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रविवार, 29 जनवरी 2012

सतियानासी मोबाइलवा










उस दिन एक ठो सहकर्मी दोस कहे कि चलिए एक ठो नयका मॉडल का मोबाइल दिलवाइए , हम कहे कि तो ई में हमको काहे ले जा रहे हैं महाराज , हम तो टेक्नीकली एतना स्ट्रॉंग हैं कि कै मर्तबे तो अपना मोबाइल का मॉडल का नाम ही भूल जाते हैं । खैर उनके साथ हम भी लद के दुकान तक चल दिए । उहां मित्र जी मोबाइल दिखाने वाली बालिका से मित्र ने फ़ोन खरीदने से पहिले टोटल जानकारी मांग लिया ,कैमरा , एफ़एम ,इंटरनेट , जीपीएस , जीपीआरएस , और जाने कौन कौन आईएएस आईपीएस तक सब कुछ , बालिका भी हुलस के सब को एकदम डिटेल में समझा बुझा दी । मित्र से हम धीरे से बोले , अमां ई तो पूछो बे कि फ़ोन से फ़ोन तो किया सुना जा सकेगा न बढियां से , दोस हमको ई निगाह से देखे मानो कह रहे हों ...इह्ह्ह्ह! रहिएगा झा जी के झा जी न । अरे ई कौनो पूछने वाला बात है जी । आगे हम चिंतन मोड में चले गए 


हम सोच रहे थे कि अब ई ससुरा मोबाइल खाली दूरभाष नय रहा । बल्कि ई कहें कि दूरभाष के अलावे ही सब कुछ हो गया तो साईत ठीक रहेगा । माथा को थोडा डोलाके जब विसराम पोजीसन में लाकर हिसाब किताब लगाए तो देखे कि अरिस्स सरबा ई मोबाईलवा तो बहुत कुछ को लील गया जी । एक समय हुआ करता था , चिट्ठी पत्री वाला जमाना ऊ में भी हमारे जैसा चिट्ठकडा । एक लंबर के चिट्ठी लिखडुआ बन गए थे । हालत ई कि नौ ठो पत्र मित्र के अलावे रेडियो, समाचारपत्र , पत्रिका आदि में घनघोर रूप से चिट्ठई चलता था । गाम में मां को लिखी चिट्ठी अब भी उनका बक्सा में धरल है ।जानते हैं कि मां एक एक चिट्ठी को पचास पचास बार बढ जाती थी । पहिले फ़ोन फ़िर ई मोबाईल पूरे रामखटोला को बंद कर दिया । फ़ोनवे पर परनामपाती हाल समाचार डायरेक्ट फ़ेस टू फ़ेस ,बस हो गिया बंटाधार लेकिन कभी मोबाइल पर मां से ऊ बात सब नय कह सके जो चिट्ठी में तफ़सील से कहते थे । 

अरे चिट्ठी आ पेजर को मारिए गोली ई मोबाइलवा तो ट्रिन ट्रिन वाला फ़ोनवो को डुबा दिहिस । घनन घनन वाला गोलका डायल वाला मोटका फ़ोन त अब खाली इश्टार गोल्ड का पुरना सिनेमा में ही दिखाई देता है । आ फ़ोनवा के साथ एक टैम में खूबे चला फ़ोन घर अरे पीसीओ महाराज , एक एक रुपैय्या डाल के बतियाने वाला भी आ फ़ोटो स्टेट के साथ एक दू फ़ोन रखके बतियाए वाला निजि पीसीओ । अरे मानिएगा , कै मर्तबा तो लाईन लगाना पडता था । त ई मोबाइल पीसीओ , जेसीओ आऊर जेतना भी ओ था सबको गीर गया , आप लोग के इंग्लिश में बोले तो दे वर डंप्ड । लेकिन आह ,क्या मजा आता था एक रुपये का सिक्का डाल के तीन मिनट का कॉल करने में आ फ़िर आखिर का आधा मिनट में टूं .टूं ..टूं  , माने कि जो ई गपियाना चालू रखना है तो दक्षिणा बढाओ तात । और जब कौनो आसिक अपनी मसूका , रूठी हुई मासूका , सोचिए कि सुपरलेटिव डिग्री का इंतहा है ई पोजीसन मासूका का , उसको फ़ोन अप्र दुनिया के तमाम परपोगेंडा करके मनाने के लिए एक दर्ज़न सिका मुट्ठी में धर के आपसे अगिला नंबर पे टकर जाए तो तीन सिक्का के बाद आप दुनिया के तमाम लैला मजनूं को भरपेट गरियाए बिना नहीं रह सकते थे । आज ई मोबाईलवापे तो परेम संदेस को भी फ़ारवर्ड टू ऑल करके पूरे परेम का फ़ेम बजा डाला है रे बबा । 

