इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

सोमवार, 31 मई 2010

आज लिखी पढी गई कुछ पोस्टें (पोस्ट झलकियां )

 

 

 

बीबीसी हिंदी ब्लोग में आज हफ़ीज़ चाचड कहते हैं …

हफ़ीज़ चाचड़ हफ़ीज़ चाचड़ | सोमवार, 31 मई 2010, 09:52

टिप्पणियाँ (2)

शनिवार को कराची प्रेस क्लब गया तो वहाँ मेरे कुछ पत्रकार मित्र हिंदी और उर्दू भाषा के बीच हुए विवाद पर चर्चा कर रहे थे. मैंने कहीं पढ़ा था कि अमरीका में हिंदी पढ़ाने वाले एक अध्यापक घूमते घूमते दिल्ली से सड़क के रास्ते लाहौर पहुँच गए थे.

जब वो वाघा सीमा पार कर पाकिस्तान पहुँचे तो किसी व्यक्ति ने उनसे कहा, "आप तो ज़बरदस्त उर्दू बोल रहे हैं." "अच्छा! यह तो हिंदी है." अध्यापक ने कहा. उस व्यक्ति ने कहा, "नहीं यह उर्दू है." अध्यापक जी ने सोचा कि सीमा के उस पार यह भाषा हिंदी बन जाती है जबकि सीमा के इस पार यानी पाकिस्तान में उन्नीस बीस के अंतर के साथ उर्दू.

लेकिन लरकाना (सिंध प्रांत का शहर) के एक मेरे मित्र हमेशा कहते हैं कि हिंदी और उर्दू के विवाद ने वास्तव में ही हिंदुस्तान पर बंटवारा कर दिया था. टोबा टेक सिंह के सरदार भूपेंद्र सिंह जो आजकल अमृतसर में रहते हैं, उन के अनुसार वह बंटवारा तो पहला था और अब कुछ और बंटवारे भी शेष हैं.

सच बात तो ये है कि 62 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी बात से बात बनती नहीं बल्कि बिग़ड़ती ही चली जाती है. इतिहास भी कमाल की चीज़ है जिसकी गंगा उलटी बह निकली है. कल तक वह लोग जो युद्ध की बात करते थे वह आज अमन की आशा की माला जपना चाहते हैं. पाकिस्तान में कई लोग अमन की आशा को आशा भोसलें समझते हैं.

 

नवभारत टाईम्स ब्लोगस में लिखते हुए भाई आलोक पुराणिक अपने चिरपरिचित अंदाज़ में लिखते हैं कि ,

image

शाम ढले उपयुक्त राहजनी

आलोक पुराणिक Monday May 31, 2010

अखबारों में हाल में कई खबरें पढ़ीं, जिनके शीर्षक थे- कनॉट प्लेस में दिनदहाड़े वारदात, आनंद विहार में दिनदहाड़े लूट, श्रेष्ठ विहार में दिनदहाड़े राहजनी।

खबरें और शीर्षक पढ़कर लगा कि जैसे आपत्ति दिनदहाड़े पर थी।

मतलब यह मानकर चला जा रहा है कि लूटपाट दिन या दिनदहाड़े में नहीं होनी चाहिए। ऐसे कार्यों के लिए शाम और रात का समय उपयुक्त है।

मसलन नॉर्मल खबरें ये होंगी -

शाम ढले माल रोड पर चार राहजनों ने नॉर्मल तरीके से राहजनी की। लुटने वाले बंदे ने पूरी शराफत से वारदात में सहयोग करते हुए अपना पर्स और घड़ी राहजनों के हवाले कर दी। अत्यधिक ही कम श्रम में यह नॉर्मल काम फुल नॉर्मलत्व के साथ संपन्न हो गया।

 

श्री एम वर्मा जी ने एक झकझोर देने वाली रचना पेश की है देखिए ….image

इस शहर को फख़्र है बड़प्पन का ~~

Posted by M VERMA Labels: चित्रकथा, बचपन

कूड़े के ढेर से जीवन चुनता है

दिन भर खुद का बोझ ढोता है

इस शहर को फख़्र है बड़प्पन का

उफ ! यहाँ तो बचपन ऐसे सोता है

image

 

जागरण जंक्शन ब्लोगस पर

हास्य-व्यंग्य

*************************************************
Munna_circuit 01महीने का पास
कॉलेज के पहले दिन प्रिसिंपल बच्चों को स्पीच दे रहे थे और उन्हें हॉस्टल के नियम बता रहे थे.

प्रिसिंपल : अगर कोई लड़का पहली बार लड़कियों के हास्टल में पकड़ा गया तो उसे 300 रूपये, अगर दूसरी बार पकड़ा गया 500 रूपये और तीसरी बार पकड़ा गया उसे 800 रूपये जुर्माना देना पड़ेगा.

मुन्ना भाई : महीने भर के पास का क्या लेगा मामू ?
********************************************************

 

दिल्ली यात्रा 3... मैट्रो की सैर एवं एक सुहानी शाम ब्लागर्स के साथ.......!

