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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

आकाश वाटिका ; आप भी बनाइये न



कौन सोच सकता था कि किसी छत को यूँ भी सँवारा जा सकता है 

पिताजी मूलतः एक कृषक परिवार से थे इसलिए अपनी फ़ौजी नौकरी के दौरान भी आवंटित फ़ौजी क्वार्टर के अहाते में हमेशा कुछ कुछ उगाते लगाते मैंने उन्हें बचपन में ही देखा था।  ग्रीष्म ऋतु के अवकाशों में गाँव जाकर आम लीची केले के लदे हुए बागान ,तालाब ,नदियाँ ,खेतों ने हमेशा एक सम्मोहन सा जगाए रखा हमारे भीतर।  कालचक्र ने तरुणाई और कॉलेज का सारा समय ग्राम्य जीवन में बिताने का अवसर दिया और मैंने मिट्टी ,पानी ,पेड़ ,पौधों आदि के साथ सहजीवन का अमृत पाठ वहीं बहुत करीब से देखा समझा। 

अध्यन के पश्चात सरकारी सेवा में आने के बाद जो सबसे पहले साथी बने वो थे पौधे और किताबें। स्वअर्जन ने आर्थिक संबलता दे दी थी किन्तु दिल्ली जैसे ईंट पत्थर से बुरी तरह त्रस्त महानगर में स्थान की सीमितिता और किरायेदार के रूप में रहने की विवशता ने बहुत समय तक इन पौधों फूलों से मेरी दोस्ती गमलों तक सीमति रखी।  लगभग पॉंच वर्ष पूर्व जब मैंने दिल्ली में छोटा सा सिर्फ 80 गज़ के क्षेत्रफल का फ़्लैट लिया तो मुझे अपने घर की खुशी उस समय दोगुनी लगी जब छत के सर्वाधिकार के साथ मुझे वो मकान मिला और यहीं से शुरू हुई ये ख्वाबों सरीखी बागवानी करने की कल्पना को साकार करने की प्रक्रिया। 

छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का नैसर्गिक आनंद होता है 

शुरुआत में मिटटी , छत ,मौसम , वानरों के उत्पात आदि ने बहुत बार व्यवधान उत्पन्न किये ,मगर सब धीरे धीरे अपने आप हल होते गए और सिर्फ दस बारह गमलों से शुरू हुई ये बागवानी आज हज़ार से ऊपर पौधों , पच्चीस तरह के फल उतने ही प्रकार की सब्जियों ,सैकड़ों मौसमी व स्थाई फूलों के अनमोल उपहार के रूप में आज मेरे घर के शीर्ष पर विराजमान हैं। घर में बेकार पड़ी चीज़ों ,प्लास्टिक बोतलों , कूलर बेस ,मिक्सी ज़ार , मग सब कुछ धीरे धीरे गमलों का आकार लेने लगे और मैं छोटी से छोटी जगह पर बागवानी कैसे किसकी कब की जा सकती है इन सबमें सिद्ध हस्त होता चला गया।

छत पर बनी मेरी बैठक वाली टेबल 

 कितने ही तरह के पक्षी , छोटे बड़े जीव ,तितलियाँ ,भौरें आदि अपने कलरव से इन्हे और जीवंत किये रहते हैं।  आसपास के पड़ोसी ,मित्र ,सहकर्मी ,बंधु बांधव आदि इससे प्रेरित होकर अपने आसपास को और अपनी आत्मा को हरित करके तृप्त कर रहे हैं तो मेरा सुख द्विगुणित हो जाता है।  पृथ्वी और प्रकृति के बीच जो सेतु है वो इंसान को बना रहना चाहिए।  यही सच है आखिरी सत्य।  बागवानी के विषय में सिर्फ इतना कहूँगा कि किसी भी इंसान को समझने से कहीं आसान होता है पौधों फूलों पत्तियों को समझना।  आप इनसे प्यार करेंगे तो बदले में अपना सर्वाव लुटा देते हैं आप पर।  देर किस बात की है कर डालिये सब कुछ हरा अपनी खिड़की ,बालकनी ,छत ,,मुंडेर सब कुछ हरा करने पर आपकी आत्मा भी हरी भरी होकर तृप्त हो जाएगी। 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

आइये टमाटर उगाते हैं










 आज बात करते हैं टमाटरों की।  आप सबने पिछले कई दिनों में जिज्ञासा ज़ाहिर की है कि टमाटरों के लिए क्या कैसे करना चाहिए तो मैं जो करता हूँ वो आप के साथ साझा करता हूँ। 




टमाटर के लिए आवश्यक 

गमला ; छोटा न हो , माध्यम आकार का हो तो उत्तम और बड़ा हो तो सर्वोत्तम
मिट्टी ; अच्छी हो तो उत्तम और बढ़िया नमी रखने वाली काली मिट्टी हो तो सर्वोत्तम
बीज ; दो तरह के मिलते हैं बाज़ार में ,देसी और हाइब्रिड ,दोनों ही अच्छा काम करती हैं
मौसम ; बहुत अधिक गर्मी और बहुत अधिक सर्दी के मौसम को छोड़कर साल भर


टमाटर के बीजों को छिड़क कर [यदि आपके पास बीजों के  लिए अलग से सीड्स बेड बने हुए हैं तो ] ऊपर से मिटटी की हलकी परत से ढक कर पानी के हलके छींटें मार दें।  यदि सीधा गमलों में ही उगाना चाह रहे हैं तो एक गमले में सिर्फ एक बीज डालें।  ध्यान रहे कि पानी बहुत ज्यादा नहीं डालना है उतना ही कि मिट्टी सूखी भी न रहे और बहुत गीली तो कतई न रहे।  


पौधों के निकलने पर उन्हें सीड्स बेड से सावधानी से बिना जड़ हिलाए गमलों में स्थानांन्तरित कर लें। गमलों में ही हैं पहले से तो फिर जरूरत नहीं है कुछ भी करने की।

पानी देते समय ध्यान ये रखने  की योग्य बात है कि छोटे पौधे बहुत ही नाजुक होते हैं इनके ,तो न तो ये झुकने पाएं न ही इनका शीर्ष मुड़ने पाए। सहारे के लिए छोटी से बेंत ,सींक आदि का इस्तेमाल करने से बेहतर रहता है और पौधे भी सुरक्षित रहते हैं।

