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रविवार, 10 जुलाई 2011

द संडे हेडलाइंस ..झा जी का वन लाईनर बुलेटिन


समाचार वाचक आपके अपने ही हैं ..




विश्व का सबसे बडा लतीफ़ा :- और किसानों के साथ सबसे बडा मजाक


टॉप हिन्दी ब्लॉग :Top Hindi Blogs :- मेट्रिक के परीक्षा में टॉप है कि बी ए के खुदे देखिए



धर्मपत्नी का मतलब :- ध्यान रहे, धर्मपत्नी कतई न पढने पावे


नायक :- अनिल कपूर वाला नहीं जी , उससे भी धांसू है


गिराने से ,गिर जाने से , सरकार :- धकियाने को कबसे ही जनता भी तैयार


दुआ की उम्र :- बडी लंबी और बडी छुपी सी होती है


रैपीडेक्स टीप्पणी कोर्स , मात्र दस मिनट में टीप्पणी करना सीखें :- और ग्याहरवें मिनट में आप कमेंट टाईप करते हुए दिखने चाहिए , समझे न


लाल मेरी पत रखियो भला :- झूले लालण जिंदडी वे ..



एस पी सिंह की रचनाओं का पहला संकलन :- बताइए जब ई रिजेक्ट माल है तो एक्सेप्ट माल क्या होगा



फ़ीका रहा  आईफ़ा 2011:- काहे , मुन्नी ,सीला , रज़िया और ज़िलेबी ब्रांड मसल्ला यूज नय हुआ क्या


भगवान को भी जलन होने लगी :- global warming इफ़ेक्क्ट , बाबू भईया , global warming इफ़्फ़ेक्ट



हैदराबाद से दिल्ली : एक रोमांटिक रेल यात्रा :- या जाटां दा रोमांस सै रे भाया ..


स्वाहा :- ओम फ़ट स्वाहा ..


बिग बॉस में जाने के लिए दागी और करप्ट होना जरूरी है ;- फ़िर तो बिग बॉस के लिए कोई आस न न बनाएं मन में


सूरज की कमर में बादलों का धागा :- सिलते ही कुर्ता आखिर कौन ले के भागा


तोसे नैना  लड गए जो इक बार :- फ़ट्ट से उसी समय फ़िर पोस्ट भई तैयार


एक कैदी की डायरी :- एक युग , एक पन्ना


नेचर कॉलिंग :- कम हेयर डार्लिंग


ब्लॉग पर लगा ताला कैसे खोलें :- हम सब सुनते हैं , पाबला जी बोलें


रेलवे ने लांच की एम-टिकट की सुविधा :- अभी तो पटरी , और उलटती ट्रेनों की दुविधा


ये इज़हार हो जाते हैं :- इक पोस्ट फ़िर बो आते हैं


इंतहा हो गई ...हर बात की :- अभी एक और आएगी पोस्ट , कल रात की







मंगलवार, 5 जुलाई 2011

वन लाइनर चर्चा ---good morning headlines ---- झा जी कहिन


आपके अपने समाचार वाचक



एक संदेश बाबा रामदेव के लिए :
फ़ौरन ही पहुंचाया जाए


उधेडबुन :   
में ही इतनी सुंदर रचना


हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत हिन्दू औऱ बौद्ध आपस में विवाह कर सकते हैं,उसके बाद तलाक भी इसी अधिनियम के अंतर्गत कर सकते हैं


नसबंदी कराओ, नैनो ले जाओ...,पडोसी की नसबंदी करवा के भी ली जा सकती है क्या ?


 अजनबी,ये तो अपना सा लगता है


लापता शब्द,फ़िर भी पोस्ट टनाटन तैयार


क्या करते हो आप जब ऐसा होता है :- यही, यानि कि एक पोस्ट ठेल देते हैं 





क्या हाऊस वाईफ़ का कोई अस्तित्व नहीं है :,जी उनके बिना तो हाऊस का ही कोई अस्तित्व नहीं है


सेंसर बोर्ड को नहीं सुनाई देते अश्लील गाने,क्या बात करते हैं , सुना है वहीं सबसे ज्यादा बजते हैं ये


क्या बिहार में मुसलमान होना गुनाह है ???,जी नहीं , कहीं भी , इंसान होना गुनाह है


क्यों खुद से झूठ बोलता है :   ,क्योंकि , सबसे सेफ़ है इसलिए


खो गया है चांद  :,ओह , चंद्र ग्रहण का असर अब जाके पडा


आप इसे क्या कहेंगे , उच्च कोटि का बलिदान , नादानी या बेवकूफ़ी :- कुछ नहीं , क्योंकि इसे पढ कर कुछ कहने की औकात किसी में नहीं है


टल्ला मारने का यंत्र :-  फ़ौरन खरीद के टल्ला मारना शुरू करें आप भी

 

 तो आज की हेडलाइंस समाप्त हुई , बुलेटिन शाम के आठ बजे पुन: प्रसारित किया जाएगा नई हेडलाइंस के साथ

 

मंगलवार, 28 जून 2011

एक बौराया , भन्नाया आम आदमी - झा जी कहिन





नेट पर टहलते हुए एक आम आदमी
कुछ तथ्य मिले पिछले दिनों , सोचा आपके साथ बांटता चलूं । इन्हें पढते हुए आपको ठीक ठीक अंदाज़ा हो जाएगा कि फ़िलहाल देश , दुनिया और समाज की स्थिति कैसी चल रही है ।देश में पिछले दस वर्षों में शराब की खपत में छ: गुनी वृद्धि हुई है । बताइए ये उस देश का हाल है जहां पर सुना है कि देश के सभी राजनीतिक दल और उसके नेता जी गांधी बाबा के दर्शन को मानते हैं । वे बेचारे क्या क्या सोच कर गए थे और अब सरकार जाने क्या क्या सोच रही है । यदि यही हाल रहा तो पूरी उम्मीद है कि सरकार जल्दी ही किसी नई योजना के तहत , पाईप लाईन द्वारा सीधे घरों में मदिरा सेवन की सुविधा दे सकेगी । आखिर अब देश विश्व का सबसे बडा बाज़ार बनने जा रहा है तो इतनी सुविधाओं का हक तो बनता ही है ।



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देश में आज स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्था सुना है कि , "हॉस्पीटल टूरिज़्म "तक के स्तर पर आ पहुंचा है , कमाल की सफ़लता है ये तो , अमरीका तक के बीमार चले आ रहे हैं और ओबामा जी को रोकने के लिए बैरिकेड लगाने पड रहे हैं । लेकिन इसके बावजूद एक आम आदमी जब ईलाज़ के किसी भी अस्पताल जाता है तो उसे जो भी दवाई की पर्ची मिलती है , उसमें से आधी दवा , अस्पताल के ठीक सामने खुली दवाई की दुकान से लाने के लिए कह दिया जाता है । अब इन दोनों के बीच का अर्थशास्त्रीय रिश्ता एक आम आदमी के पल्ले तो नहीं पडता , बेशक प्रधानमंत्री उच्च कोटि के अर्थशास्री हैं उनके पड जाता हो ।



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लो जी एक और सुना जाए प्रभु । एक अनुमान के अनुसार इस देश में धर्मस्थलों की संख्या , स्कूलों की कुल संख्या की साढे चार गुनी अधिक है । वाह वाह , वाह वाह , ये होता है , सभ्य , सुंसकृत , सदाचारी , धार्मिक , सुशील , सज्जन , मगर निरक्षर देश । वैसे एक अन्य हिसाब से भी प्रति धर्मस्थल के बेनिफ़िशयरी के हिसाब से प्रति स्कूल के कर्मचारी , रोजगार की संभावना भी कुछ कम नहीं है । देख नहीं रहे हैं , एक ट्रस्ट , पूरे भ्रष्ट को अकेला टक्कर दे रहा है । सवाल सबसे बडा ये है कि जब हमने पाप करने की रफ़्तार के बराबर ही धर्मस्थल बना लिए हैं तो फ़िर ,इसे कलियुग तो न ही माना जाए न ।