खुशदीप भाई के यहां से विदा लेते समयअविनाश जी ने फ़ोन पर बताया कि आज वे दांतों की दुकान में जाएंगे इसलिए विलंब हो जाएगा। अगर दिल्ली में कहीं घुमना हो तो बताएं। मैने कहा कि आप दांतों की दुकान से हो आएं फ़िर आपसे सम्पर्क करता हुँ। अविनाश जी ने दांत में नैनो तकनीकि से युक्त एक मोबाईल फ़ोन आज से लगभग सात वर्ष पूर्व लगवाया था, अब उसकी बैटरी खत्म हो गयी थी, इसलिए लगातार वह चेतावनी दे रहा था कि बैटरी बदलिए। इससे उनके दांत में दर्द हो जाता था। दर्द की टेबलेट तो वे साथ रख रहे थे। जब भी दर्द होता तभी एक टेबलेट उदरस्थ कर लेते। मोबाईल के नैनो जरासिम शांत हो जाते कि बैटरी बदलने वाली है, आश्वासन मिल गया है। लेकिन जब बैटरी नहीं बदली तो उनका उत्पात बढ गया इसलिए तत्काल प्रभाव से बैटरी बदलवाने जाना पड़ा। डॉक्टर ने भी बता दिया कि दो-तीन बैठक में ही बैटरी बदलने का काम होगा।

 

Monday, May 31, 2010

ये प्रतिभाशाली बच्चे घटिया निर्णय क्यों लेते हैं?

आजकल इण्टरमीडिएट परीक्षा और इन्जीनियरिंग कालेजों की प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित हो रहे हैं। इण्टर में अच्छे अंको से उत्तीर्ण या इन्जीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंक से सफलता हासिल करने वाले प्रतिभाशाली लड़कों के फोटो और साक्षात्कार अखबारों में छापे जा रहे हैं। कोचिंग सस्थानों और माध्यमिक विद्यालयों द्वारा अपने खर्चीले विज्ञापनों में इस सफलता का श्रेय बटोरा जा रहा है। एक ही छात्र को अनेक संस्थाओं द्वारा ‘अपना’ बताया जा रहा है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा चरम पर है। इस माहौल में मेरा मन बार-बार एक बात को लेकर परेशान हो रहा है जो आपके समक्ष रखना चाहता हूँ।

 

Monday 31 May 2010

ये ओढ़निया ब्लॉगिंग का दौर है गुरू......ओढ़निया ब्लॉगिंग.....समझे कि नहीं........सतीश पंचम

       आज कल ओढ़निया ब्लॉगिंग की बहार है। ओढ़निया ब्लॉगिंग नहीं समझे ? तो पहले समझ लो कि ओढ़निया ब्लॉगिंग आखिर चीज क्या है ?
   कभी आपने गाँव में हो रहे नाच या नौटंकी  देखा हो तो पाएंगे कि नचनीया नाचते नाचते अचानक ही किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।

 

एक भारतीय रेस्टरान्ट और एक अँगरेज़ पंडित

मैं लन्दन के जिस इलाके में रहती हूँ, वो शहर से काफी दूर है.हमारे कॉलोनी में एक लोकल इंडियन रेस्टरान्ट खुला अभी पिछले सप्ताह.पुरे लन्दन में तो भारतीय रेस्टरान्ट तो भरे पड़े हैं.हमारे एरिया में जो रेस्टरान्ट खुला, उसके जो मालिक हैं वो भी पटना के ही रहने वाले हैं.हम लोग हमेशा अपने पटनिया भाषा में ही बातें करते हैं.
मैं जब पहुची उस रेस्टरान्ट के उदघाटन में तो देखा की पुरे पटनिया अंदाज़ में पूजा हो रहा था.एकदम हर कुछ अपने जगह पर.लगिये नहीं रहा था की हम लन्दन में रह रहे हैं.हंसी तो तब आ गयी जब देखा की जो पुजारी थें उनका एक असिस्टन्ट था. असिस्टन्ट होना या रखना कोई ज्यादा ताज्जुब की बात नहीं लेकिन एक भारतीय पंडित का असिस्टन्ट अँगरेज़ हो तो थोड़ा अजीब तो लगेगा ही न.वो हिंदी भी अच्छी खासी बोल ले रहे थे, इसलिए थोड़ा और ताज्जुब हो रहा था, वैसे लन्दन में आजकल मैं ऐसी घटनाएँ देखते रहती हूँ..उनको पूजा करवाते देख अच्छा तो लगिये रहा था लेकिन हंसी भी बीच बीच में आ जा रही थी.

 

गांव वाली पोस्ट की टिपण्णीयों के जबाब अन्तिम भाग image

Blogger Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
इत्शे डंके! धन्यवाद!
अनुराग जी Danke, दांके कहते है धन्यवाद को, जर्मन मै D को दा बोलते है.
********Blogger *******************
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
सुंदर गांव है। अभी घूम रहे हैं। आप ने हमारी बहुत दिनों की इच्छा पूरी की है। गांव के कुछ लोगों को भी साथ के साथ मिलाते जाते तो और अच्छा लगता।
दिनेश जी यह बहुत कठिन है, क्योकि यहां लोग बहुत अलग तरह के है, मिलन सार है अच्छे है, लेकिन जब भी कभी कोई मोका मिला तो अपने साथियो की ओर गांव वासियो की फ़ोटो अपने साथ जरुर लगाऊंगा.
********************************
Blogger Sanjeet Tripathi said...
ghum raha hu aapke sath hi aapke gaon me,
shukriya, lekin ek bat bataiye har sadak karib karib sunsan hi dikh rahi hai,aisa kyn?
संजीत जी यहां लोग बहुत कम घर से निकलते है, पहले पहल हम भी हेरान होते थे, देखते थे कोई सडक पर नजर आये अब हम भी घर से बहुत कम निकलते है, महीने मै एक दो बार खरीदारी कर ली, फ़िर सारा दिन घर मै, शहरो मै बाजारो को छोड कर बाकी जगहा यही हाल है, लेकिन टुरिस्ट स्थानो पर खुब रोनक होती है
*********************************************

ब्लोगिंग से कमाई तो होने से रही ... काश ज्ञानेश्वरी एक्प्रेस में ही रहे होते ...

