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गुरुवार, 1 जुलाई 2010

कुछ पोस्ट झलकियां…..झा जी कहिन

 

 

 


आज अंजली सहाय, हिमांशु तथा मोहन वशिष्ठ का जनमदिन है

>> बुधवार, ३० जून २०१०

 

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30 जून 2010             

30 June 2010

आज का दिन मेरे लिये विशेष है । आज माँ सेवा-निवृत्त हो रही हैं । माँ के प्रति लाड़-प्यार के अतिरिक्त कोई और भाव मन में कभी उभरा ही नहीं पर आज मन स्थिर है, नयन आर्द्र हैं । लिख रहा हूँ, माँ पढ़ेगी तो डाँटेगी । भावुक हूँ, न लिखूँगा तो कदाचित मन को न कह पाने का बोझ लिये रहूँगा ।

कहते हैं जिस लड़के की सूरत माँ पर जाती है वह बहुत भाग्यशाली होता है । मेरी तो सूरत ही नहीं वरन पूरा का पूरा भाग्य ही माँ पर गया है । यदि माँ पंख फैला सहारा नहीं देती, कदाचित भाग्य भी सुविधाजनक स्थान ढूढ़ने कहीं और चला गया होता । मैंने जन्म के समय माँ को कितना कष्ट दिया, वह तो याद नहीं, पर स्मृति पटल स्पष्ट होने से अब तक जीवन में जो भी कठिन मोड़ दिखायी पड़े, माँ को साथ खड़ा पाया ।

 

Wednesday, June 30, 2010         

पहले जिंदगी सरकती थी , अब दौड़ लगाती है -image ----

पिछली पोस्ट के वादानुसार, प्रस्तुत है एक कविता अस्पताल में लिखी गई , आँखों देखी , सत्य घटनाओं पर आधारित ।
शहर के बड़े अस्पताल में ,खाते पीते लोग

भारी भरकम रोग का उपचार कराते हैं ।

तीन दिन बाद रोगी हृष्ट पुष्ट और रोगी से ज्यादा
उसके सहयोगी , बीमार नज़र आते हैं ।

यहाँ कर्मचारी तो सभी दिखते हैं ,पतले दुबले और अंडर वेट

पर कस्टमर होते हैं भारी भरकम , कमज़ोर दिल और ओवरवेट ।

 

बुधवार, ३० जून २०१०        image

:::: रोईद: ::.... 5

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

जब भी घर मे आया था..

खुद को तन्हा..पाया था...

देखो सब तो जाग चुके..

सूरज अब क्यो लाया था..

नीम ये पूछे..आँगन का..

मैं किसका सरमाया था...

 

 

नींद के फेंस के इधर और उधर..     image        

No Comment - लजाइये नहीं, टिपियाइये

एक्‍चुअली किस बात से इस पूरे झमेले की शुरुआत हुई कहना मुश्किल है. पत्‍नी के बगल सोता न होता तो शायद यह दुर्दिन सामने न खुलते. लेकिन पत्‍नी को छोड़कर कहीं और सोने जाता तो फिर मेरी आदतों के बदलने का ख़तरा सिर मंड़राता. पीठ पीछे पत्‍नी शिकायत करती कि कहीं और जाकर सो रहे हैं. शायद इसीलिए कहते भी हैं आदतों से बंधा व्‍यक्ति चैन की नींद सोता है. जबकि सच्‍चाई है मैं तो सो भी नहीं रहा था. वह तो पत्‍नी करती थी, मैं छाती पर हाथ बांधे उसकी भारी सांसों का ऊपर-नीचे होना सुनता रहता. सुनते-सुनते उकताहट होने लगती तो गरदन मोड़कर चुपचाप सोती पत्‍नी को गौर से देखता रहता. कितनी रातें मैंने इस तरह सोई पत्‍नी को चुपचाप ताकते हुए गुजारी है. ऐसे मौकों पर बहुत बार कुछ वैसा दीख गया है जिसकी ओर पहले कभी ध्‍यान न गया होता. जैसे दायीं कान और गरदन के बीच पत्‍नी के एक मस्‍सा था मैं जानता नहीं था. या उसकी पसलियों के नीचे माचिस की तीली के आकार का एक कटे का निशान जिसे वह अब तक मुझसे छुपाये हुए थी. एकाएक मुझे विश्‍वास नहीं हुआ था कि माचिस की तीली के आकार के उस कटे के निशान को कमर पर सजाई हुई औरत मेरी पत्‍नी ही है. गहरे जुगुप्‍सा में मैं देर तक उस माचिस की तीली के आकार के कटे के निशान को पढ़ता रहा. पत्‍नी के चेहरे पर झुककर इसकी ताकीद की कि माचिस की तीली के आकार के कटे के निशान वाली वह स्‍त्री मेरी पत्‍नी है.

 

 

एक पोस्ट .......आम भी , और खास भी !.....अजय कुमार झा







"अहि बेर गाम में आम खूब फ़रल अईछ , भोला भईया "(इस बार गांव में आम खूब फ़ले हुए हैं , भोला भईया ), जैसे ही फ़ोन पर चचेरे भाई ने ये कहा मैं हुलस पडा , ये जानते हुए भी कि उन आमों के स्वाद तो स्वाद इस बार तो उनकी सूरत भी देखने को नसीब न हो । और इस बार ही क्यों अब तो जमाना हो गया जब आम के मौसम में गांव जाना हुआ हो । और फ़िर अब आम ही कौन सा पहले जैसे रहे , वे भी हर दूसरे साल आने की बेवफ़ाई वाली रस्म ही निभाने में लगे हुए हैं , उसकी भी कोई गारंटी नहीं है । मगर जब चचेरे अनुज ने ये कह कर छेड दिया, तो फ़िर अगले दस मिनट तक तो फ़ोन पर आमों का ही ज़ायज़ा लिया गया । किस किस बाग में कौन कौन से आम फ़ले हैं , पिछले दिनों जो अंधड तूफ़ान आया था उसमें कितना नुकसान हुआ । फ़ोन करके जब बैठा तो अनायास ही वो आमों की दुनिया और उसके बीच पहुंचा हुआ मैं , बस यही रह गए कुछ देर के लिए ।


 

क्या आप भी बनाना चाहते है इन्डली व ब्लोगिरी जैसा ब्लॉग एग्रीगेटर ?

 

Ratan Singh Shekhawat, Jun 30, 2010

जब से सबका चहेता और लोकप्रिय हिंदी ब्लॉग एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी की सांसे अटकी पड़ी है तब से हर किसी के मन में हलचल मच रही है कि काश हिंदी ब्लॉग एग्रीगेटर्स की संख्या ज्यादा हो ताकि कोई एक या दो एग्रीगेटर पर निर्भर ना रहना पड़े | ब्लॉग वाणी के बंद होने के बाद इन्डलीब्लोगगिरी नाम के दो एग्रीगेटर्स का अवतार भी हो चूका है |

 

बुधवार, ३० जून २०१०

एक अदृश्य सूली

हर सुबह समेटती हूँ ऊर्जाओं के बण्डल
और हर शाम होने से पहले
छितरा दिया जाता है उन्हें
कभी परायों के
तो कभी तथाकथित अपनों के हाथों..
कई बार तो.. कई-कई बार तो
भरनी चाही उड़ान
'हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं' सुनकर
पर ना तो थे असली पर
और न हौसलों वाले ही काम आये..
सिर्फ एक अप्रकट
एक अदृश्य सूली से खुद को बंधे पाया
हौसले के परों को बिंधे पाया
फिर भी हर बार लहु-लुहान हौसले लिए
बारम्बार उगने लगती हूँ 'कैक्टस' की तरह

 