गाम में होते थे तो कनपट्टी से रेडियो सटले रहता था हर हमेसा ही । पूरा दिन आ रात एवररेडी मनोरंजन समाचार सबे कुछ । दिल्ली आए तो पता चला कि एन्ने शर्ट वेव कौनो बनमानुस आउर एम एम घरेलू बुझाता है ।खैर बहुत समय तक कीन कीन कर रेडियो सुनते रहे । अब ई मोबाईल पांडे का भीतर एक दर्ज़न से जादे एफ़एम चैनल धर लेता है , आ कमाल ई है कि चौबीसों घंटा बौखता रहता है । कान में कनट्ठुस्सी लगाए गर्दन टेढा किए मोटरगाडी को चलाते बतियाते दिख जाएं तो समझ जाइए कि मोबाइलीटाईटिस से पीडित हैं कौनो । कैमरा का हाल तो पूछिए मत ,ओईसे तो डिजिटल कैमरा आ मूवी कैम जैईसन इनका अपना वसंज सब ही पुरना कैमरा का बेडा गर्क किया है अब त सुने हैं कोडक वाला सब दिवालिया घोषित हो गिया बेचारे सब , लेकिन मोबाइल के हाथ में आने से कुकर्म से सुकर्म टाईम का तमाम चित्रकारी आ भित्तिकला से ससिकला तक का पिरदरसन कर रहा है भाई लोग । मोबाइलवा का कैमरा देख के ही पहली बार जाने बूझे कि मेगा पिक्सल भी कोई चीज़ होता है आऊर ऊ गाडी के एक्सल से अलग होता है । 

चलिए एतना सब तो झेला जाता है फ़िर भी लेकिन ई मोबाइलवा जौन ची सबसे जादे खतम हो गया ऊ है अपना आज़ादी , अपना एकांत , अपना सुकून ..जब देखो तब टूं टूं टूंटूटूटू ..कन्ने हैं का कर रहे हैं , का करने जा रहे हैं , का कर के आ रे हैं , बिल्लैय्या रे बिल्लैय्या ..अबे ई मोबाईल हौ कि जसूस रे । कै बार तो मन किया  कि उठा के फ़ेंक दें टेंटुआ दबा के इसका लेकिन अब तो कंपलसरी सबजेक्ट हो गया ही सतियानासी मोबाइलवा । जादे लिखेंगे न तो सोनी का किराईम पेट्रोल वाला सब आ जाएगा लडने ,काहे से कि उ सबका टोटले केस मोबाईले से सुलझा लेता है । 

15 टिप्‍पणियां:

  1. " क्या से क्या हो गया ... तेरे प्यार में ... "

    आज तो पूरा भड़ास निकले है लगता है ... ;-)

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  2. करारे व्यंग्य के साथ ही साथ रोचक और मजेदार पोस्ट ..

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 30-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  4. रोचक ... सत्यानास तो सच ही हो गया है मोबाईल से

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  5. लेकिन मोबाईल ख़रीदा कौन सा दोस ने.... :))

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  6. बेहतरीन ,
    आभार !!

    See :
    ब्लॉगर्स मीट वीकली (28) God in Ved & Quran
    http://hbfint.blogspot.com/2012/01/28-god-in-ved-quran.html

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  7. जान का दुश्मन भी बन गया है ई मोबईल्वा .

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  8. बहुत बढि़या प्रस्‍तुति ।

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  9. बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।

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  10. हाहा.. खूब बढ़ियाँ लिखे हैं आप.. पढ़कर दिल गार्डन-गार्डन हो गया बस..
    पर ई सत्तानाशी मोबाइलवा का कछु होवे नाही.. अब तो जिन्दगी का ईंटेग्रल पार्ट हो गया है ई ससुरा..

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  11. बाबू रे बाबू...भोरे भोर एतना हँसेंगे तो दिन भर का कोटवे खतम हो जाएगा...फिर भरे दिन मुंह लटका के बैठ रहना पड़ेगा...

    एकदम धुआंधार मोबाइल पोस्ट है...हमको ई बला लाइन बहुत्ते बढ़िया लगा... 'दिल्ली आए तो पता चला कि एन्ने शर्ट वेव कौनो बनमानुस आउर एम एम घरेलू बुझाता है ।'

    वैसे हमको भी चिट्ठी लिखने का घोर बीमारी था...बहुत्ते लंबा लंबा चिट्ठी लिखते थे...चार फुल्स्क्रैप पन्ना से कम लिखने में घोर बेइज्जती फील होने लगता था...एकदम पिरेम में डुबा डुबा के दोस्तीनी सब को चिट्ठी लिखे...हाँ कईहो अपने लिए लभलेटर नई लिख पाए कि माई का बहुत्ते डर था...हाँ दोस्त सब के लिए खूब्बे लिख के दिए...उसमें से कई ठो अभियो तक थैंक यू टिका जाती है :) अभी भी मूड में आते हैं तो चिट्ठी लिखते हैं एक आध ठो दोस्त को :)

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पढ़ लिए न..अब टीपीए....मुदा एगो बात का ध्यान रखियेगा..किसी के प्रति गुस्सा मत निकालिएगा..अरे हमरे लिए नहीं..हमपे हैं .....तो निकालिए न...और दूसरों के लिए.....मगर जानते हैं ..जो काम मीठे बोल और भाषा करते हैं ...कोई और भाषा नहीं कर पाती..आजमा के देखिये..

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