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अजय कुमार झा
दुनिया की भीड़ के बीच अपना वजूद तलाशता और तराशता एक आम आदमी जिसकी इंसान बनने की कोशिश जारी है..जिन्दगी के बहुत सारे उतार चढावों को देखते हुए कब बचपना छूटा और वयस्कता की देहलीज़ पर कदम रखा पता ही नहीं चला, अंगरेजी साहित्य में प्रतिष्ठा के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा..फिर विधि की शिक्षा...न्यायमंदिर ..तीस हजारी में फिलहाल कार्यरत...सफ़र जारी है...लिखना , पढ़ना शौक था..कब आदत बनी पता नहीं चला..अब हालात जूनून की हद तक पहुँचते जा रहे हैं....मुझे लगता है इतना काफ़ी है न..जान पहचान के लिये..फ़िर भी यदि आपको लगता है कि बात करनी जरूरी है तो फ़ोन नं भी है न...09871205767
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रविवार, १९ जुलाई २००९

रविवार की छुट्टी, चर्चा खट्टी-मिट्ठी

नए अंदाज का वादा था ,,पूरा भी इरादा था,
मगर आज नहीं हो पाया, काम बहुत ही ज्यादा था,

आशा है आप माफ़ करेंगे, मेरे साथ इन्साफ करेंगे,
जिस खुशी से पढ़ते थे , उसे मजे फिर आप पढेंगे ...

तो लीजिये न देर किस बात की है

ब्लॉग्गिंग जितना आसान दिखती है, उतनी होती नहीं आसान,
एक साल पूरा होने पर समझ में आया श्रीमान..

ब्लॉग साहित्य है , साहित्य ब्लॉग है, मुद्दा नहीं पीछे छूटा,
आज देखिये इस मुद्दे पर इन्होने कितना कंप्यूटर कूटा ..

रायपुर ब्लॉगर सम्मलेन में इत्ता सब कुछ सीखा ,
इस बार ताऊ की पहेली को अनिल भाई ने जीता .

दिल्ली की ब्लू लाइन में दो लडकियां चढी ,
इमानदारी और बेवकूफी की दास्ताँ है पढ़ी

सुना है रात को चाँद इनके घर आता है,
जो भी हो , हमें उनका ये अंदाज लुभाता है

आज विवेक भाई ने इक पैरोडी है बनायी ,हमें तो उसमें दिख गयी जमाने की सच्चाई

दिल से उनकी याद न जाए तो क्या करें,
कभी कभी ऐसी ही रोमांटिक पोस्ट लिखा करें

ब्लॉगर सम्मलेन राजधानी में सूचना है लगवाई,
अपनी सहमति..फटाफट , हमको दे दें भाई ...

टी वी पर पहली तारीख की कथा देखिये,
मगर असलीयत में होता है क्या देखिये

बिना किसी कारण के ,उन्होंने कितना कुछ कह दिया ,
आप भी देखिये किस किस ने पढ़ लिया

एक घरघुसना ऐसा जो बीवी का मुंह ताके,
बिल्कुल ताजा पोस्ट है, अभी पढ़ लो जाके,


गुल्लक में आज किस्सा है आलू, मिर्ची चाय का ,
पढ़ते पढ़ते मुंह का अच्छा बन गया जायका

खोया हुआ उनका मिल गया वापस ये मोबाईल ,
सैमसंग का था ये , या था मुंबई का इश्टाईल

देखिये टूटता हुआ तारा कैसा दिखता है,
ऐसा नजारा देखने को बड़ी मुश्किल से मिलता है

लीजिये आज फिर,कुछ अलग सा , कुछ ख़ास मिला है,
पाबला जी के ब्लॉग को भी कंगारू उनिवर्सिति में दाखिला मिला है

कल से नया हफ्ता शुरू है होने वाला ,
इस सप्ताह चर्चा का अंदाज होगा निराला


इसी वाडे के साथ ..राम राम

22 टिप्पणियाँ:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
अजय कुमार झा ने कहा…

yadi aisa hai to sir theek hai kal se charchaa band ..

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

झा जी, मुझे अपनी टिपण्णी पर खेद है इसलिए मैंने उसे निकाल दिया है. मैंने आपसे चिठ्ठे चर्चा बंद करने के लिए नहीं कहा है... लेकिन मैं यह मानता हूँ की आपमें अधिक उपयोगी, विचारोत्तेजक, और मनोरंजक पोस्ट लिखने की प्रतिभा है जो मैं हमेशा पढ़ना चाहता हूँ. मेरी टिपण्णी से आपको हतौत्साहित करने का कोई इरादा न था. ऐसा हुआ हो तो कृपया भाई जानकर माफ़ कर दें.

बी एस पाबला ने कहा…

ये भी बढ़िया!

लेकिन यह क्या?
ब्लॉग की अवधारणा ध्वस्त??
अब पाठक के हिसाब से लिखा जायेगा ब्लॉग या लेखक को पढ़ेगा पाठक???