30 June 2010              image

रिटायर होते, आपके घर के यह मुखिया - सतीश सक्सेना

आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय ने कुछ समय पहले प्रवीण पाण्डेय के रूप में एक बेहतरीन सोच और समझ रखने वाले लेख़क का परिचय कराया था , उनके पहले ही लेख से यह महसूस हुआ कि ब्लागजगत में एक ईमानदार ब्लाग जन्म लेने जा रहा है जो समय के साथ सही सिद्ध हुआ !
आज उन्होंने अपनी माँ के रिटायर होने के अवसर पर एक पुत्र की ओर से एक भावुक पोस्ट लिखी है ! अधिकतर हम लोग देखते हैं कि रिटायर होते ही, देर सवेर घर के अन्य सदस्य , उन्हें घर के मुखिया पोस्ट से भी रिटायर करने की तैयारी करने लगते हैं ! बेहद पीड़ा दायक यह स्थिति, आज सामान्यतः अधिकतर घरों में देखी जा सकती है ! "रिटायर" शब्द का प्रभाव प्रभावित व्यक्ति पर इतना गहरा पड़ता है कि रिटायरमेंट के  बाद वह अक्सर बुद्धि हीन, धनहीन और हर प्रकार से अयोग्य समझा जाता है ! छोटे बच्चे को खिलाने घुमाने के अलावा दूध सब्जी लाना और घर की चौकीदारी जैसे कार्य  आम तौर पर उनके लिए सही और उचित मान लिए जाते हैं !

 

Tuesday, June 29, 2010             image

अपने मोहल्ले की लड़कियों के बारे में

लगता है कि मैं एक बार फिर कविताओं की ओर लौटने लगा हूं। यह सही हो रहा है या गलत मैं नहीं जानता, बस इतना कह सकता हूं कि एक छटपटाहट ने घेर रखा है जिससे मुक्त होना थोड़ा कठिन लग रहा है। पिछले कुछ समय से मैं लगातार बेचैन चल रहा हूं। यह कब तक  चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। जो लोग कविता लिखते हैं वे मेरे बारे में अपनी यह राय जरूर कायम कर सकते हैं कि एक बेवकूफ था जो इधर-उधर अपनी फजीहत करवाने के बाद घर लौटकर आ गया है।

अपने मोहल्ले की लड़कियों के बारे में

एक लड़की
सीखने जाती है
सिलाई मशीन से

घर चलाने का तरीका



एक लड़की
दिनभर सुनती है
लता मंगेशकर का गाना


 

 

हम सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं या सुविधाओं का दास बन चुके हैं?

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Author: जी.के. अवधिया | Posted at: 10:11 AM | Filed Under: मोबाइल

घर से निकलने के कुछ देर बाद रास्ते में अचानक याद आया कि मैं अपना मोबाइल घर में ही भूल आया हूँ। एक बार सोचा कि चलो आज बगैर मोबाइल के ही काम चला लें किन्तु रह-रह कर जी छटपटाने लगा। घर से बहुत दूर तो नहीं पहुँचा था पर एकदम नजदीक भी नहीं था इसलिये घर वापस जाकर मोबाइल लाने की इच्छा नहीं हो रही थी पर मेरी छटपटाहट ने मुझे घर वापस जाकर मोबाइल लाने के लिये मुझे विवश कर दिया।
मैं सोचने लग गया कि यदि आज मेरे पास मोबाइल नहीं भी रहता तो सिर पर कौन सा पहाड़ टूट जाता? मोबाइल पर जिनसे भी और जो कुछ भी मेरी बात होती है वे कितनी आवश्यक होती हैं? क्या ललित शर्मा जी, राजकुमार सोनी जी, अजय सक्सेना जी आदि से मोबाइल में उनके पोस्ट और टिप्पणियों के बारें में बात करना बहुत ही जरूरी है? क्या एक दिन मोबाइल से अपनी पसंद के गाने सुने बिना रहा ही नहीं जा सकता?

 

Monday, June 28, 2010

चरित्र और आवरणः लवली गोस्वामी

मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की 14वीं कविता अत्यंत सक्रिय ब्लॉगर लवली गोस्वामी की है। लवली मनोविज्ञान का गहन ज्ञान रखती हैं और उसे अपने ब्लॉग संचिका पर बाँटती भी हैं। सकारात्मक परिवर्तनों की पक्षधर लवली ने हिन्दी ब्लॉगरों को वेब-निर्माण संबंधित प्रोग्रामिंग भाषाओं, टूलों (जैसे- एचटीएमएल, सीएसएस इत्यादि) की जानकारियाँ हिन्दी में दी है। धनबाद में रहती हैं और एक तकनीकी संस्थान में कम्प्यूटर विज्ञान पढ़ाती हैं। साँपों में भी इतनी गहरी दिलचस्पी है।
कविता: चरित्र और आवरण
रंगमंच में कलाकारों के चहरे हैं...
भाव पैदा करने की कोशिश करते
वो अपनी कला का सर्वोत्तम देना चाहते हैं
इन भाव भागिमाओं से
हर दर्शक को आश्चर्य चकित कर देना चाहते हैं
सफ़ेद रोशनी में भावों की कई तहों से लिपटे चेहरों में
मुझे कोई अभिनय नजर नही आता
यह सब सच-सा लगता है
जैसे वे लोग अपने अन्दर का कुछ उड़ेल कर सामने रख देना चाहते हैं

 

ऐसे चिकित्सक को क्या दंड मिलना चाहिए?

आज अखबार में समाचार था-

एक महिला रोगी के पैर में ऑपरेशन कर रॉड डालनी थी, जिस से कि टूटी हुई हड्डी को जोड़ा जा सके। रोगी ऑपरेशन टेबल पर थी। डाक्टर ने उस के पैर का एक्स-रे देखा और पैर में ऑपरेशन कर रॉड डाल दी। बाद में पता लगा कि रॉड जिस पैर में डाली जानी थी उस के स्थान पर दूसरे पैर में डाल दी गई। 

डॉक्टर का बयान भी अखबार में था कि एक्स-रे देखने के लिए स्टैंड पर लगा हुआ था। किसी ने उसे उलट दिया जिस के कारण उस से यह गलती हो गई। 

मुझे यह समाचार ही समझ नहीं आया। आखिर एक चिकित्सक कैसे ऐसी गलती कर सकता है कि वह जिस पैर में हड्ड़ी टूटी हो उस के स्थान पर दूसरे पैर में रॉड डाल दे। क्या चिकित्सक ने एक्स-रे देखने के उपरांत पैर को देखा ही नहीं? क्या ऑपरेशन करने के पहले उस ने भौतिक रूप से यह जानना भी उचित नहीं समझा कि वास्तव में किस पैर की हड्डी टूटी है? क्या एक स्वस्थ पैर और हड्डी टूट जाने वाले पैर को एक चिकित्सक पहचान भी नहीं सकता? या चिकित्सक इतने हृदयहीन और यांत्रिक हो गए हैं कि वे यह भी नहीं जानते कि वे एक मनुष्य की चिकित्सा कर रहे हैं किसी आम के पेड़ पर कलम नहीं बांध रहे  हैं?

 

Wednesday, June 30, 2010

लेखनी को आज ही कुदाल कीजिये....


फ़िज़ूल के न कोई अब सवाल कीजिये
कीजिये तो आज कोई कमाल कीजिये
बह गया सड़क पे देखिये वो लाल-लाल

कुछ सफ़े अब खून से भी लाल कीजिये
छुप गई उम्मीद क्यों, डरे हुए बदन

 

Wednesday, June 30, 2010

खुल गया स्कूल...

गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म. आज से मेरा स्कूल खुल गया. अब घुमाई कम, पढाई की बातें ज्यादा. वैसे मैंने तो इन दो महीनों में खूब इंजॉय किया. ढेर सारे आइलैंड्स की सैर, खूबसूरत बीच, रिमझिम बारिश का सुहाना मौसम. कीचड़ वाले ज्वालामुखी देखे तो INS राणा पर जाकर उसे भी नजदीक से देखा. साइंस सिटी भी गई. खूब ड्राइंग-पेंटिंग की, आपको भी दिखाउंगी. ढेर सारी मस्ती, हंगामा और शरारतें....कित्ता मजा आया. आज जब मैं स्कूल गई तो मुझे रोना आ रहा था. सही बताऊँ इत्ते दिन बाद स्कूल जाना बड़ा अटपटा सा लगा..कुछ-कुछ बोरिंग सा. 7:30 पर स्कूल है, सो सुबह ही जगना भी पड़ा. पहले कित्ता अच्छा था, देर तक सोने को मिलता. अब तो सब कम हड़बड़ी वाला लगता है. ...पर दो-चार दिन तक तो ख़राब लगता ही है, फिर सब नार्मल हो जायेगा. चलिए मेरी पहले दिन की स्कूल जाने की फोटो देखते हैं.

 

Wednesday, June 30, 2010

275 साल बाद फिर हुआ महायुद्ध...खुशदीप

जी हां, आज 93 मिनट में मैंने 275 साल पहले के काल को जिया..आप कह रहे होंगे कि क्या लंबी छोड़ने बैठ गया हूं...या मैं भी भूतकाल और आज के बीच झूलता हुआ भविष्यवक्ता बनने की राह पर चल निकला हूं...ऐसा कुछ भी नहीं है... भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की कड़वाहट का 63 साल का इतिहास है...लेकिन मैं 63 साल की नहीं 275 साल की दुश्मनी की बात कर रहा हूं...स्पेन और पुर्तगाल भी भारत-पाकिस्तान की तरह यूरोप में दो पड़ोसी मुल्क है...और इनकी दुश्मनी का इतिहास 275 साल पुराना है..कल एक बार फिर स्पेन और पुर्तगाल आमने-सामने थे...वर्ल्ड कप फुटबॉल में सुपर एट में पहुंचने के लिए सब कुछ झोंक देने के इरादे के साथ....

 

 

Wednesday, 30 June 2010

फैशन या महंगाई ? (कार्टून धमाका)

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तो आज के लिए बस इतना ही कल फ़िर मिलते हैं ..कुछ और धमाचौकडी के लिए …

मंगलवार, 29 जून 2010

कटौती का जमाना है ....एक लाईना से काम चलाईये (कुछ पोस्ट लिंक्स )

आज यकायक ही लगा कि भई कटौती का जमाना है तो फ़िर हम सबका फ़र्ज़ है कि इस जमाने के साथ चलने का कुछ न कुछ यत्न तो करें ही । तो फ़िर आज एक लाईना ही पेश किए देते हैं आपके लिए , अब दो लाईना में से इससे ज्यादा क्या कटौती करें भाई ....


तुम्हारा नाम लिखूं
..........हां अब कौन सा नाम देख कर माईनस प्लस का टंटा बचा है ।


तख्ता पलट दो ससुरों का .....और ऐसा सारे दामाद मिल कर करें ..


अब क्या करोगे राज भाई .....वेलेंटाईन डे भी चला गया जो प्रेमी प्रेमिका पीटते ..


क्या इंडली में भी फ़र्जीवाडे की झलक दिख रही है ? .. क्या कहा नहीं ....फ़ौरन ही थ्रीडी चश्मा खरीद डालिए ..सब दिखता है ।


दिन हरज़ाई ........आज भी बारिश न आई ।


प्राईम टाईम ...जरा हंस लें मुस्कुरा लें ....... रोने के लिए टीवी प्राईम टाईम ही लगा लें ।


ब्लागवाणी को लेकर हम ...
तब तक लिखते रहेंगे जब तक वो वापस न आ जाए ।


जीवन के स्टेशन पे
..कभी भी एडवांस रिजर्वेशन नहीं मिलता


गड्ढा ..
बस गिरते ही ठहाके शुरू ।


ये पैरेंटिंग नहीं आसान ..खासकर जब उसके साथ साथ ब्लोग्गिंग भी करनी हो तो ।


उदास होके भी मैं क्या पाऊंगा ....कुछ नहीं , इसलिए ऐसे ही हंसते खेलते रहिए ..पोस्ट ठेलते रहिए ।



सर , आप तो बडे ही क्यूट हैं .. कोई ऐसा कहे तो फ़ौरन समझ जाईये कि ...आपके साथ वो गे आंदोलन शुरू करने वाला है ।



याद आते हैं दूरदर्शन के वे दिन ....ओह ये पढ कर तो हमें भी अपना पेजर याद आ गया ....देखता हूं कहां गया ??


पाप और पुण्य ..
प से पाप , प से पुण्य , प से पोस्ट , प से पाठक ......



ब्लागवाणी छुट्टी पर , अंगना में आई हमारवाणी ...बस फ़टाक से इस नए अंगना में उछल कूद शुरू करो


एसएमएस से मिलेगी सीट : फ़िलहाल तो पोस्ट ही नदारद मिली है


महंगाई मार गई ..बस ब्लोग लिखना ही सस्ता रह गया है अब तो


विरोध करने का तरीका कैसा होना चाहिए ....सिर्फ़ लिख कर बताएं ..यहां हडताल, जाम , बंदी वगैरह करने की गुंजाईश नहीं है


आज के लिए इतना ही ...डोज़ पसंद आया तो ..कहिएगा ...यही प्रेस्क्रिपशन जारी रहेगा अभी कुछ दिनों तक ।

शनिवार, 26 जून 2010

टू लाईना इज बैक ......जस्ट पोस्ट लिंक्स ....यार !



बहुत दिन हो गए , अपनी मनपसंद दो लाईनों की पटरियां बिछाए हुए । यूं तो वैसे भी आजकल ब्लोगवाणी के डिरेल होने के कारण बहुत सी पोस्टें पता नहीं कौन कौन सी बडी लाईन छोटी लाईन और लूप लाईन से होकर निकल रही हैं , कमबख्त समझ ही नहीं आ रहा है कि कौन सा वो ट्रैक पकडें कि सबसे मुलाकात हो जाए । इसी बहाने सभी पगडंडियों तक पर चले जा रहे हैं , तो देखिए आज उनमें से किन किन को पकड के पटरियों को बिछाया गया है ।



एक बार सुबह उठो तो योगा के अलावा कुछ करने नहीं दूंगा ,
कह रहे हैं प्रवीण , करोगे तो मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा ॥


इस्तुतिमति का पिटारा, पंडियाईन इज हर नेम ,
देखिए भोजपुरी इज कैसे , बिल्कुल सेम टू सेम ॥


मिसर जी करके लौटे आरती भोलेनाथ की ,
आप यहां पर बांचिए , कथा इसके बाद की ।



आज पूछी वाणी ने अजब सी एक पहेली ,
बताईये कौन है उनकी जान , दोस्त या सहेली ।


बीबीसी ब्लोग्स की महिमा अपरंपार है ,
वहां आज नीति, राजनीति और बिहार है ॥


उसको लगे बडा ही पाप जो इसे पढने से रोके
,
जानिए आखिर क्या पाया हमने इंसां होके


धान के देश में मिला एक सार्थक लेख ,
इस लिकं को पकडिए और आप लीजीए देख ॥


आज देखिए अभय बाबू ने किन शब्दों की ,की धुलाई ,
हमें तो निर्मल आनंद मिल गया इसे पढ के भाई ॥


मधु चौरसिया ने डाली आज फ़ैशन पर है नज़र ,
इस पोस्ट पर पहुंचिए आपको पढना हो गर ॥


विवेक भाई के ब्लोग पर बीमे की है जानकारी ,
सबको पढनी चाहिए , जिन्हें जान हो , या न हो प्यारी ।