AUTHOR: जी.के. अवधिया | POSTED AT: 10:37 AM | FILED UNDER: कमाई, ब्लोगिंग, हिन्दी ब्लोगिंग

एक आदमी वो होता है कि काल का ग्रास बन जाने जैसे हादसे का शिकार होकर भी रुपया कमा लेता है और एक हम हैं कि ब्लोगिंग कर के कुछ भी नहीं कमा सकते। दो-दो लाख रुपये मिल गये ज्ञानेश्वरी एक्प्रेस में मरने वालों के परिवार को किन्तु यदि ब्लोगिंग करते हुए यदि हम इहलोक त्याग दें तो हमारे परिवार को दो रुपये भी नसीब नहीं होगे।
हम पहले भी कई बार बता चुके हैं कि नेट की दुनियाँ में हम कमाई करने के उद्देश्य से ही आये थे और आज भी हमारा उद्देश्य नहीं बदला है। पर क्या करें? फँस गये हिन्दी ब्लोगिंग के चक्कर में। याने कि "आये थे हरि भजन को और ओटन लगे कपास"। इस हिन्दी ब्लोगिंग से एक रुपये की भी कमाई तो होने से रही उल्टे कभी-कभी हमारा लिखा किसी को पसन्द ना आये तो चार बातें भी सुनने को मिल जाती हैं। अब कड़ुवी बातें सुनने से किसी को खुशी तो होने से रही, कड़ुवाहट ही होती है।

 

सोमवार, ३१ मई २०१०

ब्लॉग जगत की लीला है अनुपम अपरम्पार

ब्लॉग जगत की लीला है अनुपम अपरम्पार
क्यों हम दांव पेंच में पड़ रहे,
बस, अब नहीं पड़ेंगे,
लिखते रहेंगे,  उमड़ते घुमड़ते विचार
क्योंकि.......
शब्द सँवारे बोलिए शब्द के हाथ न पाँव
एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव
सुप्रभात व जय जोहार.........

प्रस्तुतकर्ता सूर्यकान्त गुप्ता

 

MONDAY, MAY 31, 2010

मनमोहन ने गिलानी को आमों कि टोकरी भेजी,देखिये ,गिलानी ने क्या कहा?

image

Posted by IRFAN

 

MONDAY, MAY 31, 2010

रूसवाई

रूसवाई
बड़े बेरहम होते हैं रूसवाई के रास्ते,
वो खोज रहा है अपनी रिहाई के रास्ते
एक जोश  था अजीब जुनूँ था उसे परवाज़ का,
न जुर्रत कर सका देखे तमाशाई के रास्ते
एक मज़बूत क़फ़स में सिमट गया है जिस्म उसका,
जौफ में ढून्ढता है वो तवानाई के रास्ते

 

Monday, May 31, 2010

क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---विश्व तम्बाकू रहित दिवस पर एक रचना ----

लोकोपयोगी व्याखानमाला के उद्घाटन पर बाएं से --डॉ एन के अग्रवाल -अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षिक , डॉ ओ पी कालरा -प्रधानाचार्य यू सी एम्एस , श्री जयदेव सारंगी --स्पेशल सेक्रेटरी , डॉ भट्टाचार्जी --निदेशकस्वास्थ्य सेवाएँ , और डॉ एस द्विवेदी --विभाग अध्यक्ष काय चिकित्सा ।

क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---

आज विश्व भर में विश्व तम्बाकू रहित दिवस मनाया जा रहा है। क्यों न जो लोग धूम्रपान करते हैं , आज के दिन प्रण करें कि आज के बाद वो कभी धूम्रपान नही करेंगे। दिल्ली जैसे शहर में जहाँ प्रदूषण पर तो नियंत्रण किया जा रहा है, वहीं धूम्रपान पर अभी तक विशेष प्रभाव नही पड़ा है।

 

आज के लिए इतना ही ……….

मंगलवार, 18 मई 2010

सिर्फ़ नाम की "हाऊसफ़ुल" : फ़िल्म समीक्षा , एक आम दर्शक की नज़र से




अभी कल परसों ही फ़ैमिली जिद पर अड गई कि पिक्चर देखने जाना है, मुझे सिर्फ़ फ़रमान सुनाया जाता है , पूछा नहीं जाता , सो सब के सब चल दिए , देखने , टिकट मुझे पहले ही लाना पडा , और इसके बाद जुल्म ये कि अगले ढाई तीन घंटे तक पूरी पिक्चर को भी झेलना पडा । बस उसी क्षण निर्णय ले लिया कि , मैं भी बदला ले ही लूंगा और जाकर एक समीक्षा तो जरूर ही लिखूंगा , वो भी अपने दर्शक अंदाज़ में , तो देखिए और पढिए , वैसे लब्बो लुआब ये कि पिक्चर हाऊसफ़ुल से ज्यादा तो "राजनीति "के प्रोमो ने ही प्रभावित किया


