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बुधवार, 7 नवंबर 2007

फेर शुरू बा रेल गडिया के मारामारी

हाँ भैया ई त अब एगो परमानेंट दुःख बन गया है। जैसे ही पर्व त्यौहार का मौस्म्वा आता है गडिया सब में टिकेट के खातिर मारामारी बढ़ जाता ही । पिछला साल स्थिति इतना बिगड़ गया था कि धाका मुक्की में बौहुते लोग मारा गया। बुझैबे नहीं करता है कि कोन ऊपाय किया जावे । इतना ट्रेन्वा गडिया सब चला दिया है , अऊर अब त एगो नया नियम भी बना दिया है कि" कनिया के साथ लोकान्या "वाला चक्कर नही चलेगा । माने जेकरा सब के जाना है वही सब खाली प्लातफार्मावा पर जा सकता है ।
लेकिन जान रहे हैं सब से ज्यादा कौन चीज तकलीफ देता है , ई जो लोग सब इहाँ से बड़का बडका तृंक पेटी ,बाल्टी, लोटा, कुर्सी, tebul, पंखा , आ पता नहीं का का ठूंस ठूंस के ले जाता हैं महाराज । ऐसन लगता है कि खाली इंटा पत्थर ,मिटटी सब छोड़ देता है । अरे भैया लोग्नी यार जब इहाँ से पैस्वा कमा के ले जा रहे हो त वहीं कहे नहीं खरीद लेते हो ऊ सब ।
बही हमरा त जाना हो नहीं पाया इहे सब के चक्कर में । देखिए अगला साल का होता है?

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पढ़ लिए न..अब टीपीए....मुदा एगो बात का ध्यान रखियेगा..किसी के प्रति गुस्सा मत निकालिएगा..अरे हमरे लिए नहीं..हमपे हैं .....तो निकालिए न...और दूसरों के लिए.....मगर जानते हैं ..जो काम मीठे बोल और भाषा करते हैं ...कोई और भाषा नहीं कर पाती..आजमा के देखिये..

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