वारा शब्दों की दुनिया के दोस्तों के लिए उपलब्ध कराए गए एक प्लेटफॉर्म पर बना तो बहुत बार मेरे ऐसे किसी कार्यक्रम में शिरकत किये जाने का टाल मटोल भी ख़त्म सा हुआ और ऐसा संयोग बना की मैं देर से ही सही उस कार्यक्रम में अपनी उपस्थति दर्ज़ करवा पाया।  

मेरे पहुँचने तक क्या कैसे हो चूका था ये तो मैं नहीं जान पाया हाँ गंतव्य स्थल तक पहुँचने के लिए भाई राजीव तनेजा  जी से फोन द्वारा दिशा निर्देश लेते रहने के कारण वे तो अगुवाई करते पहले ही मिल गए। आदतन मैं आजम से सबसे पीछे बैठ कर सारा ज़ायज़ा लेने लगा। दीदी रेखा श्रीवास्तव आज के कार्यक्रम की शो स्टॉपर थीं सो एक एक आने जाने वाले पर उनकी नज़र थी।  



पोडियम पर रंजना जी , जिनसे मेरी पहली मुलाक़ात थी ,अपने रेडियो प्रस्तोता होने के कारण बहुत अधिक दक्षता से कार्यक्रम का कुशल संचालन करती दिखीं और वहीँ  हमारे सुपर स्टार ब्लॉगर ,डॉ टी एस दराल सर , भाई खुशदीप सहगल जी ,शाहनवाज़ जी ,दिगंबर नासवा जी आदि विराजे हुए थे। नज़रें घूमी तो भाभी संजू तनेजा ,दोस्त ब्लॉगर वंदना गुप्ता ,नीलीमा शर्मा ,मुकेश सिन्हा जैसे सितारे भी अपना नूर बिखेरे हुए थे। दीदी रेखा श्रीवास्तव जी के परिवार व समस्त बन्धुगण भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हुए सबको तसल्ल्ली बक्श सुन रहे थे। 

रंजना जी सबको एक एक करके आमंत्रित कर रही थीं और साथी ब्लॉगर अपने ब्लॉगिंग के अनुभवों को साझा करते चलते जा रहे थे। मुझे सालों पहले होने वाली ब्लॉग बैठकों की याद आने लगी थी। भाई खुशदीप सहगल जी ने शुरआती दिनों की ब्लॉगिंग के दिलचस्प किस्सों को साझा करते हुए बहुत से रोचक किस्से सुनाए ,चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी जैसे संकलकों की चर्चा ,उन पर चली खींचतान आदि की बाबत बातें हुईं। 



भाई शाहनवाज़ हुसैन जो अभी हमारीवाणी संकलक के संचालन का कार्य देख रहे हैं उन्होंने भी तकनीकी बातों के साथ ब्लॉगजगत के अनुभव साझा किये। दराल से ने अपने हर दिल अज़ीज़ अंदाज़ से सबको गुदगुदा दिया तो वहीँ नासवा जी ने बताया की कैसे उन्होंने कभी भी अपने ब्लॉग पोस्ट की रफ़्तार को थमने नहीं दिया। 

मुकेश सिन्हा जी ने अपने ब्लॉग्गिंग के सफर की दास्ताँ सुनाते हुए ,भाई संजय भास्कर जी का उनकी रोचक व नियमति टिप्पणियों का उल्लेख किया तो राजीव तनेजा जी ने बताया की कैसे ब्लॉगिंग ने उनकी साहित्यिक और व्यंग्य लेखन के प्रति उनकी रूचि को अंजाम तक पहुंचाने में मदद की। 

हमारी महिला ब्लॉगर में दोस्त वंदना गुप्ता जो अब एक ब्लॉगर से कहीं आगे जाकर विख्यात लेखिका बन चुकी हैं उनहोंने न सिर्फ अपने ब्लॉग लेखन के अनुभव साझा किए बल्कि ब्लॉगिंग में एक सशक्त और नियमित संकलक की जरूरत और उसके लिए कुछ किए जाने की जरूरत की ओर सबका ध्यान दिलाया। उनका साथ सिया नीलीमा शर्मा जी ने और उन्होंने भी अपने ही अंदाज़ में सबके साथ अपने अनुभव साझा किये। विख्यात ब्लॉगर कवियत्री साहित्यकार मित्र सुनीता शानू जी ने भी अपने मुस्कराहट के साथ ब्लॉगिंग के अनुभव को साझा करते हुए पुराने दिनों को याद किया साथ ही ये भी कि बेशक इसकी गति नए प्लेटफॉर्म्स के आने से थोड़ी सी कम हो गई है किन्तु उन्हें विशवास है कि सब कुछ पहले की तरह ही रफ्तार में आ जाएगा।  