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सवाल नारी के अधिकारों का उठाइए तो जरा , अरे नहीं नहीं रिजर्वेशन को मारिए गोली । संसद में रिजर्वेशन लाने से कौन सा बडा तीर चलेगा ये किसी से छुपा नहीं है ,असली मुद्दा ये है कि आखिर ये समझा ही क्यों  जाए कि नारी को अधिकारों के लिए कुछ हासिल करना है । कुछ यूं महसूस कराइए न उन्हें या वे खुद ही महसूस कर लें कि बस जो सब हैं वो हम हैं , हाड मांस निर्मित मानुस जात । लेकिन आम आदमी ठिठक तब जाता है जब सुनता है कि अबला की रक्षा हेतु तैनात होने वाली सबलाएं और सशस्त्र सबलाएं भी किसी की हैवानियत का शिकार बन गईं , मतलब , अरे , ये क्या बात हुई भला । आखिर किस कारण ने उसे अपने पिस्तौल की छ: गोलियां उस हैवान के सीने में उतारने से रोका था , तो आरक्षण से कौन सी हिम्मत पैदा करोगे


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लगभग एक साथ , एक ही पन्ने पर , प्रांत लिख कर नीचे खबर छपी होती हैं , और अक्सर छपी होती हैं । दाएं कॉलम में , जालंधर के सरकारी गोदामों में लाखों क्विटंल गेहूं बरसात के पानी में सड रहा है । बाएं कॉलम में , उडीसा के किसी जिले में दो परिवारों के भूख से मर जाने की खबर छपी होती है । आम आदमी फ़िर परेशान हो जाता है वो यही सोचता है कि जब एक जिले का रिपोर्टर अनाज की सडती बोरियों तक और दूसरा भूख से जाती जानों तक पहुंच ही जाता है तो फ़िर आखिर अन्न का दाना भूखे पेट तक क्यों नहीं पहुंचाया जा सका । अगर हो सकता तो खबर भी क्या कमाल हुआ करती , है कि नहीं ।

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आम आदमी साला चकरघिन्नी बनके घूम ही रहा होता है कि पता चलता है कि सरकार हर रोज़ अपनी नेकनीयती , अपनी ईमानदारी का सबूत खुद प्रधानमंत्री जी की ईमानदारी को कैश करवा के देने की कोशिश करती है , लेकिन शाम तक कोई न कोई मंत्री अपने कुकर्मों का कच्चा चिट्ठा खुलवा के बैठ जाता है । और करो भारत निर्माण । आम जनता जुटी तो नाम दे दिया सिविल सोसायटी , अबे ये अगर सिविल है तो तुम कौन मिलटरी सोसायटी हो , तुम भी इसी में से एक हो , और आज आगे इसलिए खडे हो क्योंकि आम जनता ने तुम्हें आगे जाने की जगह दे दी है । अगर आम लोगों का माथा फ़िर गया न तो कुचल के पीछे करेगी कुचल के ।
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फ़िलहाल आम आदमी सोच रहा है , सोचता ही जा रहा है

शनिवार, 18 जून 2011

"जनलोकपाल" नहीं "धनलोकपाल" बिल लाएगी सरकार ..झा जी कहिन



तस्वीर , गूगल से साभार 





सरकार ने आम जनता को भरपूर आश्वासन देते हुए आश्वस्त किया है कि वो सिर्फ़ लट्ठ नहीं चला रही है और काबिल मंत्री (सरकार के काबिल मंत्री वो हैं जो खूब बोलते हैं , उनका म्यूट बटन का सॉफ़्टवेयर फ़ुंक गया है ., और ज्यादा काबिल वो हैं , जो तब भी नहीं बोलते जब उन्हें बोलना होता है ) सिर्फ़ बोल बक ही नहीं रहे बल्कि ड्राफ़्ट तैयार कर रहे हैं । ओफ़्फ़ो चेक ड्राफ़्ट वाला ड्राफ़्ट नहीं जी , अब बेचारी सरकार के पास पैसे ही नहीं बचे । अब तो मजबूर होकर सरकार को अपने खाए -पीए -अघाए और अब जेल में सुस्ताए अपने सूरमाओं की जनौती संपत्ति ( जैसे बाप की बपौती होती है , जनता के जनौती होती है ) को कुर्क ज़ब्त करके अपने खर्चे के लिए सफ़ेद धन का जुगाड कर रही है , बांकी जो सारा धन था वो तो काला हो गया । अब तो वैज्ञानिक भी मन रहे हैं कि हो न हो हाल ही में जो चांद को छिपा कर रात काली हो गई थी वो भी इसके कारण ही हुई थी । तो सरकार ये कह रही है कि अब जब जनता इत्ती लाठियां खाने के बाद भी चाहती है कि सरकार कुछ और भी पेश करे तो सरकार भी अब ड्राफ़्ट तैयार करके कुछ न कुछ तो लेकर आएगी ही ।


सरकार ने थोडी तब्दीली की मंशा ज़ाहिर की है । सरकार बोले तो कुल एक जमा एक = दो मंत्री जी ने यार दी है कि चूंकि जनता ने अपने ढंग से सोचा विचारा है और इसलिए इसका नाम "जनलोकपाल " बिल रख कर सोच रही है लेकिन सरकार का सारा ध्यान इन दिनों धन पर लगा हुआ है इसलिए सरकार जल्दी ही एक "धनलोकपाल " बिल लेकर आएगी । इस बिल से सरकार धन के लिए एक ऐसा "धनलोकपाल" नियुक्त करेगी जो धन के साथ साध धनियों को एक तरह तिहाड जाने से बचने के उपाय बताए और दूसरी तरफ़ बाबा, अन्ना जैसी तेज़ नज़रों से भी उन्हें बचाने के लिए बीस सूत्री योजना बनाए । सरकार की नज़र में तो एक "धनलोकपालिका " का नाम है भी । "धनलोकपालिका जी " ठीक "नगरपालिका" की तरह ही काम करेंगीं । न "नगरपालिका" का काम दिखाई देता है और न" धनलोकपालिका" का खाता दिखाई देगा ।


धनलोकपालिका का चयन उसी योग्यता के आधार पर किया गया है जिस आधार पर बचपन में क्रिकेट टीम के कप्तान का चयन होता था , यानि जिसका बल्ला वही कप्तान और उसी हिसाब से जिसके पास सबसे ज्यादा धन वही धनलोकपाल नियुक्त हो सकेगा ..तो आइए स्वागत करिए ..देश के नए धनपालकों का  .