आशीष भाई ब्लोगर्स के लिए करते हैं कई जतन,
आज गजेट नहीं है , मगर आज है इक बटन ॥


इस पोस्ट में दिखा गजब का इक असर ,
क्यों न हो आखिर यहां चल रहा है इक सफ़र ॥



महफ़िल प्यार की मिसर जी को आ रही है याद ,
आपको भी आएगी , इस पोस्ट को पढने के बाद ॥


राम त्यागी हो गए चींटियों से परेशान ,
आप भी उनकी परेशानी में करिए कुछ योगदान ॥


अब कुछ नए ब्लोग्स से करिए मिलने की तैयारी ,
सबसे पहले देखिए क्यों अधूरी है नारी ॥


ये हैं मनीष आचार्य , लिख रहे हैं राजस्थान से ,
आज अपनी पोस्ट में कुछ कहते हैं आसमान से ॥

संजीव गौतम जी के ब्लोग से मिलिए , नाम है कभी तो ,
फ़िलहाल एक कविता आप पढिए अभी तो ॥



चलिए अब चलता हूं उम्मीद है कि ...........बहुत दिनों बाद ....प्रस्तुत आपको ये दो लाईना कुछ अलग सा फ़्लेवर दे सकेंगी ..........। अब देखिए अगली पोस्ट में कोई अगला फ़्लेवर .....

शुक्रवार, 25 जून 2010

सीता की दुविधा ऐसी जानी , हाय कैसी अटकी ब्लोगवाणी ........


( ललित शर्मा जी के पोस्ट से साभार )






बात नहीं ये बडी पुरानी ,
सुनिए जरा सब ज्ञानी ध्यानी ,

मणि रत्नम ने बुनी कहानी ,
राम सीता रावण की बानी

राम जी ने जाने इक दिन कैसी ठानी ,
सीता जी की दुविधा पहचानी ,


और दुविधा देख सिया की ,
जतन से लिखी इक पोस्ट सयानी ,

अब दिल थाम के सुने हर प्राणी ,
अटक गई उसी पर ब्लोगवाणी ,

हाय ऐसी बदली तब सबकी बानी ,
सब ब्लोग्गर्स की याद आई नानी ॥

हर ब्लोग्गर हाय हुआ दिवाना ,
और हर पोस्ट हो गई दिवानी ,

चलो माना कि कुछ गर्मी थी पहले ,
मगर अब आया बरसात और आया पानी ,

कब तक दुविधा में अटकी रहोगी ,
अब तो वापस आओ महारानी ॥

गुरुवार, 3 जून 2010

कुछ पोस्टें , देखी अनदेखी सी (पोस्ट झलकियां )

 

 

बीबीसी हिंदी ने अपने पत्रकार साथियों को अपने मन की बात अपने तरीके से कहने के लिए ,के लिए बीबीसी ब्लोग्स मंच प्रदान कर रखा है । इस मंच पर प्रतिदिन अलग अलग पत्रकार जो देश विदेश के अलग अलग कोने में अपने कार्य को अंजाम दे रहे हैं न सिर्फ़ अपने अनुभवों को साझा करते हैं बल्कि , ज्वलंत विषयों , राजनीतिक हालातों पर बेबाकी से अपनी राय भी रखते हैं । इन्हें पढने वाले पाठकों की संख्या भी हज़ारों में होती है और प्रतिक्रिया देने वाले भी सैकडों पाठक होते हैं । आज बीबीसी पत्रकार सुशील झा झारखंड से बिहार तक की सडक यात्रा के अनुभव और झारखंड की बदहाल होती सडकों पर अपनी कलम की धार पिजाते हुए कहते हैं ,

 

सुशील झा सुशील झा | गुरुवार, 03 जून 2010, 18:53

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टूटा हुआ हाईवे...... आती जाती ट्रकें......घुप्प अँधेरा.....और पास में ट्रक वालों से पैसा वसूलते नौजवान.....

हाइवे का ढाबा.....तेज़ आवाज़ में बजता संगीत...कारों में नशा करते अधेड़ उम्र के लोग (हथियारों से लैस)......

ये दो चित्र किस राज्य के हो सकते हैं......बिहार कहने से पहले ज़रुर सोचें.. ये नज़ारा बिहार का नहीं बल्कि बिहार से सटे झारखंड का है. वहां लंबे समय से पत्रकारिता में रहे लोग कहते हैं कि अब राज्य में इस तरह के नजा़रे आम हो गए हैं.

पिछले दिनों झारखंड से बस के रास्ते बिहार गया. क़रीब 14 घंटों के सफ़र में जो देखा जो सुना और जो समझा वो दुखद और परेशान करने वाला था.

पहले जब मैं इसी रास्ते पर बस से बिहार जाता था तो रात में ख़राब सड़कों पर नींद टूटती थी तो बस के लोग कहते थे. अरे चलो बिहार की सीमा में आ गए. इस बार बिहार की सीमा में प्रवेश करने के बाद ही सड़कें ठीक मिलीं.

कहते हैं 2004 के बाद सड़कों का निर्माण और रख रखाव ठप्प पड़ता जा रहा है याद आया पश्चिमी सिंहभूम के एक इलाक़े में सड़क के ठेके को लेकर मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को काफ़ी परेशान हुए थे.

ढाबों पर नशा करते लोग संभवत छोटे ठेकेदार थे जो हथियारों से लैस भी थे यानी जान माल सुरक्षित नहीं. इनमें से एक भी आदिवासी नहीं था. महिलाओं के प्रति इन लोगों की भावना को घटिया ही कहा जा सकता था.

रास्ते में बस ख़राब हुई और अंधेरे में पांच घंटे रहने पड़े. बगल में नौजवान ( अधिकतर ग़रीब आदिवासी) ट्रक वालों से लूटपाट करने में लगे थे. इन पाँच घंटों में कभी पुलिस का कोई वाहन दिखाई नहीं दिया.

सड़कें नहीं.....क़ानून व्यवस्था नहीं और शायद रोज़गार भी नहीं. यह नवगठित राज्य जा कहां रहा है...

शायद बिहार के साथ भी यही हुआ होगा सालों पहले जब उसका गठन हुआ होगा. बर्बाद होते होते बिहार की यह हालत हो गई है कि अब थोड़ा सा भी विकास लोगों को बहुत अच्छा लगता है.

पूरी दास्तान वहीं पढिए , वैसे भी जिस राज्य में मुख्यमंत्री की सीट को क्रिकेट मैच की तरह खेला जा रहा हो उस राज्य का इससे अच्छा हाल हो भी नहीं सकता ।

 

इसी तरह से एक और मंच है नवभारत टाईम्स ब्लोग्स का जहां नवभारत टाईम्स हिंदी समाचार पत्र से जुडे पत्रकार साथी अपना ब्लोग लिखते हैं । हिंदी ब्लोग्गिंग में समान रूप से सक्रिय भाई आलोक पुराणिक जी और भाई प्रियरंजन झा जी वहां भी बहुत सक्रिय दिखते हैं ।आज अपने ब्लोग अकथ्य पर सुश्री पूजा प्रसाद ने एक सवाल रखा है

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क्या वेटर आपका गुलाम है?

पूजा प्रसाद Thursday June 03, 2010

हरिवंश राय बच्चन ने अपनी जीवनी में एक जगह कहा है - गुलामी के संस्कार पीढ़ियों तक नहीं जाते। जब मैं होटल-रेस्टॉरेंट्स में लोगों को वेटर्स को टिप देते हुए देखती हूं तो यही लगता है।
किसी को गुलाम समझने में या खुद से कमतर समझने में जो खुशी हमारी रीढ़ की हड्डी से हो कर गुजरती है, हमें अपनी सेवाएं देने वालों को दी जाने वाली बख्शीश इसी खुशी का इनडाइरेक्ट एक्सटेंशन है। बात जरा कड़वी है मगर सोच कर देखिए क्या सच नहीं है? और जिस तरह से टिप लेने वाला खुश होता है, क्या वह इसी सामंती जीन का असर नहीं है?

