फ़ॉलोअर

फ़ेसबुक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फ़ेसबुक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 जुलाई 2017

दिल तो बच्चा है जी



शायद वर्ष 2012 , में जब अचानक की पंजाब भ्रमण के दौरान , नियमति नाई से शेव न करवाने के कारण , उसने भूलवश मेरी मूंछें साफ़ कर दीं तो ये शक्ल निकल आई | कुछ नया और अलग सा महसूस हुआ तो हमने वहीं एक पासपोर्ट सीज फोटो भी खिंचवा ली | संयोग कुछ ऐसा बना कि तब से अब तक लगभग हर जगह जहां भी जरूरत पड़ी , इसी फोटो का उपयोग हुआ | मेरे कार्यालय के नए पहचानपत्र पर भी |

अब मामला यहीं तक रुक जाता तो ठीक था , जाने कितनी ही बार की तरह , आज भी एक मित्र अधिवक्ता , जिनकी नज़र शायद अचानक ही मेरे पहचानपत्र पर पड़ी तो वे भी टोक गए | सर , क्या बचपन की फोटो लगा दी आपने | मैं भी हमेशा की तरह मुस्कुरा कर रह गया | इससे पहले भी बहुत बार , मित्र दोस्त अक्सर शिकायती और उलाहने भरे स्वर में कहे उठते हैं , आप जैसों ने तो उम्र को रोक रखा है , क्या माजरा है |

कुछ नहीं जी , पिताजी का सबसे प्रिय वाक्य था , " ज़िंदगी जिंदादिली का नाम है , मुर्दादिल क्या ख़ाक किया करते हैं " ...सच है सौ फीसदी | ज़िंदगी को भरपूर जीने वालों की नज़र और असर उम्र पर कहाँ होती है | परिश्रम आपको उर्जावान और स्फूर्तमय रखता है | और बचपन से ही खेल कूद मेरी दिनचर्या में शामिल रही है और आदतन जूनूनी होने के कारण , मैं क्रिकेट , फुटबाल , वालीबाल , हॉकी , बैडमिन्टन , के साथ साथ , तेज़ दौड़ , तैराकी , साइकिल चलाना खोखो , कबड्डी सबका खिलाड़ी रहा और इन तमाम खेलों की टीम मेरे बिना नहीं बना करती थी | क्रिकेट में मेरी फिरकी गेंदों ने कई बार विपक्षी टीमों का पूरा पुलंदा बाँध दिया था |

यहाँ दिल्ली में भी नियमति दौड़ से शुरू होकर मामला खो खो , कबड्डी और बैडमिन्टन तक सीमित हो गया , बीच बीच में तैराकी भी | पार्क में मैं बच्चों के साथ खेलना शुरू किया तो , आस पास खेल खिलाने वाले अंकल जी के रूप में बच्चे पुकारने लगे | धीरे धीरे कठिन वर्जिश की भी शुरुआत हो गयी | वर्ष में कुछ महीने शरीर को बिलकुल खुला छोड़ कर फिर अगले कुछ महीनों में खेल कूद वर्जिश से , वहीं ला कर खडा कर देना मुझे खूब भाता है ....और अब वही मौसम फिर करवट लेने लगा है ....मेरे खेलने कूदने दौड़ने भागने के दिन आ रहे हैं ......इंसान के भीतर जो एक बच्चा और बचपन होता है न उसे खुद ही जिंदा रखना होता है , अपनी जिद से और अपने जुनून से .....ज़िंदगी जिंदादिली का नाम है , मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं .....

और ऐसा मैंने आज इसलिए कहा क्योंकि अभी अभी बेटे लाल के साथ कैरम खेल कर .....आ रहा हूँ .....