आप जारी रखिये जी, अपनी अपनी रूचि है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

चर्चा महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग आप के मौलिक लेखन का भी आनंद लेना चाहते हैं जो उन्हें कम मिल रहा है। आप दोनों में सामंजस्य बिठाएं।
सुंदर अंदाज में की गई चर्चा के लिए बधाई!

'अदा' ने कहा…

आपका पिरोब्लेम हम समझ रहे हैं
इसीलिए तो बाकी चिटठा
हम चिटठा चर्चा से पढ़ रहे हैं
बहुते बढ़िया...

अजय कुमार झा ने कहा…

मैं पहले ही लिख चूका हूँ की अविनाश भाई से सीख कर चिट्ठाचर्चा के लिए मैंने हाथ आजमाने की सोची थी, लिखने के बाद लगा की आप सबको ये पसंद आ रहा है ..शायद झा जी कहिन पर लिखी गयी किसी भी अन्य पोस्ट से अधिक .दरअसल मुझे ऐसा आप सबकी तिप्प्न्नियों से लगा , अब आप ही बताइये इसमें क्या कसूर है मेरा...रही बात मेरे मौलिक लेखन की तो भाई नौकरी, पढाई और अन्य कामों से जो समय बचता है ..उसमें फिलहाल मैं कम से कम दस हिंदी और तीन अंग्रेजी के ब्लोग्स पर लिख रहा हूँ ...और यकीन मानिए उन सब पर आपको मेरी सक्रिय उपस्थिति मिल जायेगी..यहाँ चर्चा लगातार करने का सिर्फ एक ही कारण था ..वो थी लगातार मिल रही तिप्प्न्नियाँ..यदि शुर में ही ऐसा कहते तो मैं इतना आगे भी नहीं आता....और निशांत जी आप मेरे भ्राता सामान हैं सो बुरा मानने का प्रश् ही नहीं उठता...मगर इतना तो तय है की अब चर्चा नहीं कर पाउँगा....और महाराज ये तुकबंदी ..मुझे भी लगता था आसान होती है..मगर उतना नहीं होता है ..ब्लोग्गेर्स शीर्षक इतने अलग अलग चुनते हैं...मैं तो ये सोच कर लिख रहा था की शायद चर्चा दो या तीन जगह हो तो लोगों को और अच्छा लगे...वैसे चर्चा के लिए तो अपना चिट्ठाचर्चा है ही ..

Vivek Rastogi ने कहा…

अरे साहब आप नाहक ही परेशान न हों हम आपकी लेखनी के कायल हैं आप जारी रखिये, और ऐसे हतोत्साहित होने की जरुरत नहीं है लेखक को आलोचक मिलना बहुत जरुरी है तभी तो लेखक को बोध होता है कि ओर कहां सुधार की जरुरत है, ऐसे आलोचक बहुत ही कम हैं अपने ब्लोग जगत में और जो हैं उन्हें विलेन मान लिया जाता है। जारी रखें..

अजय कुमार झा ने कहा…

अरे नहीं नहीं विवेक भाई मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो आलोचना से बौखला जाते हैं और आलोचकों को विलेन समझते हैं..दरअसल इससे पहले भी कुछ ऐसा सा ही कहा था किसी ने ..तो सोच रहा हूँ कि फिलहाल तो मैं इसे बंद ही कर रहा हूँ....कभी भविष्य में ...सोचूंगा ..की क्या करना है ..

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

अजय जी, आप तो ऐसे ना थे.. चिट्ठों की चर्चा करने वाले चिट्ठों में आपका चिट्ठा अलग ही स्थान रखता है। इसलिए इस सत्कर्म को आगे बढ़ाते रहिए। इस हफ्ते आपके निराले अंदाज का इंतज़ार सभी ब्लॉगर साथियों को है..

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

झा जी, आपको रोका किसी ने नहीं है, मैंने भी नहीं. लेकिन जितने मनोयोग और समय का उपयोग करके आप चिथ्थीचर्चा करते हैं उतने में तो आप न जाने कितनी यादगार पोस्टें लिख सकते हैं.
यह कोई बहस थोड़े ही है. ब्लौग आपका है, आप जो चाहे करें. हम आपके चाहनेवाले हैं इसलिए छोटी सी बात भी नहीं कह सकते क्या? दिनेशराय जी की टिपण्णी पढें, आपके मौलिक और अनूठे लेखन की ही हमें दरकार है.
यह भी कहूँगा की अपना ध्यान एक्का-दुक्का ब्लौगों पर ही केन्द्रित करना ही बेहतर होगा. मैंने भी शुरुआत में दसियों ब्लौग बना डाले थे लेकिन वह सब बहुत बेतुका था.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

अजय जी ने जो कह दिया सो कह दिया

कल से बंद
तो समझ लीजिए
कल से बंद

पर
कल कब आया है

इसलिए हमें चर्चा बंद होने का

नहीं डर सताया है।

बी एस पाबला ने कहा…

एक बात और कहना चाहूँगा कि इस मौलिक अंदाज में की गई चिट्ठाचर्चा पर मिली टिप्पणियों को इकट्ठा कीजिये। जिन्हें आप पसंद नहीं करते उसे एक पलड़े में रखिए, जो पसंद आती हैं उन्हे दूसरे पलड़े में रखिए। देखिए झुकाव किधर ज़्यादा है। यदि फिर भी संशय हो तो सभी टिप्पणियों की भावनायों को पासंग के स्थान में लगा दीजिए। जो भी परिणाम आयेगा, निश्चित तौर पर आप अपना निर्णय बदलने के बारे में पुनर्विचार करेंगे।