40-50 दिनों के अंदर इनकी फुनगी पर पीले फूल चमकने लगेंगे और उसके 7 दिनों के अंदर ही नन्हें टमाटर दिखने लगेंगे।

अब सबसे जरूरी काम ये करना होगा कि इनके शीर्ष को ,और उनको विशेषकर जिन पर टमाटर दिखने लगे हैं उन्हें सावधानी से पतले धागे डोरी आदि से सहारे के लिए लगाई हुई सींक\बेंत आदि से इस तरह से स्ट्रिंग कर दें यानि बाँध दें ताकि टमाटर का भार पड़ने पर भी वो शीर्ष झुक कर टमाटर के विकास को रोक न दे।  




पत्तों के पीले पड़ने के साथ ही हरे टमाटर अपने आप सुर्ख लाल और खाने लायक हो जाएंगे।  टमाटरों को बड़ा ,रसीला रखने के लिए उनकी जड़ों में हमेशा नमी बने रहना जरूरी है किन्तु ये भी सावधानी रखनी जरुरी है कि पानी इतना अधिक न हो कि जड़ ही गलने लगे। 

बस फिर क्या शुरू हो जाइये ,उगाइये अपने हरे और लाल टमाटर। 


रविवार, 19 अप्रैल 2020

ज़िदंगी का फ्लैश बैक देखने को ;चाहिए एक रिवाइंड बटन









कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी ऐसा भी दिन आएगा जब अचानक से कुदरत कहेगी , स्टैच्यू और हम सब ठिठक कर एक जगह रुक जाएंगे जो जहां है वहीं जड़ होकर रह जाएगा।  मैं और मेरी या मेरे से ज्यादा उम्र के सबके पास अपनी बीती हुई ज़िंदगी के एल्बम में से कितनी ही यादें ,कितनी ही बातें सबने अपने ज़ेहन में बसा कर छुपा कर रखी होंगी।  और इससे बेहतर और क्या वक्त हो सकता है उन पन्नों को पलटने का।  देख रहा हूँ मित्र अपनी बरसों पुरानी तस्वीरें ,अपनों के साथ की फोटो यहां अंतरजाल पर साझा कर के सहेज रहे हैं।  अच्छा ही है कल को जब हम न होंगे तो हमारी आने वाली नस्लें ,और उनके बाद वाले भी ये सब यदि बचा खुचा रह गया तो देख पढ़ पाएंगे और कम से कम समझ सकेंगे कि हमने अपनी ज़िंदगी में कौन कौन से रंग देखे थे।

हम बहुत ही खुशकिस्मत रहे हैं ,हम कंचे पतंगों लट्टू , से भी पहले सायकल के पुराने टायर और माचिस की डिब्बी के कवर से ढेरम ढेर खेलने वाली दुनिया से शुरू होकर आज एंग्री बर्ड्स और पब जी तक का सफर तय कर चुकने वालों में से रहे हैं। ये हम ही हैं जिसने दुनिया में रेडियो ,टीवी ,फ्रिज ,कुकर ,स्कूटर ,कंप्यूटर ,मोबाईल को अवतरित होते देखा है और जाने अभी और क्या क्या देखेंगे।  तो हम तो बहुत सारे मायनों में एकमात्र ऐसी नस्ल रहे और रहेंगे जिन्होंने दुनिया में वो देखा और देख चुके जो कल के इतिहास में किसी अजूबे से कम नहीं होगा।

मुझे याद है बाबूजी के साथ गर्मियों की छुट्टियों का वो कोयले के इंजन वाली रेल में किया हुआ साधारण डब्बों का यादगार सफर जब रास्ते में माँ के हाथ के बने भरवां करेले और पराठे के साथ सुराही का मीठा पानी कई दिनों के लम्बे रेल के सफर को भी ज़िंदगी के कुछ अनमोल दिनों में बदल देता था। मुझे याद है गाँव का वो कच्चा घर जहां दादी हमारे पहुँचते ही जाने क्या क्या मीठा खाने को और शरबत लेकर दालान पर ही अपना स्नेह लुटाने चली आती थी और मिनटों में ही पूरा टोला हमें देखने खैरियत पूछने चला आता था।


मुझे याद है सरस्वती पूजा , दुर्गा पूजा ,इंद्र पूजा ,जन्माष्टमी में लगने वाले वो छोटे छोटे मेले और उनमें गोले में पार्ले जी के बिस्किट को फंसाना ,गेंद मार कर स्टील के भारी ग्लास गिरा कर तालियाँ बटोरना ,मुझे याद है गाँव की काली पूजा में खेले गए नाटक में अभिनय करने वाले हम कुल 16 युवकों में अपने द्वारा निभाया गया  युवती का एक अकेला किरदार।  मुझे याद है गाँव की वो सत्यनारायण भगवान की पूजा में चावल और केले का मिलने वाला चौरठ प्रसाद भी और गाँव में केले के पत्तों पर खाए गए भोज भात का स्वाद भी।

मुझे याद है तीसरी कक्षा के दोस्त संजय सुथार के लखनऊ के तोपखाना बाज़ार में स्थित स्टूडियो के सामने की वो किताबों की दूकान जिसमें ऊपर रखी हुई ज्योमेट्री बॉक्स को स्कूल से आते जाते निहारना। मुझे याद है मेरे स्कूल में आने वाले जादू दिखाने वाले और स्कूल के रास्ते में कभी भालू कभी बन्दर और कभी सपेरे के इर्द गिर्द गोल खडी भीड़ में खुद को खड़ा देखना।  मुझे सर्कस याद है ,पटना जंक्शन से स्टीमर पकड़ कर गंगा पार करना भी याद है। मधुबनी रेलवे जंक्शन से गाँव तक ले जाने वाला ताँगा भी और दादी गाँव से मौसी के गाँव तक जाने वाली बैलगाड़ी भी। 


मुझे याद है मौसियों के साथ उनकी उंगलियां थामे पूरे ननिहाल के एक एक घर आँगन का चक्कर भी जिसमें जाने कितने प्यार करने वाले हाथ आशीर्वाद देने वाले हाथ एक साथ उठ जाते थे और बस माँ का नाम लेकर कहते ये निर्जला के बेटे हैं न। 