मंगलवार, 7 जून 2011

सवाल सिर्फ़ उन मुद्दों का है .....झा जी कहिन




आखिरकार न्यायपालिका ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार से पूछ ही लिया कि आखिर संविधान के किस कानून के तहत रात के एक बजे इतनी भारी पुलिस बल की सहायता से वहां चुपचाप सो रहे लोगों को मार पीट कर खदेडने की कार्यवाही की गई । ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय भी इन दिनों उसी काले धन के मुद्दे पर बार बार सरकार को लताड लगाने में लगा हुआ है जिसकी पेशी में सरकार हर बार बेशर्मी से साष्टांग करके कह आती है कि , खाता धारकों ने नाम पता तो हैं लेकिन बता नहीं सकते अदालत को ।सरकार को इसका जवाब देते समय ये भी बताना होगा कि जो सरकार गुर्जरों द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर पूरी उत्तर भारतीय रेल व्यवस्था तक को ठप्प किए जाने के बावजूद उन्हें टस से मस नहीं करवा पाई , एडी चोटी का जोर लगवाने के बावजूद भी पायलटों की हडताल नहीं खत्म करवा सकी उसे आखिरकार किन कारणों से ऐसा करने के लिए मजबूर होना पडा । इससे अलग जनलोकपाल बिल के लिए लड रही अन्ना टीम ने भी सरकार की इस हरकत को देखते हुए एक दिन के अनशन का ऐलान कर दिया है । अब बात रही जनता की , तो हालिया जूता प्रकरण से ये अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है कि बंद कमरों में खास इसी मकसद से पहुंचने वाले लोगों पर राजनेता अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं तो फ़िर क्या अब सार्वजनिक तौर पर उनमें आम जनता का सामना करने की हिम्मत बची है । क्या दिग्विजय सिंह और कपिल सिब्बल जैसे नेता इतनी ही बहादुरी जनता के बीच पहुंच कर भी दिखा सकते हैं । 


पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को गौर से देखने पर कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं । रामदेव बाबा ने महीनों पहले से प्रचारित कर रखा था कि रामलीला मैदान में वे और उनके साथ खडे बैठे लोग किस उद्देश्य से इकट्ठा होने जा रहे हैं । आज बेशक सरकार ये दलील दे कि उनसे अनुमति तो योग शिविर के लिए ली गई थी आमरण अनशन के लिए नहीं लेकिन क्या सरकार ये बता सकती है कि " भ्रष्टाचार मिटाओ " के पोस्टर से अटे पडे देश पर सरकार की नज़र क्यों और कैसे नहीं पडी , क्या रामदेव ने अनुलोम विलोम या कपाल भारती करने के लिए पोस्टर लगाए थे । यानि कि सरकार को बखूबी पता था कि क्या होने वाला है । सरकार की मंशा इतनी ही साफ़ थी , जैसा कि वो दिखाने जताने की कोशिश की जा रही है तो फ़िर रामदेव को होटल के बंद कमरे में बुलाकर क्यों और कैसी वार्ता की गई । सरकार ने क्यों नहीं कहा कि विदेशों में काले धन के मुद्दे से निपटने के लिए सरकार कडा कानून लाने जा रही है फ़िर चाहे उस कानून के दायरे में फ़ंस कर कोई नेता जेल जाए या या मंत्री या बाबा । कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे बडबोले नेताओं को जानबूझ कर सरकार की तरफ़ से हर बार क्यों इस तरह के मसलों से निपटने के लिए भेजा जाता है  , इसका बेहतर कारण तो वही बता सकती है । बंद कमरे में एक चिट्ठी लिखवाई जाती है , इसके पीछे क्या मंशा रही हो ये तो वे ही जानें , लेकिन फ़िर उस चिट्ठी को सार्वजनिक करना वो भी ये कहते हुए कि सरकार ने तो अपना कर्तव्य निभा दिया और  अब बाबा रामदेव को निभाना है । क्या उस चिट्ठी को लिखवाना जरूरी थी , और उसे सार्वजनिक करना भी जरूरी था । इसके बाद जो हुआ वो अपेक्षित ही था , और घटनाक्रम को तेज़ी से बदलने के लिए सरकार ने सोती हुई महिलाओं बच्चों तक पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोडने जैसा नृशंस कदम भी उठा लिया । और अब जूता प्रकरण पर मची हुई हाय तौबा । 


यानि कुलमिलाकर ये कि सरकार को अब किसी को कोई लिखित आश्वासन दिए जाने की जरूरत नहीं है कि वो स्विस जैसे काले धन को वापस लाए जाने के लिए क्या , कब और कैसे कोई कानून बनाने जा रही है । और वो मुद्दा पीछे चला गया , कम से कम फ़िलहाल तो जरूर ही सरकार ने लोगों का ध्यान उससे हटाकर अन्य बातों की तरफ़ मोड दिया है । अब इससे पीछे चलें तो जनलोकपाल बिल के लिए जब अन्ना हज़ारे ने जनांदोलन शुरू किया था तो सरकार ने अपने सारे दांव चलने के बाद एक आश्वासन देकर जान तो छुडा ली , किंतु अगले ही दिन से सीडी प्रकरण , अन्ना हज़ारे के ट्रस्ट पर उठने वाले सवाल जैसे कदम उठाने लगी । उद्देश्य स्पष्ट था कि किसी भी तरह से सरकार लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दे से भटका कर कहीं और ले जाया जाए । अब जबकि अन्ना टीम ने बैठक का बहिष्कार का निर्णय ले लिया है तो फ़िरसे सरकार मन ही मन जरूर राहत महसूस कर रही होगी कि उसे वो कानून बनाने से फ़िलहाल तो मुक्ति मिल ही गई है जिसे आधार बना कर न सिर्फ़ सरकार को बल्कि पूरी भारतीय राजनीति और राजनेताओं को जनसेवा का असली मकसद जनता समझा सकती थी । सरकार सूचना का अधिकार कानून पास करके खुद को फ़ंस जाने देने की एक गलती पहले ही कर चुकी है इसलिए अब वो जल्दी उसे दोहराने से बचना चाहेगी । 


सरकार इन सारे घटनाक्रमों में जो एक बात नहीं समझ रही है कि , अन्ना हज़ारे या बाबा रामदेव से लोगों के जुडने का कारण सिर्फ़ उनकी अंधभक्ति या उनपर अटूट विश्वास जैसा कारण ही नहीं है बल्कि जनता अब चाहती है कि उन मुद्दों को आगे लाया जाए , उनपर बहस हो , उन पर कानून बने और ये स्थिति बदले । कल एक आम आदमी के आक्रोश का शिकार होते होते बचे राजनेता को देख कर सरकार को अब ये एहसास होना चाहिए कि जनता के दिमाग में क्या चल रहा है । पूरा देश अलग अलग तरह से अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है लेकिन उद्देश्य एक ही है कि सरकार की नीयत और आचरण में बहुत खोट है । तमाम तर्कों , बहसों और आंदोलनों पर एक मिनट में ब्रेक लग जाएगा , आम लोग भी चुप्पी साध लेंगे अगर सरकार फ़ौरन ही विशेष सत्र बुलाकर इन तमाम कानूनों को बनाए क्योंकि असली मुद्दा यही है , लेकिन क्या सरकार ऐसा कर पाएगी ? बस इसी लेकिन ने आज अन्ना हज़ारे , बाबा रामदेव और जाने कितने आक्रोशित मन को हवा दे दी है ।  

रविवार, 5 जून 2011

हां अब शुरू हुई लीला ..फ़ंस गया जनांदोलन ...





इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सिर्फ़ मौजमस्ती के अपडेट नहीं लिखे जा रहे हैं , बाकायदा मुहिम चल रही है , बहस और विमर्श किए जा रहे हैं । लोग न सिर्फ़ अपनी साहित्यिक काबलियत का परिचय करवा रहे हैं बल्कि अपनी  बौद्धिक सोच , और वैचारिक क्रांति को भी जम के धारदार बना रही है । अन्ना हज़ारे द्वारा किए जा रहे जनांदोलन में फ़ेसबुक पर चली और चलाई गई एक मुहिम इंडिया अगेंस्ट करपशन ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इस जनांदोलन से जुडाव ने ही शायद बाबा रामदेव द्वारा स्थापित स्वाभिमान ट्रस्ट के मित्रों का रूख मेरी तरफ़ मोडा , और मित्रों ने ताबडतोड मुझसे सवाल किए कि , क्या मेरा समर्थन बाबा के प्रस्तावित आंदोलन को उसी रूप में है जिस रूप में मैंने अन्ना के जनादोंलन में रुचि दिखाई थी । मैं बह्त जल्दी किसी भी बात , और व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता और यूं भी  आधुनिक भारत में बाबाओं के इतिहास ने मुझे कभी भी किसी भी बाबा का अंधभक्त बनने नहीं देता है । इसलिए पुरज़ोर तरीके से न सही किंतु मैंने अपने विचार से उन्हें अवगत करा ही दिया था कि , ये सब मुझे संतुष्टिजनक नहीं दिख लग रहा है । 



अब जबकि मामला त्रिशंकु की तरह लटक गया है तो लगा कि अब समय आ गया है कि इस नाज़ुक समय पर हर आम आदमी की तरह विचार और सोच को सामने रखना ही चाहिए । प्रबुद्ध समाज का ये दायित्व हो जाता है कि वे ऐसे समय पर जबकि पूरा देश एक परिवर्तन की लडाई लड रहा है तो उससे सहमति या असहमति, विमर्श और विचारों के सहारे समाज के सामने जरूर रखे । इतिहास गवाह रहा है कि एक व्यक्ति द्वारा संचालित कोई भी पंथ , समुदाय , आंदोलन , संस्था अक्सर बहुत सी विषम परिस्थितियों में फ़ंस जाती है और अगर किसी कारणवश उस अकेले व्यक्ति से अलग हो कुछ भी तो सब कुछ बिखर सा जाता है । बाबा रामदेव के विषय में तबसे चर्चा ज्यादा तेज़ हुई थी जबसे उन्होंने योग के अपने चमत्कारिक साधन से इतर जाकर समाज की राजनीति से होने वाली लडाई के एक सूत्रधार के रूप में ये बयान दिया कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक देश व्यापी जनांदोलन की शुरूआत करने जा रहे हैं । खासकर विदेशों में फ़ंसी हुआ भारत का काला धन लाने की उनकी मुहिम ने उन्हें देश से लेकर विदेश तक की चर्चा में ला दिया । इस समय तक बाबा अपने योग गुरूत्व के बल पर एक बहुत बडी जमात अपने अनुयायिओं और उन पर विश्वास करने वालों की खडी कर चुके थे । बाबा को पूरा यकीन था कि वे जब किसी भी जनांदोलन को प्रारंभ करेंगे तो उसमें उनका साथ देने आने वाला ये जनसमूह सरकार के लिए बडी सिरदर्दी साबित होगा । 


लेकिन इसके साथ ही बाबा के इतिहास भूगोल के पडताल की कहानी भी शुरू हो गई । तहलका समेत कई खोजी पत्रकारों ने बाबा के ज़र्रे से आसमान तक के तीव्र सफ़र का सारा राज़ अपने समाचार सूत्रों के माध्यम से कर डाला । बाबा रामदेव और उनसे जुडी हुई संस्थाओं के पास हजार करोड की अकूत संपत्ति का होना , और उनका ये कहना कि वे आगामी चुनावों में सभी सीटों से अपने प्रत्याशी खडे कर सकते हैं ने इस बात का ईशारा कर दिया था कि राजनीतिक महात्वाकांक्षा का एक पुट भी कहीं न कहीं तो पनप ही रहा है । किंतु इसके बावजूद भी जब बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काले धन को वापस लाने के अनशन की घोषणा की तो मन ही मन एक आम आदमी यही सोच रहा था कि , इस सरकार के साथ यही सलूक होना चाहिए । और इसे हर तरफ़ से घेरा जाना चाहिए । बाबा ने अन्ना के जनांदोलन से अलग अपने इस आंदोलन के लिए व्यापक तैयारी करवाई । न सिर्फ़ अनशन स्थल पर करोडों रुपए का खर्च किया गया बल्कि इस मुहिम के प्रचार के लिए भी देश को कटाआऊट और बैनरों से पाटने में भी अच्छा खासा धन लगाया गया । खैर बाबा के पास था तो उन्होंने लगाया , इसमें कोई बडी बात नहीं । 



मामला तब दुविधा में फ़ंसने जैसा हो गया जब समाचार माध्यमों में खबर आई कि अनशन शुरू होने से पहले ही सरकारी मंत्रियों ने सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए बहुत सी मांगों पर सहमति दे दी है । आगे का चिट्ठी प्रकरण , सरकार का आश्वासन , कपिल सिब्बल की राजनीतिक धूर्तता और बाबा का अब इस विकट स्थिति में फ़ंसने की सारी घटनाएं जितनी तेज़ी से घटी हैं पिछले कुछ घंटों में उससे एक अजीब ही हालात बन गए हैं । बाबा खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं । पूरे देश से आई हुई भारी जनता , जाने कहां कहां बैठे सहयोगी और अनशनकर्ता आंदोलन खुद ही दुविधा में फ़ंस गए हैं । उधर सरकार अलग ताल ठोंक रही है कि जब मांगे मान ही लीं तो फ़िर अनशन क्यों ?? मामला अब ज्यादा संगीन हो गया है और स्थिति ज्यादा नाज़ुक । सरकार की बेशर्मी का आलम तो देखिए कि केंद्रीय मंत्री कितनी बेशर्मी से कहते हैं कि बाबा की मांगों को मान लेने का मतलब ये कतई न लगाया जाए कि सरकार कमज़ोर है इसलिए झुक जाती है । वो सरकार जिससे पिछ्ले कई सालों से अफ़ज़ल गुरू और कसाब जैसे आतंकियों को फ़ांसी पर चढाने की भी हिम्मत नहीं है , वो सरकार जो चुप होकर अपने मंत्रियों को पूरा देश लूटते हुए देख रही है वो सरकार भी ऐसे दावे करती है । अब ये जनांदोलन क्या रूप लेगा ये तो भविष्य की बात है किंतु इतना तय है कि सरकार इस बात को अच्छी तरफ़ समझ रही है कि आम अवाम जो आए दिनों भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनसैलाब की तरह उमड जा रही है वो सरकार की सेहत के लिए खतरे की घंटी है । रही बात अन्ना और बाबा के जनांदोलनों और अनशन पर सवाल उठाने वालों की , तो जिस दिन कोई भी राजनेता अपने दम पर इतने सारे आम लोगों को अपने साथ खडा होने के लिए सहमत कर लेगा उस दिन गैर राजनितिक लोगों को ये बागडोर अपने हाथों में उठाने की कोई जरूरत नहीं पडेगी । फ़िलहाले तो जनता यही चाहेगी कि , ये जनांदोलन भी सरकार के ताबूत में एक कील की तरह ठुक जाए । 

गुरुवार, 5 मई 2011

एक चिट्ठी रोज़ ...एक नए मिशन की शुरूआत



पिछले दिनों अपने जयपुर प्रवास के दौरान एक समाचार पर मेरी नज़र ठिठक गई । खबर कुछ इस तरह की थी कि एक विधायक ने को कि विपक्षी पार्टी के थे उन्होंने अपने क्षेत्र की समस्याओं को आधार बना कर पिछले एक वर्ष में लगभग छ: हज़ार पत्र सरकार को और संबंधित अधिकारियों को लिख दिए और ये सिलसिला बदस्तूर जारी रखा हुआ है । इसका परिणाम ये हुआ है कि सरकार को मजबूर होकर शर्म के मारे उसमें से बहुत सारे कार्य , सुधार आदि करवाने पड गए । इस खबर ने मुझे अपने बीते दिनों की याद दिला दी । 