जबकि असल बात तो यह है कि कोई वेटर जब विनम्रता से आपको मेन्यू दे कर, ऑर्डर ले कर खाना परोसता है, तो वह अपना काम कर रहा होता है। ठीक वैसा ही काम जैसा कि मैं एनबीटी डॉट कॉम में करती हूं या फिर आप अपने ऑफिस में कर रहे हैं। इस जॉब के बदले में महीने के अंत में हम सभी को एक अमाउंट मिलता है जिसे हम सैलरी कहते हैं। किसी वेटर, किसी अकाउंटेंट या किसी जर्नलिस्ट को हर महीने उसके काम के एवज में सैलरी मिलती है। अब जरा बताइए, कैसा लगेगा एक अकाउंटेट को जब उसका बॉस शाम को जाते समय उसकी टेबल पर कुछ चिल्लड़ रख जाए और मुस्कुरा कर चलता बने?

 

क्या कहा थकान महसूस होने लगी , लो जी खाने का भी इंतज़ाम कर रखा है ,नाश्ते में राम लड्डू पेश कर रही हैं निशा मधुलिका जी , जाईये सीखिए , बनाईये और सबको खिलाईये

| नाश्ता | राम लड्डू (Ram Laddu Recipe)

राम लड्डू (Ram Laddu Recipe)

निशा मधुलिका - - 310 बार पढ़ा गया

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image Ram Laddu Recipe

लड्डू सामान्यतया मीठे होते हैं लेकिन राम लड्डू नमकीन होते हैं और हरी चटनी और मूली के लच्छे के साथ खाये जाते हैं . दिल्ली में राम लड्डू का ठेलें आप लगभग हर बाजार में देख सकते हैं, गोल गोल गरमा गरम राम लड्डू कढ़ाई में तलते देख इन्हैं खाने के लिये मन कर जाता हैं

 

भाई आलोक रंजन कहते हैं कि चुप ही रहता हूं , मगर पोस्ट देख कर लगा कि लो कल्लो बात इतनी चुप्पा चुप्पी में ही इत्ता धमाका देखिए

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Wednesday, June 2, 2010

लो जी बोलने का मौका फिर आ गया... मुंबई के बांबे हॉस्पीटल में बिजली आखिरकार आ ही गयी... पूरे तीन दिनों बाद यहां पर बिजली रानी के कदम पड़े हैं... तीन दिनों तक बिना बिजली के ये हॉस्पीटल चलता रहा... जेनेरेटर की मदद ली गयी.. ताकि इमरजेंसी सेवाओं पर बिजली के नहीं होने का असर ना पड़े... अमां ये बिजली भी बड़ी अजीब है... रहने से भी दिक्कत ना रहने से दिक्कत... और किसी पर गिर पड़े तो भइया समझो कि बस काम पूरा हुआ... दुनिया में अब उसके लिए कोई काम बचा ही नहीं... लेकिन मुझे तो बांबे हॉस्पीटल में बिजली नहीं होने के पीछे बड़ी साजिश लगती है... कोई बड़ा षडयंत्र लगता है... कहीं जानबूझकर तो बांबे हॉस्पीटल की बिजली गायब तो नहीं कर दी गयी... अब आप सोच रहे होंगे कि भला इसमें कैसी और किसकी साजिश हो सकती है... तो जनाब लगता है आप लोगों का ध्यान हॉस्पीटल के नाम की तरफ नहीं गया... बांबे हॉस्पीटल... अब भी समझ नहीं आया

समझ नहीं आया तो जाईये पोस्ट पढिए और समझिए न …..

 

पढाई लिखाई नाश्ता वैगेरह के बाद थोडा गीत संगीत हो जाए तो ….देखिए आज प्रतिभा जी ,क्या सुनवा रही हैं

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Wednesday, June 2, 2010

हमारी सांसों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है..

आज अपने ब्लॉग पर पहला ऑडियो दे रही हूँ.
इस सुरीले आगाज़ के लिए नूरजहाँ की आवाज से
बेहतर भला क्या होगा...

 

बहुत कोशिश के बावजूद वो औडियो यहां नहीं लोड हुआ , अच्छा ही हुआ अब आप जाकर उनकी पोस्ट पर ही इसका लुत्फ़ उठाईये , वर्ना यहीं  से सुन कर खिसक लेने का रिस्क ज्यादा दिख रहा था हमें …..तो जाईये और वहीं सुनिए

Posted by pratibha at 12:18 PM

आगे बढा तो प्रतीक माहेश्वरी एक दृढ फ़ैसला लेते हुए दिखे , जिसमें एक राजनेता के  कत्ल होने की दास्तान थी । देखिए न

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एक दृढ़ फैसला 

बुधवार, २ जून २०१० comments: 7

Posted by Pratik Maheshwari at ११:५३ PM

मोहित एक सर्वगुण और सम्पूर्ण परिवार का लाडला बेटा था | बड़ा भाई डॉक्टर बन गया था और बड़ी बहन भी अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने ससुराल जा चुकी थी | मोहित पिछले ५ सालों से बाहर ही था और अपनी पढ़ाई ख़त्म करके वो वापस घर आया था |
मोहित में बदलाव ज़बरदस्त था और उसके सोचने-समझने-परखने की शक्ति लाजवाब हो गयी थी | कॉमर्स लेकर पढ़ने के बाद भी उसका रुख अपने देश, अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने का था | वह केवल बोलना और सुनना नहीं चाहता था.. कुछ करना भी चाहता था | कुछ अनुभवी लोगों से विचार-विमर्श करके उसने एक फैसला लिया.. एक दृढ़ फैसला |

बताईये कि क्या ये फ़ैसला सही था या गलत ?

 

आगे राधारमण जी ने सूचना देते हुए बताया कि नहीं रहीं उजरा बट ,

 

Wednesday, June 2, 2010

नहीं रहीं उजरा बट

प्रसिद्ध थियेटर अभिनेत्री और भारतीय अभिनेत्री जोहरा सहगल की बहन उजरा बट का पूर्वी पाकिस्तान के सांस्कृतिक शहर लाहौर में निधन हो गया है। वह ९३ वर्ष की थीं। बट ने अपना अंतिम स्टेज कार्यक्रम २००८ में दी थी। उन्होंने अपना ९३ वां जन्मदिन २२ मई को अपने दोस्तों और परिवार के साथ मनाया था।

भारत में उत्तराखंड के रामपुर में १९१७ में जन्मी बट ने अपने कैरियर की शुरुआत नृत्यांगना के रूप में १९३७ में की थी। १९४० और १९५० के बीच वह प्रसिद्ध पृथ्वी थियेटर की महत्वपूर्ण महिला में शुमार हो गई। उन्होंने ख्वाजा अहमद अब्बास के नाटक जुबैदा में अभिनय किया और पृथ्वीराज कपूर के साथ महत्वपूर्ण रोल की। पृथ्वी थियेटर के साथ कई वर्षों तक जुड़ी रही बट ने शंकुतला, पठान, किसान, गद्दार और दिवार में अपनी बहन जोहरा के साथ काम किया और लगभग पूरे अविभाजित भारत का अपने समूह के साथ दौरा की। लेकिन १९६४ में वह अपने पति हामिद बट के साथ पाकिस्तान चली गईं। वे रावलपिंडी में शांति का जीवन गुजारने लगीं। बाद में अक्टूबर १९८५ में वह अजोका थियेटर में शामिल हो गईं।

स्तुति पांडे

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अपने अलग अंदाज़ में कभी राबर्ट की भोजपुरी दिखवाती हैं तो कभी डेबी से मिलवाती हैं जाईये आप भी मिल कर आईये

Wednesday, June 2, 2010

डेबी की डेस्क


डेबी मेरे साथ आई बी एम् में काम करती थीं. वो पिछले १३ साल से आई बी एम् से जुडी हुई थीं, कल उनका विदाई समारोह था. दो वर्ष पहले वो फ्लोरिडा से कोलोराडो ऑन-साईट काम करने के लिए स्थान्तरित हुई थीं. फ्लोरिडा वाला घर बेचा, बच्चों से दूर हुयीं, पोते-पोती और नाती-नातिन से भरा पूरा परिवार छोड़ कर अकेले यहाँ आयीं. अकेले इसलिए क्यूंकि तलाक हो चुका है. यहाँ आकार फिर से नए सिरे से शुरुवात की ही थी की उनके जाने की घोषणा कर दी गयी. डेबी के हिस्से का काम इंडिया आउट सोर्स कर दिया गया.