(फेसबुक  पर लिखी गयी एक टिप्पणी )

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

ये दिल्ली के लौंडे ....कुछ फ़ुटकर नोट्स



http://www.aamaadmiparty.org/sites/default/files/styles/670_x_270/public/jhadu%20chalao.jpg


आज साठ सालों के बावजूद भी अब तक क्यों नहीं ऐसा कोई कानून पहले के राजनैतिक दलो और उनके अगुआओं ने लाने का प्रयास , संजीदा प्रयास किया ..सारी जिम्मेदारी आम आदमी के कंधों पर ही । चुनाव लडने की चुनौती फ़िर जीतने के बाद सबके डर कर पीछे भागने और पहले आप पहले आप वाला नया फ़ार्मूला लगा कर पुन: आम आदमी के कंधे पर ही बोझ लादा गया कि , पुलिस , प्रशासन , कानून , व्यवस्था राजनीति और खुद आम लोगों के विरोध और असहयोग के बावजूद भी सिर्फ़ पचास दिनों में पांच सौ रिपोर्ट कार्ड भी तैयार कर दिए ...अजी छोडिए , लात मारिए इस सरकार को , हम भी यही कह रहे हैं ...लेकिन सिर्फ़ , इतना और भी बताते जाइए कि आखिर बाकी बची हुई पार्टियों को क्यों नहीं ये जिम्मेदारी दी जा रही है कि वे आएं और लाएं न वैसा मजबूत कानून , जो आपके अनुसार ही संवैधानिक और शायद कारगर भी होगा ...बात को घुमा फ़िरा कर कहना मुझे भी नहीं आता इसलिए सीधा और सपाट कहता हूं ....हां भाषाई मर्यादा का ख्याल जरूर रखने का प्रयास करता हूं । शेष सबके अपने अपने मत और अपनी अपनी विचारधारा है जिसका सदैव स्वागत किया जाना चाहिए , आप जिसे भगोडा कह रहे हैं उसे हमने मलाईदार नौकरियों के बाद मलाईदार कुर्सी को भी ठेंगा दिखाते हुए देख लिया है ....अभी तो अपनी बस थोडी सी ...इत्ती सी समझ पे यकीन रखने का मन है वही कर रहे हैं ..
.
दिल्ली की नए नए लौंडों द्वारा बनाई गई अराजक सरकार औंधें मुंह गिर गई , चलो अच्छा हुआ ।ये सत्ताइस बावले अब जो मर्ज़ी करते रहें , बांकी के मिल कर देश के विकास और समस्याओं के लिए यकीनन ही कुछ बेहतर और बडा करके दिखाएंगे , हमें भी पूरा विश्वास है ...और ये बिल था क्या जी ???? फ़ालतू के क्लॉज़ ....पकडे जाने पर सारा माल जब्त ..नौकर चाकर रिश्तेदारों तक की जांच कराने का प्रावधान , कहां अभी साल छ: महीने की सज़ा , जमानत और कहां उम्र कैद ..अबे ऐसा होता है क्या ..दिस इज़ डेमोक्रेटिक कंटरी मैन