मैं कुछ दिलचस्प बातें आज आपके सामने बांट रहा हूं । मैंने खुद यही तरीका आज से लगभग बीस वर्ष पहले अपनाया था किंतु मैं संपादकों के नाम पत्र लिखता था । अपने छात्र जीवन से लेकर नौकरी के संघर्ष के दिनों में अपने संपादकीय पत्रों से न सिर्फ़ मैंने स्थानीय मुद्दों को उठाया बल्कि स्थानीय गडबडियों को प्रकाश में ला कर , ग्राम मुखिया एवं मंडल और जिला के अधिकारियों तक को मुश्किल में डाला था ।दिल्ली में आने के बाद भी कुछ समय तक ये सब चलता रहा और रोज़ दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों से लेकर दिल्ली सरकार को पत्र लिखने का काम मैं करता किंतु  पिछले कुछ समय से ये सिलसिला थोडा धीमा पड गया था । लेकिन अब पुन: ये फ़ैसला किया है कि उस मुहिम को फ़िर से नए सिरे से शुरू किया जाए । 

आज से रोज़ एक चिट्ठी नाम के मिशन को शुरू करने जा रहा हूं और यदि आप सब इससे जुडें अपने अपने क्षेत्रों की समस्याओं को , कमियों को , गडबडियों को बार बार सरकार और उसके नुमाईंदों के सामने रखें तो यकीनन उसका प्रभाव और परिणाम जल्दी ही देखने को मिल जाएगा । ये रही मेरी पहली चिट्ठी 



शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

आईये कि आपको दिल वालों की दिल्ली बुला रही है ........ ब्लॉग महाकुंभ ३० अप्रैल २०११





   







हिंदी ब्लॉगर मिलन के लिए अब एक कुंभ स्थल का शक्ल ले चुकी राजधानी दिल्ली ने एक बार फ़िर से तैयारी कर ली है एक मिलन , नहीं नहीं महामिलन की । जैसा कि सभी हिंदी ब्लॉगर मित्र जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से हिंदी ब्लॉग लेखन , ब्लॉग पोस्टों , और हिंदी ब्लॉगर्स पर ब्लॉगर श्री रविंद्र प्रभात जी अपनी पैनी नज़र बनाए हुए हैं । वे विगत वर्षों में न सिर्फ़ हिंदी ब्लॉगिंग का वृहद विश्लेषण करते रहे हैं बल्कि पिछले वर्ष परिकल्पना महोत्सव का आयोजन अंतर्जाल पर करके उन्होंने जैसे पूरे ब्लॉगजगत को एक सूत्र में बांध दिया । अब एक नई परंपरा को स्थापित करते हुए और एक एतिहासिक पहल करते हुए परिकल्पना महोत्सव में भाग लेने वाले सभी ब्लॉगर बंधुओं के साथ ही अन्य बहुत सी ब्लॉग प्रतिभाओं को कल यानि शनिवार ३० अप्रैल ,२०११ को , नई दिल्ली के आई टी ओ चौराहे के पास स्थित हिंदी भवन में आयोजित किए जाने वाले एक भव्य समारोह में सम्मानित किए जाने का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है । श्री रविंद्र प्रभात जी के साथ ही नुक्कड डॉट कॉम के संचालक एवं हिंदी ब्लॉगिंग की नेटवर्क रीढ कहे जाने माने जाने वाले श्री अविनाश वाचस्पति जी ने भी हिंदी साहित्य सदन के साथ मिलकर ब्लॉग प्रतिभाओं को सम्मानित करने की योजना बनाई है । इन सम्मानों की सूचना एवं सम्मानित ब्लॉगरों की सूची यहां देखी जा सकती है ।


इस समारोह में न सिर्फ़ हिंदी ब्लॉगर्स को सम्मानित किए जाने का कार्यक्रम है बल्कि हिंदी ब्लॉगिंग पर लिखी एवं संपादित की गई दो पुस्तकों का लोकार्पण , न्यू मीडिया के विभिन्न आयामों पर संगोष्ठी , कई साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं एवं हिंदी साहित्य के पुस्तकों के लोकार्पण की भी योजना है ।


 

 



सबसे खुशी की बात ये है कि इस कार्यक्रम में शिरकत के लिए न सिर्द देश भर से बल्कि , बहुत सारे मित्र साथी विदेश तक से आने की सहमित जता चुके हैं । और इस पोस्ट के लिखे जाने तक बहुत सारे मित्र ब्लॉगर्स दिल्ली पहुंच चुके हैं और बहुत अपनी यात्रा शुरू कर चुके हैं । छत्तीसगढ से तो हिंदी ब्लॉगर्स का एक पूरा प्रतिनिधिमंडल ही इस ब्लॉग महाकुंभ में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाने आ रहा है । तो आप सभी जो भी हिंदी अंतर्जाल से जुडे हुए हैं , हिंदी लेखन पठन से स्नेह रखते हैं , आप सब भी इस कार्यक्रम में सादर आमंत्रित हैं । आईये दिल्ली , दिल्ली के दिलवाले और हिंदी के तमाम सेवक आपका स्वागत करते हैं ...हम बाहें फ़ैलाए आपसे मिलने को आतुर हैं इस उम्मीद में कि जीवन में कम से कम एक बार गले मिलने के इस अवसर को न तो आप गंवाना चाहेंगे न ही हम

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

नहीं खत्म हुई है लडाई ........अभी तो और लडना है भाई ...जंतर मंतर पर आज का दिन




ये वो नौनिहाल हैं जो कल अपनी इस लडाई का परिणाम देखेंगे तो खुद पर गर्व करेंगे , और ये देश भी इन पर गर्व करेगा


क्या कोई राजनीतिक दल , कोई राजनेता झुका डरा सकता है इस अवाम को ?



इस महासमर में जाने कौन कौन कहां कहां से शामिल है ......और आप ?




अब कोई नहीं कह सकता कि देश का युवा आंदोलन क्यों नहीं करता

बंद है मुट्ठी , और तनी है मुट्ठी .,..बस एक प्रहार ..और गई सरकार



ये जनसैलाब है बाबू ,,,,,,देश की जनता है ..कौन रोक सकता है इस आंधी को अब



स्कूल तो कल भी खुलेगा और पढाई कल भी होगी ...आज जो करना है वो कल नहीं होगा

इन्हें गौर से देखिए .दुनिया इन्हें नेत्रहीन कहती है ....मगर ये नेत्रहीन हैं या सरकार ....आप खुद तय करिए ..


देश की अगली पीढी ....कतार बद्ध और प्रति बद्ध  भी कटि बद्ध भी ..

यदि जोर से फ़ूंक भर मार दे , हुंकर भर ले तो पल में सियासत धूल चाटती नज़र आएगी






आप सिर्फ़ अनुभव करिए इस आग को अपने भीतर और जहां हैं वहीं से जलाइए

ये प्रवाह अब रुकने वाला नहीं है

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

जंतर मंतर से लौट कर -2 .......अन्ना की आंधी में उड जाएगी हुकूमत

देखिए कि एक संत ने फ़िर से छेड दी है आजादी की दूसरी लडाई ....और जानिए ..क्योंकि अब नहीं निकले आप अपने घरों से तो फ़िर ..कब निकलेंगें ...लिखिए पढिए ..बहस करिए ....हर तरफ़ से एक आवाज उठनी चाहिए कि जो इस बहरी सरकार के कान के पर्दों को फ़ाड के रख दे .....बताइए आप हैं न साथ ....???