लीजीए अब परमजीत बाली जी की चिंता पर भी गौर फ़रमाईये जरा

क्या आपको भी अपने फिगर की चिन्ता नही है....?

Thursday, June 3, 2010

आज नेट पर घुमते हुए एक विचार मन मे आया कि नर-मादा दोनों मे से किसे अपनी फिगर की चिन्ता ज्यादा सताती है.......इसी बारे मे खोज कर रहा था कि अनायास ही यह कार्टून हाथ लग गया....सोचा कि आप तक भी इसे पहुँचाया जाए......जरा संभल कर देखे:)

 

अब आगे रेणु दीपक उर्फ़ पुखराज जी

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की कविता की इन पंक्तियों का मजा लीजीए ,

Wednesday, June 2, 2010

धुआं धुआं हो गयी नज़र

तेरे इंतज़ार को पाले ने मारा है ,

एक ज़लज़ला उठा है फिर

मलबे तले जीवन हारा है ,

अंतहीन तलाश है जाऊं कहाँ

लोग कहते हैं नाकारा है ,

तेरी यादों को भूलने के दर्द ने

लकीरों में तेरा नाम उभारा है ,

पूरी कविता को आप पोस्ट पर जाकर पढिए और सराहिए ……

 

मिलिए एक नए ब्लोग से

Wednesday, June 2, 2010

भारत माता की वीर पुत्री, झांसी की रानी।

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

आप सोच रहे होंगे बस आगे आगे ही भागे जा रहे हैं , अजी खुशखबरी भी सुनिए जी किसने रोका है भाई

खुशखबरी... खुशखबरी... खुशखबरी... ब्लोगिंग से कमाई शुरू

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Author: जी.के. अवधिया | Posted at: 9:55 AM | Filed Under: कमाई, टिप्पणी, ब्लोगिंग

आप तो जानते ही हैं कि आजकल विज्ञापन का जमाना है और आप विज्ञापन के महत्व को भी अच्छी तरह से समझते हैं। ये विज्ञापन चीज ही ऐसी है कि किसी उत्पाद को बाजार में आने के पहले ही सुपरहिट बना देती है। अच्छे से अच्छा उत्पाद विज्ञापन के अभाव में पिट जाता है और सामान्य से भी कम गुणवत्ता वाला उत्पाद विज्ञापन के बदौलत हिट हो जाता है। तो फिर आखिर अपने ब्लोग का अन्य ब्लोग में विज्ञापन करने में बुराई ही क्या है?
इसीलिये हमने निश्चय किया है कि आप हमारे पोस्टों में टिप्पणी करते हुए अपने ब्लोग का विज्ञापन कर सकते हैं, और वह भी बहुत सस्ते दर पर। विज्ञापन के दर इस प्रकार हैं:

  • बिना किसी लिंक के प्रचार वाली टिप्पणी के लिये रु.100 मात्र
  • आपकी टिप्पणी में एक लिंक के लिये रु.200 मात्र
  • आपकी टिप्पणी में दो लिंक के लिये रु.300 मात्र
  • आपकी टिप्पणी में तीन से पाँच लिंक के लिये रु.500 मात्र
  • हमारे ब्लोग के साइडबार में आपके ब्लोग का विजेट लगाने के लिये रु.2000 प्रतिमाह मात्र

खुशखबरी के बाद एक जरूरी सूचना भी ले लें

 

पूरे भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नम्बर बदले: हिन्दी-अंग्रेजी में पूरी सूची उपलब्ध

Posted in national highway number, छत्तीसगढ़, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक प्रस्तुतकर्ता बी एस पाबला on Thursday 3 June 2010

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पिछले कई दिनों से मैं सड़क मार्ग द्वारा अपने उत्तर-पश्चिम भारत भ्रमण की रूपरेखा बना रहा हूँ। हालांकि तकनीक के विकास ने हमें बहुत सी सुविधाएँ दे दी हैं। चाहे वह गूगल लैटीट्यूड व गूगल मैप्स का मार्ग-दर्शन हो या प्यारी सी आवाज़ में जीपीएस नेवीगेशन के सहारे रह-रह कर दिए जाने वाले दिशा-निर्देश। फिर भी कई चीजों को धरातल पर रह कर किया जाना सुरक्षित रहता है!

 

चलिए आज के लिए इतना ही काफ़ी है , अरे भाई आपके लिए नहीं मेरे लिए ……..अभी और भी बहुत कुछ पढना लिखना है जी , रेडियो भी सुनना है , समाचार भी सुनना है जी ……और और और ….सब आपही को बताएंगे क्या ॥

कुछ पोस्टें , देखी अनदेखी सी (पोस्ट झलकियां )

 

 

बीबीसी हिंदी ने अपने पत्रकार साथियों को अपने मन की बात अपने तरीके से कहने के लिए ,के लिए बीबीसी ब्लोग्स मंच प्रदान कर रखा है । इस मंच पर प्रतिदिन अलग अलग पत्रकार जो देश विदेश के अलग अलग कोने में अपने कार्य को अंजाम दे रहे हैं न सिर्फ़ अपने अनुभवों को साझा करते हैं बल्कि , ज्वलंत विषयों , राजनीतिक हालातों पर बेबाकी से अपनी राय भी रखते हैं । इन्हें पढने वाले पाठकों की संख्या भी हज़ारों में होती है और प्रतिक्रिया देने वाले भी सैकडों पाठक होते हैं । आज बीबीसी पत्रकार सुशील झा झारखंड से बिहार तक की सडक यात्रा के अनुभव और झारखंड की बदहाल होती सडकों पर अपनी कलम की धार पिजाते हुए कहते हैं ,

 

सुशील झा सुशील झा | गुरुवार, 03 जून 2010, 18:53

टिप्पणियाँ (0)

टूटा हुआ हाईवे...... आती जाती ट्रकें......घुप्प अँधेरा.....और पास में ट्रक वालों से पैसा वसूलते नौजवान.....

हाइवे का ढाबा.....तेज़ आवाज़ में बजता संगीत...कारों में नशा करते अधेड़ उम्र के लोग (हथियारों से लैस)......

ये दो चित्र किस राज्य के हो सकते हैं......बिहार कहने से पहले ज़रुर सोचें.. ये नज़ारा बिहार का नहीं बल्कि बिहार से सटे झारखंड का है. वहां लंबे समय से पत्रकारिता में रहे लोग कहते हैं कि अब राज्य में इस तरह के नजा़रे आम हो गए हैं.

पिछले दिनों झारखंड से बस के रास्ते बिहार गया. क़रीब 14 घंटों के सफ़र में जो देखा जो सुना और जो समझा वो दुखद और परेशान करने वाला था.

पहले जब मैं इसी रास्ते पर बस से बिहार जाता था तो रात में ख़राब सड़कों पर नींद टूटती थी तो बस के लोग कहते थे. अरे चलो बिहार की सीमा में आ गए. इस बार बिहार की सीमा में प्रवेश करने के बाद ही सड़कें ठीक मिलीं.