क्या क्या याद करूँ , आँखों के आँसू इस यादों के एलबम को बार बार धुँधला कर दे रहे हैं।  लेकिन मैं फिर लौटूंगा बार बार लौटूंगा इस एल्बम को लेकर इसके रंगों को लेकर ताकि मेरे जीवन का ये इंद्रधनुष उगता रहे हर दिन उगता रहे।




बुधवार, 15 अप्रैल 2020

चीन को दण्डित किये जाने की तैयारी




इस बीच खबर ये आ रही है कि , नराधम ,कृतघ्न ,लालची और महास्वार्थी धूर्त देश चीन के विरुद्ध विश्व भर के देश लामबंद हो रहे हैं . अंतर्राष्ट्रीय अदालत में अब तक अलग अलग कुल सात देशों ने वाद संस्थापित कर दिए हैं और अमेरिका ब्रिटेन जापान दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने चीन को स्पष्ट सन्देश देने शुरू कर दिए हैं |

उधर चीन भी अपनी आदतों के अनुरूप इस बीमारी के उद्भव ,प्रसार और उसमें उसकी अपनी कारगुजारियों को छिपाने की भरसक कोशिश कर रहा है | इससे जुडी तमाम जानकारियाँ ,चिकत्सकों की रिपोर्ट ,वैज्ञानिकों के शोधपात्र पर यथासंभव पाबंदी लगा कर अपने चिर परिचित चरित्र को उजागर कर रहा है |

यह सही मौक़ा है ,इस #चायनीज़वायरस से उबरने के बाद समूचे विश्व को इस धूर्त बदमाश अपराधी देश को सामाजिक आर्थिक रूप से बिलकुल अलग थलग कर देना चाहिए | ऐसे में स्वाभाविक रूप से बड़े बाज़ार और बड़े कामगार क्षेत्र के लिए पूरे विश्व के पास सबसे बेहतर और सबसे पहला विकल्प भारत होगा |

आज जिस तरह से इस महामारी की दवाई को पूरे विश्व को उपलब्ध करवाने में भारत पूरी दुनिया के बड़े से बड़े ताकतवर विकसित देश से लेकर छोटे देश तक का तारणहार बना हुआ है उससे भी एक बार फिर भारत की छवि तारणहार की और विश्व के अगुआ की बन गई है | ऐसे में पूरे विश्व का विश्वास पूरे विश्व का यकीन अपने आप ही भारत पर बन गया है |

इस महामारी से निपटने के बाद भारत को अपने आर्थिक संकट से निकलने के लिए भी निश्चित रूप से इन स्थितियों का लाभ मिलेगा बशर्ते कि शुरू से ही गणित में कमज़ोर (यूँ भी कमज़ोर गणित वाले दिल से काम लेने वाले होते हैं और लाभ हानि से ऊपर सिर्फ दिल से ही सोचते करते हैं ) , इस सरकार के पास तब तक कोई बेहतरीन और सटीक विकल्प मिल जाए |

जो भी हो चीन को मानवता के विरुद्ध किये जा रहे इस अपराध के लिए पूरे विश्व द्वारा जलालत के साथ साथ दण्डित किये जाने की भी जरूरत है | इसके अतिरिक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे तमाम वैश्विक संगठनों को भी उनके गैर ज़िम्मेदार रवैये के लिए भरपूर लानत मलामत की जानी चाहिए |


शनिवार, 11 अप्रैल 2020

आउटडेटेड हो गई क्या ब्लॉगिंग ??







अभी 1 मार्च को विख्यात ब्लॉगर दीदी रेखा  श्रीवास्तव जी द्वारा ब्लॉगरों के अधूरे सपनों को शब्दों के ताने बाने में बुनकर पुस्तक के रूप में संकलित कर प्रकाशन किये जाने और उसे पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने का अनौपचारिक कार्यक्रम जब भाई राजीव तनेजा (यहाँ बिना संजू भाभी संजू तनेजा जी ,के ज़िक्र के ये बात कभी मुकम्मल नहीं हो सकती ) द्वारा शब्दों की दुनिया के दोस्तों के लिए उपलब्ध कराए गए एक प्लेटफॉर्म पर बना तो बहुत बार मेरे ऐसे किसी कार्यक्रम में शिरकत किये जाने का टाल मटोल भी ख़त्म सा हुआ और ऐसा संयोग बना की मैं देर से ही सही उस कार्यक्रम में अपनी उपस्थति दर्ज़ करवा पाया।  

मेरे पहुँचने तक क्या कैसे हो चूका था ये तो मैं नहीं जान पाया हाँ गंतव्य स्थल तक पहुँचने के लिए भाई राजीव तनेजा  जी से फोन द्वारा दिशा निर्देश लेते रहने के कारण वे तो अगुवाई करते पहले ही मिल गए। आदतन मैं आजम से सबसे पीछे बैठ कर सारा ज़ायज़ा लेने लगा। दीदी रेखा श्रीवास्तव आज के कार्यक्रम की शो स्टॉपर थीं सो एक एक आने जाने वाले पर उनकी नज़र थी।  



पोडियम पर रंजना जी , जिनसे मेरी पहली मुलाक़ात थी ,अपने रेडियो प्रस्तोता होने के कारण बहुत अधिक दक्षता से कार्यक्रम का कुशल संचालन करती दिखीं और वहीँ  हमारे सुपर स्टार ब्लॉगर ,डॉ टी एस दराल सर , भाई खुशदीप सहगल जी ,शाहनवाज़ जी ,दिगंबर नासवा जी आदि विराजे हुए थे। नज़रें घूमी तो भाभी संजू तनेजा ,दोस्त ब्लॉगर वंदना गुप्ता ,नीलीमा शर्मा ,मुकेश सिन्हा जैसे सितारे भी अपना नूर बिखेरे हुए थे। दीदी रेखा श्रीवास्तव जी के परिवार व समस्त बन्धुगण भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हुए सबको तसल्ल्ली बक्श सुन रहे थे। 