रविवार, 3 अप्रैल 2011

क्रिकेट कटिंग ...कट कट कुट कुट ...झा जी कहिन ..नहीं झा जी झूमिन/नाचिन/गाईन .








दुनिया रंग रंगीली,में आके हो जाइए स्टैंड अप ,
क्रिकेट की गाथा शुरू करने से पहले , देखिए विश्व कप ।


विजय परेड के लिए तैयार हुई , बस ट्रेन और जीप,
जीत के लिए , कौन सा टोटका आजमाए खुशदीप


दुनिया की हर टीम के चेहरे पर उडा के हवाइयां ,
भारत जीता , आइला , मिठाइया -बधाइयां


जीत गया रे अपना इंडिया , बांकी टीमें गईं तेल लेने
यहां भरी हुंकार ये किसने , लो जीत है दुनिया मेने


सूनी हो गई थीं सडकें , गलियां हो गई थीं सून ,
चैंपियनों में होता है , ये कैसा जुनून ????


मोना बिल्कुल मत रोना , लिल्ली डॉंट बी सिल्ली ,
अईसे खेले ये धुरंधर , चख दिए फ़ट्टे, नप दी गिल्ली 


आज तो बधाईयों की पोस्टें एक पे एक पढ लीजीए ,
अरे अब कप अपना है , विश्च्वास नहीं तो कर लीजीए


चैंपियन वही बनते हैं , धुन के पक्के इंसां , 
कंगारू , हो या चीते , दहाड से बदल देते हैं फ़िजां


कोई चूम रहा है फ़ोटो , कोई बोले ईलू ईलू ,
आज हर तरह यही शोर है , इंडिया ब्लीडींग ब्लू


एक एक मैच में सबको धोया , इंडिया तुम कमाल हो ,
कोई दीवाना सचिन का , कई बोले धोनी, बेमिसाल हो





कंगारू बोले कायं कांय , चीता म्याऊं , दांत चियार के खीखी कर गए पाकिस्तानी बंदर ,
शिवम भाई ले के आए कुछ तस्बीरें , कि बन गए आप सिकंदर , रे बन गए आप सिकंदर


अब कोई चिंता नहीं , शंका नहीं , बचा नहीं कोई प्रश्न ,
हर ओर है है खुशियां ही खुशियां , सभी मनाए जश्न



हाय वो पल दे गया जाने कितनीं यादें खुशियों के आसूं रुला के ,
बस एक ही नारा गूंजे हवा में , इंडिया ने आखिरकार दे ही दिया घुमा के



शास्त्री जी लेकर आए ,  सुंदरी जीत की झांकियां,
झूमो देख के खुशी से आज और बजाओ तालियां ,


जीत का ऐसा शोर मचा , हर ओर ऐसी हवा चली ,
हम खुद दौडे सडकों पे , हम खुद नाचे गली गली ..






चलिए आज के लिए इतना ही फ़िर मिलते हैं जल्दी ही ..आप जश्न में डूबे रहिए ..

रविवार, 27 मार्च 2011

झा जी कहिन …..फ़िर चल पडी हमारी टरेन…….पोस्ट झलकियां

 

 

यूं तो इन दिनों रेल की पटरियों पर जाट भाई लोग लंबलेट पडे हुए हैं लेकिन अपनी टरेन ही क्या जो पटरियों की मोहताज हो .पटरी न सही सडक पर दौडा लेंगें ..लीजीए फ़िर से आपके बीच धडधडाती पहुंच गई है टरेन ..

 

day 25 March 2011

सिद्धान्त चौधरी उत्तराखण्ड घूमना चाहते हैं

प्रस्तुतकर्ता नीरज जाट जी

गाजियाबाद से सिद्धान्त चौधरी लिखते हैं:

"नीरज भाई नमन,
नीरज जी, मैं आपका ब्लॉग पिछले डेढ साल से पढ रहा हूं। आप जिस तरह से अपनी लेखनी प्रस्तुत करते हैं, मैं उसका काफी बडा प्रशंसक हूं। माफी चाहता हूं कि किसी कारणवश मैंने आपसे सम्पर्क करने का प्रयास नहीं किया। जब भी आप उत्तराखण्ड की यात्रा का सार प्रस्तुत करते हैं तो मुझे लगता है कि आप मुझे कुछ विशेष जानकारी दे सकते हैं।
देखिये, वैसे मैं उत्तराखण्ड कई बार गया हूं (हरिद्वार, ऋषिकेश, नीलकण्ठ, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, जोशीमठ, भीमताल, नैनीताल आदि)। मैं हमेशा अकेला ही उत्तराखण्ड के लिये घूमने निकला हूं। ज्यादातर मैं गलत सीजन में निकल जाता हूं (नवम्बर-फरवरी), इस कारण से मैं कभी ज्यादा आगे नहीं जा सका। रास्ते बन्द होते हैं और लोकल लोगों से आगे जाने के बारे में पूछता हूं तो मना कर देते हैं। एक बार इरादा भी बना लिया था कि अबकी बार दिसम्बर में बद्रीनाथ जाना है लेकिन पाण्डुकेश्वर से आगे आर्मी वालों ने मना कर दिया। वास्तव में मेरे पास टाइम भी कम होता है इसलिये मैं प्लानिंग को ठीक तरह से मैनेज और एप्लाई नहीं कर पाता। एक बात और, मैं ज्यादा से ज्यादा यात्रा को पैदल चलकर पूरा करता हूं।

 

 

 

शनिवार, २६ मार्च २०११
टीवी का दख़ल

अचरज और पाखी के पैदा होने के पहले ही शांति ने अपने बच्चों के बारे में तमाम कल्पनाएं कर रखीं थीं। और अपने बच्चों को वो क्या सिखाएगी और क्या बनाएगी, इसकी एक मोटी रूपरेखा भी उसके और अजय के ज़ेहन में थी। हालांकि बच्चों के जन्मने के बाद से उसकी काल्पनिक रूपरेखा में काफ़ी बदलाव भी आया। उसने सोचा था कि वो पाखी को संगीत ज़रूर सिखाएगी ताकि वो उसकी नानी की तरह सुरीला गा सके। हालांकि पाखी का गला अच्छा है मगर उसे संगीत में दिलचस्पी ही नहीं। उंगलियों को कीपैड पर बार-बार दबाने से जो संगीत पैदा होता है आजकल उसी से पाखी का जीवन संचालित होता है। अचरज के लिए उसने सोचा था कि वो अपने दादा की तरह अकैडमिक्स में जाए। जब अचरज पुरानी धोतियों की लंगोटियाँ ही पहन रहा था, तभी अजय और शांति ने उसकी भविष्य की छवि में मोटे चश्मे और सुलगते पाइप के तत्व जोड़ने शुरु कर दिए थे।

 

Friday, March 25, 2011
शिव ने पार्वती को चूम लिया

दक्षिण में चोल राजवंश ने ९वीं से १४वीं शताब्दी तक राज्य किया। उन्होंने गंगई कोंडा चोलापुरम में वृहद ईश्वर मंदिर बनवाया। इस चिट्ठी में, इस मन्दिर की चर्चा है।

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बृहद ईश्वर मन्दिर - चित्र विकिपीडिया से

दक्षिण में  चोल राजवंश ने ९वीं  से  १४वीं शताब्दी तक राज्य किया। ११वीं शताब्दी की शुरुवात में, राजेन्द्र चोल-I (१०१२-१०४४ ईसवी) ने वृहद ईश्वर मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर का निर्माण, पाला राजवंश पर जीत के स्मरणोत्सव के रूप में किया गया है। यह मंदिर शिव भगवान को अर्पित है। इसे, युनेस्को के द्वारा, विश्व धरोहर स्थान का दर्जा दिया गया है।