दीदी रेखा श्रीवास्तव जी ने बताया की कैसे उन्हें ये ब्लॉग जगत एक परिवार की तरह अपने मोह में बांधे रखा कर ये भी कि बहुत से अन्य ब्लॉगर के सपनों को शब्द देकर अधूरे सपनों की कसक का दूसरा भाग भी वे लेकर आएंगी।  

मैंने ब्लॉगिंग के शुरआती दिनों , ब्लॉग जगत की बढ़ती हलचल ,ख्याति से न्यू मीडिया का दखल और प्रभाव उसे बाँधने की कोशिशें ,समयांतराल पर उसमें आई मंथरता , एक बेहतरीन संकलक की जरूरत आदि पर अपने विचार रखे।  बीच में ताऊ ,उनकी पहलेयाँ ,चिट्ठा चर्चा , बेनामी ,ब्लॉग वकील आदि के रोचक किस्से भी सामने आए 

रंजना  जी के कुशल मंच संचालन के कायल मुझ सहित वहाँ उपस्थित सभी साथी हुए। 

इसके उपरान्त पुस्तक के लोकार्पण ,उसकी चर्चा और गरमा गर्म भोजन के साथ भी आगे का कार्यक्रम बदस्तूर चलता रहा।  निःसंदेह ऐसे कार्यक्रम ,ऐसे बहाने ,नई ऊर्जा का संचार कर न सिर्फ ब्लॉगिंग बल्कि हम ब्लोगर्स में भी नई स्फूर्ति का संचार करते हैं।  



मुझे उम्मीद थी की पहले की तरह इस ब्लॉग बैठकी की भी रिपोर्ट लिखने के बहाने कुछ नई पोस्टें और बातें हमें और तमाम साथियों को भी मिल जाएंगी ,मगर ऐसा हुआ नहीं , और ये प्रश्न पुनः सर उठाए इधर उधर घूमता फिर रहा है कि -आउटडेटेड हो गई क्या ब्लॉगिंग  ?? इसका उत्तर हमें और आपको तलाशना है और करना भी कुछ नहीं है सिर्फ इसके सिवा कि नियमित अनियमति होकर भी ब्लॉग पोस्ट लिखते रहना है और ब्लॉग पोस्ट पढ़ते रहना है। 

रविवार, 29 मार्च 2020

महामारी में महातमाशा





पहला दिन : बंदी से पहले और बंदी वाले पहले दिन लोगों ने दुकानों पर                         मेला लगाया
दूसरा दिन : दूसरा दिन ,पुलिस ने उठक बैठक करवाते मुर्गा बनाते ,लाठी                     भाँजते करतब दिखाया
तीसरा दिन : मीडिया ने अचानक ही लोगों को भूखे मरते तड़पते बिलखते                     वाला तमाशा दिखाया
चौथा दिन :   आखिरकार जनता ने भी सब कुछ भूल भाल कर सड़कों पर                     आकर मजमा लगाया |

लब्बो लुआब ,ये देश ,प्रशासन ,व्यवस्था ,सरकारें ,स्वयं सेवक और सबसे अधिक आम लोग अभी तक भी किसी भी कैसी भी आपदा से निपटने की तैयारी ,बचाव आदि तो दूर अभी तक किसी को भी आपदा के समय किये जाने वाला व्यवहार और सचेतता का भी पता नहीं है |

पश्चिम के देश जो भौगोलिक परिवेश के कारण भारत से कहीं अधिक भयंकर प्राकृतिक आपदाएं झेलते हैं बार बार भुगतते हैं ,मगर हर बार सबक सीख कर अगली आपदा के लिए खुद को और पूरे समाज को भी तैयार करते हैं | बावजूद इसके कि उन  देशों में तकनीक और संसाधन की प्रचुर सुलभता के बावजूद वे कभी लापरवाह या उपेक्षित नहीं होते | इसके ठीक उलट भारतीय अवाम ऐसे समय भी अपने उद्दंड स्वभाव और व्यग्रता तथा अशिक्षा के कारण ,प्रशासन व सरकार द्वारा की गयी थोड़ी बहुत की गई तैयारियों को भी पलीता लगा देते हैं |