आज दर्शक यदि मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने जाता है तो कम से कम इतना तो चाहता ही है कि जो भी पैसे टिकट के लिए उसने खर्च किए हैं वो यदि पूरी तरह से न भी सही तो कम से कम पिक्चर उतनी तो बर्दाश्त करने लायक हो ही कि ढाई तीन घंटे बिताने मुश्किल न हों । साजिद खान ने जब हे बेबी बनाई थी तो उसकी बेशक अंग्रेजी संस्करण के रीमेक के बावजूद उसकी सफ़लता ने ही बता दिया था कि दर्शकों को ये पसंद आई । और कुछ अच्छे गानों तथा फ़िल्म की कहानी के प्रवाह के कारण फ़िल्म हिट हो गई । साजिद शायद इसे ही एक सैट फ़ार्मूला समझ बैठे और कुछ अंतराल के बाद , उसी स्टार कास्ट में थोडे से बदलाव के साथ एक और पिक्चर परोस दी । मगर साजिद दो बडी भूलें कर बैठे इस पिक्चर के निर्माण में , पहली रही कमजोर पटकथा , कमजोर और मजबूत तो तब कही जाती शायद जब कोई पटकथा होती , दूसरी और फ़िल्म के न पसंद आने की एक वजह रही , बिल्कुल ही बेमजा गीत संगीत ।


बहुत कम ही पिक्चर ऐसी होती है जिसमें पहले ही दस मिनट में वो दर्शकों, को बांध कर रखने लायक दृश्य उपस्थित कर पाती हैं ,और इसी तरह कुछ पिक्चरें पहले दस मिनट में ही दर्शकों का मन उचाट कर देती हैं। फ़िल्म की शुरूआत कब हुई और अंत कब हुआ ये तो जब निर्देशक ही तय न कर पाए तो दर्शक की क्या बिसात । पूरी फ़िल्म एक ही शब्द "पनौती " के इर्दगिर्द घूमती है । इस शब्द का अर्थ वास्तव में क्या होता है ये तो नहीं पता मगर दर्शकों को भी देख कर यही लगता है जब मकाओ , और लंदन जैसी जगहों पर भी पनौती हो सकते हैं तो फ़िर भारत में ऐसा क्यों नहीं दिखता कहीं ।

फ़िल्म एक बेहद ही थके हुए बुझे हुए और शिथिल सा चेहरा बनाए व्यक्ति की है जो सिर्फ़ किस्मत का रोना रहता है । बावजूद इसके , दोस्त और उसकी पत्नी का बहुत सारा नुकसान होने के , आराम से किसी करोडपति व्यावसायी की बेटी से शादी हो जाने के , इसके बाद फ़टाफ़ट पत्नी का अलग हो जाना, दूसरी प्रेमिका का समुद्र के अंदर से निकल कर बाहर आ जाना , और तमाम मुश्किलों के बाद और प्रेमिका के कडक भाई की लाई डिटेक्टर के बावजूद उसे अपनी प्रेमिका मिल जाती है , हां नौकरी का फ़िर भी कोई पता नहीं और पनौती का लेबल लगा रहता है या हट जाता है ये तो साजिद खान के अलावा और कोई जान नहीं पाता


अभिनय के मामले में , बेशक अक्षय ने अपनी हंसोड छवि से परे हटकर खुद को पेश किया है मगर लगता है कि उनके चिपके बालों के साथ वाला लुक भी उनकी छवि को चिप्पू सा ही छोड गया है । रितेश खुद को रिपीट करते ही लगते हैं और शायद इसमें वे स्वाभाविक से ही दिखते हैं । लारा जहां रितेश से बडी दिखीं हैं वहीं दीपिका खूबसूरत तो दिखी हैं , मगर पूरी फ़िल्म में यदि एक भी दृश्य में पूरे कपडे पहने हुए दिख जाती तों शायद कुछ अलग टेस्ट भी मिलता । इनके अलावा , बहुत समय बाद पर्दे पर दिखाई देने वाले रणधीर कपूर , के अलावा , छोटी भूमिकाओं वाले सभी कलाकार जैसे चंकी पांडे, जिया खान , अर्जुन रामपाल , बोमन ईरानी आदि ने अपनी भूमिका को रूटीन अंदाज़ में ही निभाया है । वैसे ऐसी कहानियों में अभिनय क्षमता दिखाने की गुंजाईश जरा कम ही रहती है । पिक्चर में तीन जीव तोते, शेर और बंदर , फ़िल्म के प्रोमो में देखने में जितने असरदार लग रहे थे उतने ही बेकार पिक्चर में देखने में लगे । कुछ दृश्य जरूर ही हंसाने वाले रहे हैं । गाने सभी भी बेस्वाद , और जबरन सुनाए जैसे लगे । "तुझे हैवेन दिखाऊंगी "जैसे गानों को जहां वाहियात गानों की श्रेणी में रखा जा सकता है तो वहीं फ़ुल वोल्यूम में गाये गाने , "वोल्यूम कम कर " बस एवें ही था । जो गाना थोडा बहुत पसंद किया जा रहा है वो भी रिमेक ही है "अपनी तो जैसे तैसे कट जाएगी " । विदेशी लोकेशन्स पर शूट करने में जितना मजा कलाकारों को आया होगा उतना ही कैमरे को भी आया है , फ़ोटोग्राफ़ी सुंदर बन पडी है । कुल मिलाकर ऐसी फ़िल्मों के लिए आपको ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पडता है क्योंकि येकुछ दिनों में ही , ये किसी किसी चैनल पर दिखाई जाएगी

शनिवार, 15 मई 2010

जाने क्या क्या पढ गया , जो पढा सब यहां धर गया …(पोस्ट झलकियां)