...हां संसद ने इससे पहले एक बिल पास किया तो आस्तीन चढा के छोकरे ने कैमरे के सामने ही नानसेंस कहके फ़ाड के फ़ेंक दिया ...सुना एक अलग वाले को लेकर तो चक्कूबाज़ी और मरचाई बम तक चला पाल्लामेंट में ............अरे ऊ ई नहीं किया , ऊ नहीं किया , भगोडा निकला , बेकार था , वोट बेकार गया ...........अब हो गया न ई तो ...चलिए अब आप काम पर लगिए न ...पास करिए लोकपाल विधेयक , महिला आरक्षण विधेयक , न्यायिक सुधार अधिनियम , जित्ते भी हैं फ़ाईल में ..और हां पकड पकड के ठूंसिए जेल में साले चोरों को ,घपले घोटालेबाजों को , हाकिमों और दारोगाओं को ............और नहीं करने का माद्दा है तो ..........तो फ़िर आप गरियाते रहिए ...हर नई सोच , हर नए विकल्प और हर नए प्रयास को
.
आगामी लोकसभा चुनावों में यदि फ़िर से कोई राहु केतु धूमकेतु तीसरा चौथा पांचवा मोर्चा टाईप , भाजपा की कुंडली में आकर नहीं बैठ गई तो यकीनन अगली केंद्र सरकार चलाने की बागडोर भाजपा के जिम्मे ही आएगी , ये दिख और महसूस भी हो रहा है किंतु आजकल जिस तरह से देख रहा हूं ,कि भाजपा के प्रबल समर्थक अपने मिशन 2014 के लिए सकारात्मक और उर्ज़ावान माहौल बनाने की बजाय , जिस तरह से अपनी पूरी ताकत , अपनी पूरी सोच , अपनी पूरा ध्यान सिर्फ़ आलोचना में , वो भी अपने चिर प्रतिद्वंदी कांग्रेस की नहीं बल्कि देश में सिर्फ़ सत्ताइस ..सिर्फ़ सत्ताइस विधायकों वाली पार्टी पर निशाना लगा रहा है उससे तो लगने लगा है मानो भारत चीन पाकिस्तान से मुकाबले की बात छोड कर श्रीलंका भूटान को अखाडे में चुनौती देने की कवायद कर रहा हो .........
.
एक दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली की नई राजनैतिक सोच और विकल्प बनकर उभरने को लेकर अन्य राज्यों के मित्र इतने व्यग्र हैं कि मानो अपने राज्यों में हो रहे नकारात्मक सकारात्मक को छोड कर सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़िरती हुई झाडू पर नज़र गडाए बैठे हैं , इत्तेफ़ाकन कि हम जैसे दिल्ली में बैठे , हम जैसे दोस्त फ़र्क को महसूसते हुए इस परिवर्तन के प्रयास को निरंतर बल दे रहे हैं वहीं अन्य प्रांतों के मित्र भी लगातार ही दिल्ली राजनीति के इस नए प्रयोग को पूरी तरह फ़ेल करार देने के लिए उद्धत हैं , अच्छा है , अगर ये प्रयास पूरी तरह से दम भी तोड देता है तो भी ये कम से कम इतना तो स्पष्ट कर ही देगा कि अब इस देश में सियासत की सूरत बदलने की सोच रखना बेमानी साबित होगा , वे कुछ भी नहीं हारेंगे , उन्होंने जीता ही क्या अब तक ..............
.
मैं हमेशा इस बात में यकीन रखता हूं कि यदि हमें किसी बात ,व्यक्ति , व्यवस्था , आदि का विरोध करना है तो बेशक करना ही चाहिए , लेकिन क्या ये जरूरी है कि हम उसमें लेखकीय भाषा की थोडी सी भी गरिमा तो बनाए रखें , आखिर हम यहां उस अंतर्जाल पर लिख पढ रहे हैं जहां हिंदी में जो थोडा बहुत लिखा जो लिखा जा रहा है हम भी उसका एक हिस्सा हैं , गरियाने का मतलब ये थोडी है कि आप गली मोहल्ले को यहीं खडा कर लें ।

और हां किसी भी बहस से परे और बहुत सारी बहस के बावजूद मैं आपसे यही कहूंगा कि यदि व्यवस्था में रहकर , व्यवस्था से लडने वाले इन जैसे कुछ पागलों , बावलों पर आप यकीन नहीं करेंगे , और कोई जबरन नहीं कहेगा यकीन करने को ये तय है , तो फ़िर निश्चित रूप से आपको ये अधिकारपूर्वक कहना ही होगा कि व्यवस्था दूषित और भ्रष्ट नहीं है , बल्कि हम सब ही धूर्त , झूठे और भ्रष्ट होने को तत्पर हैं ।
.
कुछ अराजकतावादियों द्वारा पेश किया गया अंसवैधानिक बिल के पेश ही न हो पाने से ये हुआ है कि अब दिल्ली वालों बिजली पानी के सारे अंबानी मार्का संवैधानिक बिल मिल सकेंगे , जल्दी ही प्रदेश पूरी तरह से संवैधानिक व्यवस्था से चुस्त दुरूस्त दिखाई देगा , कोई छापेमारी , कोई स्टिंग फ़िटिंग का चक्कर नहीं , दरोगा जी भी खुश और हाकिम भी ,,,..बकिया बचा आम आदमी ..........ऊ झाडू लगाएगा , लगाते रहो