रंजना जी सबको एक एक करके आमंत्रित कर रही थीं और साथी ब्लॉगर अपने ब्लॉगिंग के अनुभवों को साझा करते चलते जा रहे थे। मुझे सालों पहले होने वाली ब्लॉग बैठकों की याद आने लगी थी। भाई खुशदीप सहगल जी ने शुरआती दिनों की ब्लॉगिंग के दिलचस्प किस्सों को साझा करते हुए बहुत से रोचक किस्से सुनाए ,चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी जैसे संकलकों की चर्चा ,उन पर चली खींचतान आदि की बाबत बातें हुईं। 



भाई शाहनवाज़ हुसैन जो अभी हमारीवाणी संकलक के संचालन का कार्य देख रहे हैं उन्होंने भी तकनीकी बातों के साथ ब्लॉगजगत के अनुभव साझा किये। दराल से ने अपने हर दिल अज़ीज़ अंदाज़ से सबको गुदगुदा दिया तो वहीँ नासवा जी ने बताया की कैसे उन्होंने कभी भी अपने ब्लॉग पोस्ट की रफ़्तार को थमने नहीं दिया। 

मुकेश सिन्हा जी ने अपने ब्लॉग्गिंग के सफर की दास्ताँ सुनाते हुए ,भाई संजय भास्कर जी का उनकी रोचक व नियमति टिप्पणियों का उल्लेख किया तो राजीव तनेजा जी ने बताया की कैसे ब्लॉगिंग ने उनकी साहित्यिक और व्यंग्य लेखन के प्रति उनकी रूचि को अंजाम तक पहुंचाने में मदद की। 

हमारी महिला ब्लॉगर में दोस्त वंदना गुप्ता जो अब एक ब्लॉगर से कहीं आगे जाकर विख्यात लेखिका बन चुकी हैं उनहोंने न सिर्फ अपने ब्लॉग लेखन के अनुभव साझा किए बल्कि ब्लॉगिंग में एक सशक्त और नियमित संकलक की जरूरत और उसके लिए कुछ किए जाने की जरूरत की ओर सबका ध्यान दिलाया। उनका साथ सिया नीलीमा शर्मा जी ने और उन्होंने भी अपने ही अंदाज़ में सबके साथ अपने अनुभव साझा किये। विख्यात ब्लॉगर कवियत्री साहित्यकार मित्र सुनीता शानू जी ने भी अपने मुस्कराहट के साथ ब्लॉगिंग के अनुभव को साझा करते हुए पुराने दिनों को याद किया साथ ही ये भी कि बेशक इसकी गति नए प्लेटफॉर्म्स के आने से थोड़ी सी कम हो गई है किन्तु उन्हें विशवास है कि सब कुछ पहले की तरह ही रफ्तार में आ जाएगा।  

दीदी रेखा श्रीवास्तव जी ने बताया की कैसे उन्हें ये ब्लॉग जगत एक परिवार की तरह अपने मोह में बांधे रखा कर ये भी कि बहुत से अन्य ब्लॉगर के सपनों को शब्द देकर अधूरे सपनों की कसक का दूसरा भाग भी वे लेकर आएंगी।  

मैंने ब्लॉगिंग के शुरआती दिनों , ब्लॉग जगत की बढ़ती हलचल ,ख्याति से न्यू मीडिया का दखल और प्रभाव उसे बाँधने की कोशिशें ,समयांतराल पर उसमें आई मंथरता , एक बेहतरीन संकलक की जरूरत आदि पर अपने विचार रखे।  बीच में ताऊ ,उनकी पहलेयाँ ,चिट्ठा चर्चा , बेनामी ,ब्लॉग वकील आदि के रोचक किस्से भी सामने आए 

रंजना  जी के कुशल मंच संचालन के कायल मुझ सहित वहाँ उपस्थित सभी साथी हुए। 

इसके उपरान्त पुस्तक के लोकार्पण ,उसकी चर्चा और गरमा गर्म भोजन के साथ भी आगे का कार्यक्रम बदस्तूर चलता रहा।  निःसंदेह ऐसे कार्यक्रम ,ऐसे बहाने ,नई ऊर्जा का संचार कर न सिर्फ ब्लॉगिंग बल्कि हम ब्लोगर्स में भी नई स्फूर्ति का संचार करते हैं।  



मुझे उम्मीद थी की पहले की तरह इस ब्लॉग बैठकी की भी रिपोर्ट लिखने के बहाने कुछ नई पोस्टें और बातें हमें और तमाम साथियों को भी मिल जाएंगी ,मगर ऐसा हुआ नहीं , और ये प्रश्न पुनः सर उठाए इधर उधर घूमता फिर रहा है कि -आउटडेटेड हो गई क्या ब्लॉगिंग  ?? इसका उत्तर हमें और आपको तलाशना है और करना भी कुछ नहीं है सिर्फ इसके सिवा कि नियमित अनियमति होकर भी ब्लॉग पोस्ट लिखते रहना है और ब्लॉग पोस्ट पढ़ते रहना है। 

रविवार, 29 मार्च 2020

महामारी में महातमाशा





पहला दिन : बंदी से पहले और बंदी वाले पहले दिन लोगों ने दुकानों पर                         मेला लगाया
दूसरा दिन : दूसरा दिन ,पुलिस ने उठक बैठक करवाते मुर्गा बनाते ,लाठी                     भाँजते करतब दिखाया
तीसरा दिन : मीडिया ने अचानक ही लोगों को भूखे मरते तड़पते बिलखते                     वाला तमाशा दिखाया
चौथा दिन :   आखिरकार जनता ने भी सब कुछ भूल भाल कर सड़कों पर                     आकर मजमा लगाया |

लब्बो लुआब ,ये देश ,प्रशासन ,व्यवस्था ,सरकारें ,स्वयं सेवक और सबसे अधिक आम लोग अभी तक भी किसी भी कैसी भी आपदा से निपटने की तैयारी ,बचाव आदि तो दूर अभी तक किसी को भी आपदा के समय किये जाने वाला व्यवहार और सचेतता का भी पता नहीं है |