 

ताकत और विरोध

कुछ दिन पहले मैंने निवेदिता मेनन और आदित्य निगम की किताब, "ताकत और विरोध" (Nivedita Menon and Aditya Nigam, "Power and Contestation: India Since 1989", Halifax and Winnipeg: Fernwood Publishing; London and New York: Zed Books 2007) पढ़ी जो मुझे बहुत दिलचस्प लगी. निवेदिता जी दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में रीडर हैं और फेमिनिस्ट विमर्ष में भी सक्रिय रही हैं, जबकि आदित्य जी दिल्ली के विकासशील समाजों के अध्ययन केन्द्र (Centre for studies of developing societies - CSDS) के संयुक्त निर्देशक हैं. यह किताब "आधुनिक विश्व इतिहास" शृँखला के अन्तर्गत छापी गयी है जिसका उद्देश्य है 1989 के शीत युग के अन्त के पश्चात बदलती हुई दुनिया के इतिहास को समझने की कोशिश करना.

मेनन और निगम भारत के आधुनिक इतिहास के विमर्ष में उत्तर राष्ट्रीयवाद, नव वामपंथ और फेमिनिस्ट दृष्टिकोणों का उपयोग करते हैं.

निवेदता मेनन ने पहले भी अन्य जगह "फेमिनिस्म के संस्थाकरण" के बारे में अपने विचार रखे हैं. उनका कहना है कि पित्रकेन्द्रित समाज में चाहे स्त्रियों से जुड़ी कोई भी बात हो, बलात्कार या हिँसा या दहेज की, लैंगिक समता के लिए लड़ने वाले गुट अब केवल कानून बदलने की बात करने तक ही सीमित रह जाते हैं कुछ यह सोच कर कि कानून बदलने से अपने आप ही समाज बदल जायेगा. वह कहती हैं कि फैमिनिस्म और लैंगिक समता की बात सोचने वालों लोगों को फैमिनिस्ट विचार विमर्श के व्यक्तिगत सशक्तिकरण के पक्ष पर ज़ोर देना चाहिये.

 

कौन बीमार औ' दवा किसकी?

वह दंपत्ति मेरे पास आया था और उनके पति अपनी पत्नी की काउंसिलिंग के लिए उन्हें लाये थे। उन्हें शिकायतथी कि वे बहुत गुमसुम रहने लगी हैं। उन्हें लगता है कि घर से बाहर और ऑफिस में खुश रहती हैं फिर घर में हीआकर क्या हो जाता है? वे इसका निदान चाहते थे और उन्होंने ये बात मुझे फ़ोन पर पहले ही बता दी थी। पति औरपत्नी दोनों ही उच्च शिक्षित और अच्छी जगह पर नौकरी कर रहे थे।
जब उन दोनों ने मेरे कमरे में प्रवेश किया तो मुझे ये समझते देर नहीं लगी कि बीमार कौन है ? जहाँघर में सिर्फ दो ही लोग रहते हों और फिर भी तनाव तो उसका कारण कोई एक तो बनता ही होगा। मैंने दोनों से हीअलग अलग बात करना चाहा तो पति से कहा कि आप बाहर बैठें , मैं इनसे अकेले में कुछ पूछना चाहती हूँ। पतिदेव बाहर चले गए।
जब पति बाहर निकल गए और दरवाजा बंद हो गया तो पत्नी ने पीछे मुड़कर देखा और एक गहरीसाँस ली। उनकी सिर्फ एक सांस ने पूरी कहानी बयान कर दी। फिर भी उनकी हिस्ट्री तो जाननी ही थी।

 

Saturday, March 26, 2011
गुमचोट
सब ठीकठाक है
बस एक तकलीफ
जब-तब जीने नहीं देती

जानता नहीं कि यह क्या है

याद से जा चुकी
या किसी और जन्म में लगी
भीतर की कोई भोथरी गुमचोट

कोई अनुपस्थिति
कोई अभाव
कोई बेचारगी कि
हम अपने खयाल को सनम समझे थे

इस खयाल का कोई क्या करे

 

Wednesday, March 23, 2011
वो कौन सा सपना था भगत?

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वह भी मार्च का कोई आज सा ही वक्त रहा होगा
जब पेड़ पलाश के सुर्ख फ़ूलों से लद रहे होंगे
गेहूँ की पकती बालियाँ
पछुआ हवाओं से सरगोशी कर रही होंगी
और चैत्र का चमकीला चांद
उनींदी हरी वादियों को
चांदनी की शुभ्र चादर से ढक रहा होगा
जब कोयल की प्यासी कूक
रात के दिल मे
किसी मीठे दर्द सी आहिस्ता उतर रही होगी

 

कोने में रखी एक किताब .......गुनाहों का देवता............भारतीनामा ( एक श्रंखला )

 

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ये महज़ एक किताब नहीं , एक पूरा युग है जिसे मैंने जियो है और अब भी जी रहा हूं    

ये इस ब्लॉग की पहली पोस्ट है । इस ब्लॉग के यहां होने की भी एक दिलचस्प वजह है । किताबें शुरू से ही बहुत लोगों की तरह में मेरे वही प्रिय दोस्त रहे हैं । ये अलग बात है कि इन किताबों के दायरे में पहले कॉमिक्स , फ़िर वेद प्रकाश शर्मा , गुलशन नंदा , और कर्नल रंजीत सरीखे लेखक आए । अपने संघर्ष के दिनों में मुझे मेरे एक सीनीयर प्रफ़ुल्ल भईया ने अचानक ही एक दिन मेरे हाथों में ये किताब रख दी । नाम था गुनाहों का देवता ..इस किताब ने हिंदी साहित्य की किताबों की तरफ़ दीवानेपन का वो दरवाज़ा मेरे भीतर खोल दिया कि आज कमोबेश मेरे पास लगभग छ सौ किताबें हैं वो भी मित्रों द्वारा पढने के बहाने टपाने के बावजूद भी ।

इन किताबों को पढने का अवसर , जी हां नियमित मैं कभी भी नहीं पढ पाता हूं ..अक्सर मुझे लंबे सफ़र में या फ़िर घर से बाहर कहीं समय बिताते समय मिल ही जाता है और कमाल दे्खिए कि इस ब्लॉग का जन्म भी हाल ही में चर्चित पुस्तक five point someone को रास्ते में पढते समय ही आया था ।

 

चंडूखाने की

हमारे देहरादून में, खास तौर पर रायपुर गांव की ओर एक मुहावरा है - चंडूखाने की। यह चंडूखाने की हर उस बात के लिए कहा जा सकता है, जिस बात का कोई ओर छोर नहीं होता, वह सच भी हो सकती है और नहीं भी। पर उसकी प्रस्तुत सच की तरह ही होती है। एक और बात- वैसे तो "चंडूखाने की" यह विशेषण जब किसी कही गयी बात को मिल रहा होता है तो उसका मतलब बहुत साफ साफ होता है कि बात में दम है। चंडूखाने की मतलब कोई ऎसी बात जो किसी बीती घटना के बारे में भी हो सकती है। पर ज्यादतर इसका संबध भविष्यवाणी के तौर पर होता है या फिर ऎसा जानिये कि इतिहास में घटी किसी घटना का वो संस्करण जिसे प्रस्तुत करने की जरूरत ही इसलिए पड़ रही है कि वह निकट भविष्य का कोई गहरा राज खोल सकती है।  मैं कई बार सोचता रहा कि यह मुहावरा देहरादून और खासतौर पर रायपुर गांव के निवासियों की जुबा में इतना आम क्यों है, जबकि आस पास भी कोई चंडू खाना मेरी जानकारी में तो नहीं  ही है।