......
जरा उन लोगों को भी याद दिलाता चलूं कि इन सबके बीच उस गृहिणी की भी सोचिए कि जिसके पति पर बडका बंगला मांगने के बाद छोटका में रहने के लिए अभी जुम्मे जुम्मे आठ दिन भी तो नहीं हुए और वही क्यों पूरी बटालियन ही तो अभी शिफ़्ट हुई , अभी तो सामान जमाया भी नहीं होगा ठीक से , फ़िर वापस ....ई नाजुक जिगरे वाले के बस का नय है जी ..ई बौरहवा सब इकट्ठा हो रहा है ....भारी .............बहुत भारी पडने वाला है
.
चलिए तो फ़िर आज ये भी खुल्लम खुल्ला तय करते है सचमुच ही सियासत चाहती है कि अब सडक पे रहने मरने वाला हर आम आदमी खुद उससे पंजा लडाए तो यही सही, दिल्ली को गरियाने वाले तमाम दोस्तों को पुन: आमंत्रण कि देखिए ,अगले फ़िर मैदान में आ गए हैं .....जम के गरियाइए
.
देखिए जी अगर समाज से गंदगी को काटकर फ़ेंकना चाहते हैं तो फ़िर तेवर तेज़ाब सा रखना ही होगा , तेल लेने जाए कुर्सी और पोस्ट , सरकारी नौकर को खूब पता होता है छोटी बडी नौकरी का फ़र्क , ये नौकर हैं , मालिक नहीं हैं , इसलिए निश्चित रूप से यदि व्यवस्था ओह , मेरा मतलब संवैधिनिक व्यवस्था को ऐसा लग रहा था कि सिर्फ़ जांच की बात कह जाना और जांच की आंच को धधकाए रखना सरासर अराजक है तो फ़िर ऐसे नौकरों को यकीनन ही अब पद को ना कह देना ही श्रेयस्कर है .....आम आदमी को अब ये भी दिखा देना चाहिए कि हमारे ठैंगे से ..लो रखो अपनी कुर्सी और खेलो सरकार सरकार
.