पश्चिम के देश जो भौगोलिक परिवेश के कारण भारत से कहीं अधिक भयंकर प्राकृतिक आपदाएं झेलते हैं बार बार भुगतते हैं ,मगर हर बार सबक सीख कर अगली आपदा के लिए खुद को और पूरे समाज को भी तैयार करते हैं | बावजूद इसके कि उन  देशों में तकनीक और संसाधन की प्रचुर सुलभता के बावजूद वे कभी लापरवाह या उपेक्षित नहीं होते | इसके ठीक उलट भारतीय अवाम ऐसे समय भी अपने उद्दंड स्वभाव और व्यग्रता तथा अशिक्षा के कारण ,प्रशासन व सरकार द्वारा की गयी थोड़ी बहुत की गई तैयारियों को भी पलीता लगा देते हैं |

वर्तमान में सिर्फ दो ही सूरतों में इस महामारी के बड़े प्रकोप से बचने की संभावना है | पहली ये कि सैकड़ों लाखों के इस समूह में मरीज़ और पीड़ित की संख्या नगण्य हो या बहुत ज्यादा कम हो | आगे जाकर समाज में घुलमिल कर उसे और अधिक विकराल रूप में पहुंचाने से पहले ही इनकी जांच व् पहचान सुनिश्चित करना |

दूसरी ये कि फिलहाल मौसम में जो अनिश्चितता बनी हुई है वो स्थिर होकर ,सामन्यतया इस ऋतू के औसत तापमान और उससे अधिक तक जितनी जल्दी से जल्दी पहुँच सके तो इसके प्रसार की रफ़्तार और ज़द में थोड़ी मंथरता आने की संभावना है |

ये देश हमेशा से भागवान भरोसे ही छोड़ा जाता रहा है ,भगवान भरोसे ही चलता रहा है और भविष्य में भी इस स्थिति में कोई बहुत बड़ा फर्क आएगा ऐसा लगता नहीं है | आने वाले सात दिनों में स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगी कि हम खराब से उबर कर सब ठीक होने की हालात में जाएंगे या इससे भी बदतर हालातों में पहुंचेंगे |





रविवार, 1 मार्च 2020

ब्लॉगरों के अधूरे सपनों की कसक -किताब के बहाने ब्लॉग बैठक (ब्लॉग बैठक रिपोर्ट )





मुद्दतों बाद ही सही ब्लॉगर किसी न किसी बहाने अब आपस में रूबरू होने का सिलसिला शुरू कर चुके हैं | अभी कुछ दिनों पूर्व ही हिंदी ब्लॉगजगत के सुपर स्टार समीर लाल समीर उर्फ़ उड़नतश्तरी अमेरिका से जब अपनी सर ज़मीन पर आए तो सबसे पहले आदतन ब्लॉगर मित्रों के बीच ही नुमायेदार हुए | ब्लॉगिंग की धीमी होती रफ़्तार और ब्लॉगर द्वारा ब्लॉग लेखन के प्रति आया उपेक्षा का भाव अदि को लेकर समय समय पुराने नए ब्लॉगर कई तरह के नए नए विचार और प्रयासों पर काम करते रहते हैं | 

पिछले दिनों ऐसी ही एक मुहिम ​"ब्लॉगिंग की ओर वापस चलें " बड़े जोर शोर से शुरू किया गया था ताकि बिलकुल शून्यावस्था को पहुंचती जा रही इस विधा को यूं दम तोड़ते हुए नहीं छोड़ा जाना चाहिए | पिछले अन्य प्रयासों की तरह ये प्रयास भी बहुत अधिक रंग नहीं ला सका हालांकि इसने मुझ सहित बहुत सारे ब्लॉगर को दोबारा अपने अपने ब्लॉग की सुध लेने को प्रेरित तो किया ही | 

इस बीच रेखा श्रीवास्तव जी ने बहुत सारे ब्लॉगर से उनके जीवन में ऐसे सपने जिन्हें पूरा न कर पाने की कसक उनके मन में रह गयी हो उसे लिपिबद्ध करके प्रेषित करने का आग्रह किया | सबने उसमें अपनी यादों को अपनी लेखनी में पिरो कर उनके हवाले कर दिया जिसे रेखा जी के सम्पादन में एक खूबसूरत किताब की शक्ल दिया गया जो अब पाठकों के बीच पहंच चुकी है | 

अब चूँकि मामला ब्लॉगर का था ब्लॉगर के सपनों का था इसलिए सभी  ब्लॉगर मित्रों का एक साथ होना स्वाभाविक था | आज भाई राजीव तनेजा जी द्वारा निर्मित और उपलब्ध , साहित्य ,ब्लॉग्गिंग ,लेखन ,पठन को समर्पित स्थान पर जुटे ब्लॉगर , उनके बीच हुआ मंथन विमर्श और "अधूरे सपनों की कसक" पर पूरी रिपोर्ट पढ़वाता हूँ आपको जल्दी ही तब तक इन तस्वीरों का आनंद उठाइये 
























गुरुवार, 5 सितंबर 2019

ये उन दिनों की बात थी -वो इंग्लिश वाली मैम



शिक्षक दिवस पर प्रकाशित एक आलेख 


शिक्षकों के लिए कक्षा में दो ही विद्यार्थी पसंदीदा होते हैं अक्सर , एक वो जो खूब पढ़ते लिखते हैं और हर पीरियड में सावधान होकर एकाग्र होकर उन शिक्षकों की बात सुनते समझते हैं और फिर परीक्षा के दिनों में उनके तैयार प्रश्नपत्रों को बड़ी ही मेहनत से हल कर अच्छे अंकों से पास होते हैं | ये वाले बच्चे कक्षा दर कक्षा शिक्षकों के प्रिय और सर्व प्रिय हो जाते हैं | इनके अलावा एक दूसरे होते हैं वो जो किसी खेल कूद में ,किसी अन्य विधा जैसे चित्र कला संगीत वाद्य आदि में निपुण होते  हैं वे भी कक्षा के अलावा पूरे स्कूल के भी प्यारे होते हैं | पहले वालों का खेल कूद आदि में बहुत कुछ न कर पाना माफ़ होता है और दूसरों वालों का पढ़ाई लिखाई में चलताऊ होना | 