कहते हैं 2004 के बाद सड़कों का निर्माण और रख रखाव ठप्प पड़ता जा रहा है याद आया पश्चिमी सिंहभूम के एक इलाक़े में सड़क के ठेके को लेकर मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को काफ़ी परेशान हुए थे.

ढाबों पर नशा करते लोग संभवत छोटे ठेकेदार थे जो हथियारों से लैस भी थे यानी जान माल सुरक्षित नहीं. इनमें से एक भी आदिवासी नहीं था. महिलाओं के प्रति इन लोगों की भावना को घटिया ही कहा जा सकता था.

रास्ते में बस ख़राब हुई और अंधेरे में पांच घंटे रहने पड़े. बगल में नौजवान ( अधिकतर ग़रीब आदिवासी) ट्रक वालों से लूटपाट करने में लगे थे. इन पाँच घंटों में कभी पुलिस का कोई वाहन दिखाई नहीं दिया.

सड़कें नहीं.....क़ानून व्यवस्था नहीं और शायद रोज़गार भी नहीं. यह नवगठित राज्य जा कहां रहा है...

शायद बिहार के साथ भी यही हुआ होगा सालों पहले जब उसका गठन हुआ होगा. बर्बाद होते होते बिहार की यह हालत हो गई है कि अब थोड़ा सा भी विकास लोगों को बहुत अच्छा लगता है.

पूरी दास्तान वहीं पढिए , वैसे भी जिस राज्य में मुख्यमंत्री की सीट को क्रिकेट मैच की तरह खेला जा रहा हो उस राज्य का इससे अच्छा हाल हो भी नहीं सकता ।

 

इसी तरह से एक और मंच है नवभारत टाईम्स ब्लोग्स का जहां नवभारत टाईम्स हिंदी समाचार पत्र से जुडे पत्रकार साथी अपना ब्लोग लिखते हैं । हिंदी ब्लोग्गिंग में समान रूप से सक्रिय भाई आलोक पुराणिक जी और भाई प्रियरंजन झा जी वहां भी बहुत सक्रिय दिखते हैं ।आज अपने ब्लोग अकथ्य पर सुश्री पूजा प्रसाद ने एक सवाल रखा है

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क्या वेटर आपका गुलाम है?

पूजा प्रसाद Thursday June 03, 2010

हरिवंश राय बच्चन ने अपनी जीवनी में एक जगह कहा है - गुलामी के संस्कार पीढ़ियों तक नहीं जाते। जब मैं होटल-रेस्टॉरेंट्स में लोगों को वेटर्स को टिप देते हुए देखती हूं तो यही लगता है।
किसी को गुलाम समझने में या खुद से कमतर समझने में जो खुशी हमारी रीढ़ की हड्डी से हो कर गुजरती है, हमें अपनी सेवाएं देने वालों को दी जाने वाली बख्शीश इसी खुशी का इनडाइरेक्ट एक्सटेंशन है। बात जरा कड़वी है मगर सोच कर देखिए क्या सच नहीं है? और जिस तरह से टिप लेने वाला खुश होता है, क्या वह इसी सामंती जीन का असर नहीं है?

जबकि असल बात तो यह है कि कोई वेटर जब विनम्रता से आपको मेन्यू दे कर, ऑर्डर ले कर खाना परोसता है, तो वह अपना काम कर रहा होता है। ठीक वैसा ही काम जैसा कि मैं एनबीटी डॉट कॉम में करती हूं या फिर आप अपने ऑफिस में कर रहे हैं। इस जॉब के बदले में महीने के अंत में हम सभी को एक अमाउंट मिलता है जिसे हम सैलरी कहते हैं। किसी वेटर, किसी अकाउंटेंट या किसी जर्नलिस्ट को हर महीने उसके काम के एवज में सैलरी मिलती है। अब जरा बताइए, कैसा लगेगा एक अकाउंटेट को जब उसका बॉस शाम को जाते समय उसकी टेबल पर कुछ चिल्लड़ रख जाए और मुस्कुरा कर चलता बने?

 

क्या कहा थकान महसूस होने लगी , लो जी खाने का भी इंतज़ाम कर रखा है ,नाश्ते में राम लड्डू पेश कर रही हैं निशा मधुलिका जी , जाईये सीखिए , बनाईये और सबको खिलाईये

| नाश्ता | राम लड्डू (Ram Laddu Recipe)

राम लड्डू (Ram Laddu Recipe)

निशा मधुलिका - - 310 बार पढ़ा गया

Font size: Decrease <br />font Enlarge <br />font

image Ram Laddu Recipe

लड्डू सामान्यतया मीठे होते हैं लेकिन राम लड्डू नमकीन होते हैं और हरी चटनी और मूली के लच्छे के साथ खाये जाते हैं . दिल्ली में राम लड्डू का ठेलें आप लगभग हर बाजार में देख सकते हैं, गोल गोल गरमा गरम राम लड्डू कढ़ाई में तलते देख इन्हैं खाने के लिये मन कर जाता हैं

 

भाई आलोक रंजन कहते हैं कि चुप ही रहता हूं , मगर पोस्ट देख कर लगा कि लो कल्लो बात इतनी चुप्पा चुप्पी में ही इत्ता धमाका देखिए

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Wednesday, June 2, 2010

लो जी बोलने का मौका फिर आ गया... मुंबई के बांबे हॉस्पीटल में बिजली आखिरकार आ ही गयी... पूरे तीन दिनों बाद यहां पर बिजली रानी के कदम पड़े हैं... तीन दिनों तक बिना बिजली के ये हॉस्पीटल चलता रहा... जेनेरेटर की मदद ली गयी.. ताकि इमरजेंसी सेवाओं पर बिजली के नहीं होने का असर ना पड़े... अमां ये बिजली भी बड़ी अजीब है... रहने से भी दिक्कत ना रहने से दिक्कत... और किसी पर गिर पड़े तो भइया समझो कि बस काम पूरा हुआ... दुनिया में अब उसके लिए कोई काम बचा ही नहीं... लेकिन मुझे तो बांबे हॉस्पीटल में बिजली नहीं होने के पीछे बड़ी साजिश लगती है... कोई बड़ा षडयंत्र लगता है... कहीं जानबूझकर तो बांबे हॉस्पीटल की बिजली गायब तो नहीं कर दी गयी... अब आप सोच रहे होंगे कि भला इसमें कैसी और किसकी साजिश हो सकती है... तो जनाब लगता है आप लोगों का ध्यान हॉस्पीटल के नाम की तरफ नहीं गया... बांबे हॉस्पीटल... अब भी समझ नहीं आया

समझ नहीं आया तो जाईये पोस्ट पढिए और समझिए न …..

 

पढाई लिखाई नाश्ता वैगेरह के बाद थोडा गीत संगीत हो जाए तो ….देखिए आज प्रतिभा जी ,क्या सुनवा रही हैं

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Wednesday, June 2, 2010

हमारी सांसों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है..

आज अपने ब्लॉग पर पहला ऑडियो दे रही हूँ.
इस सुरीले आगाज़ के लिए नूरजहाँ की आवाज से
बेहतर भला क्या होगा...

 

बहुत कोशिश के बावजूद वो औडियो यहां नहीं लोड हुआ , अच्छा ही हुआ अब आप जाकर उनकी पोस्ट पर ही इसका लुत्फ़ उठाईये , वर्ना यहीं  से सुन कर खिसक लेने का रिस्क ज्यादा दिख रहा था हमें …..तो जाईये और वहीं सुनिए

Posted by pratibha at 12:18 PM

आगे बढा तो प्रतीक माहेश्वरी एक दृढ फ़ैसला लेते हुए दिखे , जिसमें एक राजनेता के  कत्ल होने की दास्तान थी । देखिए न

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एक दृढ़ फैसला 

बुधवार, २ जून २०१० comments: 7

Posted by Pratik Maheshwari at ११:५३ PM

मोहित एक सर्वगुण और सम्पूर्ण परिवार का लाडला बेटा था | बड़ा भाई डॉक्टर बन गया था और बड़ी बहन भी अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने ससुराल जा चुकी थी | मोहित पिछले ५ सालों से बाहर ही था और अपनी पढ़ाई ख़त्म करके वो वापस घर आया था |
मोहित में बदलाव ज़बरदस्त था और उसके सोचने-समझने-परखने की शक्ति लाजवाब हो गयी थी | कॉमर्स लेकर पढ़ने के बाद भी उसका रुख अपने देश, अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने का था | वह केवल बोलना और सुनना नहीं चाहता था.. कुछ करना भी चाहता था | कुछ अनुभवी लोगों से विचार-विमर्श करके उसने एक फैसला लिया.. एक दृढ़ फैसला |

बताईये कि क्या ये फ़ैसला सही था या गलत ?