चलिए जी तो अब ये लगभग तय हो गया है और जैसा कि मैं अपने स्टेटस में इस सरकार के बनने के पहले दिन से कहता आ रहा हूं कि इस सरकार द्वारा धडाधड दर्ज़ कराई जा रही वैधानिक और सही शिकायतें, जिनके बारे में निश्चित रूप से हर भारतीय थोडा बहुत जानता है या अंदाज़ा लगा लेता है , जितनी पैनी होती जाएगी इस सरकार की मैय्यत का दिन उतना करीब होता जाएगा , तो अब ये तय हो गया कि आज और अभी के बाद से दिल्ली में कुछ भी अराजक नहीं हो पाएगा , सब कुछ 42 घनघोर संवैधानिक लोगों के हाथ में बागडोर आ गई है , हद है साला अईसा भी कोई करता है क्या कि सोटा ऐसा तैयार किया जाए कि जिसे शक्लों और रुतबों की पहचान ही न हो और हो तो उलटा बिफ़र के दुगने वेग से पीठ पर पडे ..........कल से सब कुछ संवैधानिक होगा लेकिन ई भांड मीडिया को देखिए , अजबे बाजीगरी है , साला आज टोटल बहस चरस में बह गया जईसे , सब झाडू खाने वहीं पहुंचा हुआ है , अबे साले इत्ते बेसरम हो कईसे बे , एक्के घंटा पहिले गरियाते हो अगले में सीधा दंडवत दिखते हो
...माने सब कुछ मार्केटवे तय कर रहा है क्या बे
.
हम आज साला उस जगह को पक्का खोज के ही दम लेंगे जहां से ई रोजिन्ना का "डे" सब डिकलियर किया जाता है , अरे हद है जी , हम लोग को अपना डे मनाने का साला चांसे नय दे रहा है ...नाखून डे से लेकर दातुन डे तक धडाधड मन रहा रोज़ के रोज़ लोगबाग इत्ते बिज़ी हो चले हैं ..हमसे तो रोज़ छूट जा रहा है ..नौकरी डे आ घर का ड्यूटी डे गजब बजाते हैं रोज़ ...हर डे डिफ़रैंट होता है ..हर डे एकदम खास होता है , जैसा पहले कभी नहीं होता न बाद में होता है ...............
.
ऑन ए सीरीयस नोट मुझे ऐसे वक्त पे एक खास बात जो ध्यान आती है वो ये कि आखिर आज़ादी के साठ बरस बाद भी हमें सर्वोच्च न्याय पाने के लिए बहुत ही कम फ़ैसलेकार अब तक मिल रहे हैं और ठीक ऐसा ही कुछ जनप्रतिनिधियों के मैथ का भी है ..अबे इतने बडे पेट वाले देश के पास सोचने करने के लिए क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ साढे पांच सौ लोग ही होने चाहिए , क्यों नहीं पांच हज़ार या शायद उससे भी ज्यादा...........कम लोगों पर कुछ ज्यादा दबाव डाल कर हम उनपर कुछ ज्यादा ही डिपेंडेंट नहीं हो गए हैं ......साला नौकरी सरकारी है , वो भी सिर्फ़ पांच साल की ..और कमाल देखिए कि ..भाई लोगों ने पुश्तैनी बना डाला है ...........मिर्ची और चाकू ..धंधे में ही चलाए जाते हैं ...नौकरियों में चाकूबाजी नहीं हुआ करती ..............और हां एक आखिरी बात ..अराजकता इसे कहते हैं .......माने कि ओसहिं बताए हैं

बुधवार, 28 अगस्त 2013

लिखतन लिखतन जग मुआ , हाय पोस्ट पढे न कोय ........





एक टैम हुआ करता था जब पोस्ट के आने से पहले ही टीप मिल जाया करती थी । अरे हंसिए मत जी एक वाकया तो हमें भी याद है । ये उन दिनों की बात थी जब ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत नाम के दो धुरंधर एग्रीगेटर न सिर्फ़ धुंआंधार आती पोस्टों बल्कि टिप्पणियों को भी मुख्य पेज पर दिखाता था । तो ऐसे ही एक समय में एक पोस्ट आई जिसमें गलती से सिर्फ़ शीर्षक भर ही था भीतर कुछ नहीं लिखा था , इससे पहले कि पोस्ट एडिट होकर दोबारा आती इधर दे धडाधड टिप्पणियों ने अपना काम कर दिया था । वो बेहद रोचक दौर था और मुझे ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि ब्लॉगवाणी पर दिखती उन दिलचस्प टिप्पणियों के कारण भी पाठक कई बार उन पोस्टों पर पहुंच जाते थे जिनपर शायद पहले नहीं पहुंचे होते थे । 