 

 

 

पहले नवभारत टाईम्स ब्लोग से देखिए कि, 

जो है सो है

होमवर्क खरीदने का जमाना

राजेश कालरा Friday May 14, 2010

मेरा आम तौर पर यह प्रयास रहा है कि मैं ब्लॉग के लिए ऐसे टॉपिक उठाऊं जो हमें, यानी आम लोगों को प्रभावित करे। मुझे यह लगता है कि इससे कहीं न कहीं थोड़ा असर जरूर पड़ता है। पर शायद ही मैंने कभी किसी विषय पर इतने उत्तेजित मन से कभी कुछ लिखा है, जैसा कि इस पोस्ट में लिखा है।

यह पोस्ट मैंने उस पैम्फलेट से प्रेरित होकर लिखा है, जो आज सुबह मेरे अखबार से बाहर आ गिरा। इसपर एक नजर डालें और खुद आप जान जाएंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूं।

किसी के भी मन में इस बारे में शायद ही कोई संदेह हो कि हम सुविधाओं के गुलाम बन गए हैं। आप अपने आस-पास नजर डालिए और आपको पता चल जाएगा कि मेरा मतलब क्या है। खाना, कपड़ा, यात्रा, पढ़ाई-लिखाई, पज़ल सुलझाना और यहां तक कि खेल भी... सबके लिए क्विक-फिक्स समाधान चाहिए। कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और उपकरणों के आ जाने से इस ट्रेंड में और अधिक इजाफा ही हुआ है।

 

बीबीसी हिंदी ब्लोग्स से

मुकेश शर्मा मुकेश शर्मा | बुधवार, 12 मई 2010, 14:57 IST

ट्वेन्टी-20 विश्व कप में भारत की हार पर हो रही हाय-तौबा को देखते हुए मैंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के उपाध्यक्ष और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में प्रभाव रखने वाले माननीय शरद पवार जी को एक खुला पत्र लिखने का फ़ैसला किया है.

आदरणीय शरद पवार जी,

आप जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की कमान सँभालने वाले हैं और क्रिकेट में.... नहीं-नहीं क्रिकेट के प्रशासन में जिस तरह का भारत का रुतबा है उसे देखते हुए मैं खेल में कुछ बदलाव की ज़रूरतों की ओर आपका ध्यान खींचना चाहूँगा.

भारत की एक अरब से अधिक की आबादी क्रिकेट के प्रति दीवानी है और अपना सब काम-धाम छोड़कर क्रिकेट में लगी रहती है, ऐसे में उसकी भावनाओं का ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए.

- भारत के खिलाड़ियों को आईपीएल के तुरंत बाद हो रही प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने पिछले साल इंग्लैंड और इस साल वेस्टइंडीज़ जाना पड़ा. इस तरह की यात्राओं से टीम थक जाती है. इसके अलावा इन देशों से कहीं ज़्यादा दर्शक स्टेडियम में भारत में पहुँचते हैं इसलिए विश्व कप जैसी प्रतियोगिताएँ अब से सिर्फ़ भारत में ही कराई जाएँ तो अच्छा रहेगा.

 

जागरण जंक्शन से :-

 

हनुमान रास्ता भूल गए    

पोस्टेड ओन: May,13 2010 हास्य - व्यंग में

 

return-of-hanuman-launch-indiaज्ञानी सिंह की जेल में राम लीला हो रही थी. सुबह हवलदार बेवकूफ सिंह परेशानी में ज्ञानी सिंह के पास गया और बोला- सर कल रात कैदियों ने जेल में रामलीला की थी.
जेलर- तो इसमें इतने परेशान क्यों हो, यह तो बड़ी अच्छी बात है?
हवलदार- सर वह तो ठीक है लेकिन जो कैदी  हनुमान बना था  वह अब तक संजीवनी लेकर वापस नही आया है.

 

image

Wednesday, May 12, 2010       

पाकिस्तान का देशप्रेम, वो भी चुराया हुआ!!!

Youtube वेबसाईट के बारे में आप सब जानते होंगे। बड़ी अच्छी साईट है। कभी भी कोई भी गाना सुनना हो आराम से खोजें ओर बेफिक्र होकर सुने। ऐसे ही कई गाने, खासकर पुराने गाने सुनने का शौक़ीन हूँ। जब भी मन करता है Youtube पर जाता हूँ और गाने सुन भी लेता हूँ। एक रात यूँही बैठे-बैठे देशभक्ति का जज्बा दिल में उबाल मारने लगा। बचपन में स्कूल में स्वतंत्रा दिवस ओर गणतंत्र दिवस के दिन कई गाने गाया करता था। उनमे से जो मेरा सबसे प्रिय गाना था वो था, जागृति फिल्म का 'आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ झांकी हिन्दुस्तान की।' उस रात भी इसी गाने की खोज में मैं Youtube पंहुचा। गाने को खोजा और उम्मीद मुताबिक़ तुरंत मिल भी गया। एक गाने की लिंक भी साथ में आ रही थी। गाना थोडा अटपटा लग रहा था इस लिए उसकी तरफ भी मुखातिब हुआ। वही संगीत और हुबहू वैसे ही बोल, फर्क सिर्फ इतना कि उस गाने में सैर पाकिस्तान की हो रही थी। माथा ठनका। फिल्म का पता किया तो मालूम हुई की 'बेदारी' नाम की एक फिल्म पाकिस्तान में बनी थी 1957 में जो बिलकुल 'जागृति' को उठा कर उर्दू में बनाई गयी एक फिल्म थी।

 

Wednesday, May 12, 2010  को अंतर्मन पर एक कविता

बुनियादें बदल गईं

तुमने कहा के
करनी है कुछ बातें -
कहते हो कि
अब तुम नहीं जवाबदेह
अपने रिश्ते की
बदल गईं बुनियादें बेतरतीब
क्या करूँ नई शुरुआत
जब पुरानी बातें ही
ख़त्म न हो पाईं
अच्छा है के
न हो वो आखरी मुलाक़ात
न तुम्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा
न हमें होना पड़ेगा जवाबदेह
के हम तुम्हारे
क्यों न हो सके.