इनके अलावा जो तीसरे प्रकार के होते हैं जिनकी संख्या दोनों वाली श्रेणी से अधिक होती है वे भी प्यारे होते हैं मगर एक दूसरे के | मगर कभी कभी कोई शिक्षक या शिक्षिका अपने अलग अंदाज़ के कारण अलग ही बच्चों को अपना प्रिय बना लेते हैं और उससे अधिक वो उन बच्चों के प्रिय हो जाते हैं | ऐसी ही थीं हमारी आठवी कक्षा की एडगर मैम , उनका नाम क्या था न उस समय पता था न ही आज तक पता चला | मगर अंग्रेजी भाषा के कमज़ोर विद्यार्थी उन्हें डर के मारे अजगर मैम कह कर पुकारते थे | कक्षा आठ में पहला परिचय और पहला ही पीरियड इस अंगरेजी और एडगर मैम से हुआ | हमारा और उसमें भी मेरा विशेष रूप से इसलिए हुआ कि उन बच्चों ,जो कक्षा में जोर जोर से पढ़ने के डर के मारे पसीने पसीने हो जाते थे ,उन बच्चों में से एक बच्चा मैं भी था | 

पहला सबक मिला एक डिक्शनरी खरीद कर अगले दिन से कक्षा में लाने का आदेश (डिक्शनरी अब तक मेरे पास है ,और अंग्रेजी से अंग्रेजी भाषा के शब्दार्थ वाली है ) फिर उसके बाद तो शायद ही कोई पीरियड ऐसा गुजरता हो जब बीच कक्षा में खड़े होकर ,जहाँ से मुझ से पहले वाले सहपाठी ने ख़त्म की वहीं से , पाठ को जोर जोर से पढ़ने का अनवरत अभ्यास | पहले पहल बड़े अक्षरों को एक बार में भी न पढ़ पाने ,उच्चारण का पूरा क्रिया कर्म कर डालने के कारण मनोरंजन का पात्र बने हम कब धीरे धीरे अंग्रेजी पढ़ने समझने और उसे बेहतर करने में पारंगत हुए पता ही नहीं चला | दसवीं कक्षा में आकर भी अंग्रेजी ने नहीं डराया जो हलकान किया वो कम्बख्त गणित ने ही किया | 

असली कमाल तो शुरू हुआ कक्षा 11वीं में जहां इस गणित विज्ञान के चक्रव्यूह से निकल कर अपने पसंदीदा विषयों हिंदी अंग्रेजी इतिहास अर्थशास्त्र राजनीतिशास्र व  मनोविज्ञान जैसे विषयों को पढ़ने समझने का मौक़ा मिला | ये एडगर मैम द्वारा पढ़ाए गए और उससे अधिक उनके द्वारा जगाए आत्मविश्वास का ही परिणाम था कि मेरे जैसा विद्यार्थी स्नातक में अँग्रेजी प्रतिष्ठा के साथ अपने महाविद्यालय में दूसरे स्थान पर उत्तीर्ण हो सका | आज भी मन ही मन मैं उनको बार बार प्रणाम करता हूँ और शायद ही कोई दिन जाता हो जब मैं उन्हें न याद करता होऊं | बच्चों को अपनी आठवीं कक्षा की वो डिक्शनरी दिखाते ही उनकी प्रतिक्रया देखने लायक होती है | 

ये उन दिनों की बात थी 

सोमवार, 26 अगस्त 2019

चिट्ठा चर्चा दोबारा शुरू -हिंदी ब्लॉगिंग को दोबारा लौटाने का एक प्रयास



जैसे जैसे ब्लॉगिंग की तरफ लौट रहा हूँ तो देख रहा हूँ कि हिंदी ब्लॉगिंग का प्रवाह सच में ही बहुत कम हो गया है | हालत ये है की पूरे दिन में यदि पचास पोस्टें भी नज़रों के सामने से गुज़र रही हैं तो उसमें से दस तो वही पोस्टें हैं जो इन पोस्टों के लिंक्स लगा रही हैं |   
टिप्पणियों का हाल तो और भी खस्ता है | अधिकाँश पोस्टों पर सिर्फ यही देखने पढ़ने को मिल रहा है की आपकी पोस्ट का लिंक फलाना ढिमकाना में लगाया गया है आकर जरूर देखें | जबकि पोस्टों को चुनने सहेजने वाले ब्लॉगर मित्र खुद अपनी राय तक नहीं दे रहे हैं वहां |
समाचारों को ब्लॉग पोस्ट में चस्पा करके लगातार जाने कितनी ही पोस्टों का प्रकाशन किया जा रहा है | विषयवार सामग्री तलाशने वालों के लिए ये निश्चित रूप से निराश करने वाली बात है | सभी ब्लॉगर मित्र एक साथ धीरे धीरे ही सही प्रयास शुरू करें तो ये महत्वपूर्ण विधा फिर से अपनी रफ़्तार पकड़ लेगी मुझे पूरा यकीन है |
अपने स्तम्भ ब्लॉग बातें के लिए मुझे एक विषय पर गिन कर दस पोस्टें भी पढ़ने को नहीं मिलीं | फिलहाल मैं अपने इसी ब्लॉग झा जी कहिन पर चिट्ठा चर्चा (सिर्फ पोस्टों के लिंक्स नहीं ) शुरू करने जा रहा हूँ | जहाँ पोस्टों को पढ़ कर उनका विश्लेषण व चर्चा करूँगा , एक पाठक के रूप में एक ब्लॉगर के रूप में भी और ये काम बहुत जल्द शुरू करूंगा
 आप तमाम मित्र मुझे अपने ब्लॉग के लिंक अपनी पोस्ट के लिंक और ब्लॉग से सम्बंधित कुछ भी मेरे मेल में ,मेरे फेसबुक पर ट्विट्टर कहीं भी थमा सुझा सकते हैं | इस विधा को दोबारा से अपनी रवानी में लाने के लिए निरंतर किए जाने वाले इस प्रयास में मुझे आप सबका साथ चाहिए होगा , आप देंगे न साथ मेरा
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बुधवार, 21 अगस्त 2019