अगली चर्चा मंगलवार को हो जानी चाहिए वरना हम भी अपना 'प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा' वाला ब्लॉग बंद कर देंगे :-) और अपने मूल ब्लॉग पर लिखेंगे :-D

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

एक चर्चा होती है और एक काव्यमय चर्चा होती है. मैं समझता हूं आपकी चर्चा लिंक के साथ एक मौलिक काव्य का सृजन करती है. लोग समझते हैं कि चर्चा करना आसान है..बस लिंक ऊठाये और लगा दिये..तो ऐसा समझने वाले एक बार चर्चा करके देखें..चर्चा करने मे भी उतनी ही सूझबूझ और दिमाग लगता है जितना एक साधारण ब्लाग पोस्ट लिखने मे. बल्कि कुछ ज्यादा ही लगता है.

हमारी उम्मीद और सलाह है कि आप इसे चालू रखेंगे. शुभकामनाएं.

रामराम.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

आपके निर्णय पर आपको विचार करना चाहिये । हम सबको तो संतोष की एक चाबी अविनाश जी थमा गये - कल कब आया है । सूफियाना टिप्पणी है उनकी । आखिर ऐसी टिप्पणियाँ भी तो मिलती हैं झा जी की चर्चा में ही ।

आप लिखते रहें ।

संगीता पुरी ने कहा…

क्‍या हुआ .. बात इतनी कैसे बढ गयी .. आखिर क्‍या लिखा था निशांत जी ने .. उन्‍होने तो मिटा भी दिया है .. अब क्‍या दिक्‍कत आ पडी .. अविनाश वाचस्‍पति जी सही कह रहे हैं .. किसी कल को चिट्ठा चर्चा न करें .. पर हर आज को चिट्ठा चर्चा जरूर करें .. करना ही पडेगा .. पाबला जी भी तो अनशन पर बैठ गए हैं .. सब संभाल लेंगे आप .. शुभकामनाएं।

विवेक सिंह ने कहा…

भई आप जो ठीक लगे वही करिये . आप जो भी लिखते हैं वह मज़ेदार होता ही है, हाँ कोई पाठक यदि आपसे अधिकारपूर्वक कोई आग्रह करता हो तो विचार तो होना चाहिए उसकी बात पर, बेशक अन्तिम निर्णय आपका ही होना चाहिए .

हमने तो कल ही लिखा था कि दुकान चल निकली,

पर आप तो आज ही दुकान बढ़ाने पर आमादा हैं,

यह सब मेरे ही कारण हुआ है, मेरी ही नज़र लग गई शायद आपकी चिट्ठी चर्चा को , आपसे हमें जबरिया लिखने की उम्मीद रहती है अनूप जी की तरह :)

ओम आर्य ने कहा…

ठीक है जो कर सकते है करे.........शुभकामनाये .......अतिसुन्दर

Shefali Pande ने कहा…

ise band mat kariyega....

अजय कुमार झा ने कहा…

आप सब बहुते खराब हैं..दोनों हाथों में लड्डू रखते हैं..न आदमी को जीने देते हैं न मरने ..बताइये तो हमरे जैसे झा जी को तो एकदम पाजी बना कर रख दिए..ऊपर से पाबला जी ..सर काहे धर्मसंकट में फस रहे हैं..बस ऐसा समझिये न थोड़े दिन की छुट्टी ले रहे हैं..तब तो ठीक है ...और निशांत भाई..यार आपने तो खामख्वाह में टिप्प्न्नी हटाई..अमा ऐसा क्या कह दिया था आपने..भाई मैं ढीठ किस्म का प्राणी हूँ..इत्ती जल्दी बुरा नहीं मानता...और फिर बुरा मान कर जाऊँगा कहाँ..मगर अभी तो कुछ दिनों की छुट्टी दे ही दीजिये..बड़ी कृपा होगी...

बी एस पाबला ने कहा…

चलिए, हमने इस ब्लॉग से आपका अध्ययन अवकाश स्वीकृत किया :-)

ज़ल्दी दर्शन दीजियेगा

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

ए ल्यो..खोदा चुहिया और निकला पहाड...अरे..रे..ससुरी जबान फ़िसल गई..हां तो खोदा पहाड और निकली चूहिया..

अगर छुट्टि ही चाहिये थी तो सीधे से ताऊ के पास अर्जी भिजवा देते ह, मंजूर करवा देते..अब खामखा चढने टंकी पर काहे चढ गये? चलो बचुआ..अब इतनी देर से टंकी पर चढे हो..जरा तनिक कुछ खा पीलो..और छुट्टी खुशी खुशी जाकर आवो.

रामराम.

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