 

Wednesday, May 12, 2010

 पार्ट टाइम टूर्नामेंट ! !         मस्तान सिंह की कूची से

और ये आउट !!

Posted by Mastan singh

 

बुधवार, १२ मई २०१०

 मेरे हाल चाल ………..कैसे हैं पढिए प्रतूल से

आज गुप्पा हो गया
................ मैं फूलकर इतना
............................लगने लगा भय
.......................................नोक से.
आसमान में उठा
................ मैं ऊलकर इतना
.......................... भगने लगा हय*
.................................... शोक से.
साथ तेरे थक गया
................ मैं झूलकर इतना
........................... जगने लगा मैं
................................... झोंक से.
उर को सभी कुछ दे दिया
.................. है मूल-कर इतना
.......................... ठगने लगी वय*
..................................... थोक से.
आप आते हो नहीं
................... मुँह खोलकर अपना
............................... पगने लगी लय
......................................... कोक* से.
हय — घोड़ा;
वय — आयु;
कोक — काम-वासना.

प्रस्तुतकर्ता PRATUL

 

Wednesday, May 12, 2010 आलोक मोहन नायक पूछते हैं ,कि ,

क्या आपको याद आती हैं हाथ में पंखा लिए दादी-नानी। मैंने आज इनवर्टर ले लिया।

मुझे यकीन है। आपको याद होगा। कैसे कुछ सालों पहले तक जब हम अपने घरों में थे। कैसे हमारी दादी। कभी नानी। हाथ में पंखे लेकर डुलाया करती थी। कैसे वह ततुरी वाली गर्मी उस पंखे की हवा में काफुर हो जाती थी। छत पर सोते हम और बहुत देर तक नहीं आती थी नींद। गर्म हवा भी आधी रात तक चला करती थी। और ऐसे में ही हमारी दादी के बुढ़े हो चले हाथ लगातार चलते रहते थे। पंखा हिलाते रहते थे। उस समय यह भी था। दादी के सबसे नजदीक सोने के लिए भी तिकड़म भिढ़ानी पड़ती थी। वजह साफ थी जो दादी के पास सोएगा। वही सबसे ज्यादा पंखे की हवा का मजा उठा पाएगा। हांलाकि दादी इस बात का ध्यान रखती थी। कि हवा सबको बराबर मिले। उस हवा में कहानी बोनस होती थी। और दादी बीच बीच में ठोकती भी रहती थी। कि नींद जल्दी आ जाए। लेकिन हम तो अब दिल्ली में हैं।और मशीनों के सहारे जिंदगी काटते हैं। हर काम के लिए एक नई मशीन चाहिए हमें। कभी कभी लगता है कि शायद हम खुद भी तो एक मशीन ही बन गए हैं।

 

शुक्रवार, १४ मई २०१० दिवाकर मणि सूचित कर रहे हैं कि ,

मौत से जूझते एक ब्लॉगर को जरुरत है आपके शुभकामनाओं की..

ब्लॉगर मित्रों,

हमें पता होता है कि जीवन का हर क्षण बड़ा ही परिवर्तन भरा होता है, लेकिन उसे यथावत्‌ स्वीकारना कितना कठिन होता है, इससे आज मैं दो-चार हूं। मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि जिसे हम कुछ घंटों पूर्व तक हँसते-मुस्कुराते देख रहे हैं, वो हमारे सामने जीवन को वापस पाने के लिए मृत्यु से संघर्षरत है। आज मैं बहुत ही ज्यादा दुःखी हूँ। मेरे कार्यालय सहकर्मी “राघवेन्द्र गुप्ता” जिन्होंने कुछ माह पूर्व ब्लॉग की आभासी दुनिया में “ओज-लेखनी” नामक ब्लॉग के साथ कदम रखा है, तीन दिन पहले सुबह-सुबह अपने कमरे में अचानक चक्कर खाकर गिर पड़े। सिर के पिछले हिस्से में अंदरुनी गहरी चोट लगने के कारण तुरंत ही बेहोश हो गए। कार्यालय के एक साथी के पास तुरंत ही उनकी श्रीमती जी का फोन आया। फोन सुनते ही आनन-फानन में तुरंत ही कुछ कार्यालय-सहकर्मी उनके निवास पर जाकर वहां से एक निजी क्लिनिक ले गए, जहां उनका प्रारंभिक इलाज आरंभ हो गया। रात्रि तक उनके हालात में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ तो सहकर्मी-गण उन्हे लेकर पुणे के एक दूसरे प्रतिष्ठित चिकित्सालय में ले गए।

 

तुकबंदी-शोभना 'शुभि'      image

आज सोचा थोड़ी तुकबंदी कर ली जाये, तो पढो मेरी तुकबंदी
१. दुनिया बदल जाएगी
पर न बदलेगा

