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गुरुवार, 6 मार्च 2008

अबके कईसन है ई फाग बबुआ ?

कहीं छाई है उमंग,
तो कहीं मचा हुडदंग,
अबके आया गजब है ,
ई फाग बबुआ॥

पिच्करिया सब फेल हुआ,
रंग हुए बेरंग,
पेट्रोल पीके, बाबा ठाकरे , देखो,
उगले हैं कतना आग बबुआ॥

मुम्बई बुन गया पाकिस्तान,
काफिर बन गए बिहारी,
शिवसेना का फतवा निकला,
मुम्बई से निकल , भाग बबुआ॥

कहाँ गया , प्रेम मोहब्बत,
खेल-खेल रही सियासत,
जात, धर्म और भाषा भी,
अब बन गए हैं नाग बबुआ॥

बाबा ठाकरे हो गए बीमार,
चढ़ गया दिमागी बुखार,
कुढ़-कुढ़ बाबा कुछ कर न बैठें,
अईसन जतन में तू लाग बबुआ॥

यूं भी बढ़ रहे हैं पाप,
नित नए लग रहे हैं घाव,
फ़िर समाज को काहे , दे रहे हो,
एक नया और दाग बबुआ॥

चलो माना की हम लौट जायेंगे,
आपका,अपना , सब सौंप जायेंगे,
का मुम्बई बन जायेगा मल्येसिया, काहे मराठियों को,
दिखा रहे हो सब्जबाग बबुआ॥

मुंह से बहुते गंद निकाला,
सबकुछ तहस-नहस कर डाला,
फगुआ में त दिल मिला लो,
छोडो अब ई खटराग बबुआ॥

अरे ओ बाबा , और कौनो काम नहीं है का, अरे होलिया में त खुश रहा हो ..

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया !!
    अरे ओ बाबा , और कौनो काम नहीं है का, अरे होलिया में त खुश रहा हो ॥

    और ये लाइन तो मस्त है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. होलिया में खुस रहें, कइसे? पुआ-पकवान कहंवा भेंटायेगा?

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब !

    हम तो इस होलिया में भी ख़ुश है और चाहते है सभी ख़ुश रहे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढिया रचना है।एक्दम सही लिखा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. achha aap log bhee keh rahe hai ta chaliye na baba ko samjhaayaa jaye.

    उत्तर देंहटाएं

पढ़ लिए न..अब टीपीए....मुदा एगो बात का ध्यान रखियेगा..किसी के प्रति गुस्सा मत निकालिएगा..अरे हमरे लिए नहीं..हमपे हैं .....तो निकालिए न...और दूसरों के लिए.....मगर जानते हैं ..जो काम मीठे बोल और भाषा करते हैं ...कोई और भाषा नहीं कर पाती..आजमा के देखिये..

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