दोस्ती ज़िंदगी बदल देती है




कहते हैं कि संगत का असर बहुत पड़ता है और बुरी संगत का तो और भी अधिक | बात उन दिनों की थी जब हम शहर से अचानक गाँव के वासी हो गए थे | चूंकि सब कुछ अप्रत्याशित था और बहुत अचानक हुआ था इसलिए कुछ भी व्यवस्थित नहीं था | माँ और बाबूजी पहले ही अस्वस्थ चल रहे थे | हम सब धीरे धीरे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे और भरसक प्रयास कर रहे थे कि किसी तरह से सब कुछ बिसरा कर आगे बढ़ा जाए |
चूंकि शहर से अचानक आया था और तरुणाई की उस उम्र में वहां तब तक कोई दोस्त नहीं बन सका था | गाँव के बहुत से अनुज जिनमें बहुत से चचेरे भाई थे वे सब दोस्त की तरह होते जा रहे थे | गाँव में होने के बावजूद आदतन पहनवा आदि शहरी जैसा ही था | शर्ट को पैंट के अंदर रखना , बेल्ट लगाना , गाँव से बाहर जाते समय जूते पहनना | कुल मिलाकर कोई दूर से ही देख कर समझ सकता था कि हम ग्रामीण परिवेश से अलग हैं | यही बात उस समय गाँव के कुछ हमउम्र लड़कों को नहीं भा रही थी |
इनमें से एक युवक थे संजीव ,जिनके पिताजी उस समय गाँव के सबसे रसूखदार ,जमींदार और धनवान व्यक्ति थे | संजीव की परवरिश लाड प्यार से हुई थी और बोर्डिंग स्कूल आदि में भी रहे थे सो ज़ाहिर तौर पर बहुत अधिक शरारती , उद्दंड थे | छोटी छोटी बातों पर मारपीट कर लेना झगडा कर लेना उनकी आदत थी | हमारी निकटता की शुरुआत भी एक ऐसी ही झड़प से हुई जो मेरे लिए बिलकुल नई बात थी | संयोगवश संजीव के सबसे कनिष्ठ चाचा जी ,जिन्हें हम प्यार से भैया बुलाते थे , बात उन तक पहुँच गयी और उन्होंने संजीव को बहुत डाँट लगाई |
मगर असली कहानी तब शुरू हुई जब एक रात गाँव में पड़ी डकैती की घटना में उन भैया की ह्त्या कर दी गयी | पूरा गाँव उबाल खा गया और संजीव अब पहले से अधिक उग्र हो चुके थे | देशी कट्टे और जाने कैसे कैसे हथियार से लैस होकर बिलकुल दिशाहीन होकर पढ़ाई लिखाई त्याग कर एक अलग ही राह पर चल पड़े थे | अपने कुछ साथियों के साथ ही बिलकुल बिगड़ैल और असंतुलित | एक बहुत बड़ी दुर्घटना का शिकार भी और जान जाते जाते बची |
उनके चाचा और हमारे भैया के अचानक चले जाने के बाद हम दोनों के बीच का वैमनस्य जाता रहा | संजीव अब हमारे साथ ज्यादा समय गुजारते | हमारे मंडली में मैं और मेरे चचेरे अनुज समेत मेरे जैसे ही कुछ मित्र थे | हम शाम को बैठ कर बातें करते ,इधर उधर ,गाँव घर ,राजनीति ,समाज ,काली पूजा आदि की | धीरे धीरे संजीव ने अपने उन बिगड़ैल साथियों के साथ करीबी कम कर हमारे साथ नज़दीकी बढ़ा ली | चूंकि घर पर उनके लिए हमेशा चिंता बनी रहती थी सो हम भी यही कोशिश करते कि वो घर पर ज्यादा समय दें | हम खुद भी झिझकते हुए उनके घर पर जाने लगे | एक दिन संजीव के पिताजी (हमारे विद्या भैया ) ने कहा कि ,जब से संजीव आप लोगों के साथ समय बिताने लगा है मेरी चिंता उसको लेकर थोड़ी कम हो गई है | सच कहूं तो निश्चिंत सा रहने लगा हूँ | वो उनसे ज्यादा हमें संतोष देने वाली बात थी |
बाद में हम एक साथ काँवड़ लेकर वैद्यनाथ धाम जाते रहे तो कभी उनकी छोटी बहन के विवाह में हम सब संजीव के साथ कंधे से कन्धा मिला कर ऐसे डटे कि ग्रामीण भी भौंचक्के रह गए | उन दिनों उनके विवाह में जाने के लिए अपनी ज़िद पर वे हमारे लिए अलग से एक कार का इंतज़ाम कर बैठे | आज संजीव गृहजिले मधुबनी में एक रसूखदार भू व्यवसायी के रूप में स्थापित हैं | अपने छोटे से परिवार में दो सुपुत्रों के साथ पूर्ण गृहस्थ जीवन बिता रहे हैं | संजीव के बाबूजी हमारे विद्या भैया दस वर्षों तक गाँव के मुखिया रहे व अब संजीव की माता जी हमारे गाँव की मुखिया हैं |
संजीव की दिलेरी , साहस और जीवटता को यदि उस समय गलत दिशा में जाने से नहीं रोका जा पाता तो ये कहानी मैं आपको नहीं सुना पाता। ......... हाँ ये उन दिनों की बात थी

बुधवार, 2 जनवरी 2019

साल ये भी कुछ तो नया होगा .....





इस जीवन में यूं तो हर पल नया होता है और ये इस मायने में भी होता है कि हमारे आसपास कुछ कुछ न भी हो तो भी जो बीत जाता है वो स्वयमेव पुराना हो जाता है और स्वतः ही सब कुछ नवीन यानि नया हो जाता है | और ये उसी तरह से जरूरी भी है जिस तरह से कुछ नया याद रखने के लिए पुराना भूलना बहुत जरूरी होता है | 

यहाँ एक दिलचस्प बात भी उल्लेखनीय है कि , साल के 365 दिनों में से क्या हमें हर दिन हूबहू याद रहता है ? शायद नहीं ? यकीनन नहीं ? मानव मन अधिकांशतः अपने ज़ेहन में सिर्फ या तो बहुत अच्छी या बहुत बुरी स्मृतियाँ ही सहेज पाता है जो स्वाभाविक भी है | और ऐसा सबके साथ शायद पूरी उम्र होता है | 


