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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

भूत का कुनबा




पुराने समय की बात है , एक गाँव में अकाल पड गया | सुखी समपन्न और भरे पूरे लोगों को छोड़ कर अन्य सबको खाने के लाले पड़ गए | संपन्न सेठ साहूकार और उनके परिवार तो मज़े में ज़िंदगी काट रहे थे , किंतु गरीब किसानों का  जीना दूभर हो गया था | बांकेदास का परिवार भी इस गरीबी की चपेट में आ गया था | बांकेदास ने जब देखा कि यहां तो अब भूख से सबकी मृत्यु ही हो जानी है तो उसने निश्च्य किया कि वह स्वयं परिवार के सभी पुरुषों  के साथ पास के गावों कस्बों में जाकर कोइ काम मजदूरी ढूंढ कर अपने परिवार के लिए कुछ खाने पीने का इंतज़ाम करेगा | कुनबे के सभी पुरुष सदस्यों को कल प्रातः निकलने को तैयार रहने के लिए कह दिया गया | 


अगली सुबह बांकेदास अपने भाईयों भतीजों व् कुनबे के अन्य पुरूष सदस्यों  के साथ घर से निकल पड़े | चलते चलते सुबह से शाम हो गयी किन्तु उन्हें अब तक कोई ऐसा ठिकाना या काम नहीं मिला जिससे उनका मकसद पूरा हो पाता | साँझ होने को आ रही थी और सभी थक कर चूर हो गए थे | गाँव कस्बों से काफी दूर आगे आने के बाद एक पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे पूरे कुनबे ने रात बिताने की सोची | शुक्ल पक्ष अपने चरम पर था और पूर्णिमा से पहले की चांदनी में चाँद की चमकीली रोशनी से सारा वातावरण शीतलमय हो रहा था | 


ऐसे में बांकेदास ने देखा की पास में ही मूँज के बड़े बड़े झाड़ लगे हुए हैं मानो मूँज का जंगल उगा हुआ हो | उसके दिमाग में एक तरकीब आई | उसने अपने कुनबे के सदस्यों को पास बुलाकर कहा की क्यों न रात में इस मूँज को काट कर उसकी बंटाई करके डोरियाँ रस्सियाँ बना ली जाएँ और सुबह होने पर उन्हें बाज़ार में बेच कर थोड़े पैसे कमाए जाएं | बात सबको भा गयी | फिर क्या था सबने आनन् फानन में मूँज के बड़े बड़े गट्ठर काट कर इकट्ठा कर लिए और आमने सामने मिल कर बैठ उनकी गुंथाई बंटाई करने लगे | साथ ही साथ पूरा कुनबा मिल कर जोर जोर से गाता जा रहा था ..आज तो मिल के बांधेंगे , आज तो मिल के बांधेंगे | 



उस पीपल के वृक्ष के ऊपर रहने वाले एक प्रेत , जो कि यह माज़रा बहुत देर से देख रहा था अचानक ही यह सुन कर डर गया | उसने मन ही मन सोचा हो न हो ये कोइ विशेष दल आज मुझे बांध कर ले जाने आया है | जैसे जैसे आवाज़ बढ़ती जाती प्रेत का दिल डर से बैठा जा रहा था | उससे अब नहीं रहा जा रहा था उसने नीचे उतर कर सीधा बांकेदास के सामने पहुँच कर उससे कहा ," हे वीर पुरुषों आप सब मुँझे न बांधें मैं यहाँ कई युगों से ऐसे ही उन्मुक्त और भयरहित हो कर रहा हूँ | आप चाहें तो इसके बदले में मुझसे अनन , धन ,वेभव् जो चाहे ले लें `|

बांकेदास को सारी बात समझते देर नहीं लगी , उसने बड़ी चतुराई से प्रेत से अपने पूरे कुनबे के लिए एक वर्ष का भोजन गुजारे की अन्य सामग्री मांग ली | सारा अनाज , कपड़े व् अन्य सामग्री लेकर बांकेदास अपने गाँव वापस आ गया | गाँव के सेठ साहूकारों को जब यह बात पता चली तो वे सब बांके दास से इस बाबत पूछने लगे | बांकेदास सीधा सरल किसान था उसने सारी राम कहानी उस सेठ को सूना दी | 


सेठ के मन में यह सुन कर लालच आ गया उसने सोचा कि यदि इस तरकीब से मैं मेरा कुनबा भी  अन्न धन ले आएं तो हम और भी अमीर हो जाएंगे | अगली सुबह उसने जैसे तैसे अपने कुनबे के पुरुष सदस्यों को तैयार किया की बाहर जाकर परिश्रम करके अधिक धन कमा कर लाना है | सारे पुरुष सदस्य इस बात का विरोध करने लगे ,क्योंकि वे साधन संपन्न होने के कारण बहुत ही सुस्त व् आलसी हो गए थे | जैसे तैसे  वे उस पीपल के वृक्ष तक पहुँच गए किन्तु मूँज काट कर लाने की बात पर वे आपस में एक दूसरे से नोक झोंक करने लगे |खैर थोड़ी बहुत मूँज काट कर लाने के बात उसको गूंथ कर डोरी बनाने की बारी आई तो वे आपस में लड़ाई कुटाई तक करने लगे | ऊपर से बैठे प्रेत ने यह सब देखा तो नीचे उतर आया | सेठ जो पहले से इओस क्षण की प्रतीक्षा में व्यग्र बैठा था , लपक कर प्रेत के सामने पहुंचा और कहा हमें ढेर सारा अन्न धन दो नहीं तो हम सब तुम्हें बाँध कर ले जाएंगे | 


प्रेत ने पास ही पड़ा अपना मोटा लट्ठ उठाया और सेठ को पीटने लगा , प्रेत ज़ोर ज़ोर से कहता जा रहा था , तुझसे अपना कुनबा तो बांधा जोड़ा नहीं जा सका अब तक तू मुझे बाँधने का बात करता है " | सेठ और उसका कुनबा अपनी जान बचा कर भाग खड़े हुए |
सीख : आपस में बंधा हुआ जुड़ा हुआ कुनबा ही शक्तिशाली होता है |        

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी सीख .. सच है जो अपने घर को नहीं संभाल सकता वह दूसरों को क्या ख़ाक संभालेगा

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया और आभार आपका कविता जी

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  2. बहुत सुन्दर शिक्षाप्रद प्रसंग

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (03-10-2015) को "तलाश आम आदमी की" (चर्चा अंक-2117) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. आपका शुक्रिया और आभार शास्त्री जी

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  5. एकता और सहयोग में ही शक्ति है...बहुत रोचक शिक्षाप्रद कहानी..

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  6. शिक्षाप्रद कहानी ........बेहतरीन

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पढ़ लिए न..अब टीपीए....मुदा एगो बात का ध्यान रखियेगा..किसी के प्रति गुस्सा मत निकालिएगा..अरे हमरे लिए नहीं..हमपे हैं .....तो निकालिए न...और दूसरों के लिए.....मगर जानते हैं ..जो काम मीठे बोल और भाषा करते हैं ...कोई और भाषा नहीं कर पाती..आजमा के देखिये..

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