सवाल जवाब का सिलसिला

अगर ख़तम हो गया ये
तो रुक न जाएगी
आने वाली नई दुनिया

२. दुनिया चलती है जब हम चलते है
दुनिया रूकती है जब हम रुकते है
हमारा है ही कुछ अंदाज़ ऐसा कि
जो हम चाहें वो मुट्ठी में कैद कर लेते है

(ये ख्याल काफी लिखा जा चुका है, फिर भी ये मेरे मन में आया तो लिख डाला, वैसे भी तुकबंदी ही तो की है )

 

Thursday, May 13, 2010

 

 

आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (समापन किस्त ) …… रश्मि रविजा

शची के यहाँ से निकला....निरुद्देश्य सा इधर उधर भटकता रहा थोड़ी,देर...कुछ लोगों से बातें  की...मन में भले ही झंझावात चल रहें हों..पर प्रोफेशनल ड्यूटी तो निभानी ही है...जिस काम के लिए आया है,उसे तो अंजाम देना ही है.....भले ही दिल के  अंदर अरमानों की मौत हुई हो...पर नए विचार,आलेख के जन्म लेने के लिए तो जमीन तैयार करनी ही होगी.
थक हार कर गेस्ट हाउस लौटा. और प्रोफेशनल चोला उतार कर फेंकते ही एकदम कमजोर पड़ गया. सोचने लगा,किस मुहूर्त में यहाँ आने का फैसला लिया. कम से कम इतने दिनों, शची से मिलने की उम्मीद पर जिंदा था...अब तो वो भी गयी. पर शची के मन में भी क्या कोई भावना सर नहीं उठा सकी?.कैसे भूल गयी वह ,सबकुछ?..और एक वो है,उन्हीं दिनों की याद को सारी ज़िन्दगी भेंट कर दी. पर शची क्या सचमुच भूल गयी है?..फिर कैसे,जब वह 'कणिका ' को नहीं याद कर पा रहा था तो बड़ी गहरी मुस्कराहट के साथ बोली थी, "कभी तो तुम्हारी बड़ी गहरी छनती थी उस से " इसका अर्थ है,वह भूली नहीं है कुछ. फिर इस अभिनय का क्या अर्थ है? आखिर किस बात से बचना चाहती है?

 

इरफ़ान जी ने गडकरी पर कुत्ते छोडे …image

 

Thursday, May 13, 2010

'कुत्ते' भड़के गडकरी पर!

 

 

Friday, May 14, 2010

शुद्धतावादियों, आंखे खोलो…

भाषायी शुद्धतावाद के समर्थकों को इस बात का गुमान भी न होगा कि हिन्दी में बेरोजगार शब्द का कोई प्रचलित विकल्प ही नहीं है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली, अंग्रेजी आदि भाषाओं से आकर हिन्दी में घुलमिल गए हैं और हम उनके साथ देशी बोलियों के घुले-मिले शब्दों जैसा ही बर्ताव करते हैं। कभी एहसास नहीं होता कि कुछ सौ साल पहले तक ये हमारे पुरखों के लिए अजनबी थे। साबुन के लिए हिन्दी में ढूंढे से कोई दूसरा शब्द नहीं मिलता। इसी तरह शर्त लगाने के लिए क्या हिन्दी के पास कोई आसान सी अभिव्यक्ति है? चाय पीने के लिए जिस पात्र का हम प्रयोग करते हैं उसके लिए फारसी मूल से प्याला, प्याली ( फारसी में पियालः) जैसे शब्द हिन्दी में बना लिए गए हैं मगर क्या हिन्दी में इनका कोई आसान विकल्प नजर आता है? सर्वाधिक लोकप्रिय जो शब्द इस संदर्भ में याद आता है वह कप है जो अंग्रेजी का है। संस्कृत का चषक शब्द जरूर हमारे पास है मगर वह ग्रंथों में है, दिल, दिमाग और जबान पर उसका कोई स्पर्श अब बाकी नहीं रहा। बोलचाल में सिफारिश ही की जाती है, शुद्धतावादियों के अनुशंसा जैसे शब्द से कलम को तो कोई परहेज नहीं पर जबान को जरूर है। अपने दिल से पूछ कर देखिए। शुद्धतावाद दरअसल एक किस्म की कट्टरता है जिससे न समाज का कल्याण होना है, न भाषा का और न ही साहित्य का। भाषा का भला होता है तभी संस्कृति भी समृद्ध होती है।

 

कबाड्खाने में आज पढिए

Thursday, May 13, 2010

कि जंगल आज भी उतना ही ख़ूबसूरत है

वेणु गोपाल (२२ अक्तूबर १९४२ - १ सितम्बर २००८) के निधन के बाद हमने वीरेन डंगवाल का एक मार्मिक संस्मरण यहां लगाया था. वेणुगोपाल बड़े कवि थे - आदमी की पक्षधरता और सतत उम्मीद उनकी कविताओं की ख़ासियत हैं. उनकी एक कविता प्रस्तुत है:

 

Friday 14 May 2010 जानिए आजकी कानूनी सलाह   image

ससुर पुलिस में हैं, क्या वे मुझे झूठे मुकदमे में फँसा सकते हैं ?

श्री शैल पूछते हैं ......