आज की तुलना में उन दिनों ब्लॉगों और ब्लॉगरों की संख्या कम थी लेकिन फ़िर भी कुछ ब्लॉगर जो न सिर्फ़ पोस्ट लिखने में बल्कि टिप्पणियों में भी बहुत नियमित हुआ करते थे जैसे कि आज भाई प्रवीण पांडेय जी अक्सर ब्लॉग पोस्टों पर टिप्पणीकर्ताओं की कतार में दिख ही जाते हैं वैसे ही । हम भी उस समय कुछ ऐसे ही कमर कस कर ब्लॉगिंग में लॉगिंग किए बैठे रहते थे कि या तो लिख रहे होते थे या  टीप रहे होते थे । और फ़िर होता भी क्यों नहीं , उस समय कौन सा ब्लॉगिंग की ये पैदा हुई सौतें , फ़ेसबुक , ट्विट्टर आदि इत्ती फ़ैशन में थीं ले देकर ऑरकुट और उसकी कम्युनिटीज़ थीं , मगर ब्लॉगिंग का तोड बनने का माद्दा कहां था उनमें । 

ऐसा नहीं था कि ब्लॉगिंग में मंदी का दौर नहीं आया,  आता जाता रहता था जी , लेकिन उसकी भरपाई के लिए हम सब ब्लॉगर खुदही कोई न कोई उठापटक वाला एंगल निकाल के दंगल शुरू कर लेते थे , फ़िर तो बात टिप्पणी और प्रतिटिप्पणी से शुरू होकर पोस्ट प्रतिपोस्ट , आरोप प्रत्यारोप तक पहुंच के माहौल को कुछ इस तरह से गर्म कर देती थी कि मज़ाल है जो कोई पोस्ट लिखने या टिप्पणी करने के अपने ब्लॉगरीय फ़र्ज़ से ज़रा भी चूक जाए । उन दिनों इसमें , होने वाली ब्लॉग बैठकियां , मिलन , आदि ने और बाद में पुरस्कार और पुरस्कार के तिरस्कार ने भी काफ़ी अहम भूमिका निभाई थी । हालांकि इन अचूक अस्त्रों पर तो हमें अब भी पूरा भरोसा है , यदा कदा बमबार्डिंग तो हो ही जाती है ।


इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्लॉगिंग की इन सौतनों , खासकर फ़ेसबुक ने तो ब्लॉगरों के एक बडे समूह को जैसे हाइजैक ही करके रख लिया  , उनमें से तो एक हम खुद ही रहे । लेकिन ऐसा नहीं है कि ब्लॉगिंग की या ब्लॉगरों के आगमन की रफ़्तार थमी । कहते हैं न खाली हुए स्थान को भरने के लिए कोई न कोई आ ही जाता है । आज देखा जाए तो ब्लॉगरों की एक नई पीढी पूरी शिद्दत से महफ़िल जमाए हुए है । न सिर्फ़ खूब लिखा पढा जा रहा है बल्कि अब तो देखता हूं कि लिंक्स को सहेज़ कर एक साथ प्रस्तुत करने वाले प्रयास भी काफ़ी किए जा रहे हैं |


""एक बात जो सबसे ज्यादा खटक रही है वो ये कि सुबह से शाम तक जाने कितनी ही पोस्टें लिखी जा रही हैं , वो भी बेहतरीन और नायाब पोस्टें , एक से बढकर एक , अलग अलग विषयों और क्षेत्रों पर , मगर कई दिनों बाद भी उन पोस्टों पर पहुंचने के बाद भी वे अनछुई अनपढी सी लग रही हैं , हम पढ कम रहे हैं या टिप्पणी नहीं कर रहे हैं । कारण जो भी हो , मगर ब्लॉग लेखकों के ये कहने के बावजूद कि इससे कोई फ़र्क नहीं पडता कि कोई पढे न पढे टीपे न टीपे , मुझे लगता है फ़र्क पडता तो है । मैं अपनी पुराने अंदाज़ और रफ़्तार में आने जा रहा हूं , देर सवेर आपको अपनी पोस्टों में प्रतिक्रिया देता , कुछ कहता , लिखता , दिख ही जाउंगा , जो साथी नियमित हैं वे तो मिलेंगे ही , मुझे उम्मीद है कि आप सब कहीं न कहीं टिप्पणी प्रतिटिप्पणी में भी मिलेंगे ...................मिलेंगे न "
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...