 

संक्षिप्त नाम (Abbreviations)

प्रस्तुतकर्ता जी.के. अवधिया Sunday, March 27, 2011

AAFI
अमेच्योर एथेलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इण्डिया (Amateur Athletics Federation of India)

AASU
ऑल आसाम स्टूडेंड्स यूनियन (All Assam Students Union)

ABM
एंटी बैलेस्टिक मिसाइल (Anti Ballistic Missile)

AC
अल्टरनेट करेंट / अशोक चक्र / एयर कंडीशनर / अंटार्टिक क्लब (Alternate Current / Ashok Chakra / Air Conditioner / Antarctic Club)

ACC
एंक्ज़िलरी कैडेट कोर (Anxillary Cadet Core)

AD
एनो डोमिनी अर्थात् ईसा के जन्म के पश्चात् (Ano Domini - After the birth of Jesus)

ADB
एशियन डेव्हलपमेंट बैंक (Asian Development Bank .)

AERE
एटामिक एनर्जी रिसर्च इस्टेब्लिशमेंट (Atomic Energy Research Establishment)

 

Sunday 27 March 2011
आरक्षण लाभ के लिए जाति का निर्धारण जन्म से होगा न कि विवाह से

मथुरा (उ.प्र.) से नेम प्रकाश ने पूछा है -
.............................................................................................................

अनुसूचित जाति की कोई लड़की किसी सामान्य जाति के पुरुष से विवाह करती है, तो क्या उस लड़की की जाति शादी के बाद बदल जाती है? क्या वह सरकारी नौकरियों के लिये अपनी जाति का प्रयोग कर सकती है? कृपया उचित सलाह दें।
.

 

Sunday, March 27, 2011
हिमाचल से ‘हिमप्रस्थ’
पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 96, मूल्य: 5रू(वार्षिक 50रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश पिं्रटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला 5 हिमाचल प्रदेश
पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रमुखतः विविधतापूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया जाता है। इस अंक में शमी शर्मा, दादू राम शर्मा, ललितमोहन शर्मा, अमिता पाण्डेय, सुनीता, गोपल जी गुप्त, कंचन कुमारी तथा सिम्मी सिंह के विविध विषयों पर लिखे गए आलेखों का प्रकाशन किया गया है। सुरेन्द्र चंचल, मनोज श्रीवास्तव तथा पीयूष गुलेरी की कहानियां अच्छी व पढ़ने योग्य हैं। नरेन्द्र भारती, देशराज पुष्प तथा अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं समसामयिक विषयों पर संक्षिप्त किंतु सार्थक चिंतन है। स्नेहलता, नंदिता बाली, उदय ठाकुर एवं रमेश कुमार सोनी की कविताएं भी स्तरीय हैं। अशोक गौतम का व्यंग्य तथा दायकराम ठाकुर का यात्रा विवरण ठीक ठाक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी रूचिपूर्ण कही जा सकती है।

 

नवकी... घर को जाने कब से बुढ़ौना लगा है!


बालम विदेस हैं। नवकी का करे?
इस उजाड़खंड बरमंड में ससुर खाँसते रहते हैं और सास सुनगुन सूँघती रहती हैं। घर को जाने कब से बुढ़ौना लगा है जब कि  पलंग रात को चररमरर चर पर करती है। नवकी अपनी ही करवट उठान लेती है, लजाती है और फिर बालम को कोसती है  - मुआँ एक किल्ला तक ठीक न करा पाया, अब नवकी का करे? इस चररमरर का का करे?
नवकी किरकेट देखती है। लागा झुलनिया के धक्का बलम कलकत्ता। अरे नाहीं रे छक्का! कोई इतनी नई मेहरारू को छोड कर जाता है भला?
चौका छक्का ना रे नवकी! सब धक्का है। तोहरी झुलनिया क नाहीं रे! माया क धक्का। देखो मोबैल पर, टीवी पर तिरकिथ धिन तिरकित धिन मधुबन में राधिका, धुत्त पगली! माया नाचे रे! बालम की मुरलिया बाजे रे। थिरकित थिरकित, छनछन न न न नोट गिरे स न न न।
कहाँ बाड़ू sss हो पतोहा? नवकी नाक सिकोड़ती है। मुसकाती है। दाँत न दिखाना, अम्मा जी कहिन। घुघ्घुट काहें तनले, रे पतोहा। पुरान जमाना गइल रे। इहाँ आव देखीं। लपर लपर। हमहूँ कहीं, ललना काहे विदेस गैल? लै लो मुँहदेखाई। वोकर त करम फूट गैल। सनीचरी जस मेहरारू।

 

साहित्य लेखन बनाम ब्लौगिंग -- स्त्री-पुरुष चर्चा भाग-११


विषय दो प्रकार के होते हैं -

पहला- विज्ञान , आविष्कार , संस्कृति , भाषा , प्रेम , जनसंख्या , बीमारियाँ , भूकंप , प्रलय , ज्योतिष , आस्था , पकृति , इतिहास , भूगोल , गणित , आंकड़े , तरक्की और विकास , मंदिर , सभ्यताएं , वेद-पुराण , धर्म , भ्रष्टाचार इत्यादि ।
दूसरा - मन के विचार , मन का कोलाहल , मन में उत्पन्न असंख्य प्रश्न , खट्टे मीठे अनुभव , विमर्श , गोष्ठी , प्रतिक्रियाएं , उपलब्धियों की अभिव्यक्ति , मन का आक्रोश , ह्रदय की चिंता या व्यथा की अभिव्यक्ति , थोडा सा खट्टा , थोडा चरपरा , अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर ,आत्मा , पुनर्जन्म , छोटी-छोटी खुशियाँ और बहुत कुछ..
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...न रन, न बिकेट......इंडिया हिट विकेट !

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चौबे जी की चौपाल
(दैनिक जनसंदेश टाईम्स/२७ मार्च २०११ )
....न रन, न बिकेट......इंडिया हिट विकेट !
आज चौपाल में काफी गहमागहमी है,वर्ल्ड कप के  उत्तेजक क्रिकेट मैच की चर्चा जो हो रही है, दालान के बाहर पाकड़ के पेंड के निचवे दरी बिछाके बईठे हैं चौबे जी महाराज और कह रहे हैं कि बटेसर ! आजकल माहौल में इत्ती गर्मी और देशभक्ति की मात्रा इत्ती ज्यादा हो गयी है कि क्रिकेटमय  हो गया है हमरा  देश  .... मैच देखने के चक्कर में हमरी  लोकल पुलिस  हफ्ता वसूली छोड़कर जेब कतरों के साथ टी वी पर अंखिया गराई  दिए  हैं , बस सारा फोकस हमरे धोनी भईया के ऊपर है, हार गए तो धोनी भईया जिम्मेदार और जीत गए तो कहेंगे अमा यार तक़दीर अच्छी थी उसकी ! जैसे हमरे देश में क्रिकेट क्रिकेट न शिला की जबानी हो गयी है, जिधर से गुजरो सारी टी वी कवरेज उसी पर फोकस हो जाती है और मुन्नी की तरह खामखा बदनाम हो जाता है बेचारा धोनी भईया !

 

 

तो आज की झलकियां फ़िलहाल इतनी ही …कल से फ़िर मिलेंगी आपको झा जी की दो पटरियों पर दौडती टरेन ..दो लाईना और एक लाईना भी

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