मेरी शादी मई 2003 में हुई थी और मेरी पत्नी मार्च 2004 से उस के मायके में रहती है। पहले नौ माह के दौरान वह मेरे पास दो माह भी नहीं रही है। एक सप्ताह वह हमारे पास रहती और दो माह उस के मायके में रहती। हम अभी तक चार बार लेने जा चुके हैं, लेकिन वह वापस नहीं आती। मेरे ससुर पुलिस विभाग में हैं। वे हम को झूठे केस में फँसाने की धमकी दे रहे हैं। हमारे घर में मेरे माता-पिता और मेरा छोटा भाई है जिस की शादी 2005 में हो चुकी है और एक बच्चा भी है। मेरी पत्नी कहती है, तुम्हारे माता-पिता से अलग रहो तो मैं तुम्हारे पास रहूंगी।  मेरी पत्नी कोई भी वजह बता कर मुझे माता पिता से अलग रहने की कहे तो क्या मुझे जाना पड़ेगा? वह पिछले छह वर्ष से मायके में रह रही है। मैं ने पिछले वर्ष धारा-9 की अर्जी कोर्ट में प्रस्तुत की है। क्या वे लोग मुझे झूठे मुकदमे में फँसा सकते हैं?

 

आज कौन कहां छपा

 

14 May 2010

राष्ट्रीय सहारा में 'हक़ बात'

8 मई 2010 को राष्ट्रीय सहारा के स्तंभ 'ब्लॉग बोला' में हक़ बात करते हुए कोडरमा की निरूपमा का सबक

 

Friday, May 14, 2010

एक जादुई गोली के पचास साल

राजकिशोर
उस गर्भनिरोधक गोली को, जिसे अंग्रेजी की दुनिया में पिल कहते हैं, आधिकारिक मान्यता मिले हुए पचास साल हो गए। यह अवसर खुशी मनाने का है। स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधरों को कुछ खास खुशी होनी चाहिए, क्योंकि पिल ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है। अगर पिल न होता, तो यौन क्रांति भी न होती। यौन क्रांति न होती, तो स्त्री स्वतंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते।
बेशक यह जादुई गोली उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना पेनिसिलिन का आविष्कार, जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में एक चमत्कार का काम किया। पिल का महत्व एसपिरिन या पैरासिटामोल जितना भी नहीं है। लेकिन ये दवाएं हैं। पिल कोई दवा नहीं है। वैसे गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार भी स्त्रियों में बांझपन का इलाज खोजने की प्रक्रिया में हुआ था। आज भी पिल का प्रयोग कई स्त्री रोगों का इलाज करने के लिए होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह गर्भनिरोधक की तरह ही प्रयुक्त होता है और गर्भाधान कोई बीमारी नहीं है। लेकिन अनिच्छित गर्भाधान एक बहुत बड़ी समस्या जरूर है, जिसके कुफल स्त्री को ही भुगतने पड़ते हैं। कहा जा सकता है कि उसके लिए तो यह बीमारियों की बीमारी है। पिल ने उन्हें सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। इस मायने में यह छोटी-सी गोली जितनी जादुई है, उतनी ही क्रांतिकारी भी।

बस जी आज तो इतना ही पढा…………

रविवार, 9 मई 2010

"ब्लोग बोलता है" : ब्लोग + रेडियो : व्हाट एन आईडिया सर जी !


कल जब इस पोस्ट पर भाई खुशदीप ने टिप्पणी की कि , क्या मैंने कभी रेडियो प्रसारण सेवा में हाथ आजमाने की नहीं सोची तो मुझे बताना पडा कि एक दशक पहले जब मेरा अंतरिम चयन पटना औल इंडिया रेडियो के लिए समाचार वाचक /अनुवादक के पद पर हुआ था , मगर अंतिम चयन नहीं हो पाया । इसी तरह बैठे बैठे अचानक एक धमाकेदार ख्याल आया जिसपर यूं तो मैंने बात आगे बढा दी है , मगर सोचा कि आप सबकी राय भी लेता चलूं ।


तो आईडिया ये है कि , ब्लोग पोस्टों की , ब्लोग पर हो रही दिलचस्प बहसों की , ब्लोग पर लिखी जा रही कविताओं ,गज़लों,शेरों, कहानियों और सभी कुछ को रेडियो कार्यक्रमों के साथ जोडा जाए तो । हालांकि इस विषय पर कुछ न कुछ तो रेडियो पर होता ही रहता है । जैसा कि एक वर्ष पहले रेडियो जर्मनी हिंदी सेवा ने ब्लोग्गिंग पर एक प्रस्तुति भी की थी । और इतना ही नहीं एफ़ एम रेडियो के उदघोषक भी अपने कार्यक्रमों में अपने ब्लोगस की चर्चा करते रहते हैं । इसके लिए फ़िलहाल तो मैंने सभी हिंदी प्रसारण सेवाओं को पत्र लिख कर आग्रह किया है कि यदि ऐसा संभव हो सकता है कि ऐसे किसी कार्यक्रम की शुरूआत ,की जा सकती है तो मैं खुद ही इसे तैयार करके भिजवा सकता हूं । अन्यथा ये बडी आसानी से खुद उनके प्रसारक कर सकते हैं ।


इसके साथ ही ये योजना भी है कि सभी एम एम रेडियो चैनलों से भी आग्रह किया जाएगा कि वे जब भी किसी सामयिक विषय पर कोई कार्यक्रम कर रहे होते हैं तो इन ब्लोग पोस्टों में कही गई बातों को बहसों को और टिप्पणियों का भी उपयोग कर सकते हैं


तो तैयार हैं आप सब रेडियो ब्लोग्गिंग के लिए ........................................
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Google+ Followers