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गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

आओ बात करें ............१

कार्टून गूगल से साभार


इस पोस्ट के साथ ही मैं चुनाव पूर्व एक आम आदमी के रूप में , अपने विचार यहां बांटता जाऊंगा , मेरी कोशिश होगी कि बात उन पांच राज्यों के बहुत ही बडी जिम्मेदारी उठाने वाले साथियों के साथ अन्य दोस्तों के लिए भी एक सलाह और विमर्श के रूप में सामने आए । विश्व की राजनीति बहुत तेज़ गति से बदल रही है और देश बदलता है नागरिकों की सोच बदलने से । देश पिछले साठ बरसों से एक ही करवट पर है और बहुत गहरी नींद में था , अब ज़रा सा खटका हुआ है और करवट बदलने का वक्त है । चुनाव से पहले तक अब इस ब्लॉग पर बातें होंगी , बहस होगी , सिर्फ़ इस बात पर कि लोकतंत्र में हम कहां हैं , हम कौन हैं । इसलिए अबसे रोज़ यहां आओ बात करें ............................................

आओ बात करें ......१

देश को इस साल क्या मिला , और क्या नहीं मिला ये तो भविष्य के दिनों में ही ठीक ठीक फ़ैसला हो सकेगा , किंतु इतना तो यकीनन तय है कि ये फ़र्क अब आ चुका है कि , देश के सबसे बडे रुतबे , ओहदे और पद वाला व्यक्ति भी जबरिया एक ठेलागाडी वाले को ये समझा नहीं सकता कि कि उसके लिए सोचने करने का अधिकार उसके ही पास है , और ठेलागाडी वाले के पास सिर्फ़ एक रास्ता है , वो है मान जाने का । अब लोगों को बहुत अच्छी तरह से पता है कि पांच वर्षों में एक बार पूरी लकदक और सपनों के सौदागरी रूप को लेकर उनके बीच आने वाले का कर्म और धर्म चुनाव जीतते ही कैसे बदल जा रहा है । और उस पर तुर्रा ये कि , वे उलट कर जनता को ही आंखें दिखा रहे हैं , चोप्प अब जब तुमने ये अधिकार हमें दे दिया है तो फ़िर चोप्प करके उस अधिकार का उपयोग होता देखो । हम जैसा जो भी बनाएंगे वो जाहिर है कि जनता की सोच , उनकी काबलियत , उनकी ईमानदारी से बेहतर ही होगा ।


वर्ष २०११ के लिए यदि ये बात विस्फ़ोटक रही है कि बरसों से जंग खा रहा जनांदोलनी स्वरूप एकाएक जाग गया , और अब जबकि वर्ष २०१२ के लिए पहले ही ये माना और कहा जा रहा है कि ये महाप्रलय का वर्ष होगा तो फ़िर भला इससे बेहतर वक्त और क्या हो सकता है भारतीय जनतंत्र की व्यवस्था को ठोक पीट कर सही करने का । पूरा विश्व ये तय कर रहा है कि , उन्हें कल कैसा चाहिए तो फ़िर भारत ही पीछे क्यों रहे खुद को अभिव्यक्त करने में । पिछले कुछ दिनों में देश के जनप्रतिनिधियों ने जो भी कहा , सुना , बताया , समझा , आरोप लगाए वो किसी भी तर्क और कारण से भारतीय जनमानस की अभिव्यक्ति नहीं कही जा सकती । आज जो जनता महंगाई के साथ अपने जीवन के सारे क्षणों को जोर से जोर लगा कर खुद को बचा पाने के लिए संघर्षरत है , वो जब देखती है कि देश का , देश के लोगों का , देश की मिट्टी , खनिज , संसाधनों का दोहन करके निकाले गए पैसे को सिर्फ़  कुछ लोगों ने अपने हित ही नहीं बल्कि विलासितापूर्ण जीवन के लिए लगा रखा है और ऐसा लगातार हो रहा है तो फ़िर कहीं किसी सीमा पर जनता भी प्रतिक्रिया देने को उद्धत हो गई है ।