 

आगे राधारमण जी ने सूचना देते हुए बताया कि नहीं रहीं उजरा बट ,

 

Wednesday, June 2, 2010

नहीं रहीं उजरा बट

प्रसिद्ध थियेटर अभिनेत्री और भारतीय अभिनेत्री जोहरा सहगल की बहन उजरा बट का पूर्वी पाकिस्तान के सांस्कृतिक शहर लाहौर में निधन हो गया है। वह ९३ वर्ष की थीं। बट ने अपना अंतिम स्टेज कार्यक्रम २००८ में दी थी। उन्होंने अपना ९३ वां जन्मदिन २२ मई को अपने दोस्तों और परिवार के साथ मनाया था।

भारत में उत्तराखंड के रामपुर में १९१७ में जन्मी बट ने अपने कैरियर की शुरुआत नृत्यांगना के रूप में १९३७ में की थी। १९४० और १९५० के बीच वह प्रसिद्ध पृथ्वी थियेटर की महत्वपूर्ण महिला में शुमार हो गई। उन्होंने ख्वाजा अहमद अब्बास के नाटक जुबैदा में अभिनय किया और पृथ्वीराज कपूर के साथ महत्वपूर्ण रोल की। पृथ्वी थियेटर के साथ कई वर्षों तक जुड़ी रही बट ने शंकुतला, पठान, किसान, गद्दार और दिवार में अपनी बहन जोहरा के साथ काम किया और लगभग पूरे अविभाजित भारत का अपने समूह के साथ दौरा की। लेकिन १९६४ में वह अपने पति हामिद बट के साथ पाकिस्तान चली गईं। वे रावलपिंडी में शांति का जीवन गुजारने लगीं। बाद में अक्टूबर १९८५ में वह अजोका थियेटर में शामिल हो गईं।

स्तुति पांडे

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अपने अलग अंदाज़ में कभी राबर्ट की भोजपुरी दिखवाती हैं तो कभी डेबी से मिलवाती हैं जाईये आप भी मिल कर आईये

Wednesday, June 2, 2010

डेबी की डेस्क


डेबी मेरे साथ आई बी एम् में काम करती थीं. वो पिछले १३ साल से आई बी एम् से जुडी हुई थीं, कल उनका विदाई समारोह था. दो वर्ष पहले वो फ्लोरिडा से कोलोराडो ऑन-साईट काम करने के लिए स्थान्तरित हुई थीं. फ्लोरिडा वाला घर बेचा, बच्चों से दूर हुयीं, पोते-पोती और नाती-नातिन से भरा पूरा परिवार छोड़ कर अकेले यहाँ आयीं. अकेले इसलिए क्यूंकि तलाक हो चुका है. यहाँ आकार फिर से नए सिरे से शुरुवात की ही थी की उनके जाने की घोषणा कर दी गयी. डेबी के हिस्से का काम इंडिया आउट सोर्स कर दिया गया.

लीजीए अब परमजीत बाली जी की चिंता पर भी गौर फ़रमाईये जरा

क्या आपको भी अपने फिगर की चिन्ता नही है....?

Thursday, June 3, 2010

आज नेट पर घुमते हुए एक विचार मन मे आया कि नर-मादा दोनों मे से किसे अपनी फिगर की चिन्ता ज्यादा सताती है.......इसी बारे मे खोज कर रहा था कि अनायास ही यह कार्टून हाथ लग गया....सोचा कि आप तक भी इसे पहुँचाया जाए......जरा संभल कर देखे:)

 

अब आगे रेणु दीपक उर्फ़ पुखराज जी

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की कविता की इन पंक्तियों का मजा लीजीए ,

Wednesday, June 2, 2010

धुआं धुआं हो गयी नज़र

तेरे इंतज़ार को पाले ने मारा है ,

एक ज़लज़ला उठा है फिर

मलबे तले जीवन हारा है ,

अंतहीन तलाश है जाऊं कहाँ

लोग कहते हैं नाकारा है ,

तेरी यादों को भूलने के दर्द ने

लकीरों में तेरा नाम उभारा है ,

पूरी कविता को आप पोस्ट पर जाकर पढिए और सराहिए ……

 

मिलिए एक नए ब्लोग से

Wednesday, June 2, 2010

भारत माता की वीर पुत्री, झांसी की रानी।

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

आप सोच रहे होंगे बस आगे आगे ही भागे जा रहे हैं , अजी खुशखबरी भी सुनिए जी किसने रोका है भाई

खुशखबरी... खुशखबरी... खुशखबरी... ब्लोगिंग से कमाई शुरू

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Author: जी.के. अवधिया | Posted at: 9:55 AM | Filed Under: कमाई, टिप्पणी, ब्लोगिंग

आप तो जानते ही हैं कि आजकल विज्ञापन का जमाना है और आप विज्ञापन के महत्व को भी अच्छी तरह से समझते हैं। ये विज्ञापन चीज ही ऐसी है कि किसी उत्पाद को बाजार में आने के पहले ही सुपरहिट बना देती है। अच्छे से अच्छा उत्पाद विज्ञापन के अभाव में पिट जाता है और सामान्य से भी कम गुणवत्ता वाला उत्पाद विज्ञापन के बदौलत हिट हो जाता है। तो फिर आखिर अपने ब्लोग का अन्य ब्लोग में विज्ञापन करने में बुराई ही क्या है?
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  • आपकी टिप्पणी में एक लिंक के लिये रु.200 मात्र
  • आपकी टिप्पणी में दो लिंक के लिये रु.300 मात्र
  • आपकी टिप्पणी में तीन से पाँच लिंक के लिये रु.500 मात्र
  • हमारे ब्लोग के साइडबार में आपके ब्लोग का विजेट लगाने के लिये रु.2000 प्रतिमाह मात्र

खुशखबरी के बाद एक जरूरी सूचना भी ले लें

 

पूरे भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नम्बर बदले: हिन्दी-अंग्रेजी में पूरी सूची उपलब्ध

Posted in national highway number, छत्तीसगढ़, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक प्रस्तुतकर्ता बी एस पाबला on Thursday 3 June 2010

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पिछले कई दिनों से मैं सड़क मार्ग द्वारा अपने उत्तर-पश्चिम भारत भ्रमण की रूपरेखा बना रहा हूँ। हालांकि तकनीक के विकास ने हमें बहुत सी सुविधाएँ दे दी हैं। चाहे वह गूगल लैटीट्यूड व गूगल मैप्स का मार्ग-दर्शन हो या प्यारी सी आवाज़ में जीपीएस नेवीगेशन के सहारे रह-रह कर दिए जाने वाले दिशा-निर्देश। फिर भी कई चीजों को धरातल पर रह कर किया जाना सुरक्षित रहता है!

 

चलिए आज के लिए इतना ही काफ़ी है , अरे भाई आपके लिए नहीं मेरे लिए ……..अभी और भी बहुत कुछ पढना लिखना है जी , रेडियो भी सुनना है , समाचार भी सुनना है जी ……और और और ….सब आपही को बताएंगे क्या ॥

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