वर्तमान में सिर्फ दो ही सूरतों में इस महामारी के बड़े प्रकोप से बचने की संभावना है | पहली ये कि सैकड़ों लाखों के इस समूह में मरीज़ और पीड़ित की संख्या नगण्य हो या बहुत ज्यादा कम हो | आगे जाकर समाज में घुलमिल कर उसे और अधिक विकराल रूप में पहुंचाने से पहले ही इनकी जांच व् पहचान सुनिश्चित करना |

दूसरी ये कि फिलहाल मौसम में जो अनिश्चितता बनी हुई है वो स्थिर होकर ,सामन्यतया इस ऋतू के औसत तापमान और उससे अधिक तक जितनी जल्दी से जल्दी पहुँच सके तो इसके प्रसार की रफ़्तार और ज़द में थोड़ी मंथरता आने की संभावना है |

ये देश हमेशा से भागवान भरोसे ही छोड़ा जाता रहा है ,भगवान भरोसे ही चलता रहा है और भविष्य में भी इस स्थिति में कोई बहुत बड़ा फर्क आएगा ऐसा लगता नहीं है | आने वाले सात दिनों में स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगी कि हम खराब से उबर कर सब ठीक होने की हालात में जाएंगे या इससे भी बदतर हालातों में पहुंचेंगे |





रविवार, 1 मार्च 2020

ब्लॉगरों के अधूरे सपनों की कसक -किताब के बहाने ब्लॉग बैठक (ब्लॉग बैठक रिपोर्ट )





मुद्दतों बाद ही सही ब्लॉगर किसी न किसी बहाने अब आपस में रूबरू होने का सिलसिला शुरू कर चुके हैं | अभी कुछ दिनों पूर्व ही हिंदी ब्लॉगजगत के सुपर स्टार समीर लाल समीर उर्फ़ उड़नतश्तरी अमेरिका से जब अपनी सर ज़मीन पर आए तो सबसे पहले आदतन ब्लॉगर मित्रों के बीच ही नुमायेदार हुए | ब्लॉगिंग की धीमी होती रफ़्तार और ब्लॉगर द्वारा ब्लॉग लेखन के प्रति आया उपेक्षा का भाव अदि को लेकर समय समय पुराने नए ब्लॉगर कई तरह के नए नए विचार और प्रयासों पर काम करते रहते हैं | 

पिछले दिनों ऐसी ही एक मुहिम ​"ब्लॉगिंग की ओर वापस चलें " बड़े जोर शोर से शुरू किया गया था ताकि बिलकुल शून्यावस्था को पहुंचती जा रही इस विधा को यूं दम तोड़ते हुए नहीं छोड़ा जाना चाहिए | पिछले अन्य प्रयासों की तरह ये प्रयास भी बहुत अधिक रंग नहीं ला सका हालांकि इसने मुझ सहित बहुत सारे ब्लॉगर को दोबारा अपने अपने ब्लॉग की सुध लेने को प्रेरित तो किया ही | 

इस बीच रेखा श्रीवास्तव जी ने बहुत सारे ब्लॉगर से उनके जीवन में ऐसे सपने जिन्हें पूरा न कर पाने की कसक उनके मन में रह गयी हो उसे लिपिबद्ध करके प्रेषित करने का आग्रह किया | सबने उसमें अपनी यादों को अपनी लेखनी में पिरो कर उनके हवाले कर दिया जिसे रेखा जी के सम्पादन में एक खूबसूरत किताब की शक्ल दिया गया जो अब पाठकों के बीच पहंच चुकी है | 

अब चूँकि मामला ब्लॉगर का था ब्लॉगर के सपनों का था इसलिए सभी  ब्लॉगर मित्रों का एक साथ होना स्वाभाविक था | आज भाई राजीव तनेजा जी द्वारा निर्मित और उपलब्ध , साहित्य ,ब्लॉग्गिंग ,लेखन ,पठन को समर्पित स्थान पर जुटे ब्लॉगर , उनके बीच हुआ मंथन विमर्श और "अधूरे सपनों की कसक" पर पूरी रिपोर्ट पढ़वाता हूँ आपको जल्दी ही तब तक इन तस्वीरों का आनंद उठाइये 
























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