ये तो पहले ही तय था कि सत्ता के खिलाफ़ लडाई , वो भी किसी ऐसे वैसे मुद्दे पर नहीं बल्कि बनने जा रहे एक ऐसे कानून पर , जिसके बनने में ज़रा भी असावधानी या ढील दी जाए तो मामला आत्मघाती हो सकता है , तो ऐसे मुद्दे पर सीधे सीधे आम जनता के बीच से कुछ लोग इकट्ठे होकर , न सिर्फ़ सरकार की गलतियों को बाहर ले आते हैं बल्कि उससे बेहतर विकल्प प्रस्तुत करके , सरकार को उसके खिलाफ़ अपना नज़रिया व्यक्त करने पर मज़बूर कर देते हैं तो फ़िर ऐसा करने वालों के लिए ये बडा आसान सा नहीं होगा । पिछले दिनों लगातार एक के बाद सिविल सोसायटी के सभी सदस्यों को ,गैर जनलोकपाल विवाद की सुर्खियों में बनाए रखने की पूरी कोशिश की गई और बहुत हद तक कामयाब भी रहा गया । अतंत: अन्ना हज़ारे का ताज़ातरीन आंदोलन अनापेक्षित रूप से टल गया । सिविल सोसायटी के सदस्य  और इस मुहिम से जुडे लोग अब नए सिरे से ये सोचेंगे कि आगे की लडाई कैसे लडी जाएगी । हालांकि , ईशारा तो दे ही दिया गया है कि , आगामी विधानसभा चुनाव में इस बात को प्रमुख मुद्दे के रूप में देखने की अपील की जाएगी कि जनलोकपाल के मुद्दे पर किसका कैसा रूख रहा । ज़ाहिर है कि कांग्रेस सत्तारूढ और सबसे प्रमुख दल होने के कारण सभी जगह निशाने पर होगी ही ।

अब ये उन पांच राज्यों के नागरिकों पर , बहुत बडी जिम्मेदारी होगी कि वे अपने रुख से , अपने माहौल से , और अपनी राजनीतिक प्रखरता से पूरे देश के सामने कम से कम अपना नज़रिया तो रख सकें । ये चुनाव इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अब शायद पहली बार देश के इतिहास में लोग " इनमें से कोई नहीं " जैसे विकल्पों की न सिर्फ़ मांग रखें बल्कि उसका ही चुनाव भी करें । पिछले दिनों बार बार राजनीतिज्ञ दों बातों का दंभ भरते रहे हैं कि वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं इसलिए वे ही प्रतिनिधित्व करने का अधिकार रखते हैं और दूसरी ये कि किसी भी ऐसे जनांदोलन और जनसमर्थन वाले व्यक्ति को सीधे चुनाव में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करानी चाहिए । नियति का चक्र देखिए कि आज वो स्थिति खुद चल कर आ गई है । पांच राज्यों के चुनावों में मुद्दे कौन से होंगे , और पार्टियां कौन सी होंगी ये अहम नहीं है अहम होगा एक आम आदमी का एक वोटर के रूप में प्रतिक्रिया देना ।

ये समय है जब आम जनता जो अब तक सडकों पर उतर कर अपनी बात कह रही थी , समाचार माध्यमों में , संचार माध्यमों में और हर उस जगह जहां अभिव्यक्ति दी जा सकती है अभिव्यक्ति दे रही थी और है वो अब आमने सामने अपने जनप्रतिनिधियों से सारा हिसाब किताब पूछे । और ये इसलिए भी महत्वपूर्ण होने जा रहा है क्योंकि अब जनता ये समझ रही है कि जब उनका चुना हुआ ही प्रतिनिधि बन सकता है तो फ़िर वो वैसा हो जैसे वे खुद हैं । आम जनता के लिए ये एक होने का समय है , एक होकर संगठित होकर आगे बढने का समय है । अब बरसों से चली आ रही तटस्थता और अक्रियाशीलता को तोडना होगा , और आम लोगों को दुनिया को ये साबित करके दिखाना ही होगा कि असल में देश के लोकतंत्र का स्वरूप कैसा होना चाहिए ।



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