नव वर्ष मनाने की परम्परा कब शुरू हुई , कैसे शुरू हुई इसकी भी बहुत सारी कहानियाँ हैं | और अलग अलग सभ्यताओं , समाजों , देशों , क्षेत्रों , ने इस रवायत को अपनी अपनी तरह से मनाना निभाना शुरू किया होगा | हालांकि पूरा विश्व जिस तारीख को नव वर्ष के रूप में मनाता है और मनाता चला आ रहा है वो अंग्रेजी कैलेण्डर के पहले महीने की पहली तारीख होता है | 

इस हिसाब से हम आप अब वर्ष 2019 में प्रवेश कर चुके हैं और बहुत से मायनों में ये साल भी हमारे आपके लिए बहुत सारे ख़ुशी,गम, साधारण , असाधारण , उत्सव , घटनाओं का समावेश लिए होगा | राजनीति , धर्म , सरकार ,प्रशासन , न्यायालय , समाज , लगभग हर क्षेत्र में बहुत सारी नवीन बातों के लिए खुद को तैयार किए रहिये और हाँ खुद को क्यूँ अछूता रखें | हमारे आपके जीवन में भी बहुत कुछ नया होगा इन आने वाले 365 दिनों में | 


तो तैयार हैं न आप इस नए साल में बहुत सारे नए के लिए ......





रविवार, 19 अगस्त 2018

बुलबुल ने बचाया गोरैया को



नन्हीं गोरैया कुकू 


कल शाम तो दिल्ली में बहुत ही तेज़ बारिश हुई , हवा भी उतनी ही तेज़ होने के कारण और ज्यादा मारक साबित हुई | बारिश से हुए जलभराव ने कितना ताण्डव मचाया ये कहने सुनने की जरूरत नहीं | मगर अचानक ही बालकनी में पानी निकालते समय ,अचानक ही इस नन्हीं गोरैया पर पड़ी जो चोटिल होकर बिलकुल मरणासन्न अवस्था में थी |


घर में ढेर सारे खरगोश ,पहाड़ी मूषक ,तोतों ,और उनकी देखभाल करते रहने के कारण बिना देर किये उसे आराम से नर्म रुमाल से उठा कर ,पहले गरमाईश देने की कोशिश शुरू हुई | बुलबुल का हेयर ड्रायर इस समय बहुत काम आया चंद मिनट बाद उसने आँखें खोलीं | मगर पांव में ऊपर से गिरने के कारण ,शायद चोट लग गयी थी | उसकी तीमारदारी में पुत्र आयुष और बुलबुल (जिसने इसका नाम भी रख दिया कुकू ) भी जी जान से लगे हुए थे | अब जब ये नन्ही जान थोड़ी सी और सूख कर होश में आई तो पंख फ़ड़फडाने लगी | फ़ौरन ही इसके लिए रात में एक अस्थायी गर्म घर का इस्तेमाल किया गया और तोतों को दिया जाने वाला आहार और पानी रख दिया गया |


मैं लगभग पूरी रात ही जागता सोता रहा और इस नन्ही जान को देखता रहा | देखा तो आराम से इसी में बैठे बैठे सो गयी | सुबह अपने रंग में आ गयी थी और वही गोरैया वाली फुर्ररर फर्रर्र वाली फुर्ती | अब इसे ऊपर छत पर ले जाकर देखने का समय था | बाहर आते ही फुर्ररर , मगर फिर ठिठक कर बैठ गई | शायद इतनी ऊंची नहीं उड़ी हो ,मगर ये झिझक तोतों की किलकारी सुनते ही दूर ,और कुकू उड़ चली अपनी दुनिया में



मंगलवार, 14 अगस्त 2018

ये कुछ दिनों की बात थी





कुछ दिनों पूर्व

समय करीब शाम के आठ बजे
स्थान : पूर्व दिल्ली की कोई गली

पुत्र आयुष को जुडो कराटे की प्रशिक्षण कक्षा से वापस लेकर लौट रहा हूँ | तीन दिनों से लगातार हो रही बूंदाबांदी ने सड़क को घिचपिच सा कर दिया है | अचानक ही स्कूटी की तेज़ लाईट में सड़क के बीचों बीच कोई औंधा पड़ा है ,रौशनी सड़क पर सिर्फ आती जाती गाड़ियों से बीच बीच में पड़ती छुपती है | लोग आ जा रहे हैं , कोई देखने की ज़हमत नहीं कर रहा |

मैं अचानक ही ब्रेक लगाता हूँ पुत्र आयुष अकचका कर मुझे देखता है | दो मिनट में ही समझ जाता हूँ कि इस बारिश के मौसम में कोई युवक दिन से खूब सारी शराब उड़ेल उड़ेल के खुद को ऐसा कीड़ा/केंचुआ बना चुका है की अब उसे कोई फ़िक्र नहीं नाली में हो या सड़क पर और उसे कोई फर्क भी नहीं पड़ रहा | मैं आदतन तुरंत ही दिल्ली पुलिस को फोन करके पूरी स्थिति बताता हूँ साथ ही ये ताकीद की फ़ौरन ही इसे उठा कर अस्पताल पहुँचायें || मुझे बताया जाता है की पीसीआर की एक गाड़ी उसे देखने निकल चुकी है |

थोड़ी ही देर बाद मेरे फोन पर एक आरक्षी का फोन ,वो मुझसे जगह की बाबत पूछता है और अंदाज़ ये मानो सारी झल्लाहट इस बात की जैसे कोई गुनाह कर दिया गया हो | मेरा स्वर तल्ख़ और अंदाज़ खुरदुरा हो जाता है और फिर मजबूरन "कचहरीनामा खोल"(अपना परिचय देकर ) कर उसे डांटना पड़ता है | वो सॉरी सॉरी कह कर फोन रख देता है |
1 . शहरों में समाज मर चुका है | 
२. पुलिस जो इसी समाज से है ,वर्दी पहनते ही उसकी आत्मा भी मर जाती है (अपवाद के लिए पूरी गुंजाईश है ) | 
३. शराब आज देश की रगों में तेज़ाब बन के बह रहा है |
सोच रहा हूँ की शायद अदालत में कार्यरत होने के कारण स्वाभाविक रूप से निर्भय होकर पुलिस क़ानून मीडिया को बुला कर बात कर लेता हूँ ............
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